समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
-------------------------


Sunday, September 22, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-बुद्धिमान क्लेश के समय भी अपना जीवन शुद्ध रखे(kautilya ka arthsharta-buddhiman klish ke samay bhi apna jiwan shuddh rakhen)



                        सांसरिक जीवन में उतार चढ़ाव आते ही रहते हैं। हम जब पैदल मार्ग पर चलते हैं तब कहीं सड़क अत्यंत सपाट होती है तो कहीं गड्ढे होते हैं। कहीं घास आती है तो कहंी पत्थर पांव के लिये संकट पैदा करते हैं।  हमारा जीवन भी इस तरह का है। अगर अपने प्राचीन ग्रंथों का हम निरंतर अभ्यास करते रहें तो मानसिक रूप से परिपक्वता आती है। इस संसार में सदैव कोई विषय अपने अनुकूल नहीं होता। इतना अवश्य है कि हम अगर अध्यात्मिक रूप से दृढ़ हैं तो उन विषयों के प्रतिकूल होने पर सहजता से अपने अनुकूल बना सकते हैं या फिर ऐसा होने तक हम अपने प्रयास जारी रख सकते हैं।  दूसरी बात यह भी है कि प्रकृति के अनुसार हर काम के पूरे होने का एक निश्चित समय होता है।  अज्ञानी मनुष्य उतावले रहते हैं और वह अपने काम को अपने अनुकूल समय पर पूरा करने के लिये तंत्र मंत्र तथा अनुष्ठानो के चक्कर पड़ जाते हैं।  यही कारण है कि हमारे देश में धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के पाखंडी सिद्ध बन गये हैं। ऐसे कथित सिद्धों की संगत मनुष्य को डरपोक तथा लालची बना देती है जो कथित दैवीय प्रकोप के भय से ग्रसित रहते हैं।  इतना ही नहीं इन तांत्रिकों के चक्कर में आदमी इतना अज्ञानी हो जाता है कि वह तंत्र मंत्र तथा अनुष्ठान को अपना स्वाभाविक कर्म मानकर करता है।  उसके अंदर धर्म और अधर्म की पहचान ही नहीं रहती।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
----------------------
अपां प्रवाहो गांङ्गो वा समुद्रं प्राप्य तद्रसः।
भवत्यपेयस्तद्विद्वान्न्श्रयेदशुभात्कम्।।
                        हिन्दी में भावार्थ-गंगाजल जब समुद्र में मिलता है तो वह पीने योग्य नहीं रह जाता। ज्ञानी को चाहिये कि वह अशुभ लक्षणों वाले लोगों का आश्रय न ले अन्यथा उसकी स्थिति भी समुद्र में मिले गंगाजल की तरह हो जायेगी।
किल्श्यन्नाप हि मेघावी शुद्ध जीवनमाचरेत्।
तेनेह श्लाध्यतामेति लोकेश्चयश्चन हीयते।।
                        हिन्दी में भावार्थ-बुद्धिमान को चाहे क्लेश में भी रहे पर अपना जीवन शुद्ध रखे इससे उसकी प्रशंसा होती है। लोकों में अपयश नहीं होता।
                        हमारे देश में अनेक ज्ञानी अपनी दुकान लगाये बैठे हैं। यह ज्ञानी चुटकुलों और कहानियों के सहारे भीड़ जुटाकर कमाई करते हैं। इतना ही नहीं उस धन से न केवल अपने लिये राजमहलनुमा आश्रम बनाते हैं बल्कि दूसरों को अपने काम स्वयं करने की सलाह देने वाले ये गुरु अपने यहां सारे कामों के लिये कर्मचारी भी रखते हैं।  एक तरह से वह धर्म के नाम पर कपंनियां चलाते हैं यह अलग बात है कि उन्हें धर्म की आड़ में अनेक प्रकार की कर रियायत मिलती है।  मूल बात यह है कि हमें अध्यात्मिक ज्ञान के लिये स्वयं पर ही निर्भर होना चाहिये। दूसरी बात यह भी है कि ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे धारण भी करना चाहिये।  यही बुद्धिमानी की निशानी है। बुद्धिमान व्यक्ति तनाव का समय होने पर भी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता।  यही कारण है कि बुरा समय निकल जाने के बाद वह प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।  लोग उसके पराक्रम, प्रयास तथा प्रतिबद्धता देखकर उसकी प्रशंसा करते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Sunday, September 15, 2013

मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन-बालक यदि अनाचार होतो उसे भी कड़ा दंड देना चाहिये( thought article based on manu smriti-balak yadi anachari ho to use bhee kada dan dena chahiye)




                        हमारे देश में यह देखा गया है कि अनेक नाबालिग युवक बलात्कार और हत्या के आरोप में लिप्त पाये जा रहे हैं।  हमारे देश में किशोर अपराधियों के लिये अलग से कानून है पर उसकी व्याख्या अनेक आम लोगों की समझ में नहीं आती। क्या किसी युवक की आयु अट्ठारह वर्ष से तीन, चार, या छह माह से कम हो तो उसका अपराध इसलिये कम हो जाता है कि वह बालिग नहीं है। प्रकृति का ऐसा कौनसा नियम है कि अट्ठारह वर्ष होने पर व्यक्ति को पूर्ण ज्ञान हो जाता है, अगर उसकी यह आयु एक महीने या पंद्रह दिन भी कम हो तो इसका मतलब यह है कि वह पूर्ण ज्ञानी नहीं है। हास्यास्पद तो बात तब होगी जब किसी ने बालिग होने के एक दिन पहले अपराध किया हो और उस पर किशोरो के अपराध वाले कानून के तहत मुकदमा चले। दूसरी बात यह है कि बुद्धि का कौनसा पैमाना है कि यह मान लिया जाये कि मनुष्य सोलह वर्ष की आयु में कम ज्ञानी और अट्ठारह वर्ष होने पूर्ण ज्ञानी हो जाता है।
                        अभी एक मामला सामने आया जिसमें एक सामूहिक बलात्कार तथा हत्या के आरोप में एक नाबालिग होने के बात सामने आयी।  हैरानी की बात यह है कि इसी नाबालिग ने ही सबसे बड़ा अपराध में बढ़चढ़कर भाग लिया था पर उसे किशोर न्याय के नियमों के अनुसार हल्की सजा दी गयी।  उसके सहअपराधियों ने स्पष्ट किया कि हमें उकसाने तथा सर्वाधिक अपराध करने में उसी का हाथ है।  जब मामला सामने आया तो पता नहीं जांच एजेंसियां उम्र का विषय क्यों लेकर बैठ गयीं? दूसरी बात यह कि उसकी आयु की जांच स्वास्थ्य विशेषज्ञों से ही कराने की बात कही गयी, पर पता नहीं वह हुई कि नहीं- कहीं पढ़ा या सुना था बाद में इस बारे में कोई खबर नहीं मिली।  हमारा मानना है कि इस प्रकरण को मनोवैज्ञानिकों के पास भी भेजा जाये। वही जांच करें कि उस कथित नाबालिग की बौद्धिक आयु क्या है? जिन लोगों का जांच और अभियोजन काम काम है उन्हें मनोविज्ञानिक आधार भी लेना चाहिये।  यह कानून में नहीं लिखा है पर यह भी कहां लिखा है कि अपराध जघन्य होने पर बौद्धिक आयु का परीक्षण नहीं होगा अथवा अपराध की प्रकृत्ति देखकर यह निर्णय नहीं होगा कि यह अपराध करना ही बालिग होने का प्रमाण है। खासतौर से तब जब नाबालिग अपराधी पर पहले भी अपराधिक प्रकरण दर्ज होने की बात सामने आती हो-यह भी कहीं हमने पढ़ा या सुना था।  एक अध्यात्मिक ज्ञान साधक होने के आधार पर हमारी यह राय है कि अपराध की प्रकृत्ति देखा जाना चाहिये।  अगर दिन या माह की कमी से अपराध की प्रकृत्ति करे कम माना जायेगा तो न्याय में विसंगतियां अवश्य आयेंगी।
मनुस्मति में कहा गया है कि
-------------------
गुरुं वा बालबुद्धौ वा ब्राह्म्ण वा बहुतश्रुतम।
अतितायिनमायांन्तं हन्यादेवाविचारवन्।।
हिन्दी में भावार्थ-यदि गुरु, बालक, वृद्ध या विद्वान या बहुचर्चित मनुष्य अत्याचारी हो तो उसे मृत्युदंड दिया जाना चाहिये।     
परस्य पत्न्या पुरुषः सम्भाषां योजयन् रहः।
पूर्वामाक्षारितो दोषैः प्राप्नुयात्पूर्वसाहसम्।।
                        हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य पहले से ही कुख्यात हो और परायी स्त्री से अकेेले में मिलने का प्रयास करता हो उसे भी कड़ा दंड देना चाहिये।
                        हमारे देश में पश्चिमी सभ्यता के अनुसार कानून बनते हैं। इतना ही नहीं जघन्य अपराधियों के लिये मानव अधिकारों जैसे प्रश्न उठाये जाते हैं।  यह माना जाता है कि सभी मनुष्य दैवीय प्रकृत्ति के हैं और अगर किसी से गलती हो जाये तो उसे सुधारा जा सकता है। इसके विपरीत हमारा अध्यात्मिक दर्शन मानता है कि आसुरी प्रकृत्ति के लोगों को कभी सुधारा नहीं जा सकता। भारतीय क्षेत्र की प्रकृत्ति ऐसी है कि यहां यदि आदमी दैवीय प्रकृत्ति  का है तो वह छोटे अपराध करने से भी डरता है और आसुरी है तो सिवाय अपराध के उसे कुछ नहीं सूझता।  यही कारण है कि मनुस्मृति में अपराधों के लिये कड़े दंड का प्रावधान किया गया है। दूसरी बात यह भी है कि अपराध और अत्याचार में अंतर होता है। अपराध हो तो किसी नाबालिग  पर पश्चिमी आधार पर बने कानून के अनुसार मामला चले हम इसका प्रतिवाद नहीं करते पर जब अत्याचार का मामला हो तब कम से कम हमने अध्यात्मिक दर्शन के आधार पर इसका समर्थन करना थोड़ अजीब लगता है।  हमारा यह तो मानना है कि बालिग की आयु अट्ठारह वर्ष ही रहे। किशोर कानून भी बना है तो बुरी बात नहीं है पर जघन्य अपराध के समय इस विषय की अनदेखी करते हुए अपराधियों को न्यायालय के समक्ष पेश करना चाहिये।  हमारे देश के न्यायाधीशों में इतनी विद्वता है कि वह इस बात को समझेंगे मगर उनके सामने अभियोजन पक्ष को ही मामला लाना होता है वह स्वयं कोई ऐसा आदेश नहीं दे सकते।  अगर देंगे तो तमाम तरह के विवाद खड़े कर न्यायालयों पर टिप्पणियां करने वाले कथित मानवाधिकार कार्यकर्ता भी इस देश में कम नहीं है। इन कार्यकर्ताओं का मुख्य लक्ष्य चर्चित मामलों में अपनी टांग फंसाकर प्रचार पाना होता है। यही कार्यकर्ता मनुस्मृति को भी अप्रासंगिक मानते हैं क्योंकि उनको अपने प्रसंगों के माध्यमों से प्रचार तथा लोकप्रियता मिलती है।          

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Sunday, September 8, 2013

विदुर नीति-पुरूष में शील प्रधान होता है(vidur neeti-purush mein sheel pradhan hota hai)



       अगर हम आज देश के हालात देखें तो भारी निराशा हाथ लगती है।  सभी लोग देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई तथा अपराध कम  के लिये कमर कसने की बात तो करते हैं पर फिर भी कोई बड़ा अभियान इसके लिये छेड़ा नहीं जा पाता।   विगत समय में एक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हुआ था पर उसकी परिणति अत्यंत निराशाजनक ढंग से हुई।  इसका कारण यह है कि हमारा देश अब सामाजिक रूप से शक्तिशाली नहीं रहा।  समस्त प्राचीन सामाजिक संस्थायें ध्वस्त हो गयी हैं।  जो बची हैं वह निष्काम रहने की बजाय अपने साथ आर्थिक, राजनीतिक तथा प्रचार करने की कामना के साथ कार्यरत हैं।  ईमानदारी की बात यह है कि समाज, अर्थ, कला साहित्य, पत्रकारिता, राजनीति, फिल्म और धर्म के क्षेत्रों में शिखर पर बैठे लोगों ने कांच के महल बना लिये हैं और इसलिये कोई किसी पर पत्थर फैंकने का सामर्थ्य नहीं रखते।
            हमारे देश में अनेक विद्वान क्रांति की बातें करते हैं। समाज में बदलाव का नारा लगाते हुए थकते नहीं है। विचारधाराओं में बंटे यह विद्वान समाज को बदल तो नहीं पाये पर उसे तोड़ डालने में सफल हो गये हैं। आज स्थिति यह है कि नैतिकता, पवित्रता, विचारशीलता तथा कार्यक्षमता के आधार पर हमार समाज का आधार अत्यंत  कमजोर हो गय गया है। जब किसी शिखर पुरुष के निजी आचरण की बात होती है तो हमारे देश के  बौद्धिक वर्ग के लेाग उसके सार्वजनिक जीवन की प्रशंसा तो करना चाहते हैं पर निजी आचरण पर चर्चा करने से बचते है क्योंकि देखा यह जा रहा है कि बहुत कम ऐसे बड़े लोग हैं जिनका निजी चरित्र बेदाग हैं। इतना ही नहीं हमारे देश के कुछ सामाजिक विद्वान तो यह मानते हैं कि लड़की का चरित्र मिट्टी के बर्तन की तरह है एक बार टूटा तो फिर उसके जीवन का आधार कमजोर हेाता है जबकि लड़के का चरित्र पीतल के बर्तन की तरह जो गंदा होने या टूटने पर फिर से संवर सकता है।  हमारा अध्यात्मिक दर्शन इसे स्वीकार नहंी करता।

विदुर नीति में कहा गया है कि
----------------
शीलं प्रधानं पुरुषे तद् यस्येह प्रणश्यति।
न तस्य जीवितेनार्थो न धनेन न बन्धुभिः।।
                        हिन्दी में भावार्थ-किसी पुरुष में उसका शील ही प्रधान होता है। वह नष्ट हो तो फिर पुरुष का जीवन, धन और बंधुओं से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
आत्मानमेव प्रथमं द्वेष्यरूपेण बीजायेत्।
ततोऽमात्यानमित्रांश्च न मोघं विजिगीषते।
                        हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य इंद्रियों के साथ ही मन को भी शत्रु मानकर जीत लेता है वही बाहरी शत्रुओं को जीतने में सफलता प्राप्त कर सकता है।

                        हमारे दर्शन के अनुसार जिस पुरुष का चरित्र शुद्ध है वही पवित्र विचार रखने के साथ ही अनैतिकता से लड़ने का सामर्थ्य रखता है।  जिसका चरित्र कमजोर है उसे स्वयं का पता होता है इसलिये वह कभी किसी अस्वच्छ चरित्र, अपवित्र विचारवान तथा अधर्म के लिये तत्पर दुष्टों से लड़ने का साहस नहीं दिखाते।  इतना ही नहीं अब तो यह भी देखा गया है कि दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों को समाज के कथित शिखर पुरुष अपनी स्वच्छ छवि के पीछे छिपाते हैं। अनेक लोगों को तो इसके विपरीत कहना है कि समाज के शिखरों पर कथित रूप से स्वच्छ छवि वाले चेहरे लाने वाले वही लोेग हैं जिनको अपने चरित्र पर लगे दागों की वजह से प्रतिष्ठा वाले शिखर पदों पर बैठना संभव नहीं लगता।  स्थिति यह है कि अर्थ, धर्म, कला, साहित्य, फिल्म तथा धर्म के क्षेत्र के शिखरों पर बैठे लोग दुष्टों को संरक्षण देने या उनसे पाने के लिये लालायति रहते हैं।  यही कारण है कि हमारे देश में अब विश्वास का संकट पैदा हो गया है। किस पर यकीन करें या नहीं लोग अब इस बात को  लेकर द्वंद्व में रहने लगे हैं।  प्रचार माध्यमों में हमारे अनेक प्रकार के शत्रु बताये जाते हैं पर सच यह है कि हमारा सबसे बड़ा शत्रु हमारे चरित्र का ही संकट है।  हम देश की विश्व में प्रतिष्ठा भी देखना चाहते हैं और विदेशीमुद्रा पर आश्रित हैं। हमारा देश भारी कर्ज के साथ सांस ले रहा है।
      हमारे देश में अध्यात्म के नाम पर मनोरंजन बिकता है इसलिये उसके वास्तविक संदेशों का ज्ञान किसी को नहीं है। सच बात तो यह है कि हमें अपने अध्यात्मिक दर्शन के साथ जुड़े रहें और इस बात पर विचार न करें कि हमारा समाज किधर जा रहा है बल्कि हम यह तय करें कि हमें कहां जाना है?

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Sunday, September 1, 2013

मनु स्मृति-स्वस्थ लोग ही प्रजाहित का काम कर सकते हैं (swasth log he prajahit ka kama kar sakte hain, jo fit hai vahi hit hai-manu smriti ke aadhar par chinttan)



                        हमारे दर्शन के अनुसार पूर्णतः स्वस्थ होने पर ही किसी मनुष्य को राजसी कर्म करना चाहिये। ऐसे में जिन लोगों पर राज्य का भार है उनको प्रजा हित के लिये अधिक ही परिश्रम करना होता है इसलिये उनका पूर्णतः स्वस्थ होना आवश्यक है।  आधुनिक लोकतंत्र ने पूरे विश्व में राज्य व्यवस्थाओं में इस नीति का पालन नहीं किया जा रहा है। आज तो सभी देशों में यही देखा जाता है कि चुनाव में कौन जीत सकता है? चुनाव जीतने की योग्यता और क्षमता ही राज्यपद पाने का एक आधार बन गयी है।  ऐसे में अनेक देशों के राज्य प्रमुख शासन में आने के बाद जनता में अपनी लोकप्रियता खो देते हैं। दूसरी बात यह भी है कि पद की अवधि पांच या छह साल होती है उसमें राज्य पद पर प्रतिष्ठित होने पर व्यक्ति की चिंतायें प्रजा हित से अधिक अपने चुनाव के लिये चंदा देने वालों का उधार चुकाने या फिर अगले चुनाव में फिर अपना पद बरबकरार रहने की होती है।  कुछ समय विपक्षियों का सामना करने तो बाकी समय जनता के सामने नये वादे करते रहने में लग जाता है।
                        अनेक देशों के राज्य प्रमुख शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक दृष्टि से अस्वस्थ होने के बावजूद सत्ता रस पीते रहते हैं। राज्य के अधिकारी भी अपनी नौकरी चलाते हुए केवल राज्य प्रमुख की कुर्सी बचाये रखने में अपना हित समझते हैं। विश्व प्रसिद्ध चिंत्तक कार्लमार्क्स ने अपने पूंजी नामक पुस्तक में इन पूंजीपतियों के हाथ लग चुकी व्यवस्थाओं की चर्चा बहुत की है।  यह अलग बात है कि उसके अनुयायियों ने भी अपने शासित राष्ट्रों में शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक दृष्टि से बीमार लोगों को उच्च पदों पर बैठाये रखा और बेबस जनता तानाशाही की वजह से उनको ढोती रही।  वामपंथी व्यवस्था में बौद्धिकों को वैचारिक मध्यस्थ बन कर मजे लूटने की सुविधा मिलती है इसलिये वह जनहित की बातें बहुत करते हैं पर अपने शिखर पुरुषों की शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक अस्वस्थता को निजी विषय बताते हैं।  मजे की बात यही है कि यही वामपंथी बौद्धिक मध्यस्था मनुस्मृति का जमकर विरोध करते हैं।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
------------------
अमात्यंमुख्यं धर्मज्ञं प्राज्ञं दान्तं कुलोद्भवम्।
स्थापयेदासने तस्मिन् खिन्नः कार्येक्षणे नृणाम्।।
                        हिन्दी में भावार्थ-जब राज्य प्रमुख अपने खराब स्वास्थ्य की वजह से प्रजाहित के कार्यों का निरीक्षण करने में असमर्थ हो तब उसे अपना कार्यभार किसी बुद्धिमान, जितेन्द्रिय, सभ्य तथा शिष्ट पुरुष को सौंप देना चाहिये।
विक्रोशन्त्यो यस्य राष्ट्राद्धियन्ते दस्युभिः प्रजाः।
सम्पतश्यतः सभृत्यस्य मृतः स न तु जीवति।।
                        हिन्दी में भावार्थ-उस राजा या राज्य प्रमुख को जीवित रहते हुए भी मृत समझना चाहिये जिसके अधिकारियों के सामने ही डाकुओं से लूटी जाती प्रजा हाहाकर मदद मांगती है पर वह उसे बचाते ही नहंी है।
                        सामान्य सिद्धांत तो यही है कि अस्वथ्यता की स्थिति में राज्य प्रमुख किसी गुणी आदमी को अपना पदभार सौप दे पर होता यह है कि वामपंथी विचारक शिखर पर बैठे पुरुष को अपने अनुकूल पाते हैं तो वह उसकी जगह किसी दूसरे को स्वीकार नहंी करते। दूसरी बात यह है कि आजकल के राज्य प्रमुखों में इतनी मानवीय चतुराई तो होती है कि वह अपने बाद के दावेदारों को आपस में लड़ाये रखते है ताकि कोई उसकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सके। अनेक जगह तो राज्य प्रमुख इस तरह की व्यवस्था कर देते हैं कि उनके बाद उनके परिवार के सदस्यों को ही जगह मिले। वामपंथियों के सबसे बड़े गढ़ चीन में भी अब शासन में परिवारवाद आ गया है।  वामपंथियों ने शायद इसलिये ही हमेशा मनुस्मृति का विरोध किया है ताकि उसकी सच्चाई से आम लोग अवगत न हों और उनका छद्म समाज सुधार का अभियान चलता रहे।
                        हम आजकल पूरी विश्व अर्थव्यवस्था चरमराने की बात करते हैं। उसका मुख्य कारण यही है कि अनेक महत्वपूर्ण देशों का शासन पुराने राजनीतिक सिद्धांतों की अनदेखी कर चलाया जा रहा है। स्थिति यह है कि तानाशाही व्यवस्था हो या लोकतांत्रिक सत्य कहने का अर्थ अपने लिये शत्रुओं का निर्माण करना होता है। अपनी आलोचना सहन करने के लिये पर्याप्त प्राणशक्ति बहुत कम लोगों में रह गयी है। इसका मुख्य कारण शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक अस्वस्थता ही है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Tuesday, August 27, 2013

कन्या भ्रूण हत्या के लिए जिम्मेदार लोगों का अन्न भी न खाएं-मनु स्मृति के आधार पर यह सन्देश (kanya bhrun hatya ke liye jimmedar logon ka bhjan grahan na karen-manu smriti ke aadhar par yah sandesh)



         कहा जाता है कि जैसा खायेंगे अन्न, वैसा ही होगा मन।  दरअसल इस कहावत का आशय शब्दिक, लाक्षणिक तथा व्यंजना तीनों विधाओं में लिया जाना चाहिये।  अन्न का शाब्दिक आशय तो गेहुं, चावल तथा दालों सहित उन तमाम तरह के पदार्थों से है जो प्रकृत्ति से प्रदत्त हैं। लाक्षणिका रूप से देखने पर लगता है कि अगर इन अन्नों के उत्पादन की गुणवत्ता में कमी है तो सेवन किये जाने  पर वह देह को कम पौष्टिकता प्रदान करते हैं। गुणहीन अन्न अधिक खाने पर भी पाचक नहीं होता और पाचक अन्न कम खाने पर भी अधिक शक्ति देता है।  उसी तरह आशय  व्यंजना विधा में यह कहा जा सकता है कि अन्न से बने भोज्य पदार्थों का उद्गम स्थल भी अत्यंत महत्व रखता हैै। जहां भोजन आचरणहीन, लोभी तथा दुष्ट व्यक्ति के माध्यम से प्रस्तुत हो उसका सेवन करने से मनोवृत्ति विषाक्त हो जाती है।
      हमारे यहां समाज में आचरण, विचार तथा व्यवहार का स्तर देखने के बजाय लोग केवल पैसे की उपलब्धि देखने लगे हैं।  दूसरी बात यह भी है कि सिकुड़ते हुए पारिवारिक दायरों तथा जीवन में व्यक्तिगत संघर्ष ने लोगों के पास समाज की चारित्रिक स्थिति से मुंह फेरने के लिये विवश कर दिया हैं।  वह मित्रों के संग्रह के लिये जूझते हैं पर स्वयं किसी के स्वयं हितैषी बनने को तैयार नहीं है। फिर पार्टियों तथा पिकनिक के दौर नियमित हो गये हैं जिसमें लोग केवल जान पहचान के आधार पर शमिल होते हैं। यह जानने का कोई प्रयास नहीं करता कि उनके सहभागियों के घन का स्तोत्र क्या हैं? जहां मिल जाये खाना वहीं चला जाये जमाना वाली स्थिति है। भोजन के स्तोत्र की अज्ञानता ने आचरण और व्यवहार के प्रति उदासीनता का भाव पैदा किया है।  
मनुस्मृति में कहा गया है कि
----------------
मत्तक्रुद्धातुराणां च न भुञ्जति कदाचन।
केशकीटावपन्नं च पदा स्पृष्टं च कामतः।।
भ्रुणघ्रावेक्षितं चैव संस्पृष्टं चाप्यदक्यया।
पतत्रिणाऽवलीढं च शुना संस्पृष्टंमेव च।।
     हिन्दी में भावार्थ- विक्षिप्त, क्रोधी और रोगी व्यक्ति के लिये  रखा, बालों तथा कीड़े पड़ जाने से दूषित, खाने के लिये अनुचित मानकर फैंकने के लिये रखा गया, जिसे भ्रुण हत्यारों ने देखा हो तथा जिसे पक्षियों ने चखा हो, ऐसा पदार्थ कभी सेवना नहीं करना चाहिये।
राजान्नं तेज आदत्ते शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम्।
आयुः सुवर्णकारान्नं यशश्चर्मावकर्तिनः।।
     हिन्दी में भावार्थ-राजा का अन्न खाने से तेज और निम्न आचरण करने वाले व्यक्ति का अन्न खाने से विद्या के साथ ही यश की भी हानि होती है।
      हमारे यहां सामान्य लोगों को विशिष्ट लोगों के घर मेहमाननवाजी करने का सपना हमेशा रहता है।  खासतौर से राजसी शिखर पर बैठे लोगों के यहां जाने के लिये लोग लालायित रहते हैं।  मनुस्मृति के अनुसार राजा का अन्न खाने से तेज का नाश होता है। इसका आशय यही है कि जब कोई किसी राजपुरुष के यहां भोजन करेगा तो उसके सामने नतमस्तक होना भी पड़ेगा इससे मन के साथ ही ज्ञानेंद्रियां भी शिथिल होती हैं।  उसी तरह हम देख रहे हैं कि कन्या भ्रुण हत्या रोकने का अभियान हमारे देश में इसलिये चल रहा है क्योंकि उसके कारण जनसंख्या में लिग का अनुपात बिगड़ जाने से स्त्रियों के प्रति अपराध बढ़ते जा रहे हैं। कन्या भ्रुण हत्या रोकने का अभियान भी चल  रहा है पर समाज से उसमें सहयोग नहीं मिल रहा है।  समाज में चेतना लाने के लिये यह आवश्यक है कि लोगों को अपना अध्यात्मिक ज्ञान उनमें प्रचारित करना चाहिये। कन्या भ्रुण हत्या के लिये जिम्मेदार लोगों के प्रति समाज जब उपेक्षा का भाव अपनायेगा तभी संभवत सफलता मिल पायेगी।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Saturday, August 17, 2013

अथर्ववेद के आधार पर संदेश-सौ हाथ से कमा हजार हाथ से दान कर (atharvved ke adhar par sandesh-sau hath ka kama hazar hath se dan kar)



    हमारे देश में धर्म को लेकर अनेक भ्रम प्रचलित हैं जिनका मुख्य कारण धन के आधारित पर प्रचलित पंरपराऐं हैं जिनको निभाने के लिये कथित धर्मभीरु अपना पूरा जीवन पर दाव पर लगा देते हैं। दूसरी बात यह है कि आधुनिक शिक्षा पद्धति में डूबा समाज अध्यात्मिक ज्ञान से परे हो गया है और उसके पास धर्म तथा भ्रम की पहचान ही नहीं रही।  सच बात तो यह है कि हम जिस अपनी महान संस्कृति और संस्कारों की बात करते रहे हैं उनका आधार वह पारिवारिक संबंध रहे हैं जो अब धन के असमान वितरण के कारण कलह का कारण बनते जा रहे हैं। पहले एक रिश्तेदार के  पैसा अधिक होता तो दूसरे के पास कम पर अंतर इतना नहीं रहता था कि उसकी अनुभूति प्रत्यक्ष रूपे की जा सके पर  कि अब असमान स्तर दिखने लगा है। इतना ही नहीं स्तर में अंतर इतना अधिक आ गया है कि सद्भाव बने रहना कठिन हो गया है। एक रिश्तेदार सामान्य जीवन जी रहा है तो दूसरा राजकीय कर्म से जुड़ने के कारण विशिष्ट हो जाता है। ऐसे में रिश्तों में मिठास कम कड़वाहट अधिक हो जाती है।
       महत्वपूर्ण बात यह कि हम धर्म के नाम पर सभी एक होने का स्वांग करते हैं पर हो नहीं पाते। इसका मुख्य कारण यह है कि हमारे देश में दो प्रकार के भारतीय धार्मिक लोग हैं। एक तो हैं लालची दूसरे हैं त्यागी।  एक बात निश्चित है कि भारतीय धर्म से जुड़े लोग अधिकतर त्यागी होते हैं पर आधुनिक लोकतंत्र ने कुछ लालची लोगों को आगे बढ़ने का मार्ग दिया है। समाज पर नियंत्रण करने वाली अनेक संस्थाओं में कथित रूप से लालची लोगों ने कब्जा कर लिया है। यह लालची लोग एक तरफ से चंदा लेते हैं दूसरी तरफ दान करने का स्वांग करते हैं। अंधा बांटे रेवड़ी आपु ही आपको दे की तर्ज पर यह उस दान का हिस्सा भी अपने घर ही ले जाते हैं। धर्म, अर्थ, राज्य, कला, तथा शिक्षा के शिखर पर अनेक ऐसे कथित लोग पहुंचें हैं जो भारतीय धर्म के रक्षक होने का दावा तो करते हैं पर होते महान लालची हैं। सीधी बात कहें तो हमारे भारतीय धर्म को खतरा बाहर से नहीं बल्कि अपने ही लालची लोगों से है।  यह लालची लोग प्रचार तंत्र में अपने समाज सेवक होने का प्रचार करते हैं जो जब बाहरी लोग उनका चरित्र देखते हैं तो समस्त भारतीय धर्म के लोगों को वैसा ही समझते हैं जबकि हमारे हमारे देश के अधिकतर  लोग अपने धर्म के अनुसार त्यागी होते हैं।  लालची लोग सौ हाथों से धन तो बटोरते हैं पर दान एक हाथ से भी नहीं करते।  ऐसे ही लोग धर्म के लिये सबसे बड़ा संकट हैं। अगर हम अपने देश में श्रम पर आधारित करने वाले लोगों को देखें तो वह गरीब होने के बावजूद अपने आसपास के लोगों की सहायता को तत्पर होते हैं। इसका वह प्रचार नहीं  करते वरन् करने के बाद किसी प्रकार की फल याचना भी नहीं करते।  इसके विपरीत जिन लोगों ने अपनी लालच की वजह से येन केन प्रकरेण समाज पर नियंत्रण करने वाली संस्थाओं पर कब्जा किया है वह अपना स्तर बनाये रखने के लिये षडयंत्रपूर्वक काम करते हैं। इतना ही नहीं धर्म का कोई एक नाम देना हमारे अध्यात्मिक दर्शन की दृष्टि गलत है वहीं वह सभी धर्मों की रक्षा की बात कहते हुए भ्रमित भी करते हैं।  सबसे बड़ी  इन लोगों ने सभ्रांत होने का रूप भी रख लिया है और अपने से नीचे हर व्यक्ति को हेय मानकर चलते हैं।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
----------------
शातहस्त समाहार सहस्त्रस्त सं किर।
कृतस्य कार्यस्य चहे स्फार्ति समायह।।
        हिन्दी में भावार्थ-हे मनुष्य! तू सौ हाथों वाला होकर धनार्जन कर और हजार हाथ वाला बनकर दान करते हुए समाज का उद्धार कर।
       समाज में समरसता बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है कि शक्तिशाली तथा समृद्ध वर्ग कमतर श्रेणी के लोगों की सहायता करे पर अब तो समाज कल्याण सरकार का विषय बना दिया गया है जिससे लोग अब सारा दायित्व सरकार का मानने लगे हैं।   धनी, शिक्षित तथा शक्तिशाली वर्ग यह मानने लगा  है कि अपनी रक्षा करना ही एक तरह से  समाज की रक्षा है।  इतना ही नहीं यह वर्ग मानता है कि वह अपने लिये जो कर रहा है उससे ही समाज बचा हुआ है।  जब धर्म की बात आती है तो सभी उसकी रक्षा की बात करते हैं पर लालची लोगों का ध्येय केवल अपनी समृद्धि, शक्ति तथा प्रतिष्ठा बचाना रह जाता है।  कहने का अभिप्राय यह है कि हमें केवल किसी को अपने धर्म से जुड़ा मानकर उसे श्रेष्ठ मानना गलत है बल्कि आचरण के आधार पर ही किसी के बारे में राय कायम करना चाहिये। हमारा समाज त्याग पर आधारित सिद्धांत को मानता है जबकि लालची लोग केवल इस सिद्धांत की दुहाई देते हैं पर चलते नहीं। समाज की सेवा भी अनेक लोगों का पारिवारिक व्यापार जैसा  हो गया है यही कारण है कि वह अपनी संस्थाओं का पूरा नियंत्रण परिवार के सदस्यों को सौंपते हैं। दावा यह करते हैं कि पूरे समाज का हम पर विश्वास है पर यह भी दिखाते हैं कि  उनका समाज में  परिवार के बाहर किसी दूसरे पर उनका विश्वास नहीं है।  हम जाति, धर्म, शिक्षा, क्षेत्र तथा कला में ऐसे लालची लोगों की सक्रियता पर दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि उनका ढोंग वास्तव में समूचे समाज  को बदनाम करने वाला हैं। बहरहाल हमें अपने आचरण पर ध्यान रखना चाहिये। जहां तक हो सके धर्म, जाति, भाषा, कला, राज्यकर्म तथा क्षेत्र के नाम पर समाज को समूहों में  बांटने वाले लोगों  की लालची प्रवृत्ति देखते हुए उनसे दूरी बनाने के साथ ही अपना सहज त्याग कर्म करते रहना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Friday, August 9, 2013

चाणक्य नीति-श्रृंगार का प्रेमी कभी अकाम नहीं हो सकता (chankya neeti darshan-shringar ka premi kabhee akam nahin ho sakta)




        महान भारतीय विद्वान चाणक्य को आज भी विश्व का महान दार्शनिक माना जाता है। हमारे यहां राजनीति शास्त्र का उनको एक तरह से  जनक माना जाता है। जब हम राजनीति की बात करते हैं तो यकीनन उसमें सक्रिय भूमिका राजसी भाव से राजसी कर्म के साथ ही निभाई जा सकती है। महान विशारद चाणक्य के संदेशों में जीवन रहस्यों का सार है। व्यक्ति कोई भी हो-योगी, सात्विक और राजस-उसे चाणक्य नीति का ज्ञान हो तो कहना ही क्या? दरअसल हमारे यहां अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को अपनाया गया है जिसमें केवल राजसी विषयों का अध्ययन ही किया जाता है। नैतिक शिक्षा के नाम पर भी अंग्रेजी उद्धरणों का सहारा ही लिया जाता है।  इस पर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारतीय अध्यात्म दर्शन के विषय को बाहर रखा गया है। सच बात यह है कि भारतीय अध्यात्म दर्शन किसी एक देवता या भगवान की पूजा पद्धति की बात नहीं करता। उसमें साकार तथा  निरंकार का दोनों में किसी का भी  स्मरण करना श्रेष्ठ विचार माना गया है। उसमें जीवन रहस्य के साथ ही सांसरिक विषयों की पहचान भी बतायी गयी है।  मनुष्य की मनस्थिति कब किस प्रकार की होगी यह मनोविज्ञान का विषय है पर भारतीय दर्शन इसे अलग से अध्ययन करने का विचार नहीं देता बल्कि वह सामान्य जीवन के भाग के रूप में इसे देखता है। श्रीमद्भागवत गीता में यह माना गया है कि मनुष्य तीन प्रकार का-सात्विक, राजस तथा तामस-होता है।  अगर कोई  योग का अभ्यास करे तो वह इन तीनों से प्रथक एक अलग प्रकार का जीव योगी  हो जाता है। एक मनुष्य अलग अलग मनस्थिति से गुजर सकता है तो वह प्रथक प्रथक समय सात्विक, राजस तथा तामस प्रकृतियों के वशीभूत होने से वैसे  कर्म भी कर सकता है। श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान तथा विज्ञान के संदेशोें से भरा एक महान ग्रंथ है।  यह अलग बात है कि उसे केवल भारतीय धर्मों से जुड़ा मानकर शिक्षा के विषयों से दूर रखा जाता है। इसका कारण देश का राजनीतिक रूप से धर्मनिरपेक्ष होने विचार कम, लोगों में अज्ञान का अंधेरा रहे और उन्हें रौशनी के रूप में सपने, वादे और दावे बेचे जा सके, यह नीति अधिक जिम्मेदार है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
-----------------------
निःस्पमृहो नाऽअधिकारी स्यान्नाकामी मण्डनप्रियः।
नाऽविदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्टवक्ता न वञ्चकः।।
      हिन्दी में भावार्थ-कोई भी अधिकार संपन्न आकांक्षा रहित, श्रृंगार का प्रेमी अकाम, मूर्ख मधुर वचन बोलने वाला तथा स्पष्टवादी कभी धोखेबाज नहीं होता।
 
       यही कारण है कि आजकल लोग व्यवहार में धोखे का शिकार हो रहे हैं। खासतौर से युवक युवतियों के बीच अज्ञानता की प्रवृत्ति अधिक देखी जा रही है।  सहशिक्षा ने युवक युवतियों के बीच कथित मित्रता या प्रेम संबंधों को प्रोत्साहन दिया है। उर्दू शायर कर लड़कियों को लड़के प्रभावित करते हैं। लड़कियां यह समझती हैं कि उनका मित्र या प्रेमी उनसे निष्काम प्रेम कर रहा है। जब उन्हें धोखे, आक्रमण या अपराध का शिकार होना पड़ता है तब सच्चाई का पता चलता है। लैला मजनूं, शीरी फरहद, रोमियो जूलियट और ससी पुनू के किस्से अक्सर पत्रिकाओं प्रकाशित होते है।  स्थिति यह है कि कामना और वासनामय आकर्षण को हमारे प्रचार माध्यम प्यार, इश्क, लव और प्रेम बताकर प्रचार करते हैं।
    हमारा अध्यात्म दर्शन कहता है कि साकार या निराकार परमात्म के अलावा किसी अन्य नश्वर वस्तु या व्यक्ति से प्रेम हो ही नहीं सकता।  प्रेम निष्काम होना चाहिये पर कामनामय प्रेमी कभी ऐसा नहीं करता।  वह तो श्रृंगार के आकर्षण का शिकार होता है। उसी तरह रिश्त नातों में पारंपरिक अधिकार की बात आती है।  तय बात है कि जब कोई व्यक्ति दूसरे के समक्ष  रिश्ते में अपना अधिकार मानता है उससे  त्याग की आशा करना व्यर्थ है।  मूर्ख से मधुर वचन की आशा लगभग मूर्खतापूर्ण बात ही है।  जो लोग स्पष्ट बात कहते हैं वह कभी धोखेबाज नहीं होते यह अलग बात है उनकी बातें सुनने में बुरी जरूर लगती हैं।
      जीवन में हर आदमी को सतर्क तथा व्यवहारकुशल होना चाहिये पर यह तभी संभव है जब कोई भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का अध्ययन करे। उसमें व्यक्ति, विषय तथा वस्तुओं के व्यवहार के साथ ही उनकी उपयोगिता का भी रूप बताया गया है। भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का अध्ययन कर उनका ज्ञान धारण करने पर जीवन में हर पल सहजता का अनुभव होता है तथा प्यार, पैसा तथा प्रतिष्ठा के विषय में कभी कोई धोखा नहीं खा सकता।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


अध्यात्मिक पत्रिकाएं