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Saturday, December 15, 2012

विदुर नीति-कोई धन में तो कोई गुण में धनी है (vidur neeti-koyee dhan mein to gun mein dhani hai)

       पूरे विश्व में आर्थिक एवं वैज्ञानिक विकास की बात खूब होती है पर चारित्रिक विकास  का कोई प्रश्न नहीं उठाता। अगर विश्व के भौतिक विकास को ही सत्य माना जाये तो फिर हमें यह मानना चाहिए समूचे मानव सभ्यता में जो भयंकर वैचारिक दोष आ गये हैं उन पर अधिक चिंता करने की आवश्यकता व्यर्थ है ।  यह अलग बात है कि पूरे विश्व के प्रचार माध्यम एक तरफ से विश्व समुदाय के भौतिक विकास को सभ्य मानव सभ्यता का प्रमाण प्रचारित कर रहे हैं तो दूसरी तरफ उन्हीं में नित प्रतिदिन हिंसा, अपराध और संवदेनहीन समाज को लेकर अनेक प्रकार की बहस भी होती है।  इस धरती पर विचरने वाले जीवों में मनुष्य एक ऐसा जीव है जिसकी बुद्धि अधिक है और जहां वह भौतिक विकास पर प्रसन्न है वहीं चारित्रिक, वैचारिक तथा आचरण में हुए हृास पर  चिंतित भी है।  संसार का बौद्धिक समाज असमंजस में है।  इस भौतिक विकास ने एक तरह से मनुष्य समुदाय की बुद्धि का ह्रास  इस कदर किया है कि समझ में नहीं आता कि पशु और मनुष्य में अंतर क्या रह गया है?
         अध्यात्मिक विकास की बात करना एक तरह से बकवाद करना लगता है।  यह कहना गलत होगा कि पूरा मनुष्य समुदाय मूर्ख है पर इतना तय है कि ज्ञानियों की संख्या अब नगण्य रह गयी है।  आर्थिक विकास और मनोरंजन के नये साधनों में मगजपच्ची लोगों को यह आभास नहीं है कि इनसे उनकी बुद्धि के साथ आयु का भी क्षय हो रहा है।  देह और मन के साथ विचारों में विकार इतने भर गये हैं कि आदमी विष को भी अमृत समझ कर सेवन कर रहा है। 
विदुरनीति में कहा गया है कि
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न च क्षयो महाराज यः क्षयो शुद्धिभावहेतु।
क्षयः सत्विह मन्तव्यो यं लब्धवां बहुनाशयेत्।।
         हिन्दी में भावार्थ-किसी हानि या क्षय से अगर वृद्धि या लाभ होता है तो उसकी परवाह नहीं करना चाहिये पर अगर किसी लाभ से बाद में हानि या क्षय हो उस पर अवश्य विचार कर कोई काम करना चाहिए।
समृद्धा गुणतः केचित भवन्ति धनतोऽपरे।
धनवृद्धान् गुणंहींनान् धृतराष्ट्र विवर्जय।
        हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में कुछ लोग धन के तो कुछ गुणों में धनी होते हैं। जो धनी होते हुए भी गुणों से हीन हैं उनका त्याग करना ही श्रेयस्कर है।
         समाज में धनवान को गुणवान मानने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।  गुणवान अगर अल्पधनी है तो उसका सम्मान कोई नहीं करना चाहता। स्थिति यह है कि समाज सेवा, राजनीति, कला, साहित्य, तथा धार्मिक क्षेत्र में जो लोग सक्रिय हैं उनके छोटे और बड़े होने की पहचान केवल उनके पास उपलब्ध  धन की मात्रा रह गयी है।  इधर उधर से धन के साथ शिष्यों का संग्रह कर कोई अपना रटा रटाया अध्यात्मिक ज्ञान सुनाता है तो वह ज्ञानी है पर धारण करने वाला जो त्यागी है उसे कोई ज्ञानी नहीं मान सकता।  दान लेकर समाज सेवा करने वाले सम्मानीय और स्वतः दान देने वाला मूर्ख मान जा रहा है।  धर्म और समाज सेवा में व्यवसायिकता का इतना बोलबाला है कि जिसे अध्यात्म का ज्ञान नहीं है वह उन्हीं लोगों को महान समझता है जो कमाने के लिये सेवा करते हैं।  सेवा कर जो न कमाये उसे तो एक तरह से मूर्ख माना जाता है।
        समाज की इस प्रवृत्ति के बावजूद ज्ञानी और  साधकों का एक ऐसा समूह है जो निष्काम भाव से सक्रिय है।  वह यह सच जानते हैं कि समाज में लोगों का एक बहुत बड़ा वर्ग मानसिक, शारीरिक और बौद्धिक विकारों से जूझ रहा है।  हमारे देश में संपन्नता बड़ी है पर लोगों में उसी अनुपात से  प्रसन्नता का भाव कम हो गया है।  मूल बात यह है कि हम दूसरों की तरफ देखने की बजाय आत्ममंथन करें कि कहां खड़े हैं। भीड़ में भेड़ की तरह एकांत में ध्यान साधना करने पर इसका आभास हो सकता है कि एक ज्ञानी या साधक और आम मनुष्य में क्या अंतर है? साथ ही जिन लोगों को बड़ा माना जाता है उनकी स्थिति वाकई क्या है?        
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
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Saturday, November 24, 2012

चाणक्य नीति-जंगल के जल जाने पर पशु पक्षी उसे त्याग देते हैं

                हमारे देश में धर्म के नाम पर अनेक ऐसी परंपरायें प्रचलित हो गयी हैं जिनका मूल आध्यात्मिक आधारों से कोई संबंध नहीं है।  भोगी और त्यागी में का समाज में कोई  अंतर नहीं जानता है।  भोग करने वाले अपने आपको सबसे बड़ा त्यागी बताते हैं और त्यागी को अक्षम कहा जाता है।  हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में जन्म के आधार पर जातियों का पैमाना तय किया हो ऐसा लगता नहीं है।  अलबत्ता जातियों का कर्म के आधार पर विभाजन बताया गया है।  यह कहना कठिन है कि मनुष्य की जाति उसके जन्म के आधार पर तय करना चाहिए यह कर्म ही उसकी पहचान होना चाहिए।  एक व्यक्ति जो समाज को मार्गदर्शन देता है उसे ब्राह्मण माना जाता है उसकी संतान अगर अपना पारिवारिक कर्म न करे तो उसकी जाति उसके जन्म के आधार तय हो या कर्म को आधार  मानना चाहिए? इस प्रश्न पर अनेक लोगों को भिन्न भिन्न मत हैं।  एक बात तय है कि जातियों का संबंध कहीं न कहीं कर्म से है।  समाज को बौद्धिक सहायता देने वाले विद्वान ब्राह्मण, व्यापार करने वाले वैश्य, रक्षा करने वाले क्षत्रिय और अन्य सेवायें करने वाले शुद्र माने गये हैं।  आमतौर से शुद्र शब्द को अत्यंत बुरा माना जाता है पर सत्य यह है कि यह उस सेवा भाव का प्रतीक है जिसका हमारे अध्यात्मिक दर्शन  में बहुत महत्व है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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गृहीत्वा दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति वाजामानकम्।
प्राप्तविद्या गुरुं दगधाऽरण्यं मृगास्तथा।।
  हिन्दी में भावार्थ-ब्राह्मण दक्षिण लेकर यजमान, शिष्य ज्ञान लेकर गुरुदक्षिणा देकर गुरु और जंगल के जाने पर पशु पक्षी उसे त्याग देते हैं।
लौकि कर्मणि रतः पशुनां परिपालकः
वाणिज्यकृषिकर्मा यः सः विप्रो उच्यते।
       हिन्दी में भावार्थ -जो विद्वान ब्रह्मज्ञान होने पर भी  सांसरिक जीवन मे  रहकर पशुपालन, व्यापार और कृषि करता है वह वैश्य कहलाता है
                अनेक लोग यह कहते हैं कि हम गरीबों, अपंगों, असहायों तथा पीड़ितों की सेवा कर रहे हैं पर वह अपने आपको ऊंचा दिखाना चाहते हैं।  सेवक के रूप में वह झंडा लेकर समाज के शासक बनने का प्रयास करते हैं।  फिर पाश्चात्य शिक्षा पद्धति की वजह से हमारे यहां शुद्र को केवल घृणित या निम्न कोटि का कर्म करने वाला माना जाने लगा है जबकि इस जाति के लोग अन्य तीन वर्णों की सेवा करने वाला कार्य करते हैं।  अध्यात्मिक ग्रंथों में यह कहीं नहीं कहा गया कि शुद्र होना निम्न होना है।  अनेक जगह शुद्रों को ज्ञान देने पर प्रतिबंध है पर उसका आशय स्पष्ट नहीं है।  ऐसा लगता है कि सेवाकर्म में लगे मनुष्यों में नम्रता, दया, सहृदयता का भाव  और कष्ट उठाने की क्षमता स्वाभाविक रूप से रहती है।  उनमें अपनी मूल पारिवारिक तथा सामाजिक स्थिति के कारण बड़े बनने के लिये पाखंड दिखाने  की इच्छायें नहंी रहती। सेवाभाव वाले लोगों राजसी भाव का अभाव होता है इसलिये वह विकारों से परे रहते हैं। उनको ज्ञान की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। सेवा भाव में लगे समूहों को बारे में जानते हैं और यकीनन राजसी षड्यंत्रों और सामूहिक अपराधों में उनकी सक्रियता नहीं देखी जाती।
     हमारे देश में पेशेवर अध्यात्मिक संदेश वाहकों ने अपनी अपनी दृष्टि और सुविधा से  ग्रंथों की व्याख्या की है।  श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से संसार के चारों वर्णों को अपनी भक्ति का अधिकार दिया है।  उसमें कहीं भी किसी भी तरह का प्रतिबंध नहीं लगाया गया।  उसमें स्पष्टत त्यागी को ज्ञानी बताया गया है पर हमारे समाज में भोगियों के आभामंडल से प्रभावित लोग उन लोगों को सन्यासी मानते हैं जिन्होंने केवल वस्त्र सफेद या गेरुए पहने हों पर शेष सारा काम राजस भाव से करते हैं।  चाणक्य नीति में कहा गया है कि शिक्षा प्राप्ति के बाद गुरु का त्याग किया जाता है पर आजकल लोग केवल गुरुओं के आश्रमों में जाकर ही अपना धर्म निभाते हैं। उनके दर्शन होने पर क्षणिक प्रसन्नता का दावा करने वाले लोग कभी जीवन में आनंद नहीं उठा पाते क्योंकि उनमें ज्ञान का सर्वथा अभाव है। पेशेवर गुरु भी क्यों किसी शिष्य को ज्ञान देंगे? उनको पता है कि पूरी शिक्षा दे दी तो शिष्य गायब हो जायेगा।  यही कारण है कि अध्यात्मिक सत्संग के नाम पर अब केवल गुरु शिष्य का नियमित आपसी मेलमिलाप होना रह गया है।   
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Thursday, November 15, 2012

मनुस्मृति से संदेश-भिक्षा लेने और देने के भी नियम होते हैं (manu smriti se sandesh-bhiksha lene aur dene ka bhee niyam hote hain)

            हमारे देश में बरसों से भिक्षा मांगने और देने की एक धार्मिक परंपरा रही है। इसमें भी भिक्षा मांगने वाले भिक्षुक और देने वाले गृहस्थ के लिये भी नियम होते इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को  है।  दरअसल भिक्षा हमारी दान परंपरा का वह हिस्सा है जिसमें सांसरिक धर्म का निर्वाह होता है।  दान के बारे में कहा जाता है कि वह हमेशा सुपात्र को दिया जाना चाहिए। गृहस्थ का कुपात्र को दिया गया दान   निष्फल हो जाता है और दुष्ट को दान देने पर तो पाप भी लगता है।  उसी तरह भिक्षा लेना भी केवल उन सन्यासियों का कार्य है जो संसार में धनोपार्जन त्यागी भाव होने के कारण नहीं करते। भिक्षा लेकर अपनी देह का पालन पोषण वह धर्म पालन की दृष्टि से करते हैं न कि उनका यह एक पूर्णकालिक व्यवसाय होता है।  अपना पेट भरने के बाद वह समाज निर्माण का प्रयास करते हैं। इस सन्यासियों के मुख, वाणी और चक्षृओं में तप का तेज दिखाई देता है।  
                                    एककालं चरेद्भेक्षं न प्रसजोत विस्तरे।
                               भैक्षे प्रसक्तो हि यतिर्विषयेष्वपि सज्जति।।
          हिन्दी में भावार्थ-
एक बार भिक्षा मांगकर सन्यासी को उसी से अपना पालन करना चाहिए।  एक से अधिक बार भीख मांगने वाला सन्यासी विषयों में घिरने लगता है।
                      विघूमे सन्ममुसले ज्याङ्गारे भुक्तवञ्जने।
                    वृत्ते शराव सम्पाते भिक्षां नित्यं यतिश्चरेत्।।
            हिंदी में भावार्थ-
सन्यासी को उसी घर से  भिक्षा मांगनी चाहिए जहां चूल्हा ठंडा हो चुका हो। उस घर में कूटने और पीसने का काम पूरा होने पर खानी पीने के बर्तन धोकर रख दिये गये हों।
                 यह अलग बात है कि इस भिक्षा का स्वरूप अब बदलकर भीख के रूप में दिखता है। अब भिखारी मंदिरों के द्वारों पर खड़े होकर जिस  तरह भीख मांगते हैं उसे देखकर नहीं लगता कि वह कोई त्यागी हैं।  उनके चेहरे पर अकर्मण्यता, लालच और लोभ के भाव आसानी से देखे जा सकते हैं।  अनेक खास अवसरों पर ऐसे भिखारी सारा दिन भीख मांगते हैं। अनेक श्रद्धालु उनको खाना खिलाते हैं पर उसके बाद वह फिर वहीं भीख मांगने लगते हैं। कुछ धर्मभीरु भीख में धन या भोजन प्रदान कर  यह सोचते हैं कि उन्होंने महान दान किया है। अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में उनका यह प्रयास वृथा होता है।  अनेक सामाजिक विशेषज्ञ तो इस प्रकार की भीख को पापपूर्ण मानते हैं क्योंकि इस कार्य में त्यागी लोग नहीं बल्कि आलसी और लालची लोग लगे हैं।  अनेक जगह छोटे छोटे बच्चे भीख मांगते हैं। सामाजिक विशेषज्ञ मानते हैं कि उन बच्चों को भीख देकर उनको भविष्य में अकर्मण्यता के साथ जीवन बिताने के लिये प्रेरित किया जाता है। देखा यह गया है कि अनेक लोगों को भीख मांगने की आदत बचपन से ही लग जाती है और वृद्धावस्था तब वह उससे छूट नहीं पाते।  इसलिये भीख की इस नयी परंपरा से समाज में जो विकृत्तियां आई हैं उसे रोकने के लिये हमें अपने ग्रंथों में वर्णित भिक्षा परंपरा के नियमों की जानकारी रखनी चाहिए।



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Saturday, November 10, 2012

विदुर नीति-भोजन वह करो जो पच सके (vidur neeti-bhojan vah karen jo pach sake)

                 धन, पद और शक्ति की संचय में लगे पूरे विश्व समाज का ध्यान अपने शरीर पर कम मन पर अधिक रहता है।  लोग बाहरी आंखों से संसार की रंगीनियों  को देखने में इतना ध्यान लगाते हैं कि उनको इस बात का आभास ही नहीं होता कि उनकी देह समय से पूर्व ही विकारो के जाल में फसती जा रही है।  अब तो स्थिति यह है कि दिमागी तनाव से पैदा होने वाले रोग छोटे बच्चों और युवकों में भी दिखाई देने लगे  है। विश्व के मनोवैज्ञानिक समाज में मनोविकारों की बढ़ती संख्या से चिंतित हैं।  पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञ इसके लिये भोजन, रहन सहन और अप्राकृतिक कार्यशैली को बताते हैं। हालत यह है कि अनेक मनोवैज्ञानिक यह बात  कहते हुए नहीं चूकते कि अब यह बात लगाना भी कठिन है कि हम से बात कर रहा व्यक्ति मनोरोगी है या हम स्वयं ही हैं।  उनकी बात ठीक है पर भोजन, रहन सहन और कार्यशैली के सुविधाभोगी होने से उपजे मनोरोगों का परिणाम क्या हो रहा है, इस पर अभी तक कोई चिंत्तन सामने नहीं आ रहा है।

विदुरनीति में कहा गया है कि
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भक्ष्योत्तमप्रतिाच्छन्नं मत्स्यो वडिशमायसम्।
लोभाभिपाती ग्रसते नानुबन्धनवेक्षते।।
      हिन्दी में भावार्थ-मछली हमेशा ही भोजन की लालच में कांटा पकड़कर उसमें बिना किसी विचार के फस जाती है।’’
यच्छक्यं ग्रसितु ग्रस्यं परिणमेच्च यत्
हितं च परिणामे यत् तदाद्यं भूतिमिच्छता।।
      हिन्दी में भावार्थ- अपनी उन्नति की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को सदैव ऐसा भोजन करना चाहिए जो पच सके।
    पूरे विश्व के प्रचार माध्यम पूंजीपतियों के हाथ में है और वह केवल आर्थिक विकास की बात करते हुए समाज को भ्रमित कर रहे हैं।  वास्तविकता यह है कि विकास केवल भौतिक ही नहीं वरन् आध्यात्मिक भी होता है पर इसके प्रति कोई जागरुक नहीं है। वास्तविकता यह  है कि जब मनुष्य को भौतिकता का चरम मिलता है तब उसके अंदर एक खालीपन दिखाई देता है।  यह खालीपन उसके आध्यात्मिक विषयों के अभाव की तरफ संकेत करता है। कहा जाता है कि इस ंसार में न गरीब सुखी है न अमीर! तब प्रश्न उठता है कि लोग अमीर होकर कौनसा सुख पाते है? सीधी बात यह है कि सुख कहीं मिलता नहीं बल्कि उसे अंदर अनुभव किया जाता है। इस अनुभूति के लिये यह आवश्यक है कि अध्यात्मिक ज्ञान होना चाहिए वरना तो जिस तरह मछली फसती है आदमी भी फस ही रहा है।  स्थति यह है कि फास्ट फूड के नाम पर ऐसा भोजन करने की आदत लोगों में बढ़ी गयी है जो कि जिससे देह में ऊर्जा का निर्माण नहीं होता। बाज़ार में बनने वाले खाद्य पदार्थों में शुद्धता का अभाव होता है पर वहां खाने वालों की भीड़ इस बात का प्रमाण है कि लोग अपने स्वास्थ्य को बेजुबान मछलियों की तरह  दाव पर लगा रहे हैं।

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Sunday, November 4, 2012

पतंजलि योग विज्ञान-वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता से युक्त सम्प्रज्ञात योग (patanjaili yoga vigyan or sicence)

       भारतीय योग साहित्य की चर्चा चारों तरफ है पर मुख्य रूप से आसन तथा प्राणायाम जैसे दो भागों पर ही विद्वान लोग अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।  कुछ लोगों ने समय समय पर  यम, नियम और ध्यान पर भी अपनी राय रखी है पर पतंजलि योग साहित्य के बारे सही ज्ञान बहुत कम लोगों को हैं।  यह सत्य है कि योग से मन को बुद्धि से और बुद्धि को आत्मा से जोड़ कर परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव अपने अंदर करना सहज हो जाता है पर ऐसा करने के लिये पतंजलि योग के सूत्रों का ज्ञान होना आवश्यक है।  इसमें योग के अनेक रूपों का वर्णन है। जब मनुष्य योग के बाह्य रूप से अवगत होकर अपनी साधना करता है तब उसके अंदर अनेक प्रकार की आंतरिक सिद्धियां स्वतः आती है जो कि योग साधना का चरम स्तर होता है।          
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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  वितर्कविचारान्नदास्मितानुगमात्सप्रज्ञातः।।
हिन्दी में भावार्थ-वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता के संबंध से युक्त सम्प्रज्ञातयोग है।
तत्परं पुरुषख्यांतेर्गुणवैतृष्ण्यम्।।
हिन्दी में भावार्थ-पुरुष के ज्ञान से प्रकृति के गुणों में तृष्णा का सर्वथा अभाव हो जाता है। यह परम वैराग्य है।
    मुख्य बात यह है कि ज्ञान साधक जब इस संसार की त्रिगुणमयी माया से अवगत हो जाता है तब वह बाहरी विषयों में निर्लिप्त और निष्काम भाव से कर्म करता है। अपनी दैहिक क्रियाओं से होने वाली उपलब्धियों को फल नहीं बल्कि कर्म का ही विस्तार मानता है।  उसे यह आभास हो जाता है कि शारीरिक और बौद्धिक श्रम से उसे मिला धन अंततः उसके पास न रहकर दूसरी जगह व्यय होना है।  उसने जो मकान बनाये या वाहन खरीद एक दिन वह उसका साथ छोड़ देंगे।  इतना ही नहीं जिस देह को धारण किये है एक दिन उससे भी वह छोड़ जायेगा।  तब उसमें वैराग्य भाव पैदा होता है जो उसमें जीवन के प्रति आत्मविश्वास पैदा करने के साथ ही परमात्मा की पहचान भी कराता है।  तब आदमी सांसरिक विषयों से दैहिक रूप से प्रथक तो नहीं होता पर आत्मिक रूप से उसका लक्ष्य नहीं रह जाता। वह एक दृष्टा की तरह अपने जीवन को देखता हुआ हर क्षण का आनंद लेता है।  वह ध्यान, धारणा तथा समाधि जैसी विद्याओं में पारंगत होकर कर्मयोगी बन जाता है। यही भारतीय योग साधना का चरम स्तर है।
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Wednesday, October 24, 2012

राज्य के मंत्रियों को योग्य होना चाहिए-कौटिल्य का अर्थशास्त्र

           मूलतः हर मनुष्य में दूसरे पर शासन करने की प्रवृत्ति होती है जो अंततः अहंकार की अग्नि से पैदा होती है। यह बुरा भी नहीं है पर जिस मनुष्य में अपने शासित लोगों का हित करने की बजाय उनका दोहन करने का लक्ष्य होता है  वह उसको भ्रष्ट, निकृष्ट और दुष्ट बना देता है। आधुनिक लोकतंत्र ने पूरे विश्व में राजनीति शास्त्र की बजाय केवल नारे देने वालों को राज्य पद पर प्रतिष्ठित करना प्रारंभ किया है।  इतना ही नहीं राजनीति की बजाय अन्यत्र विषयों में पारंगत और प्रतिष्ठित लोगों के लिये राजकाज में आने की प्रवृत्ति बढ़ी है।  कहने का अभिप्राय यह है कि राजनीति से अनभिज्ञ लोग राजधर्म से भी अनभिज्ञ होते हैं और जब वह राजकाज करते हैं तो वह उसमें वह सफल नहीं हो पाते।  इसके परिणाम प्रजा को भोगने पड़ते हैं।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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शास्त्रचक्षुनृपस्तस्मान्महामात्यमते स्थितः।
धर्मार्थप्रतिपातीनि व्यसननि परित्येत्।।

                ‘हिन्दी में भावार्थ-किसी भी राज्य प्रमुख के पास शास्त्रों का ज्ञान होना आवश्यक है।  उसे हमेशा ही योग्य मंत्रियों के साथ दिखना चाहिए।  धर्म और अर्थ के लिये घातक व्यसनों को वह त्याग दे।
      राज्य करना भी एक तरह से कला है।  जिस तरह समाज में कला का व्यवसायीकरण हुआ है वैसे ही राजनीति भी पेशा बन गयी है।  अनेक लोग तो अपने राजनीति से इतर व्यवसायों, संगठनों तथा सामाजिक हितों की रक्षा के लिये पदारूढ़ होने की  कामना करते हैं।  वह सफल भी होते हैं। उनका लक्ष्य केवल पद पर बैठकर अपने तथा परिवार की रक्षा करना होता है इसलिये प्रजाहित की न तो उनमें दिलचस्पी रहती है न ही कोई वह योजना बनाते हैं।  इसी कारण पूरे विश्व में भ्रष्टाचार और अराजकता का वातावरण बन गया है।  अलबत्ता पद बचाये रखने के लिये ऐसे लोग  नारे अवश्य दिया करते हैं।  यही कारण है कि इस समय विश्व के अनेक देशों में असंतोष का वातावरण बन गया है।  अनेक जगह खूनी संघर्ष चल रहे हैं।  अनेक राज्य प्रमुख अपने ही देश के विद्रोहियों से जान बचाते फिर रहे हैं। यह राज्य प्रमुख केवल बंदूक के सहारे पदों पर आ गये पर जनहित करने की समझ उनमें कभी नहीं दिखी। हमारे देश को अंग्रेजों से राजनीतिक स्वतंत्रता मिले साठ साल से अधिक समय हो गया है पर आज भी अनेक विद्वान मानते हैं कि अधूरी आजादी ही मिली है।  इसलिये राजनीति में सक्रिय होने वाले लोगों को पहले राजनीति शास्त्र का अध्ययन करना चाहिए।
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Saturday, October 6, 2012

सामवेद से संदेश-आलसी मनुष्य को देवता पसंद नहीं करते (asli manushya ko devata pasand nahin larte)

         ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना की तो देवता तथा मनुष्यों की उत्पति हुई।  उन्होंने कहा कि मनुष्य देवताओं की आराधना करें तो देवता मनुष्य को उसका  फल देंगे। अध्यात्म और सांसरिक विषयों के बीच जीव की देह पुल का काम करती है। सांसरिक विषयों में सहजता से संबंध रखना आवश्यक है। इसलिये आवश्यक है कि उन विषयों से संबंधित कार्य करते हुए हृदय में शुद्धि हो। सांसरिक विषयों में फल की कामना का त्याग नहीं किया जा सकता  पर उसके लिये ऐसे गलत मार्ग का अनुसरण भी नहीं किया जाना चाहिए जिससे बाद में संकट का सामना करना पड़े।  दूसरी बात यह भी है कि अपने कर्म के परिणाम की आशा दूसरे का दायित्व नहीं मानते हुए आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करना चाहिए।। 
सामवेद में कहा गया है कि
..................................
देवाः स्वप्नाय न स्पृहन्ति।
 
हिन्दी में भावार्थ-देवता आलसी मनुष्य को प्रेम नहीं करते।
देवाः सुन्वन्तम् इच्छान्ति। 
हिन्दी में भावार्थ-देवता कर्मशील मनुष्य को प्रेम नहीं करते हैं।
           जीवन को सुचारु रूप से चलाने क्रे लिये कर्मशील होना आवश्यक है। आलस्य मनुष्य का शत्रु माना जाता है। देह से परिश्रम न करना ही आलस्य है यह सोचना गलत है वरन् मस्तिष्क को सोचने के ले कष्ट देने से बचना भी इसी श्रेणी में आता है। आधुनिक सुविधाभोगी जीवन ने आदमी की देह के साथ ही उसके मस्तिष्क की सक्रियता पर भी बुरा प्रभाव डाला है। लोग प्रमाद तथा व्यसन में अधिक रुचि इसलिये लेते हैं कि उनके मस्तिष्क को राहत मिले। यही राहत आलस्य का रूप है।  इससे बचना चाहिए। अध्यात्म ज्ञान प्राप्त करने यह आलस्य स्वमेव दूर होता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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