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Sunday, July 17, 2011

वेद शास्त्र-पाप को न रोकना भी उसमें सहभागी होना है

         स्वयं पाप न करना ही धर्म का परिचायक नहीं है वरन् जिस पाप को रोकना संभव है उसका प्रतिकार न करना भी अधर्म है। हम अपने मित्रों, रिश्तेदारों या परिवार के सदस्यों के पाप में स्वयं लिप्त न हों पर उनको दुष्कर्म करते देख मौन रहना या उनको न रोकना भी अधर्म की श्रेणी में आता है। चूंकि मनुष्य को प्रकृति ने हाथ पांव, वाणी, तथा आंखें दी हैं और उसके साथ ही बुद्धि भी प्रदान की है तब यह उसके लिये आवश्यक है कि वह अपने समूहों को पाप कर्म से रोके। अगर कोई ऐसा सोचता है कि वह स्वयं पाप नहीं कर रहा है इसलिये वह धर्मभीरु है तो गलती पर है। यह उदासीनता अधर्म का ही एक बहुत बड़ा भाग है।
           हमारे वेद शस्त्रों में कहा गया है कि
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          धर्मादयेतं यत्कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम्।
            न तत् सेवत मेधावी न तद्धिमिहोच्यते।।
               ‘‘इस धर्म का अर्थ बहुत व्यापक है। जहां विद्वान लोग न्याय का समर्थन नहीं करते वह अधर्मी ही कहे जाते हैं।
           यत्र धर्मोह्य्मेंण सत्यं यत्रानृतेन च।
          हन्यते प्रेक्षामाणानां हतास्तत्र सभासदः।।
       ‘‘जहां अधर्म को देखते हुए भी सभासद चुप रहते हैं और उसका प्रतिकार नहीं करते वह भी पाप के भागी हैं।’’
                 कहते हैं भी अन्याय करने से अधिक पाप अन्याय पाप सहना है। उतना ही पाप है अपने सामने अन्याय, व्याभिचार, भ्रष्टाचार और बेईमानी होते देखना। वैसे धर्म साधना एकाकी होती है पर उसका निर्वहन करना सामूहिक गतिविधियों में ही होता है। परमार्थ, दान तथा धर्म की रक्षा का दायित्व बोध बाहरी गतिविधियों से प्रमाणित होता है। जब कोई आदमी अपनी जाति, परिवार और मित्र समुदाय के पथभ्रष्ट होने पर यह सोचकर चुप रहता है कि वह अपना धर्म निभा रहा है तो उसे बताना चाहिए कि यह भी अधर्म का ही एक भाग है। धर्म का आशय यह है कि आप स्वयं पाप न करें तो दूसरे को भी करने से रोकें।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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