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Friday, June 27, 2014

विषयों के त्याग से पूर्ण योगाभ्यास संभव-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन लेख(vishayon ke tyag ka poorn yogabhyas sanbhav-A hindu hindi religion thought based on patanjali yoga literature)



            हमारा योग दर्शन अत्यंत पुराना है और उसका मूल स्वरूप आत्म नियंत्रण के लिये  आंतरिक क्रियाओं से जुड़ा है। उसमें आसनों साथ व्यायाम जुड़ा नहंी दिखता। हालांकि वर्तमान काल में जब लोगों का जीवन अत्यंधिक श्रमवान नहीं है तब इन व्यायामों की आवश्यकता है और नये योग शिक्षकों नेे इस विषय के  साथ सूर्यनमस्कार, वज्रासन और पद्मासन जैसी प्रभावशील क्रियाओं को जोड़ा है तो अच्छा ही किया है।  चूंकि देह की सक्रियता इन आसनों से दिखती है तो करने और देखने वाले को अच्छी लगती है।  यही कारण है कि प्राचीन योग के साथ नया स्वरूप उसे लोकप्रिय बना रहा है। यह अलग बात है कि लोग बाह्य रूप पर अधिक ध्यान दे रहे हैं पर उसके आंतरिक प्रभाव का ज्ञान उन्हें नहीं है। दरअसल योग का मूल आशय सांसरिक विषयों से परे होकर साधना करने से है। अभ्यास से ऐसी स्थिति हो जाती है कि आदमी संसार के विषयों में कार्यरत दिखता है पर उसमें आसक्ति नहीं रह जाती। यह कर्मयोगी का श्रेष्ठ रूप होता है।
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः।
ततः क्षीयते प्रकाशवरणाम्।।
धारणासु च योग्यता मनसः।।
स्वविषयास्प्रयोग चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः।
            हिन्दी में भावार्थ-बाहर और भीतर के विषयों के चिन्त्तन का त्याग कर देना अपने आप में चौथा प्राणायाम है। उससे सांसरिक प्रकाश का आवरण क्षीण हो जाता है। ज्ञान की धारणा से मन योग्य हो जाता है। अपने विषयों से रहित हो जाने पर इंद्रियों का चित्त से जो संपर्क होता है वही प्रत्याहार है।
            हमने देखा है कि अनेक लोग प्रचार माध्यमों में योग के बारे में पढ़ और सुनकर समूह बनाकर  साधना करते हैं। इस दौरान वह सांसरिक विषयों पर बातचीत करते हैं।  कहीं पार्क में बैठ गये और हाथ पैर हिलाने लगे।  दावा यह कि योग कर रहे हैं। वैसे प्रातः घर से बाहर निकलना ही अपने आप में एक अच्छी किया है जिसका लाभ अवश्य होता है पर इस दौरान वार्तालाप में अपनी ऊर्जा नष्ट करना ठीक नहीं है। उससे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह कि जिन सांसरिक विषयों से बाद में जुड़ना उनका स्मरण करना प्रातःकाल सैर करने पर मिलने वाले मानसिक लाभ से वंचित करता है।  अनेक लोग समूह में बैठकर हाथ पैर हिलाकर योग कर का दावा अवश्य करें पर उनको यह मालुम नहीं है कि वह स्वयं को ही धोखा दे रहे हैं।
            भारतीय योग संस्थान योग साधना का अभ्यास कराने के लिये निशुल्क शिविर चलाता है। उसके शिविर में योग का जो अभ्यास कराया जाता है पर अभी तक विधियों में अत्यंत श्रेष्ठ है। श्रीमद्भागवत में त्रिस्तरीय आसन की चर्चा होती है। पहले कुश फिर उस पर मृगचर्म और फिर वस्त्र बिछाकर सुख से बैठना ही आसन बताया गया है।  भारतीय योग संस्थान के शिविरों  उसकी जगह प्लस्टिक की चादर, दरी और फिर कपड़े की चादर को आसन बनाकर योगाभ्यास कराया जाता है। इस तरह के अभ्यास से देह, मन और विचारों में शुद्धि आती है।
            इस तरह के अभ्यास के बाद श्रीमद्भागवत गीता के एक दो श्लोक का अध्ययन अवश्य करना चाहिये।  उससे यह बात समझ में आ जायेगी के वास्तव में विषयों का त्यागकर अभ्यास करना ही योग है। अगर आसन तथा प्राणायाम के समय भी विषयों के प्रति आसक्ति बनी रहे तो समझ लेना चाहिये कि हमें अधिक आंतरिक अभ्यास की जरूरत है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, June 14, 2014

बड़ा काम करने पर छोटे आदमी को प्रशंसा की आशा नहीं करना चाहिये-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन लेख(bada kam karnea par chhote aadmi ko prashansa ki aasha nahin karna chahiye-A hindi hindu religion thought based on chankya policy)



            जिस तरह प्रकृत्ति नियमों में बंधकर चलती है वैसे ही यहां विचरने वाले जीव भी अपनी मूल प्रकृत्ति के साथ ही रहते हैं। इस प्रकृत्ति और जीवन को बांधने वाले तत्वों का समझने वाला ही ज्ञानी है। सत्य के साथ जीवन बिताने वाला कभी भी अपने अंदर किसी भी हालत में कष्ट का अनुभव नहीं करता।
            आमतौर से मनुष्य का यह स्वभाव होता है कि वह अपनी शक्ति, योग्यता तथा पराक्रम से अधिक वस्तु पाने की कामना करता है। कई लोगों में प्रतिष्ठित हस्तियों की तरह महत्व पाने का लोभ पैदा होता है।  हम देखते भी हैं कि फिल्म और टीवी में कथित सामाजिक धारावाहिकों में अनेक ऐसे पात्र सृजित किये जाते हैं जिनका आधार केवल कल्पना ही होती है पर देखने वाले अनेक कमजोर मानसिकता वाले लोग वैसा ही जीवन जीने का सपना देखते हैं।  यही कारण है कि अनेक लोग उलूल जुलूल हरकते कर मजाक का पात्र बनते हैं।  अनेक लोग तो अपनी हरकतों की वजह से जान भी गंवा बैठते हैं।  उन्हें यह समझाना कठिन है कि जीवन और प्रकृत्ति के नियम अलग ही है। मनुष्यों का समूह मूल रूप से इस प्रकृत्ति का है कि वह खास को ही तवज्जो देता है और अपनी तरह आम आदमी की कभी प्रशंसा नहीं कर सकता।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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अयुक्त्तं स्वामिनो युक्त्तं युक्त्तं नीचस्य दूषणम्।
अमृतं राहवे मृत्युर्विषं शंकर भूषणम्।।
            हिन्दी में भावार्थ-धन, उच्च पद और बाहुबल के स्वामी यानि समर्थ व्यक्ति का अनुचित कार्य भी उचित माना जाता है जबकि असमर्थ या छोटे आदमी का बड़ा काम भी महत्वहीन माना जाता है। अमृत राहु के  कंठ के लिये कंटक तो विष भगवान शंकर के लिये आभूषण बन गया था।
            आजकल हर बड़ा कार्य पैसे की दम पर ही होता है यही कारण है कि लोग येनकेन प्रकरेण उसे कमाना चाहते हैं।  उन्हें उचित या अनुचित साधनों की चिंता नही होती।  किसी ने अगर गलत काम कर पैसे कमा लिये तो वह प्रतिष्ठित मान लिया जाता है।  हमारे देश में भ्रष्टाचार का रोना सभी रोते हैं पर कभी कोई आम आदमी अपने आसपास किसी धनिक के भ्रष्ट होने पर उसके समक्ष प्रतिकूल  टिप्पणी करने का न साहस करता है न उसकी इच्छा ही होती है।  सच बात तो यह है कि हमारे देश में धर्म, कर्म, कला, साहित्य तथा अन्य बड़े कार्यक्रम बिना दो नंबर के धन के हो ही नहीं सकते पर लोग उसमें अधिक संख्या में शामिल होते हैं।  यह प्रदर्शन है वहां भीड़ जमा होती है जहां सादगी है वहां कोई नहीं जाता।
            कहने का अभिप्राय यही है कि ज्ञान साधकों को हमेशा अपनी चादर देखकर ही पांव फैलाने के सिद्धांत का पालन करते हुए यही मानना चाहिये कि उनकी प्रतिष्ठा में इससे अधिक वृद्धि नहीं होगी। अगर वह कोई भला काम करते हैं तो उन्हें उससे किसी प्रकार की प्रतिष्ठा पाने का मोह भी नहीं रखना चाहिए।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, June 7, 2014

तीन दोष मनुष्य का नाश कर देते हैं-विदुर नीति के आधार पर चिंत्तन लेख(teen dosh admi ka nash ka dete hain-A hindi hindu religion message based on vidur neeti)



            जैसे जैसे विश्व में आर्थिक विकास हुआ है वैसे ही अध्यात्मिक रूप से लोगों में  चिंत्तन क्षमता का हªास भी दिखाई देता है।  मनुष्य में उपभोग की  प्रवृत्ति बढ़ी है पर सहनशीलता कम हुई है। लोग धर्म के नाम पर पाखंड न स्वयं करते हैं वरन् उसकी आड़ में पेशा करने वालों को प्रोत्साहन भी देते हैं।  विश्व में कथित रूप से धर्म प्रचार करने वाले संगठनों की संख्या बढ़ गयी है तो समाज के लिये भी अनेक लोग नाम और नामा कमा रहे हैं। इनके शीर्ष पुरुष अपने आसपास धर्मभीरुओं का जमावड़ा कर लेते है और ुिछ उसकी आड़ में अपने समाज विरोधी गतिविधियों में लिप्त हो जाते हैं।
            ऐसे लोग अपनी सफेद तथा काली गतिविधियों को सहजता से इसलिये भी कर लेते हैं क्योंकि सामान्य लोग अपने ज्ञान चक्षु बंदकर उनका नेतृत्व को अच्छा मानकर पिछलग्गू बन जाते हैं।
विदुर नीति में कहा गया है कि
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हरणं च परम्वानां परदाराभिमर्शनम्।
सुहृदश्चय परित्यागस्त्रयो दोषाः क्षमावहा।।

           
हिंदी में भावार्थ-दूसरे के धन का हरण,  परायी स्त्री से संपर्क रखना तथा सहृदय मित्र का त्याग-यह तीन दोष आदमी का नाश कर देते हैं।
द्वाविमौ पुरुषौ राजन् स्वर्गस्योपरि तिष्ठतः।
प्रभुश्चक्षमया युक्तो दरिद्रश्च प्रदानवान्।।

           
हिंदी में भावार्थ-शक्तिशाली होने पर भी क्षमा करने तथा दरिद्र होने पर भी दान करने वाला मनुष्य स्वर्ग से भी ऊपर स्थान पाता है।
      आजकल सबसे बड़ी समस्या यह है कि आदमी अपने गुण दोषों पर ध्यान नहीं देता। दूसरे के हक मारने से लोग तब रुकें जब उनके पास इतनी चिंतन क्षमता हो कि वह अच्छाई बुराई का निर्णय कर सकें। सभी को अपने स्वार्थ का भान है दूसरे के अधिकार पर कौन ध्यान देता है? हमने कई बार सुना होगा कि किसी ने अनुसंधान से कोई अविष्कार किया तो किसी दूसरे ने अपने नाम से उसे प्रचारित किया। उसी तरह अनेक लोग दूसरों की मौलिक रचनायें अपने नाम से छापकर गर्व महसूस करते हैं। कई लोग दूसरे के परिश्रम के रूप में देय मूल्य से मूंह फेरे जाते हैं या फिर कम देते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि दूसरे का अधिकार मारने में कोई नहीं झिझकता। यह कोई नहीं समझता कि इसका परिणाम कहीं न कहीं भोगना पड़ता है।
      मनुष्य की शक्ति की पहचान उसकी सहनशीलता में है न कि हिंसा का प्रदर्शन करने में। जिसमें शारीरिक शक्ति और मानसिक दृढ़ता की कमी होती है वह बहुत जल्द हिंसक हो उठते हैं। जिन लोगों के पास शक्ति और धीरज है वह क्षमा करने में अधिक विश्वास करते हैं। उसी तरह आजकल धनलोलुपों का हाल है। सभी धन के पीछे अंधे होकर भाग रहे हैं। दिखाने के लिये वह धन का दान भले ही करते हों पर उनके लिये पुण्य कमाना दुर्लभ है क्योंकि उनका धन उचित मार्गों से नहीं अर्जित किया गया। सच तो यह है कि जो मिलबांटकर खाते हैं उनको ही पुण्य मिलता है। जो दरिद्र है वह जब दान करता है तो उसका स्थान स्वर्ग से भी ऊंचा हो जाता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Friday, June 6, 2014

दूसरों के छिद्र देखने वाला हमेशा कष्ट में रहता है-विदुर नीति के आधार पर चिंत्तन लेख(doosron ke chidra dekhne wala hamesha kashta mein rahta hai-A hindu hindi relition message based on vidur neeti)



            मनुष्य का यह सहज स्वभाव होता है कि अपने अंदर गुणों का विकास करने की बजाय दूसरे के दोष दिखाकर अपने लिये प्रशंसा जुटाना चाहता है।  इतना ही नहीं रचनात्मक कार्य में लगे लोगों का समर्थन करने की बजाय समाज उसका मनोबल गिराना चाहता है। सामान्य लोग पूरा जीवन स्वार्थों की पूर्ति में लगा देते हैं पर परमार्थी कहलाने का मोह होने के कारण वह कोई परोपकार करने की बजाय दूसरे के कार्यों को समाज के लिये अपकारी बताकर अपनी छवि बनाना चाहते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि अपनी बड़ी लकीर खींचने की बजाय लोग थूक से दूसरे की खींची लकीर को छोटा करना चाहते हैं।
विदुर नीति में कहा गया है कि
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असूय को दन्दशू को निष्ठुरो वैरकृच्छठः।
स कृच्छम् महदाप्नोति न चिरात् पापमाचरन्।।

       हिन्दी में भावार्थ-गुणों में दोष देखने वाला, दूसरे के मर्म को छेदने वाला, निर्दयी, शत्रुता का व्यवहार रखने वाला और शठ मनुष्य शीघ्र ही अपने आचरण के कारण महान कष्ट को प्राप्त होता है।
अनूसयुः कृतप्रज्ञ शोभनान्याचरन् सदा।
न कृच्छ्रम् महदाप्नोति सर्वत्र च विरोचते।।

      हिन्दी में भावार्थ-दोषदृष्टि से रहित शुद्ध मंतव्य वाला सदा अनुष्ठान तथा पवित्र कार्य करते हुए महान सुख के साथ सम्मान भी प्राप्त करता है
       चाहे कोई कितना भी कहे कि आजकल बुरे काम और गलत मार्ग अपनाये बिना कुछ नहीं मिलता पर यह उसका भ्रम है। जो मार्ग कुऐं की तरफ जाता है और कोई अज्ञानी उस पर चलता चला जायेगा तो वह उसमें गिरेगा ही-वह कोई आकाश में उड़ने का विमान प्राप्त नहीं कर लेगा। यही स्थिति कर्म, व्यवहार और दृष्टि की है।
      दूसरे में दोष देखते रहकर उसकी चर्चा करने रहने से वह दुर्गुण हमारे अंदर भी आ जाता है। हमारे मन में जिस प्रकार का स्मरण होता है वैसे ही दृश्य सामने आते हैं। दूसरे के दोषों का स्मरण करने मात्र से भी वह दोष हमारे अंदर आ जाता है। दूसरे को मर्म भेदने वाली बात कहकर उसे कष्ट देना बहुत बुरा है। किसी के दुःख को उभारने उसके मन में जो कष्ट आता है उसका प्रभाव कहीं न कहीं हम पर भी पड़ता है। इस तरह का नकारत्मक व्यवहार करने वाले लोग न केवल अपने जीवन में विकास से वंचित रहते हैं बल्कि उनको महान कष्ट भी प्राप्त होता है।
    कहने का अभिप्राय यह है  जो  मनुष्य सदा दूसरों में गुण देखते हुए सभी का सम्मान करते हैं उनको अपने काम में न केवल सफलता मिलती है बल्कि समाज में उनको सम्मान भी प्राप्त होता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday, May 28, 2014

यात्रायें तो सपने जैसी होती हैं-हिन्दी चिंत्तन लेख(treval only as a as dream-hindi thought article)



      यात्रा और यंत्रणा-हिन्दी के यह दो शब्द स्वर की वजह से थोड़ा आपस में मेल खाते हैं मगर भाव की दृष्टि से इनका आपस में कोई संबंध नहीं है। यात्रा का उर्दू पर्यायवाची शब्द सफर है जिसे अंग्रेजी के सफर यानि कष्ट से जोड़कर कहा जाता है कि सफर तो सफर होता है। वैसे देखा जाये तो यात्रा का यंत्रणा शब्द को भाव से जोड़ा जाये तो भी बुरा नहीं है। 
      जब हम अपने घर से बाहर की यात्रा करने निकलते हैं तो लगता है कि अब बाहर वैसा सुख तो मिलने से रहा जैसा कि घर में मिल रहा है। यह सोच नकारात्मक लगती जरूर है पर यही प्रेरणादायक भी होती है। यात्रा का उद्देश्य सामाजिक, धार्मिक या आर्थिक लक्ष्य की पूर्ति करना  हो तो स्वतः ही यंत्रणा की बात छोटी लगती है। उस दिन हमें रात्रि को घर से बाहर से निकलते समय इस बात का आभास था कि हम दैनिक सुखों का त्याग कर जा रहे हैं पर अपना उद्देश्य उस भाव का हृदय से विलोपित कर रहा था। यात्रा की यंत्रणा तो हमेशा की तरह प्रारंभ हो गयी जब घर से स्टेशन तक ऑटो ढूंढने निकले।  ऑटो वाला अस्सी रुपये मांग रहा था और हमारा मानना था कि यह राशि साठ रुपये से अधिक नहीं होना चाहिए।  उस समय दूसरा ऑटो दिख नहीं रहा था इसलिये हमें झुकना पड़ा।  अर्थशास्त्र का विद्यार्थी होने के नाते  हमें मांग तथा आपूर्ति का नियम मालुम है इसलिये बीस रुपये ज्यादा देने की पीड़ा हजम कर गये।
      पूरी रात रेल में नींद नहीं आयी और इसलिये कोटा शहर में पूरा दिन सिर दर्द के साथ गुजरा।  यह तो गनीमत थी कि योगभ्यास की वजह से बीच बीच में आसनों से ऊर्जा का संचय करते रहे। नींद नहंी आयी इस पर भी विरोधाभास हो सकता है।  हमें लगता था कि हमें नींद  आयी थी पर सोच यही थी कि नहीं आयी।  यह सोच भी देह का संतुलन बिगाड़ रही थी। हुआ यूं कि हमने लगातार नींद नहीं ली थी।  रात को अनेक बार ऐसा लगता था कि हम अभी जगे हैं पर सोचते थे कि हम सोये ही नहीं हैै।
      भरी दोपहरिया में जब रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ हो गया हो तब आसमान से आग बरसती है और सूर्य नारायण सिर पर इस तरह विराजते हैं कि बस अब भस्म कर देंगे।  देह में ंरोम रोम जल रहा हो तब दिमाग को शंात रखकर ही तनाव से बचा जा सकता है।  इधर गर्मियों में वातानुकूल और गर्म वातावरण के बीच हम झूलते रहे हैं इसलिये जुकाम तो बना ही हुआ है।  भरी दोपहरिया में हम नाक से जुकाम निकालकर बाहर फैंकते हैं।  कई बार गला खंखार का थूक से बाहर वह आ ही जाता है।  रात में अपने घर से लाया गया सात लीटर पानी चूक गया था।  स्टेशन पर ठंडा पानी पिया यह जानते हुए भी कि वह अंदर जुकाम की श्रीवृद्धि करेगा।
      आज सुबह घर लौटे।  रात भर बस में नींद के साथ वैसा ही खेल चला जैसा कि पहले रेल में चला था।  हमें यह यात्रा यंत्रणादायक तो नहीं लगी क्योंकि ऐसे समय में हमें अपनी योगाभ्यास की वजह से  दैहिक शक्ति का परीक्षण करने का अवसर मिल जाता है। देह नहीं थकती पर योगाभ्यास में बाधा की वजह से मन जरूर थक जाता है। इससे ज्यादा इंटरनेट से संपर्क कट जाने की बात मनोरंजन से दूर कर देती है।
      उस दिन पार्क में घूमते हुए एक सज्जन से मुलाकात हुई थी। वह पंद्रह दिन के पर्यटन से वापस आये थे।  कहने लगे कि ‘‘भई, जब हम बाहर से घूमकर थके हारे आते हैं और फिर पार्क मे घूमने का अवसर मिलता है  तो लगता है कि हमारा सारा प्रयास व्यर्थ हो गया।  आनंद तो यहां पार्क में घूमने पर ही मिलता है। हम दूसरी जगह जाते हैं तो जहां ठहरना हो तो  ऐसे पार्क में कहां मिलते हैं?’’
      हमें पता है कि घर के सुख से उकताये आदमी का मन ही उसे बाहर भगाता है। प्रातःकाल योगाभ्यास और सैर करने के बाद मन तृप्त हो जाता है इसलिये हमें बाहर भागने की प्रेरणा नहीं देता। जब आदमी बाहर सुख से उकताता है तो घर की याद सताती है। घर लौटकर वह यही सोचता है कि अपनी यात्रा तो उसने सपने की तरह बिताई।  आज हम यहां थे कल कहीें ओर थे। कल यहीं होंगे जहां हैं। इसका मतलब यह कि हम पांच दिन एक सपना देख रहे थे।
      हमारी यह यात्रा कोटा राजस्थान से जुड़ी थी। वहाँ  चंबल गार्डन और सात अजूबे देखे। हमने ऑटो वाले से कहा था कि सात अजूबे  चलोगो तो वह मुंह देखने लगा। हमने कहां सेवन वंडर जाना है। वह समझ गया।  इन दोनों जंगहों पर हमें पार्क अच्छे लगे पर इनमें जाने पर टिकिट लगता है। मतलब यह कि हम जैसे प्रतिदिन पार्क घूमने जाने वाले के लिये वहां के उद्यान सहायक नहीं है। दूसरी अच्छी चीजों की उपस्थिति हमें भाती नहीं है।  मन करता था कि इन उद्यानों में प्रतिदिन भ्रमण करें पर जब अपनी कॉलोनी के उद्यान में आये तो लगा कि यह कहीं बेहतर है।  कल जो देख रहे थे वह सपना था।  हां यात्रायें एक सपना ही होती है। उनकी स्मृतियां वैसे ही मस्तिष्क से विलोपित हो जाती हैं जैसे कि रात्रि की सपने भूला दिये जाते है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Tuesday, May 13, 2014

प्राणायाम से मन पर नियंत्रण रहता है-पतंजलि योग साहित्य का आधार पर चिन्तन लेख (pranayam se mana par ninantran rahata hai-A hindi thougt based on patanjali yoga litrature)



  जकल भारतीय योग की पूरे विश्व में चर्चा है। यह अलग बात है कि अनेक पेशेवर लोगों ने इस पद्धति का लाभ उठाने के लिये इसका रूप विकृत करने की कोशिश की है। सच बात तो यह है कि योग साधना अंतमुर््खी विषय है जबकि अनेक योग शिक्षक उसे रंगीन बनाने का प्रयास कर रहे हैं।  इस योग के इतने नाम हो गये हैं कि ऐसा लगता है कि इसके अनेक रूप हैं।  जबकि सच्चाई यह है कि योग अपनी देह, मन और विचार स्थिर कर मौन साधना करना ही है।  हालांकि अनेक निष्काम योग शिक्षकों ने इस पर अनुंसधान कर इसे नया रूप दिया है  जिससे  योग साधना के मूल तत्व परिवर्तित नहीं होते वरन् व्यायाम भी अच्छा हो जाता है।  जबकि पेशेवर लोगों ने इसको आकर्षक विषय बनाने के साथ ही बहिमुर््खी बना दिया है।      
            तंजलि योग सूत्र एक प्रमाणिक कला और विज्ञान है। आज जब हम अपने देश में अस्वस्थ और मनोरोगों के शिकार लोगों की संख्या को देखते हैं तो इस पद्धति को  अपनाने की आवश्यकता अधिक अनुभव होती है। पतंजलि योग एक बृहद साहित्य है और इसमें केवल आसनों से शरीर को स्वस्थ ही नहीं रखने के साथ  ही प्राणायाम तथा ध्यान  योग से मन को भी प्रसन्न रखा जा सकता है। यह अंतिम सत्य है कि दवाईयां मनुष्य की बीमारियां दूर सकती हैं पर योग तो कभी बीमार ही नहीं पड़ने देता। योग साधना के नियमित अभ्यास से लाभ कि अनुभूति उसे करने पर ही की जा सकती है|


पतंजलि योग सूत्र में  कहा गया है
प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य।

     हिन्दी में भावार्थ-प्राणवायु को बाहर निकालने और अंदर रोकने के निरंतर अभ्यास चित्त निर्मल होता है।

विषयवती वा प्रवृत्तिरुपन्न मनसः स्थितिनिबन्धनी।।

हिन्दी में भावार्थ-विषयवाली प्रवृत्ति उत्पन्न होने पर भी मन पर नियंत्रण रहता है।
विशोका वा ज्योतिवस्ती।
हिन्दी में भावार्थ-इसके अलावा शोकरहित प्रवृत्ति से मन नियंत्रण में रहता है।
वीतरागविषयं वा चित्तम्।
हिन्दी में भावार्थ-वीतराग विषय आने पर भी मन नियंत्रण में रहता है।

     भारतीय योग दर्शन में प्राणायाम का बहुत महत्व है। योगासनों से जहां देह के विकार निकलते हैं वहीं प्राणायाम से मन तथा विचारों में शुद्धता आती है। जैसा कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते आ रहे हैं कि इस विश्व में मनोरोगियों का इतना अधिक प्रतिशत है कि उसका सही आंकलन करना संभव नहीं है। अनेक लोगों को तो यह भी पता नहीं कि वह मनोविकारों का शिकार है। इसका कारण यह है कि आधुनिक विकास में भौतिक सुविधाओं की अधिकता उपलब्धि और उपयेाग के कारण सामान्य मनुष्य का शरीर विकारों का शिकार हो रहा है वहीं मनोरंजन के नाम पर उसके सामने जो दृश्य प्रस्तुत किये जा रहे है वह मनोविकार पैदा करने वाले हैं।     ऐसी अनेक घटनायें  समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर आती हैं जिसमें किसी फिल्म या टीवी चैनल को देखकर उनके पात्रों जैसा अभिनय कुछ लोग अपनी जिंदगी में करना चाहते हैं। कई लोग तो अपनी जान गंवा देते हैं। यह तो वह उदाहरण सामने आते हैं पर इसके अलावा जिनकी मनस्थिति खराब होती है और उसका दुष्प्रभाव मनुष्य के सामान्य व्यवहार पर पड़ता है उसकी अनुभूति सहजता से नहीं हो जाता।
      प्राणायाम से मन और विचारों में जो दृढ़ता आती है उसकी कल्पना ही की जा सकती है मगर जो लोग प्राणायाम करते और कराते हैं वह जानते हैं कि आज के समय में प्राणायाम ऐसा ब्रह्मास्त्र है जिससे समाजको बहुत लाभ हो सकता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday, May 7, 2014

दीनता के सौंदर्य से दीनबंधु प्रभावित होते हैं-रहीम दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(dinta ke saundarya se deenbandhu prabhavit hote hain-rahim darshan)



            पाश्चात्य संस्कृति तथा शिक्षा के प्रभाव में हमारे यहां समाज सेवा करना एक फैशन बन गया है। जहां पहले लोग दान आदि जैसे काम धार्मिक भावना से ओतप्रोत होकर स्वभाविक रूप से करते थे वहीं अब स्थिति यह है कि समाज सेवा करने वाले एक हाथ से चंदा लेते हैं तो दूसरे हाथ से गरीबों और असहायों की मदद का दावा करते हैं। एक तरह से पूर्णकालिक पेशेवर समाज सेवकों की जमात बन गयी है जिनका दावा यह होता है कि वह निष्काम भाव से परमार्थ कर रहे हैं।  इतना ही नहीं यह समाज सेवक अपनी छवि एक देवपूरुष की बनाकर सम्मान भी प्राप्त करते हैं।  अपनी छवि के लिये चंदे के रूप में प्राप्त धन का उपयोग वह प्रचार माध्यमों में बनाये रखने के लिये भी करते हैं।  इतना ही नहीं उनका कोई व्यवसाय नहीं होता इसलिये वह इसी चंदे से अपना घर भी चलाते हैं।

कविवर रहीम कहते हैं
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दिव्य दीनता के रसहि, का जाने जग अंधु
भली बिचारी दीनता, दीनबंधु से बंधु
      हिंदी में भावार्थ-भगवान की भक्ति दीन भाव से करने पर जो रस और आनंद मिलता है उसे अहंकार में अंधे लोग नहीं समझ सकते। दीनता में जो सोंदर्य है उससे ही दीनबंधु आकर्षित होते हैं।
दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोय
जो रहीम दीनहि लखै, दीनबंधु सम होय
      हिंदी में भावार्थ-जो दीन है वह सबकी तरफ देखता है पर उसे कोई नहीं देखता। जो दीन की ओर देखकर उस पर दया करता है उसके लिये वह भगवान तुल्य हो जाता है।

     पहले समाज की एक स्वचालित व्यवस्था थी जिसमें धनी व्यक्ति के लिये दान का कर्तव्य निश्चित किया गया ताकि जिनके पास धन नहीं है उन्हें प्राप्त होता रहे और समाज में समरसता का भाव बना रहे मगर  अब लोग दान के नाम पर नाक भौं सिकोड़ते हैं या फिर ढिंढोरा पीटकर देते हें जिससे उनको आर्थिक लाभ और सामाजिक प्रतिष्ठा मिले। कुछ धनिक और उनकी संतानों के लिये तो माया शक्ति प्रदर्शन का एक हथियार बन गयी है। जिनके पास धन है उनको समाज में दीन और दरिद्र की तकलीफों का ख्याल नहीं होता और न ही इस बात का विचार होता है कि वह उनकी तरफ अपेक्षित भाव से देख रहे हैं। माया उनको अंधा बना देती हैं और फिर इन्हीं दीनों में से कोई अपराधी बनकर उनकी इसी माया का हरण तो कर ही लेता है और कहीं न कहीं तो शारीरिक हानि भी पहुंचा देता हैं।
      एक बात धनिकों को याद रखना चाहिये कि दीन उनको देखते हैं और उनके व्यवहार से ही उन पर अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में अगर वह स्वयं ही उन पर दया करें तो उनके लिये भगवान बन जायेंगे क्योंकि दीन तो बिचारे सभी तरफ देखते हैं पर उनकी तरफ अगर कोई देखे तो उनका मन प्रसन्न हो जाता है।
      दान करने से आशय यह नहीं है कि कहीं भिखारियों को खाना खिलाया जाये या किसी मंदिर में दान डाला जाये। यह अपने आसपास ही निर्धन और जरूरतमंद लोगों लोगों की सहायत कर भी किया जा सकता है। किसी मजदूर से काम कराकर उसके मांगे गये मेहनताने से थोड़ा अधिक देकर या अपने घर की अनावश्यक पड़ी वस्तु उनको देखकर भी उनका मन जीता जा सकता है। यह संदेश साफ है कि अगर आप धनी है तो आप अपने आसपास के निर्धन लोगों पर कृपा करते रहें तभी आप भी अमन से रह पायेंगे वरन आपको स्वयं ही अकेलापन और असुरक्षा का अनुभव होगा। मतलब यह कि आप दीनबंधु बने तभी आप दीनबंधु को पा सकते हैं। दान देते समय भी अपने अंदर दीन भाव रखना चाहिये और भक्ति करते समय भी। तभी परमानंद की प्राप्त हो सकती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, April 27, 2014

अहिंसक मनुष्य कभी कष्ट नहीं उठाता-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(ahinsak manushya kabhi kasht nahin uthata-manus smriti)



            प्रकृत्ति का नियम है जैसा बोओगे वैसा काटोगे। अहिंसा तथा परमार्थ का मार्ग अपनाने वाले इस बात को जानते हैं कि अपने सत्कर्म कभी न कभी उनके लिये अच्छा परिणाम देने वाले होंगे पर दुष्कर्म करने वालों को अपने भावी दंड का अनुमान पहले से नहीं होता।  श्रीमद्भागवत गीता के गुण तथा कर्म विभाग का अगर ध्यान से अध्ययन किया जाये तो इस बात का ज्ञान हो जाता है कि इस त्रिगुणमयी मायावी संसार में बीज के अनुरूप ही फल प्रांप्त होता है। हर मनुष्य रहन सहन की स्थिति, खान पान के रूप तथा संगति के प्रभाव के अनुसार काम करता है।  हम अक्सर यह सोचते हैं कि अपनी बुद्धि से काम कर रहे हैं पर इस बात का आभास नहीं होता कि देह के तत्वों से वह प्रभावित भी होती है।
            कभी हम एकांत चिंत्तन के समय अपने अंतर्मन की गतिविधियों पर दृष्टिपात करें तो इस बात का आभास होगा कि हम अपने खान पान, रहन सहन तथा संगति के अनुरूप व्यवहार करते हैं। अगर हमें अच्छे काम करने हैं तो अपने रहन सहन, खान पान तथा संगति को भी शुद्ध रखना होगा।

मनु स्मृति में में कहा गया है कि
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यद्ध्यायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च।
तद्वाघ्नोत्ययत्नेन यो हिनस्तिन किंचन।।
     हिंदी में भावार्थ-जो मनुष्य किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता, वह जिस विषय पर एकाग्रता के साथ विचार और कर्म करता है  अपना लक्ष्य शीघ्र और बिना विशेष प्रयत्न के प्राप्त कर लेता है।

नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्यद्यते क्वचित्।
न च प्राणिवधः स्वग्र्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्।।
     हिंदी में भावार्थ-किसी भी जीव की हत्या कर ही मांस प्राप्त किया जाता है लेकिन उससे स्वर्ग नहीं मिल सकता इसलिये सुख तथा स्वर्ग को प्राप्त करने की इच्छा करने वालो को मांस के उपभोग का त्याग कर देना चाहिये।

     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में मनुष्य के चलने के दो ही मार्ग हैं-एक सत्य  परमार्थ और दूसरा असत्य हिंसा। यदि मनुष्य का मन लोभ, लालच और अहंकार से ग्रस्त हो गया तो वह नकारात्मक मार्ग पर चलेगा और उसमें सहृदयता का भाव है तो वह सकारात्मक मार्ग पर चलता है। श्रीगीता के संदेशों का सार यह है कि जैसा मनुष्य अन्न जल ग्रहण करता है तो वैसा ही उसका स्वभाव हो जाता है तब वह उसी के अनुसार ही कर्म करता हुआ फल भोगता है।
      वैसे पश्चिम के वैज्ञानिक भी अपने अनुसंधान से यह बात प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन और मांसाहारी भोजन करने वालों के स्वभाव में अंतर होता है। वह यह भी प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन करने वालों के विचार और चिंतन में सकारात्मक पक्ष अधिक रहता है जबकि मांसाहारी लोगों का स्वभाव इसके विपरीत होता है। जहा माँसाहारी उग्र होते हैं वहीँ शाकाहारी शांत स्वाभाव के पाए जाते हैं| अतः जितना संभव हो सके भोजन में मांसाहार से परहेज करना चाहिये।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, April 24, 2014

धर्म की पहचान वाले दस लक्षण-मनु स्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(dharm kee pahachan wale das lakshan-manu smriti)



            हमारे देश में धर्म चर्चा अधिक ही होती है।  चाहे शिक्षित हो या अशिक्षित, चिकित्सक हो या मरीज, शिक्षक हो र्या छात्र कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो स्वयं को धर्मभीरु साबित करने का कोई अवसर छोड़ता है। इसके बावजूद धर्म को लेकर अनेक प्रकार के भ्रम हमारे देश में प्रचलित हैं। इतना ही नहीं अनेक कथित धार्मिक विद्वान अपनी सुविधानुसार धर्म की परिभाषा भी बदलते रहते हैं। पेशेवर धार्मिक बुद्धिमान जितना धर्म का उपयोग अपने लिये करते हैं उतना शाायद ही किसी अन्य पेशे के लोग कर पाते हैं। अनेक वणिक वृत्ति के लोगों ने धर्म के नाम पर अपने महलनुमा आश्रम बना लिये हैं। इतना ही नहीं उनके पास परिवहन के ऐसे आधुनिक वाहन भी उपलब्ध हो गये हैं जिनकी कल्पना केवल अधिक धनी ही कर पाते हैं।

मनु स्मृति में कहा गया है कि
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धृति क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रिवनिग्रहः।
धीविंद्या सत्यमक्रोधी दशकं धर्मलक्षणम्।।

      हिंदी में भावार्थ-धैर्य, क्षमा, मन पर नियंत्रण, चोरी न करना, मन वचन तथा कर्म में शुद्धता,इंद्रियों पर नियंत्रण, शास्त्र का ज्ञान रखना,ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना, सच बोलना, क्रोध और अहंकार से परे होकर आत्मप्रवंचना से दूर रहना-यह धर्म के दस लक्षण है।
दक्ष लक्षणानि धर्मस्य व विप्राः समधीयते।
अधीत्य चानुवर्तन्ते वान्ति परमां गतिम्।।

      हिंदी में भावार्थ-जो विद्वान दस लक्षणों से युक्त धर्म का पालन करते हैं वे परमगति को प्राप्त होते हैं।

      वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में किसी धर्म का नाम देखने को नहीं मिलता है। अनेक स्थानों पर कर्म को ही धर्म माना गया है अनेक जगह मनुष्य के आचरण तथा  लक्षणों से पहचान की जाती है। कहने को तो यह भी कहा जाता है कि हमारा धर्म पहले सनातन धर्म से जाना जाता था पर इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि इंसान को इंसान की तरह जीने की कला सिखाने वाला हमारा धर्म ही सनातन काल से चला आ रहा है। धर्म का कोई नाम नहीं होता बल्कि इंसानी कि स्वाभाविक वृत्तियां ही धर्म की पहचान है। इस संसार में विभिन्न प्रकार के इंसान हैं पर वह  मनु द्वारा बताये गये धार्मिक लक्षणों पर चलते हैं  तभी वह धर्म मार्ग पर स्थित माने  जा सकते हैं। हमें इन लक्षणों का अध्ययन करना चाहिये। इसका ज्ञान होने पर यह देखने का प्रयास नहीं करना चाहिए  कि कोई दूसरा व्यक्ति धर्म मार्ग पर स्थित है या नहीं  वरन् हमें स्वयं देखना है कि हमारा अपना  मार्ग कौनसा है?
      वैसे हमारे देश में जगह जगह ज्ञानी मिल जायेंगे। बड़ों की बात छोड़िये आम आदमियों में भी ऐसे बहुत लोग हैं जो खाली समय बैठकर धर्म की बात करते हैं। ज्ञान की बातें इस तरह करेंगे जैसे कि उनको महान सत्य बैठ बिठाये ही प्राप्त हो गया है। मगर जब आचरण की बात आती है तो सभी कोरे साबित हो जाते हैं। कहते हैं कि जैसे लोग और जमाना है वैसे ही चलना पड़ता है। अपने मन पर नियंत्रण करना बहुत सहज है पर उससे पहले यह संकल्प करना पड़ता है कि हम धर्म का मार्ग चलेंगे। धर्म की लंबी चैड़ी व्याख्यायें नहीं होती। परिस्थतियों के अनुसार खान पान में बदलाव करना पड़ता है और उससे धर्म की हानि या लाभ नहीं होता। वैसे खाने, पीने में स्वाद और पहनावे से आकर्षक  दिखने का विचार छोड़कर इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि हमारे स्वास्थ्य के लिये क्या हितकर है? दूसरा क्या कर रहा है इसे नहीं देखना चाहिये और जहां तक हो सके अन्य लोगो के कृत्य पर टिप्पणियां करने से भी बचें। जहां हम किसी की निंदा करते हैं वहां हमारा उद्देश्य बिना कोई परोपकार का काम किये बिना स्वयं को श्रेष्ठ साबित करना होता है। यह निंदा और आत्मप्रवंचना धर्म विरुद्ध है। सबसे बड़ी बात यह है कि एक इंसान के रूप में अपने मन, विचार, बुद्धि तथा देह पर निंयत्रण करने की कला का नाम ही धर्म है और मनु द्वारा बताये गये दस लक्षणों से अलग कोई भी दृष्टिकोण धर्म नहीं हो सकता।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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