समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
-------------------------


Showing posts with label hindu society. Show all posts
Showing posts with label hindu society. Show all posts

Thursday, January 22, 2015

बेहतर राज्य प्रबंध से ही भारतीय धर्म की रक्षा संभव-हिन्दी चिंत्तन लेख(behatar rajya prabandh se hee bhartiya dharma ki raksha sambhav-hindi thought article)



            इस समय भारत के कुछ धार्मिक ठेकेदार अपने समूहों को प्रसन्न करने के लिये बेतुके बयान दे रहे हैं पर हम यहां केवल भारतीय धर्म से संबद्ध लोगों की बात करें।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार ज्ञानी को देशकाल, समय, क्षेत्र तथा समाज की वर्तमान स्थिति देखकर अपना विचार व्यक्त करना चाहिये। जो ऐसा नहीं करता वह ज्ञानी नहीं है।
            हमारे भारतीय धर्म के कुछ कथित विद्वान समाज में चार, आठ अथवा दस पुत्र पैदा करने का जो ज्ञान बघार रहे हैं क्या वह उन्हें पता नहीं है कि जन्म पुत्र और पुत्री दोनों में से किसी का भी हो सकता है।  हमने समाज में ऐसे लोग भी देखे हैं कि जिनको छह बच्चे हुए जो लड़के थे। ऐसे भी देखे कि सात लड़कियां एक ही क्रम में हुईं।  अनेक कथित धार्मिक ठेेकेदार भारतीय नारियों से पुत्र देने की मांग कर रहे हैं।  इनमें से तो कुछ इतने बड़े हैं कि उनकी पहचान महान व्यक्तित्व की है।  कितने शर्म की बात है कि यह नारियों से नर की मांग कर रहे हैं पर यह भूल जाते हैं कि नर ही नर पैदा हुए तो फिर आगे कौन जन्म का आधार बनेगा? हिन्दू समाज में नारियों की संख्या कम हो गयी है शायद उन्हें इसका पता नहीं है। मध्यम वर्ग के लड़कों के लिये लड़कियां अत्यंत कम हो गयी हैं।  हमारे कुछ प्रदेशों में नारियों से नर की संख्या इतनी अधिक है कि वहां वधु दिलाने के चुनावी सभाओं में वादे तक किये जाते हैं।
            टीवी और समाचार पत्रों में प्रचार पाने तथा अपने शिष्यों में अपने धर्म का रक्षक दिखने की कामना करने वाले ऐसे कथित धार्मिक ठेकेदार इतने अज्ञानी हो सकते हैं यह आज तक नहीं पता था। वह कहते हैं कि हर क्षेत्र के लिये हमें पुत्र दो। धर्म की रक्षा के लिये आबादी बढ़ाओ। जब तक प्रचार माध्यम सीमित थे अनेक लोगों ने धर्म नाम पर अपनी पवित्र छवि बना ली पर अब उनकी व्यापकता के चलते अब पता लग रहा है कि वैचारिक रूप से वह कितने निम्न स्तर के हैं।      विवादास्पर बयानों से यह प्रचार माध्यम  में बहसों का केंद्र तो बनते हैं पर उद्घोषक इन्हें मूर्ख  तथा सांप्रदायिक कहते हुए थकते नहीं है। कभी कभी तो लगता है कि बाज़ार और प्रचार प्रबंधकों से प्रायोजित  यह धार्मिक नायक एक पूर्ववत योजना के तहत अपने धनदाता स्वामियों को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं।
            हम यह कहते हुए थकते नहीं हैं कि भारत में कभी सनातन या हिन्दू धर्म मानने वाले ही लोग थे। अब पश्चिम से आई धार्मिक विचाराधाराओं के बढ़ते प्रभाव पर हम चिंता कर रह हैं तो यह भी विचार करना चाहिये कि हमारे हिन्दू धर्म से ही जैन, सिख तथा बौद्ध धर्म का प्रादुर्भाव हुआ है। इस पर मनन करना चाहिये।  दरअसल हमारे यहां की शासन व्यवस्था हमेशा ही विवादों का केंद्र रही हैं। पहले राजशाही को कोसते थे तो अब आधुनिक लोकतंत्र पर भी अनेक लोग प्रश्न उठा रहे हैं।  एक अध्यात्मिक साधक होने के नाते हमारा विचार है कि हमारे देश की समस्या यह है कि राजसी कर्म में-जिसमें शासन, व्यापार तथा समाज सेवा जैसे विषय भी शािमल हैं-शिखर पर पहुंचे लोग तामसी वृतियों में लिप्त हो जाते हैं। जब हम राज धर्म की बात करते हैं तो शासन, व्यापार तथा सामाजिक संस्थाओं में इसका पालन होना आवश्यक है। हमारे यहां अहंकार की भावना से बहुत कम ऐसे राजसी पुरुष हैं जो किसी लघु को प्रगति की राह पर चलाकर उच्चतक शिखर पर पहुंचाकर गौरव अनुभव करें। अधिकतर तो किसी को छोटा दिखाकर अपनी श्रेष्ठता का आनंद लेना चाहते हैं।  इसी प्रवृत्ति ने समाज में हमेशा वैमनस्य का भाव स्थापित कर रखा है।
            कहा जाता है कि भारत विश्व का अध्यात्मिक गुरु है।  सच है क्योंकि हमारे ऋषियों, मुनियों तथा तवस्वियों ने जिस ज्ञान रहस्य का संचय किया वह अनुपम है पर इसके पीछे यह भी देखना चाहिये कि उन्हें ऐसा अज्ञानी समाज मिला जिसे देखकर वह अनुसंधान कर सके।  जिस तरह गुलाब का फूल कांटों तथा कमल का फूल कीचड़ में खिलता है उसी तरह ज्ञान की अनुभूति अज्ञान के अंधेरे में होती है। हमारे यहां माया की भौतिक उपलब्धि भी परमात्मा की कृपा से जोड़ी जाती है। यही कारण है कि भौतिक रूप से संपन्न स्वयं को महान भक्त प्रमाणित करने के लिये प्रयासरत रहते हैं। अपना वैभव हजम नहीं होता और वह समाज के सामने उसका प्रदर्शन कर वैमनस्य बढ़ाते हैं।  बड़े और छोटे वर्गों के बीच समन्वय का काम राज्य का है और यकीन मानिए कहीं न कहीं विदेशी धार्मिक विचाराधाराओं का आना हमारे राजसी पुरुषों की नाकामी का प्रमाण है। हम यह कहते हैं कि हमारे यहां भारतीय धर्म मानने वालों की संख्या कम हो रही है तो इसके पीछे हमारे आर्थिक और सामाजिक कारण हैं।  उन्हें दूर किये बिना आबादी बढ़ाने का विचार करना व्यर्थ है।  जितनी बड़ी संख्या में अभी भी हैं पहले उनको सामाजिक रूप से तो स्थापित कर लें तब भविष्य का विचार करें।  इसलिये प्रयास यह करना चाहिये कि सुशासन एक नारा बनकर नहीं रहे वरन् उसे प्रजा के बीच चलते हुए दिखना चाहिए। कम से कम जैसे योग तथा ज्ञान साधक को इसके अलावा कोई मार्ग नहीं दिखता। इन कथित धर्म के ठेकेदारों को अगर अपनी नेकनीयती प्रमाणित करनी है तो बजाय वह आबादी बढ़ने का नारा देने के राजसी पुरुषों को भ्रष्टाचार से दूर रहने तथा सार्वजनिक जीवन में सादगी अपना का संदेश देना चाहिये। यही आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Saturday, January 3, 2015

अज्ञानियों की ज्ञानियों से निभना कठिन-हिन्दी चिंत्तन लेख(agyaniyon ki gyani se nibhna kathin-hindi thought article)



            इस संसार में चार तरह के के भक्त पाये जाते हैं-आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  श्रीमद्भागवत् गीता में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि उन्हें ज्ञानी भक्त ही प्रिय है।  यह सभी मानते हैं कि श्रीगीता हमारी धार्मिक विचाराधारा का आधार ग्रंथ है पर आधुनिक संदर्भ में उसको समझ पाने की क्षमता उन लोगों में नहीं हो सकती जो धर्म से ही भौतिक समृद्धि की आशा करते हैं। इस तरह की भौतिक समृद्धि आर्ती तथा अर्थार्थी भाव वाले भक्त से धन मिलने पर ही संभव है जिनके लिये अध्यात्मिक तत्वज्ञान केवल सन्यासियों का विषय है।  उनके लिये अंदर के प्राणों से अधिक बाह्य विषयों की तरफ आकर्षित मन ही स्वामी होता है। आर्त भाव से अपनी समस्याओं के निराकरण तो अर्थार्थी अपनी भौतिक सिद्धि के लिये देव मूर्तियों पर धन चढ़ाते हैं।  वह चमत्कारों तथा दुआओं पर यकीन करते हैं।  उन्हें यह समझाना कठिन है कि सांसरिक विषयों का संचालन माया से स्वतः ही होता है।  अध्यात्मिक ज्ञान से प्रत्यक्षः समृद्धि नहीं आती पर देह, मन और पवित्रता की वजह से जो आनंद प्राप्त होता है  उसका मूल्य मुद्रा से आंका नहीं जा सकता। मगर समाज का अधिकांश वर्ग पश्चिमी प्रभाव के कारण प्रत्यक्ष प्रभुता में ही आनंद ढूंढ रहा है ऐसे में किसी से ज्ञान चर्चा भी व्यर्थ लगती है।


कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
----------------
निरालोके हि लोकेऽस्मिन्नासते तत्रपण्डिताः।
जात्यस्य हि मणेर्यत्र काचेन समता मता।।
                        हिंदी में भावार्थ- अज्ञान के अंधेरे में रहने वाले अज्ञानी के पास विद्वान रहना पसंद नहीं करते।  जहां मणि हो वहां कांच का काम नहीं होता उसी तरह विद्वान के पास अज्ञानी के लिये कोई स्थान नहीं है।

            हम अक्सर समाचारों में यह सुनते हैं कि दक्षिण के एक मंदिर तथा महाराष्ट्र के  मुख्य संाई बाबा पर करोड़ों का चढ़ावा आता है।  वहां सोने के मुकुट और सिंहासन चढ़ाये जाते हैं।  एक बात निश्चित है कि छोटी रकम का चढ़ावा कोई सामान्य इंसान कर सकता है पर अगर भारी भरकम की बात हो तो यकीनन ईमानदारी की आय से यह संभव नहीं है। हम देख रहे हैं जैसे जैसे देश में काले धन की मात्रा बढ़ रही है वैसे वैसे ही चढ़ावा भी बढ़ रहा है।  हम यह कह सकते हैं कि जिस तरह नैतिकता का पैमाना नीचे जा रहा है वैसे ही पाखंड का स्तर ऊंचा जा रहा है। अध्यात्मिक ज्ञान से प्रत्यक्षः समृद्धि नहीं आती पर देह, मन और पवित्रता की वजह से जो आनंद प्राप्त होता है  उसका मूल्य मुद्रा से आंका नहीं जा सकता। मगर समाज का अधिकांश वर्ग पश्चिती प्रभाव के कारण प्रत्यक्ष प्रभुता में ही आनंद ढूंढ रहा है ऐसे में किसी से ज्ञान चर्चा भी व्यर्थ लगती है।
            अध्यात्मिक ज्ञान साधकों के लिये धर्म के नाम पर कर्मकांडों का तमाशा अधिक महत्व नहीं रखता पर अपने मन की बात सार्वजनिक रूप से कहते भी नहीं है क्योंकि श्रीमद्भागवत गीता में स्पष्टतः कहा गया है कि ज्ञानी कभी भी अज्ञानियों को अपनी भक्ति से विमुख करने का प्रयास न करे।  न ही वह उनकी राय का अनुमन करे।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Tuesday, December 30, 2014

शक्तिशाली देश चाहते हो तो मनोरंजन और व्यसनों के दासत्व से मुक्ति पाओ-कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर चिंत्तन लेख(shaktishali desh chahte ho to manoranjan aur vyasaon ke dasatva se mukti pao-A Hindu hindu religion thought based on kautilya ka arthshastra)



                             भारत एक विशाल प्राकृतिक संपन्न देश है। विश्व में क्षेत्रफल की दृष्टि से अनेक बड़े देश हैं पर उनमें प्राकृतिक और मानवीय संसाधन की दृष्टि से अनेक दोष हैं। भारत में सभी प्रकार के खनिज पाये जाते हैं तो जलसंपदा भी यहां बहुत है।  उनके दोहन के लिये जनसंपदा भी कम नहंी है। अनेक देश बड़े हैं और उनकी उनके पास प्राकृत्तिक संपदा भी बहुत है पर जनसंख्या अधिक नहीं है जिससे वह उसका पूर्ण दोहन नहीं कर पाते।  अनेक देशों का क्षेत्रफल बड़ा है पर वहां जमीन में न पानी है  और न ही खनिज संपदा।  उन बड़े  देशों में संपन्नता है पर भारत जैसा अध्यात्मिक ज्ञान नहंी है। भारत विश्व मे अपने अध्यात्मिक ज्ञान के कारण भी जाना जाता है।  यही कारण है कि भारत के विरोधी राष्ट्र उस पर शासन करने के लिये यहां भेदनीति अपनाते हैं। अध्यात्मिक ज्ञान के कारण  आम भारतीय धर्मभीरु व्यक्ति  बौद्धिक रूप से दृढ़ होता है इसलिये यहां के समाज पर शासन सहज नहीं है।  यही कारण है कि यहां नये मानसिक भौतिक तथा मानसिक व्यसन निर्यात किये जाते हैं।
                             कार्ल मार्क्स ने कहा था कि धर्म अफीम की तरह होता है।  यह पाश्चात्य विचाराधाराओं पर पूर्णतः सही लगता है भारत में धर्म निजी नियंत्रण बनाये रखना वाला सिद्धांत है।  भारत में विदेशी विचाराधाराओं की तरह मार्क्सवाद भी आया है।  इसके मानने वाले समाज सेवा को व्यसन की तरह करते हैं।  उन्हें भारतीय अध्यात्मिक दर्शन अफीम का तत्व लगता है।  इतना ही नहीं मार्क्स के शिष्य हर विदेशी राजनीतिक, धार्मिक तथा सामाजिक विचार को भारतीय विचाराधाराओं से  श्रेष्ठ मानते हैं।  अंग्रेंजोें ने भारत को गुलाम बनाये रखने के लिये ऐसी शिक्षा पद्धति अपनाई कि आज हर शिक्षार्थी नौकरी यानि गुलामी के लिये तत्पर रहता है।  उससे भी काम न चला तो क्रिकेट जैसा खेल थोप दिया। भारत की बुद्धि का हरण उन्होंने इस कदर किया कि फिल्म और क्रिकेट के नायक यहां भगवत्स्वरूप प्रचारित हो रहे हैं।  प्रचार माध्यम उनकी आड़ में ढेर सारी आय अर्जित कर रहे हैं। धर्म, अर्थ और समाज सेवा के क्षेत्र में सक्रिय शिखर पुरुष धनार्जन के नशे में लग ेहुए हैं तो आम लोग मनोरंजन के दास हो गये हैं।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

--------------

स्फीतं त्रीणि बलं शक्यमाधातुं पानवर्त्मनि।

हृस्वप्रयासव्यायामादितिसैन्यं समुत्पतेत्।।

            हिन्दी में भावार्थ-शत्रु की सेना अगर बल में अधिक हो तो उसे मद्यपान के व्यसन में लगाकर  व्यायाम में लग होने पर उसे आक्रमण कर दें।

                              अभी हाल ही में भारत में बढ़ते मादक द्रव्य पर समाचार आये थे।  चार दिन चर्चा चली पर नतीजा वही ढाक के तीन पात!  अंग्रेजों ने यहां शासन कर यह समझ लिया था कि यहां का अध्यात्मिक ज्ञान जितना प्रबल उतना ही यहा लोग मानसिक रूप से कमजोर है।  उनकी कमजोरियों पर  अनुसंधान के कारण ही यहां के ऋषि, मुनि और तपस्वियों ने महान ज्ञान स्थापित किया। इस ज्ञान के रहते भारतीयों पर शासन कठिन है इसलिये उन्होंने विदेशी विचारधाराऐं यहां प्रवाहित कीं।  अंग्रेजों ने इसलिये ही अपनी शिक्षा पद्धति, खेल तथा मनोरंजन के साधन के रूप में स्थापित किया ताकि यहां से जाने के बाद भी उनका प्रभाव बना रहे।  इधर यह भी चर्चा होती रही कि फिल्मों के प्रदर्शन, क्रिकेट में सट्टे और मादक द्रव्यों से आतंकवादी संगठन पैसा अर्जित कर रहे हैं फिर भी हमारे देश के लोग मनोरंजन के दासत्व से मुक्त नहीं हो पा  रहे।  एक तरह से मद्यपान-फिल्म, क्रिकेट और मादक द्रव्य-इस देश पर विदेशी कब्जा हो गया है। हमारा मानना है कि अगर हमारे देश के लोग कम से कम दो वर्ष फिल्म, क्रिकेट और मादक द्रव्यों से दूर रहें तो यहां वातावरण अत्यंत सहज हो जायेगा।  भारत को व्यसनों में धकेलने वाले तब निराश हो कर चुप हो जायेंगे।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Saturday, November 29, 2014

कांच का महत्व न समझे उसे हीरा दिखाना व्यर्थ-हिन्दी चिंत्तन लेख(kanch ka mahatva n samjhje use heera dikhana vyarth-hindi chinntan article)



            यह आश्चर्य की बात है कि संसार के जितने भी कथित धर्म हैं उनसे जुड़े प्राचीन ग्रंथों के प्रचारक लोगों के बीच ज्ञान इस तरह बेचते हैं जैसे कि धर्म का ज्ञान कोई बाज़ार में बेचने का विषय या वस्तु हो।  हम अगर भारतीय अध्यात्म दर्शन की बात करें तो उसमें ज्ञानी से आशय केवल अच्छे शब्द समूह या वाक्यों से संबद्ध व्यक्ति होना नहीं है।  ज्ञानी वह माना जाता है जिसकी क्रियाओं से यह पता चलता है कि वह ज्ञान पर आधारित हैं।  व्यवहार, विचार, वक्तव्य तथा विचार से यह अपने आप पता चल जाता है कि कोई व्यक्ति ज्ञानी है या नहीं।  इतना ही नहीं ज्ञान भी उस व्यक्ति को दिया जाता है जिसमें गेय करने का सामर्थ्य हो। इसके साथ ही जो इच्छुक हो उसे ज्ञान दिया जाता है।
            भारतीय अध्यात्मिक परंपरा में गुरुकुल और सत्संग परंपरा ज्ञानार्जन का साधन मानी जाती है जिसमें साधक स्वयं उपस्थित होता है।  अब पाश्चात्य पंरपरा अपनाने के चलते हमारे देश में भी अनेक ज्ञान के व्यवसायी सार्वजनिक सभायें करनें लगे हैं।  अपने प्रवचनों में मनोंरजन की भाषा बोलते हैं।  भारत में विदेश से आयातित विचाराधारायें समस्त मनुष्यों को देवता बनाने का ऐसा सपना लेकर आती हैं जो असंभव है। इसमें ज्ञान का विषय व्यक्ति की गेय करने की क्षमता तथा उसकी इच्छा का आंकलन कतई नहीं किया जाता।  इतना ही नहीं अनेक विचाराधाराओं के प्रवर्तक तो व्यक्ति को अपना समूह त्याग कर नये समूह में आने की प्रेरणा यह कहकर देते हैं कि उन्हें सर्वशक्तिमान का सदियों से आकाश या परलोक में  स्थापित   श्रेष्ठ स्थान मिल जायेगा।
संत कबीर दास ने कहा है कि
---------------
जो जैसा उनमान का, तैसा तासों बोल।
पोता को गाहक नहीं, हीरा गांठि न खोल।।
            हिन्दी में भावार्थ-अपने संपर्क में आने वाले मनुष्य की प्रवृत्ति देखकर व्यवहार करना  चाहिये। जिसे कांच की पहचान न हो उसके सामने अपने हीरे का प्रदर्शन करना व्यर्थ है।
एक ही बार परिखए, न वा बारम्बार।
बालू तौहु किरकिरी, जो छानै सौ बार।।
            हिन्दी में भावार्थ-किसी व्यक्ति या विषय की परख एक बार ही करना ठीक है। बार बार किसी को अवसर देना ठीक नहीं है।  रेत को सौ बार छाने पर वह हमेशा किरकिरी ही रहेगी।
            हम देख रहे हैं कि पश्चिम से कोई भी भाषा, संस्कृति, संस्कार तथा सामाजिक विचाराधारा ऐसी नहीं आयी जो दोषमुक्त हो।  यह अलग बात है कि आधुनिक दिखने की चाहत में हमारा सभ्रांत वर्ग उसके पीछे भाग रहा है।  हम देख रहे हैं कि हमारा समाज इसी कारण विरोधाभासी संस्कृति के जाल में फंस गया है। यही कारण है कि हमारे यहां जितना ज्ञान का प्रचार हो रहा है उतना समाज निर्माण होता दिख नहीं रहा।  जिस तरह का धर्ममय वातावरण सतह पर दिख रहा है उस दृष्टि से तो भ्रष्टाचार, अनाचार और व्याभिचार के घटनायें होना ही नहीं चाहिये पर वह तो बढ़ती जा रही हैं।  तय बात है कि हमारे पेशेवर धार्मिक ठेकेदार ऐसे लोगों के सामने ज्ञानं बांच रहे हैं जिनके लिये शब्द केवल क्षणिक मनोंरजन के लिये होते हैं न कि जीवन सुधारने के लिये उपयोग किया जाता है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Sunday, November 23, 2014

इतिहास बदलता है, अध्यात्मिक ज्ञान के सिद्धांत नहीं-संतों के हिसंक होने पर चिंत्तन लेख(ithas badalta hai,adhnatmik darshan nahin-hindi thoght article)



            विषयों में निर्लिप्त भाव अपनाने से आशय क्या है? हमने आज तक अनेक कथित विद्वानों को सुना पर लगता नहीं है कि वह इसे समझे जो दूसरे को समझा पायें। हमने श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन कर यह समझा है कि किसी व्यक्ति, विषय वस्तु के संपर्क में आना बुरा नहीं है वरन् निरंतर उसका स्मरण करना ही लिप्तता है। श्रीमद्भागवत गीता में गृहस्थ धर्म का पालन करने हुए भी योग प्राप्ति संभव बताई गयी है।  ऐसे में यह संभव नहीं है कि विषयों से संपर्क न रखना ही निर्लिप्त भाव माना जाये। हमारे अनुसार तो लिप्तता का आश लिपटने से है। अपने दैहिक आवश्कता की पूर्ति के बाद संबंधित विषय से विमुख होना ही निर्लिप्पता है।  मुख्य बात यह है कि हम अपनी इंद्रियों का सांसरिक विषयों से संपर्क तो  रोक नहीं सकते  पर हम अपने मस्तिष्क में निरंतर भौतिक संसार के चिंत्तन से परे रहकर निर्लिप्त रह सकते हैं।
            हमने पशु पक्षियों का जीवन देखा होगा।  पेट भरने के बाद बचे भोजन का पशु पक्षी  त्याग कर देते हैं, पर मनुष्य उसे बचाकर रख देता है-यह लिप्तता का भाव है। सिंह एक बार किसी मृग कर शिकार कर लेता है तो उसके पास चाहे कितने भी अन्य मृग विचरण करें वह उनसे मुंह फेर लेता है।  गाय को एक बार रोटी दे दी जाये तो वह उस दरवाजे का त्याग कर चली जाती है।  चिड़िया जमीन पर रखे दानों का सेवन करती है पर पेट भर जाने पर वह उसे छोड़ जाती है।  कोई भी पशु पक्षी संग्रह नहीं करता यही उसका निर्लिप्त भाव है। अनेक पशु पक्षी अपने बच्चे के युवा होने पर उसका त्याग कर देते हैं। कभी कभी तो यह लगता है कि वह बच्चे उनकी स्मृति से ही बाहर हो गये हैं।  मनुष्य ही नहीं वरन् सृष्टि के समस्त जीवों में अपनी संतान के प्रति लगाव देखा जाता है मगर अन्य जीव अधिक समय तक न संतान साथ रखते हैं न वह रहती है।  पशु पक्षियों का यही उन्मुक्त भाव निर्लिप्त भाव है।
            सांसरिक विषयों से देह के भरण पोषण से अधिक संपर्क रखना तो ठीक पर उनका निंरतर चिंत्तन करने से उपभोग के प्रति अनेक प्रकार  की अनेक नयी  कामनायें मन में पैदा होती हैं। इनमें से कई पूर्ण होती है तो कई में नाकामी हाथ आती है।  नाकामी से क्रोध और क्रोध से मूढ़ भाव पैदा होता है। मूढ़ भाव से ज्ञान शक्ति का हृास होता है और उसके बाद मनुष्य अपनी स्थिति से गिर जाता है।
            हम अक्सर यह कहते हैं कि ज्ञानी कभी पतन को प्राप्त नहीं होता पर सच यह है कि भौतिकता या माया का जाल इतना विकट है कि बड़े से बड़ा ज्ञानी भी उसमें फंस सकता है। ज्ञान किसके पास कितना है यह प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह देखना चाहिये कि उसमें धारणा शक्ति कितनी है।  जब मनुष्य सांसरिक विषयों में अत्यंत रुचि के साथ जुड़ता है तब उसके पास तत्व ज्ञान कितना भी हो धारणा शक्ति के हृास के साथ वह पतन की तरफ जाता ही है।
            अभी हाल ही में एक कथित संत ऐसे ही मायावी जाल में फंस गया।  हमने उसके प्रवचन सुने। सच बात तो यह कि उसमें ज्ञान की कोई कमी नहीं थी।  उसने अनेक प्रकार के उपाय कर बड़ा आश्रम बनाया। उस आश्रम में उसने अपने भक्तों के रहने, खाने और सत्संग के लिये बढ़िया सुविधा बनायी। ज्ञान में कमी नहीं थी पर अपनी या दूसरे की देह का चिंत्तन अंततः एक सांसरिक विषय है।  आश्रम के लिये तमाम चिंत्तायें उन संत के मन में रही होंगी। इतना ही नहीं जब भक्तों के सुविधा के लिये चिंता करेंगे तो अपने लिये भी क्या कम रखते होंगे? न्यायालय के एक प्रकरण में निंरतर उपस्थित नहीं रहे तो उनके विरुद्ध अवमानना का नया विषय उपस्थित हो गया। इधर सांसरिक विषयों में भारी उपलब्धि का अहंकार उनके मन में आने से न्यायालय की शक्ति का ज्ञान लुप्त हो गया होगा।  परिणाम यह हुआ कि न्यायालयीन आदेश पर पुलिस ने आश्रम घेरा।  उनके कथित शिष्यों ने प्रहरियों पर हमला कर दिया।  आपाधापी में छह अन्य लोग भी मर गये। अब उन कथित संत को  पुराने प्रकरण से अधिक तो नये प्रकरण भारी पड़ने वाले हैं। हमारे प्रचार माध्यम संतों के ज्ञान और कार्यों पर प्रश्न उठा रहे हैं।  यह कैसे हुआ? संत ने ही इसका जवाब भी दिया किमेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी थी?’’
            वास्तव में यह एक ऐसे ज्ञानी की स्वीक्रोक्ति है जिससे लोभ और लालच ने अपराध के मार्ग पर पहुुंचा दिया।  हमारा तो पहले से ही निष्कर्ष था कि उनके पास ज्ञान हमेशा ही रहा है पर लगता है कि सांसरिक विषयों ने उनकी धारण शक्ति को क्षीण कर दिया। इसी घटना के परिप्रेक्ष्य में हमारा यह भी निष्कर्ष है कि प्रथ्वी के भूगोल और जीव की प्रकृत्ति में कोई बदलाव नहीं होता। इतिहास बदल जाता है हम उससे भ्रमित हो जाते है।  रामायण में श्रीसीता ने श्रीराम जी को एक कथा सुनाई थी जो इससे मिलती जुलती है। सतयुग में  एक महान तपस्वी थे।  उनके तप से इंद्र व्यथित हो उठे। उनको लगा कि यह तो उनका सिंहासन ही हर लेगा।  एक दिन वह एक योगी का रूप धर कर उस तपस्वी के पास आये और उन्हें अपना फरसा हाथ में देकर बोले-हम तपस्या करने जा रहे हैं जब तक लौटकर आयें आप इसकी रक्षा करें।’’
            परोपकार में तत्पर रहने वाला वह तपस्वी प्रसन्न हो गया और इंद्र चले गये। अब तपस्वी का मन तो उस फरसे में ही रहने लगा।  स्थिति यह कि ध्यान में भी वह फरसा बसने लगा।  एक दिन जिज्ञासावश उन्होंने अपने हाथ में उठाकर देखा तो उन्हें लगा कि अपनी रक्षा के लिये यह अत्यंत उपयुक्त है। बस फिर क्या तो इस तरह के चिंत्तन में ऐसा फंसे कि  धीमे धीमे हिंसा में ही लीन हो गये और अंततः उनको उसका दंड भोगना ही पड़ा।
            हमने इन कथित संत और रामायणकालीन उस तपस्वी के जीवन में समानता देखी और यह माना कि अध्यात्मिक दर्शन की दृष्टि से प्रथ्वी का भूगोल और जीव की स्वाभाविक प्रकृत्तियां नहीं बदलती यह अलग बात है कि एतिहासिक घटनायें पात्र का नाम बदलकर प्रस्तुत होती हैं।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Friday, October 31, 2014

सम्मान का महत्व समझने वाले व्यक्ति का ही अभिवादन करें-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(samman ka mahatva samajhne wale vyakti ka hi abhivadn karen-A Hindi hindu religion thought based on manu smriti)



            आमतौर से यह माना जाता है कि लघु श्रेणी के मनुष्य को श्रेष्ठ का हाथ जोड़कर या सिर झुकाकर अभिवादन करना चाहिये।  यह भी माना जाता है कि जहां हाथ मिलाने का अवसर हो वहां विशिष्ट व्यक्ति को पहले हाथ बढ़ाना चाहिये।  कंधे पर हाथ रखकर आपसी मिलने की परंपरा में भी विशिष्ट व्यक्ति लघु श्रेणी के व्यक्ति को अपनी पहल से सम्मान देता है।  गले मिलने की प्रक्रिया में भी यही बात है। दो व्यक्तियों की पारस्परिक भेंट में हमेशा ही अभिवादन  की प्रक्रिया से ही यह संकेत मिल जाता है कि दोनों के आपसी संबंध मधुर या कटु हैं। जहां संबंध मधुर होते हैं वहां अभिवादन के समय मिलने वालों की आंखों में सद्भाव का रस बहता दिखता है।  जहां कटु हों वहां चेहरे के हावभाव प्रमाणित कर देते हैं।

मनु स्मृति मिएँ कहा गया है कि

---------------------------

यो न वेत्यभिवादस्य विप्रः प्रत्यभिवादनम्।
नाभिवाद्य स विदुषा यथा शूर्दस्तथैव सः।।


           
हिन्दी में भावार्थ-जो अभिवादन का उत्तर देना नहीं जानता उसे प्रणाम नहीं करना क्योंकि वह इस सम्मान के अयोग्य होता है।

अवाच्यो तु या स्त्री स्वादसम्बद्धा य योनितः।
भोभवत्पूर्वकं त्वनेमभिभाषेत धर्मवित्।।


           
हिन्दी में भावार्थ-धर्म का ज्ञान रखने वाले को चाहिए कि वह दूसरे ज्ञानी को कभी भी नाम से संबोधित न करे भले ही वह उससे छोटी आयु का क्यों न हो। उसको हमेशा सम्मान से संबोधित करना चाहिए।
            हमेशा मीठी वाणी में बोलकर दूसरों को प्रसन्न करना चाहिए। अपने से बड़ों का सम्मान करना हमारा धर्म है। निसंदेह इस संसार में विनम्र व्यवहार से मनुष्य विजय प्राप्त करता है। मगर इस संसार में ही लोग भी दो प्रकार के होते हैं-एक आसुरी संपदा तो दूसरे दैवीय संपदा लेकर उत्पन्न होते हैं, यह बात भी ध्यान रखने योग्य हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो विनम्र व्यवहार को कायरता और उदारता को कमजोरी समझकर दुर्व्यवहार करने पर आमादा हो जाते हैं। ऐसे लोगों को दंडित करना भी हमारा धर्म है।
      इसलिये जो लोग अभिवादन का उत्तर न देते हों या अहंकारवश मजाक उड़ाते हों उनका कभी स्वयं अभिवादन नहीं करना चाहिए। जहां तक हो सके उनके सामने आने से बचना चाहिए। इस संसार में आसुरी संपदा लेकर उत्पन्न हुए कुछ लोग ऐसे हैं जिनका अभिवादन करने पर सिवाय अपमान के कुछ नहीं मिलता। उनका अभिवादन करना तो दूर उनके चेहरे की तरफ दृष्टि नहीं डालना चाहिए।
      उसी तरह दैवीय संपदा लेकर उत्पन्न सहृदयजनों का सम्मान करना भी आवश्यक है भले ही आयु में वह छोटे क्यों न हों? सच बात तो यह है कि योग्यता, प्रतिभा तथा सज्जनता के गुणों होने के लिये आयु का छोटा या बड़ा होना जिम्मेदार नहीं है। अनेक लोग बड़ी आयु होने पर भी अपना विवेक नहीं खोते। अतः अपने से कम आयु के व्यक्ति की योग्यता देखकर उसका सम्मान करना चाहिए। सामने आने पर उसे पहले अभिवादन करना भी अच्छी बात है। उस समय पहले अभिवादन करने में संकुचित मानसिकता नहीं दिखाना चाहिए।
------------------------------
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Thursday, October 23, 2014

सांई बाबा की भक्ति के विरुद्ध अभियान का औचित्य नहीं-हिन्दी चिंत्तन लेख(sai baba ki bhakti ke viruddh abhiyan ka auchitya nahin-hindi thought article on sai baba of shirdi)



            एक हिन्दू धार्मिक गुरु ने शिर्डी के सांई बाबा की भक्ति के विरुद्ध अभियान चलाया हुआ है। इसमें एक तर्क यह दिया जा रहा है कि उनकी पूजा करने पर लक्ष्मी नाराज हो जाती है।  हमें हैरानी इस बात की है कि स्वयं को ब्रह्मज्ञानी कहलाने वाले लोग श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों का आशय नहीं समझते इसी कारण उसमें वर्णित  मनोविज्ञान से वह अनभिज्ञ हैं। श्रीमद्भागवगीता में चार प्रकार के भक्तों के-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी का-वर्णन किया गया है। इन चारों का अस्तित्व रहना ही है इसलिये ज्ञानी को सहअस्तित्व का भाव रखना चाहिये। श्रीमद्भागवत गीता में  यह भी बता दिया है कि ज्ञानी भक्त जो भगवान को प्रिय हैं उनकी संख्या नगण्य ही रहेगी। इसलिये सारे संसार को ज्ञानी बना देने का सपना देखना महान अज्ञानता का लक्षण है।
            हम यहां सांईं बाबा की भक्ति  के समर्थक नहीं है पर विरोध भी नहीं करते।  जिन धार्मिक गुरु ने सांई बाबा की भक्ति का विरोध किया उन्होंने ही दलित वर्ग के मंदिर प्रवेश को भी निषिद्ध बताया है।  ऐसा लगता है कि हमारे देश में कुछ धर्माचार्य समाज में विघटन कर अपना काम सिद्ध करना चाहते हैं। कहा जाता है कि दो हजार वर्ष यह देश गुलाम रहा पर यह सत्य कोई नहीं स्वीकार कर रहा कि इसके लिये हमारा सामाजिक वैमनस्य रहा है। इस तरह का वैमनस्य फैलाना भारतीय धर्म के विरोधियों को अपने ऊपर प्रहार करने का अवसर देने जैसा होगा।
            वैसे तो समस्त मंदिरों में आमजन का प्रवेश सहजता से होता है  पर जिनमें निजी प्रभाव अधिक होता है वहां आम श्रद्धालू अपनी सुविधा से जाता है।  इसके अलावा हमारे जहां मूर्तिपूजा अधिक होती है इसलिये चारों प्रकार के भक्त मंदिरों जाते जरूर हैं पर आर्ती और अर्थार्थी तो अपने काम की सिद्धि के लिये इधर उधर चक्कर भी मारते हैं।  उनकी पीड़ाओं का निवारण तथा कार्यसिद्ध समय के अनुसार स्वतः होता ही है पर किसी का यकीन प्राचीन देवता से हटकर किसी सांसरिक मनुष्य पर जम जाये तो उसे समझाना कठिन है। सांसरिक मनुष्य पर यकीन करने वाले मनुष्य को रोकना या धमकाना जोखिम भरा भी हो सकता है यह बात धर्म को समूह में बनाये रखने वाले कथित धार्मिक विद्वानों को समझना चाहिये।
            अगर मान लीजिये किन्हीं सांईं बाबा के भक्तों के पास भले ही  भाग्य से धन आया हो पर वह उनकी कृपा मानता है तो वह ऐसे धर्माचार्यों पर गुस्सा होंगे। आज आप उनको हिन्दू कहकर दुत्कार रहे हो कल वह धर्म परिवर्तन करने लगे तो क्या करेंगे? हालांकि इस तरह की आशंका  इसलिये नहं है क्योंकि सांईबाबा के अधिकतर भक्त हिन्दू ही हैं और अन्य देवी देवताओं के प्रति उनमें हृदय में आस्था कम नहीं है।  यही कारण है कि सांई बाबा के मंदिरों में अन्य देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित की जाती हैं। वहां रामनवमी, कृष्णजन्माष्टमी, गणेश चतुर्थीं और दीपावली जैसे पर्व मनाये ही जाते हैं।
            मुख्य बात यह है कि एक योग साधक और गीता पाठक होने के नाते हम दूसरे की भक्ति पर आक्षेप करना अनुचित मानते हैं। वैसे ही हमारे देश में आर्थिक, सामाजिक तथा शारीरिक तनाव अधिक हैं ऐसे में कोई सांई बाबा की भक्ति से प्रसन्नता प्राप्त कर रहा है तो एक ज्ञानी की नज़र में बुरा नहीं है।  अब इस तरह के अभियान को अधिक हवा देना ठीक नहीं है।  जहां तक इस तरह के अभियान से संतोषी माता की भक्ति समाप्त करने का दावा किया जाता है पर यह उनका भ्रम है।  आज भी अनेक लोग संतोषी माता का व्रत रखते हैं। इसलिये सांईबाबा के विरुद्ध अभियान चलाने वाले इस तरह के दावे कर अपने को सिद्ध नहीं प्रमाणित कर सकते।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Sunday, September 21, 2014

ग्रंथों के सतत अध्ययन से भी ज्ञान और विज्ञान में पारंगत होना संभव-हिन्दी चिंत्तन लेख(granthon ke satat adhyayan se bhi gyan aur vigyan mein paarangat hona sambhav-hindi chinttan)



            भारत में यह प्रकृति की कृपा कहें या प्राचीन ऋषियों, मुनियों तथा तपस्वियों का प्रभाव कि हमारे यहां  लोग स्वाभाविक रूप से धर्मभीरु होते हैं।  हम लोग  संसार के दृश्यव्य विषयों में लिप्त जितना होते हैं उतनी ही हमारी रुचि अध्यात्म के अदृश्यव्य तत्वों में भी रहती है।  यही कारण है कि हमारे यहां बरसों से ही प्रवचन, सत्संग और परमात्मा की एकांत साधना की परंपरा रही है।  यह अलग बात है कि लोगों को धार्मिक शिक्षा की व्यवसायीकरण आधुनिक शिक्षा की तरह सदियों पहले ही हो गया है पर इसका आभास लोग सहजता से नहीं करते।  जहां अनेक निष्काम योगियों, साधुओं और संतों भारतीय अध्यात्म दर्शन का रथ अपने तप से खींचा वही अनेक कामनावान विद्वानों ने आमजन से दक्षिणा के नाम पर पैसा कमाने तथा समाज में अपनी प्रभावी छवि बनाये रखने के लिये धर्म प्रचार का व्यवसाय अपनाया।  यह अलग बात है कि वह निष्काम और सन्यासी होने का दावा करते रहे हैं पर उनके रहन सहन और चाल चलने से यह स्पष्ट होता रहा है कि वह वास्तव में वैसे त्यागी हैं नहीं जैसा दावा करते हैं।
            यही कारण है कि आजकल अनेक धर्मभीरु लोग सच्चे गुरु की तलाश में रहते हैं। अनेक लोग प्रश्न करते हैं कि सच्चा गुरु ढूंढना मुश्किल हो गया है तो कैसे अध्यात्म ज्ञान कहां से प्राप्त करें? पाखंड गुरु से प्राप्त ज्ञान गेय नहीं हो पता। इस समस्या के कारण अनेक लोगों की ज्ञान पिपासा शांत नहीं हो पाती।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
------------
यथायथा हि पुरुषः शास्त्रंसमधिगच्छति।
तथा विजानाति विज्ञानं चास्य रोचते।
            हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य निरंतर शास्त्रों का अभ्यास करता है वह अंततः ज्ञान और विज्ञान में दक्षता प्राप्त ही कर लेता है। सतत अध्ययन से उसकी रुचि ज्ञान और विज्ञान में बढ़ती जाती है।
            हमारा मानना है कि इसके दो ही उपाय हैं। एक तो यह कि इन्हीं पेशेवर रट्टा लगाने वाले गुरुओं से प्रवचन सुने पर उनके पास जाकर उनकी निजी गतिविधियों पर ध्यान न लगायें।  उनके आश्रम या दरबार में जो स्थान हो उसके सामने ही बैठे, सत्संग सुने और ध्यान लगायें फिर वहां से चले आयें।  दरबार के पीछे या गुरु के अंतपुर में कभी न जायें। सीधी बात कहें तो पर्दे पर देखें उसके पीछे क्या इसमें दिलचस्पी न लें।  अगर वह आपने कोई अनैतिक या असहनीय विषय देखा तो आपका मन खराब होगा।  मन में कुविचार आने से अपनी ही हानि होती है। यह संसार संकल्प के आधार पर ही निर्मित होता है।  इसलिये अपने ंसकल्प में शुद्ध विषयों का संग्रह करें। जिस तरह अर्थ संग्रह की सीमा रखना चाहिये उसी तरह धर्म संग्रह में यही नियम लागू होता है। गुरु से शिक्षा प्राप्त करनें उसके आश्रम या दरबार में चिपक कर न रह जायें।
            दूसरा उपाय यह कि अपने ही प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करें। पेशेवर गुरु यह प्रचारित जरूर करते हैं कि इस संसार में उद्धार के लिये किसी दैहिक गुरु होना चाहिये पर महान धनुर्धर एकलव्य ने हमें इस बंधने से भी मुक्त कर दिया है कि गुरु हमेशा सामने बैठा रहे।  अनेक महान लोगों ने ग्रंथों को अपना गुरु बनाया और महान ज्ञान अर्जित किया।  इसलिये नियमित रूप से अध्ययन करें तो भी ज्ञान और विज्ञान विषय स्वतः आत्मसात हो जाता है। इसलिये दैहिक गुरु होने पर अधिक चिंता नहीं करना चाहिये।

--------------------------------------------


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, August 17, 2013

अथर्ववेद के आधार पर संदेश-सौ हाथ से कमा हजार हाथ से दान कर (atharvved ke adhar par sandesh-sau hath ka kama hazar hath se dan kar)



    हमारे देश में धर्म को लेकर अनेक भ्रम प्रचलित हैं जिनका मुख्य कारण धन के आधारित पर प्रचलित पंरपराऐं हैं जिनको निभाने के लिये कथित धर्मभीरु अपना पूरा जीवन पर दाव पर लगा देते हैं। दूसरी बात यह है कि आधुनिक शिक्षा पद्धति में डूबा समाज अध्यात्मिक ज्ञान से परे हो गया है और उसके पास धर्म तथा भ्रम की पहचान ही नहीं रही।  सच बात तो यह है कि हम जिस अपनी महान संस्कृति और संस्कारों की बात करते रहे हैं उनका आधार वह पारिवारिक संबंध रहे हैं जो अब धन के असमान वितरण के कारण कलह का कारण बनते जा रहे हैं। पहले एक रिश्तेदार के  पैसा अधिक होता तो दूसरे के पास कम पर अंतर इतना नहीं रहता था कि उसकी अनुभूति प्रत्यक्ष रूपे की जा सके पर  कि अब असमान स्तर दिखने लगा है। इतना ही नहीं स्तर में अंतर इतना अधिक आ गया है कि सद्भाव बने रहना कठिन हो गया है। एक रिश्तेदार सामान्य जीवन जी रहा है तो दूसरा राजकीय कर्म से जुड़ने के कारण विशिष्ट हो जाता है। ऐसे में रिश्तों में मिठास कम कड़वाहट अधिक हो जाती है।
       महत्वपूर्ण बात यह कि हम धर्म के नाम पर सभी एक होने का स्वांग करते हैं पर हो नहीं पाते। इसका मुख्य कारण यह है कि हमारे देश में दो प्रकार के भारतीय धार्मिक लोग हैं। एक तो हैं लालची दूसरे हैं त्यागी।  एक बात निश्चित है कि भारतीय धर्म से जुड़े लोग अधिकतर त्यागी होते हैं पर आधुनिक लोकतंत्र ने कुछ लालची लोगों को आगे बढ़ने का मार्ग दिया है। समाज पर नियंत्रण करने वाली अनेक संस्थाओं में कथित रूप से लालची लोगों ने कब्जा कर लिया है। यह लालची लोग एक तरफ से चंदा लेते हैं दूसरी तरफ दान करने का स्वांग करते हैं। अंधा बांटे रेवड़ी आपु ही आपको दे की तर्ज पर यह उस दान का हिस्सा भी अपने घर ही ले जाते हैं। धर्म, अर्थ, राज्य, कला, तथा शिक्षा के शिखर पर अनेक ऐसे कथित लोग पहुंचें हैं जो भारतीय धर्म के रक्षक होने का दावा तो करते हैं पर होते महान लालची हैं। सीधी बात कहें तो हमारे भारतीय धर्म को खतरा बाहर से नहीं बल्कि अपने ही लालची लोगों से है।  यह लालची लोग प्रचार तंत्र में अपने समाज सेवक होने का प्रचार करते हैं जो जब बाहरी लोग उनका चरित्र देखते हैं तो समस्त भारतीय धर्म के लोगों को वैसा ही समझते हैं जबकि हमारे हमारे देश के अधिकतर  लोग अपने धर्म के अनुसार त्यागी होते हैं।  लालची लोग सौ हाथों से धन तो बटोरते हैं पर दान एक हाथ से भी नहीं करते।  ऐसे ही लोग धर्म के लिये सबसे बड़ा संकट हैं। अगर हम अपने देश में श्रम पर आधारित करने वाले लोगों को देखें तो वह गरीब होने के बावजूद अपने आसपास के लोगों की सहायता को तत्पर होते हैं। इसका वह प्रचार नहीं  करते वरन् करने के बाद किसी प्रकार की फल याचना भी नहीं करते।  इसके विपरीत जिन लोगों ने अपनी लालच की वजह से येन केन प्रकरेण समाज पर नियंत्रण करने वाली संस्थाओं पर कब्जा किया है वह अपना स्तर बनाये रखने के लिये षडयंत्रपूर्वक काम करते हैं। इतना ही नहीं धर्म का कोई एक नाम देना हमारे अध्यात्मिक दर्शन की दृष्टि गलत है वहीं वह सभी धर्मों की रक्षा की बात कहते हुए भ्रमित भी करते हैं।  सबसे बड़ी  इन लोगों ने सभ्रांत होने का रूप भी रख लिया है और अपने से नीचे हर व्यक्ति को हेय मानकर चलते हैं।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
----------------
शातहस्त समाहार सहस्त्रस्त सं किर।
कृतस्य कार्यस्य चहे स्फार्ति समायह।।
        हिन्दी में भावार्थ-हे मनुष्य! तू सौ हाथों वाला होकर धनार्जन कर और हजार हाथ वाला बनकर दान करते हुए समाज का उद्धार कर।
       समाज में समरसता बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है कि शक्तिशाली तथा समृद्ध वर्ग कमतर श्रेणी के लोगों की सहायता करे पर अब तो समाज कल्याण सरकार का विषय बना दिया गया है जिससे लोग अब सारा दायित्व सरकार का मानने लगे हैं।   धनी, शिक्षित तथा शक्तिशाली वर्ग यह मानने लगा  है कि अपनी रक्षा करना ही एक तरह से  समाज की रक्षा है।  इतना ही नहीं यह वर्ग मानता है कि वह अपने लिये जो कर रहा है उससे ही समाज बचा हुआ है।  जब धर्म की बात आती है तो सभी उसकी रक्षा की बात करते हैं पर लालची लोगों का ध्येय केवल अपनी समृद्धि, शक्ति तथा प्रतिष्ठा बचाना रह जाता है।  कहने का अभिप्राय यह है कि हमें केवल किसी को अपने धर्म से जुड़ा मानकर उसे श्रेष्ठ मानना गलत है बल्कि आचरण के आधार पर ही किसी के बारे में राय कायम करना चाहिये। हमारा समाज त्याग पर आधारित सिद्धांत को मानता है जबकि लालची लोग केवल इस सिद्धांत की दुहाई देते हैं पर चलते नहीं। समाज की सेवा भी अनेक लोगों का पारिवारिक व्यापार जैसा  हो गया है यही कारण है कि वह अपनी संस्थाओं का पूरा नियंत्रण परिवार के सदस्यों को सौंपते हैं। दावा यह करते हैं कि पूरे समाज का हम पर विश्वास है पर यह भी दिखाते हैं कि  उनका समाज में  परिवार के बाहर किसी दूसरे पर उनका विश्वास नहीं है।  हम जाति, धर्म, शिक्षा, क्षेत्र तथा कला में ऐसे लालची लोगों की सक्रियता पर दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि उनका ढोंग वास्तव में समूचे समाज  को बदनाम करने वाला हैं। बहरहाल हमें अपने आचरण पर ध्यान रखना चाहिये। जहां तक हो सके धर्म, जाति, भाषा, कला, राज्यकर्म तथा क्षेत्र के नाम पर समाज को समूहों में  बांटने वाले लोगों  की लालची प्रवृत्ति देखते हुए उनसे दूरी बनाने के साथ ही अपना सहज त्याग कर्म करते रहना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


अध्यात्मिक पत्रिकाएं