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Tuesday, July 29, 2014

अपनी उच्च तथा निम्न इंद्रियों को पहचाने-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(apni uchcha tatha nimna indriyon ko pahachane-manu smriti ka aadhar par chinnta lekh)




            कहा जाता है कि भौतिक विकास के कारण समाज में विभिन्न आयुवर्ग के लोगों में एक पीढ़ीगत अंतर स्वाभाविक रूप से होता है। आजकल तो यह भी कहा जाता है कि बच्चे अक्षर ज्ञान से पहले ही टीवी, मोबाइल और अन्य आधुनिक उपभोग के सामानों का चलाना सीख लेते हैं।  इस बहिर्मुखी जानकारी को अब बौद्धिक विकास का प्रतीक माना जाने लगा है जबकि आंतरिक ज्ञान से-जिसके बिना जीवन में हमेशा ही आनंद उठाने का अवसर मिलता है-सभी परे हो गये हैं। यही कारण है कि समाज में तनाव की प्रवृत्ति बढ़ रही है।  सबसे बड़ी बात यह कि जिस देह को धारण कर इस संसार में गुजारना है उसके बारे में कोई नहीं जानता।
            हमारे शरीर के विकार मन को प्रभावित करते हैं जिससे बुद्धि संचालित होती है।  अक्सर अनेक बुद्धिमान और विद्वान समाज के लोगों को नकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने का सुझाव देते हैं पर जिसकी देह और मन में विकार होंगे वह किस तरह सकारात्मक दृष्टिकोण अपना सकता है भारतीय अध्यात्म ज्ञान के अभाव में वह स्वयं भी नहीं जानते।


मनुस्मृति में कहा गया है कि
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वसाशुक्रमसृङ्मज्जरमूत्रविङ्घ्राणकर्णविट्।
श्लेषामाश्रृदूषिकास्वेदा द्वाशैते नृणां मलाः।।
            हिन्दी में भावार्थ-चर्बी, वीर्य, रक्त, मज्जा, मूत्र, मल, आंखों का कीचड़, नाक की गंदगी, कान का मैल, आंसू, कफ तथा पसीना यह बारह प्रकार के मल हैं।
ऊर्ध्व नाभेर्यानि खानि तानि मेध्यानि सर्वशः।
यान्यधस्तान्यमेध्यानि देहाच्चैव मलाश्चयुताः।।
            हिन्दी में भावार्थ-नाभि के ऊपर स्थित इंद्रियां-हाथ, कान, नाक, आंख तथा जीभ पवित्र मानी जाती हैं। नाभि के नीचे की इंद्रियां-गुदा, लिंग, तथा पैर एवं शरीर से निकलने वाले मल, मूत्र, विष्टा पसीना, खोट आदि अपवित्र हैं।

            महत्वपूर्ण बात यह है कि हम अपनी नाभि के ऊपर स्थित इंद्रियों के उपयोग करते समय यह नहीं जानते कि नीचे की इंद्रियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? उच्च इंद्रियां ग्रहण करती हैं और निम्न इंद्रियां उसके संपर्क से  मिले कचड़े का निवारण करती हैं। हमारी देह में सात चक्र हैं-सहस्त्रात, आज्ञा, विशुद्धि, अनहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मूलाधार-जो निरंतर घूमते रहते हैं। हम अपनी इंद्रियों से बाहरी विश्व का उपभोग करते हैं पर इसमें नियमितता तभी तक संभव रह पाती है जब तक यह सभी चक्र काम करते हैं।
            इसलिये हम उच्च इंद्रियों से केवल उन्हीं व्यक्तियों, वस्तुओं और विषयों से संपर्क करें जिनसे हमारी देह का कोई चक्र दृष्प्रभाव का शिकार न हो। हम इन्हीं इंद्रियों से अपने कर्म फल का निर्माण करते हैं यह नहीं भूलना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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