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Friday, April 3, 2009

रामायण में दिया गया है अहिंसा का संदेश (ram, ramayan, sita, aritcle on hindu dharm)

अपने वन प्रवास के दौरान सुतीक्षण के आश्रम से निकलकर जब श्री राम अपनी धर्म पत्नी सीताजी और भ्राता लक्ष्मण में साथ आगे चले। अपने पति द्वारा राक्षसों के वध करने के प्रतिज्ञा से वह दुखी थीं इसलिए उन्होने इससे हटने के लिए उनसे हिंसा छोड़ने का आग्रह किया और निम्नलिखित कथा सुनाई

पूर्वकाल की बात है किसी पवित्र वन में जहाँ मृग और पक्षी बडे आनंद से रहते एक सत्यवादी एवं पवित्र तपस्वी निवास करते थे। उन्हीं की तपस्या में विघ्न डालने के लिए शचिपति इन्द्र किसी योद्धा का रूप धारण कर हाथ में तलवार एक दिन उनके आश्रम पर आये। उन्होने मुनि के आश्रम में अपना उतम खड्ग रख दिया। पवित्र तपस्या में लगे हुए मुनि को धरोहर के रूप में वह खड्ग दे दिया। उस शस्त्र को पाकर मुनि उस धरोहर की रक्षा में लग गए, वे अपने विश्वास की रक्षा के लिए वन में विचरते समय भी उसे अपने साथ रखते थे। धरोहर की रक्षा में तत्पर रहने वाले वे मुनि फल-मूल लेने के लिए जहाँ-कहीं भी जाते, उस खड्ग की साथ लिए बिना नहीं जाते। तप ही जिनका धन था उस मुनि ने प्रतिदिन शस्त्र ढोते रहने के कारण क्रमश: तपस्या का निश्चय छोड़कर अपनी बुद्धि को क्रूरतापूर्ण बना लिया। फिर तो अधर्म ने उन्हें आकृष्ट कर लिया। वे मुनि प्रमादवश रोद्र कर्म में तत्पर हो गये और उस शस्त्र के सहवास से नरक जाना पडा।

इस प्रकार शास्त्र का संयोग होने के कारण पूर्वकाल में उन तपस्वी मुनि को ऐसी दुर्दशा भोगनी पडी। जैसे आग का संयोग ईंधन के जलाने का कारण होता है उसी प्रकार शस्त्रों का संयोग शस्त्रधारी के हृदय में विकार का उत्पादक कहा गया है।

आगे सीता जी कहतीं हैं कि-'मेरे मन में आपके प्रति जो स्नेह और विशेष आदर है उसके कारण मैं आपको उस प्राचीन घटना की याद दिलाती हूँ तथा यह शिक्षा भी देती हूँ कि आपको धनुष लेकर किसी तरह बिना बिः के ही वन में रहने वाले राक्षसों के वध का विचार नहीं करना चाहिए। आपका बिना किसी अपराध के किसी को मारना संसार के लोग अच्छा नहीं समझेंगे। अपने मन और इन्दिर्यों को वश में रखने वाले वीरों के लिए वन में धनुष धारण करने का इतना प्रयोजन है कि वे संकट में पड़े हुए प्राणियों की रक्षा करें।''

अरण्यकाण्ड के नौवें सर्ग से लिए गया यह वृतांत इस उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है कि लोग अस्त्रों-शस्त्रों को शौक के लिए अपने पास भी रखते है और उसके जो परिणाम आते हैं वह बहुत भयावह होते हैं ।

Sunday, March 29, 2009

भर्तृहरि दर्शन: अपने मन की इच्छाएं ज़िंदगी भर (article on hindu dharm in hindi) हैं

खलालापाः सोढाः कथमपि तदाराधनपरैर्निगृह्यह्यान्तर्वाष्पं हसितमपि शून्येन मनसा।
कृतश्चित्तस्तम्भः प्रहसितधियाम´्जलिरपित्वमाशे मोघाशे किमपरमतो नर्तयसि माम्

हिंदी में भावार्थ-भर्तृहरि जी कहते हैं कि दुष्ट लोगों की सेवा करते हुए उनके अनेक व्यंग्यात्मक कथन सुनने पड़े। दुःख के कारण अंदर के आंसुओं को किसी तरह बाहर आने से रोका और उनको प्रसन्न करने के लिये जबरन चेहरे पर हंसी लाने का प्रयास किया। अपने मन को समझाकर उन्हें प्रसन्न करने के लिये उनके सामने अनेक बार हाथ जोड़े। अपने अंदर जो आशायें और आकांक्षायें हैं वह पता नहीं कितना नचायेंगी

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आदमी के मन में अनेक प्रकार की आशायें, आकांक्षायें और इच्छायें होती हैं जो उनको उनको अपने स्वामी या उच्च पदस्थ व्यक्ति की जीहुजूरी के लिये बाध्य करती हैं। जो सोने का चम्मच मूंह में लेकर पैदा हुए हैं वह निरीह लोगों के मन की बात को नहीं समझ सकते। धन, पद और बाहूबल से संपन्न लोगों के सामने अनेक प्रकार के लोग हाथ जोड़े खड़े रहते हैं पर वह मन से कभी उनके नहीं होते। अपनी आशाओं और आशाओं की पूर्ति के लिये उनके सामने उनकी प्रशंसा और पीठ पीछे निंदा कर अपने मन हल्का करते हैं। संसार में माया का प्रभाव है और वह अनेक प्रकार से मनुष्य को उलझाये रहती हैं। अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिये एक मनुष्य को माया दूसरे का गुलाम बना देती हैं।
कई बार गुलामी और नौकरी से ऊबा आदमी व्यथित हो जाता है पर वह अपनी जगह से हट नहीं सकता क्योंकि उसे अपनी आशाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिये माया की जरूरत होती है और वह इसलिये नाचता रहता है और सोचता भी है कि कब वह इससे मुक्ति पाये पर वह कभी आजाद नहीं हो पाता। उसका मन ही उसको उकसाता है और वही उसको पिंजरे में रहने को भी बाध्य करता है।
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Saturday, March 28, 2009

कौटिल्य दर्शन: शत्रु का विनाश करे वही कुशल राजा कहलाता है (economics of kautilya-arthshastra)

रिपोः शत्रुपरिच्छेदः सहृद्वप्पुविभेनम्।
दुर्गकोषबलयानं कृत्यपक्षेपसंग्रहः।।

राज्य प्रमुख को चाहिये कि वह अपने शत्रु को उसके शत्रु से विनाश की प्रक्रिया को जानने के साथ उसके सहृदयों का भेद,दुर्ग,कोष और शक्ति का ज्ञान प्राप्त करते हुए अपने साथ कर्तव्य पूर्ण करने वाले सहयोगियों का संगह करे।
दूतेनैव नरेंद्रस्तु फुर्वीतारविकर्षणम्।
स्वपक्षे च विजानीयात्तपरदूतविचेष्टितम्
हिंदी में भावार्थ-राजा को चाहिये कि वह अपने दूत के द्वारा ही दूसरे राजा को आकर्षित करे और अपने शत्रु के दूत की चेष्टाओं से उसका मंतव्य समझे।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल पूरी दुनियां के सभी देश आधुनिक और तीव्रगामी हथियारों से सुज्जित हो गये हैं। ऐसे में सीधे युद्ध के बहुत सारे खतरे है। सभी देशों के पास दूर तक मार करने वाली मिसाइलें और राकेट हैं। ऐसे बम हैं कि अगर एक गिर जायें तो पूरा शहर नष्ट हो जाये। 1942 में अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा और नागासकी पर गिराये गये बमों की याद आते ही लोग सिहर उठते हैं जबकि उससे कई गुना शक्तिशाली बम अब बन चुके हैं। ऐसे में अब कूटनीति से काम लेने में ही बुद्धिमान लोग ठीक समझते हैं। इसलिये अब वह समय है कि जब अपने शत्रु को उसके शत्रु से नष्ट कराया जाये या उसे अपने ही देश में उलझाया जाये कि वह अपने राज्य पर वक्रदृष्टि न डाल सके। सच बात तो यह है कि कुशल राजा वही है जो अपनी प्रजा पर युद्ध लादने की बजाय अपने शत्रु को उसके राज्य में स्थित शत्रु से नष्ट करने की कूटनीतिक चाल चले। हालांकि सीधे युद्ध में जीतने पर राज्य प्रमुख का सम्मान होता है पर उसके खतरे भी बहुत हैं। कूटनीतिक चाल से शत्रु को पराजित करने में जहां अपनी प्रजा सुरक्षित होती है पर आजकल उसका प्रचार करना संभव नहीं है। अगर कूटनीति से विजय मिल भी जाये तो उसका दावा कोई सार्वजनिक रूप से नहीं कर सकता। इसके बावजूद यह एक सच्चाई है कि बुद्धिमान राज्य प्रमुख वही है जो कूटनीतिक चाल चलते हुए शत्रु राज्य को उसके शत्रुओं के हाथ से पराजित करे।
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Friday, March 27, 2009

भर्तृहरि संदेश: प्रचुर मात्रा में धन होने या न होने से कोई अन्तर नहीं पड़ता

जीर्णाः कन्था ततः किं सितमलपटं पट्टसूत्रं ततः किं
एका भार्या ततः किं हयकरिसुगणैरावृतो वा ततः किं
भक्तं भुक्तं ततः किं कदशनमथवा वासरान्ते ततः किं
व्यक्तज्योतिर्नवांतर्मथितभवभयं वैभवं वा ततः किम्

हिंदी में भावार्थ-तन पर फटा कपड़ा पहना या चमकदार इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। घर में एक पत्नी हो या अनेक, हाथी घोड़े हों या न हों, भोजन रूखा-सूखा मिले या पकवान खायें-इन बातोंं से कोई अंतर नहीं पड़ता। सबसे बड़ा है ब्रह्मज्ञान जो मोक्ष दिलाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव ने हमारे देश में भौतिकवाद को प्रोत्साहन दिया है और अब तो पढ़े लिखे हों या नहीं सभी सुख सुविधाओं को जाल में फंसते जा रहे हैं। भारतीय अध्यात्म ज्ञान के बारे में जानते सभी हैं पर उसे धारण करना लोगों को अब पिछड़ापन दिखाई देता है। नतीजा यह है कि समाज में आपसी रिश्ते एक औपचारिकता बनकर रहे गये हैं। अमीर गरीब की के बीच में अगर भौतिक रूप से दूरी होती तो कोई बात नहीं पर यहां तो मानसिक रूप से सभी एक दूसरे से परे हो जा रहे हैं। जिसके पास सुख साधन हैं वह अहंकार में झूलकर गरीब रिश्तेदार को हेय दृष्टि से देखता है तो फिर गरीब भी अब किसी अमीर पर संकट देखकर उसके प्रति सहानुभूति नहीं दिखाता। हम जिस कथित संस्कृति और संस्कार की दुहाई देते नहीं अघाते वह केवल नारे बनकर रहे गये हैं और धरातल पर उनका अस्तित्व नहीं रह गया है।

जिसके पास धन है वह इस बात से संतुष्ट नहीं होता कि लोग उसका सम्मान इसकी वजह से करते हैं बल्कि वह उसका समाज में प्रदर्शन करता है। धनी लोग अपने इसी प्रदर्शन से समाज में जिस वैमनस्य की धारा प्रवाहित करते हैं उसके परिणाम स्वरूप सभी समाज और समूह नाम भर के रहे गये हैं और उसके सदस्यों की एकता केवल दिखावा बनकर रह गयी है।

जिस तत्वज्ञान की वजह से हमें विश्व में अध्यात्म गुरु माना जाता है उसे स्वयं ही विस्मृत कर हम भारी भूल कर रहे हैं। शरीर पर कपड़े कितने चमकदार हों पर अगर हमारी वाणी में ओज और चेहरे पर तेज नहीं हो तो उसका कोई प्रभाव नहीं होता। काम चलने को तो दो रोटी से भी चल जाये पर जीभ का स्वाद ऐसा है कि अभक्ष्य और अपच भोजन को ग्रहण कर अपने शरीर में बीमारियों को आमंत्रित करना होता है। सोचने वाली बात यह है कि अपना पेट तो पशु भी भर लेते हैं फिर अगर हम ऐसा करते हैं तो कौनासा तीर मार लेते हैंं। मनुष्य जीवन में भक्ति और ज्ञान प्राप्त करने की सुविधा मिलती है पर उसका उपयोग नहीं कर हम उसे ऐसे ही नष्ट कर डालते हैं। ऐसे में वह ज्ञानी धन्य है जो दाल रोटी खाकर पेट भरते हुए भगवान भजन और ज्ञान प्राप्त करने के लिये समय निकालते हैं।
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Thursday, March 26, 2009

कबीर के दोहे: हरि भक्ति से कपट नहीं गया तो क्या लाभ (dohe of kabir on hari bhakti)

पढ़त गुनत रोगी भया, बढ़ा बहुत अभिमान
भीतर ताप जू जगत का, घड़ी न पड़ती सान

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि अनेक प्रकार की पुस्तकें पढ़ते हुए लोगी रोगी हो गये क्योंकि उनको अहंकार के भाव ने घेर लिया। अंदर तो इच्छाओं और कामनाओं की पूर्ति के लिये अग्नि लगी होने के कारण उनको पल भर की भी शांति नहीं मिलती।
हरि गुन गावे हरषि के, हिरदय कपट न जाय
आपन तो समुझै नहीं, औरहि ज्ञान सुनाय


कबीरदास जी के अनुसार भक्ति के नाम पर लोग नाचते गाते हैं पर उनक हृदय का कपट नहीं जाता। भगवान को स्वयं तो समझते नहीं पर दूसरे को समझाने लगते हैं।

वर्र्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अब तो धर्म प्रचार एक तरह से व्यवसाय हो गया है। जिस तरह कोई व्यापारी किसी वस्तु को बेचते समय अपनी चीज की प्रशंसा करता है भले ही वह उसने स्वयं दूसरे से खरीदी और और उसके बारे में स्वयं न जानता हो। यही हाल धर्म प्रचारकों और प्रवचनकर्ताओं का है वह स्वयं तो परमात्मा के बारे में जानते नहीं बस किताबों से रटे ज्ञान को बघार कर अपनी रोजी रोटी चलाते हैं पर प्रदर्शन ऐसा करते हैं कि जैसे बहुत बड़े ज्ञानी हो।

यही हाल आधुनिक शिक्षा प्राप्त लोगों का है। अनेक विषय पढ़ने पर यह भूल जाते हैं कि किस विषय का मूल तत्व क्या है? अनेक विषयों पर निरर्थक बहसें करते हैं। केवल सीमित दायरों में सोचते हैं पर ऐसा दिखने का प्रयास करते हैं जैसे कि कोई बड़े भारी ज्ञानी हैं। आधुनिक शिक्षित लोगों की स्थिति तो बहुत दयनीय है। भारत का प्राचीतनतम अध्यात्म ज्ञान तो उनके लिये व्यर्थ है और जिन किताबों को पढ़कर उनको अहंकार आ जाता है उसकी सीमा तो कहीं नौकरी प्राप्त करने तक ही सीमित है-यानि गुलाम बनकर रहने के अलावा वह कुछ अन्य कर ही नहीं सकते। कहीं वह अपने शरीर से गुलामी करते हैं तो कहीं मानसिक गुलामी में फंस जाते हैं। उनको तो यह मालुम ही नहीं कि आजादी का मतलब क्या होता है? उनसे तो पुराने लोग बेहतर हैं जिनके पास अध्यत्मिक ज्ञान है और वह कभी भक्ति कर अपने मन को शांत कर लेते हैं जबकि आधुनिक शिक्षित व्यक्ति तो हमेशा ही अपने अहंकार के कारण मानसिक रूप से तनाव में रहते हैं।
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Wednesday, March 25, 2009

मनु स्मृति: राज्य के दंड से ही प्रजा की रक्षा संभव (manu smruti on kingdom)

  1. देश, काल, विद्या एवं अन्यास में लिप्त अपराधियों की शक्ति को देखते हुए राज्य को उन्हें उचित दण्ड देना चाहिए।
  2. सच तो यह है कि राज्य का दण्ड ही राष्ट्र में अनुशासन बनाए रखने में सहायक तथा सभी वर्गों के धर्म-पालन कि सुविधाओं की व्यवस्था करने वाला मध्यस्थ होता है।
  3. सारी प्रजा की रक्षा और उस पर शासन दण्ड ही करता है, सबके निद्रा में चले जाने पर दण्ड ही जाग्रत रहता है।
  4. भली-भांति विचार कर दिए गए दण्ड के उपयोग से प्रजा प्रसन्न होती है। इसके विपरीत बिना विचार कर दिए गए अनुचित दण्ड से राज्य की प्रतिष्ठा तथा यश का नाश हो जाता है।
  5. यदि अपराधियों को सजा देने में राज्य सदैव सावधानी से काम नहीं लेता, तो शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर लोंगों को उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं, जैसे बड़ी मछ्ली छोटी मछ्ली को खा जाती है।
  6. संसार के सभी स्थावर-जंगम जीव राजा के दण्ड के भय से अपने-अपने कर्तव्य का पालने करते और अपने-अपने भोग को भोगने में समर्थ होते हैं ।

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Tuesday, March 24, 2009

भर्तृहरि नीति शतक: भले काम आयु ढलने से पहले ही प्रारंभ कर दें

यावत्स्वस्थमिदं शरीरमरुजं यावच्च दूरे जरा यावच्चेंिद्रयशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः।
आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान् संदीप्ते भवने तु कुपखननं प्रत्युद्यम कीदृशः

हिंदी में भावार्थ- जब शरीर स्वस्थ है, वृद्धावस्था परे है, इंद्रियां सही ढंग से काम कर रही हैं और आयु भी ढलान पर नहीं है विद्वान और ज्ञानी लोग तभी तक अपनी भलाई का काम प्रारंभ कर देते हैं। घर में आग लगने पर कुंआ खोदने का प्रयास करने से कोई लाभ नहीं होता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भर्तृहरि महाराज का यहां आशय यह है कि जब तक हम शारीरिक रूप से सक्षम हैं तभी तक ही अपने मोक्ष के लिये कार्य कर सकते हैं। इसके लिये आवश्यक है कि प्रारंभ से ही मन, वचन, और शरीर से हम भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा रखें। कुछ लोग यह कहते हैं कि अभी तो हम सक्षम हैं इसलिये भगवान की भक्ति क्यों करें? जब रिटायर हो जायेंग्रे या बुढ़ापा आ जायेगा तभी भगवान की भक्ति करेंगे। सच बात तो यह है कि भगवान की भक्ति या साधना की आदत बचपन से ही न पड़े तो पचपन में भी नहीं पड़ सकती। कुछ लोग अपने बच्चों को इसलिये अध्यात्मिक चर्चाओंे में जाने के लिये प्रेरित नहीं करते कि कहीं वह इस संसार से विरक्त होकर उन्हें छोड़ न जाये जबकि यह उनका भ्रम होता है। सच बात तो यह है कि भारतीय अध्यात्म ज्ञान किसी भी आदमी को जीवन से सन्यास होने के लिये नहीं बल्कि मन से सन्यासी होने की प्रेरित करता है। सांसरिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए उसके फल की कामना से परे रहना कोई दैहिक सन्यास नहीं होता।

हमारा अध्यात्मिक ज्ञान तो यह कहता है कि आदमी अपने स्वभाव वश अपने नित्यप्रति के कर्तव्य तो वैसे ही करता है पर भगवान की भक्ति और साधना के लिये उसे स्वयं को प्रवृत्त करने के लिये प्रयास करना होता है। एक तो उसमें मन नहीं लगता फिर उससे मिलने वाली मन की शांति का पैमाना धन के रूप में दृश्यव्य नहीं होता इसलिये भगवान की भक्ति और साधना में मन लगाना कोई आसान काम नहीं रह जाता। बुढ़ापे आने पर जब इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं तब मोह और बढ़ जाता है ऐसे में भक्ति और साधना की आदत डालना संभव नहीं है। सच बात तो यह है कि योगसाधना, ध्यान, मंत्रजाप और भक्ति में अपना ध्यान युवावस्था में ही लगाया जाये तो फिर बुढ़ापे में भी बुढ़ापे जैसा भाव नहीं रहता। अगर युवावस्था में ही यह आदत नहीं डाली तो बुढ़ापे में तो नयी आदत डालना संभव ही नहीं है।
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Sunday, March 22, 2009

भर्तृहरि संदेश: कवि लोग इस नश्वर देह को शब्दों से व्यर्थ चमकाते हैं

सत्यत्वे न शशांक एव बदनीभूतो न चेन्दोवर द्वंद्व लोनतां गतं न कनकैरष्यंगयश्टिः कूता।
किंतवेवं कविभि प्रतारितमनतत्वं विजनान्नपि त्वं मांसस्थ्मियं वयूर्मृगदृशां मंदो जनः सेवते।।


हिंदी में भावार्थ- न तो चंद्रमा जमीन पर आकर किसी सुंदरी युवती के मुख पर सजा है और न ही कभी कमल ने किसी के नेत्र का स्थान लिया है और न ही किसी की देह सोने से बनी है पर फिर भी कविगणों के बहकावे में सामान्य लोग आ जाते हैं और हाड़मांस के इस नश्वर को सर्वस्व मानते हुए भोगों में लिप्त हो जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-बरसो पूर्व कही गयी यह बात आज भी कितनी प्र्रासंगिक है। हमारे यहां आजकल फिल्मों में सूफी तरीके से गीत लिखे जा रहे हैं जिसमेंे भगवान और प्रेमिका को एक ही गदद्ी पर बिठाया जाता है यानि उस गीत को सोलह साल का लड़का अपनी प्रेयसी पर भी गा सकता है और कोई भक्त भगवान के लिये भी गा सकता है। सच तो यह है कि सच्चे भक्त के लिये तो किसी सुर संगीत की आवश्यकता तो होती नहीं इसलिये वह उनके दांव पर नहीं फंसते पर युवक युवतियां उन गीतों पर झूमते हैं और कभी कभार तो यह लगता है कि इस तरह देश को बहकाया जा रहा है। उनके दांव में कच्चे भक्त भी फंस जाते हैं और गीत सुनकर अपनी गर्दन हिलाने लगते हैं।
भगवान की निष्काम भक्ति का सर्वश्रेष्ठ रूप एकांत में उनका ध्यान और स्मरण करना है जबकि सुर संगीत से उनका स्मरण करना एक तरह से सकाम भक्ति का प्रमाण है और जिस तरह प्यार प्यार की बात आती है उससे तो ध्यान भटकता है और देह तथा मन को कोई लाभ भी हीं होता।
इस तरह भगवान और प्रेयसी के प्रति एक साथ प्रेम पैदा करने वाले शब्द केवल बहकाते हैं और आजकल के व्यवसायिक युग में इसका प्रचलन बढ़ गया है। कभी कभी तो लगता है कि इस तरह के सूफी गीत भारत के युवाओं में मौजूद अध्यात्मिक की स्वाभाविक प्रवृति को अपने स्वार्थ को भुनाने के लिये लिखे गये हैं।
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Thursday, March 19, 2009

रहीम के दोहे:अग्नि में मिलकर शरीर भी अग्नि हो जाता है

जहाँ गाँठ तहँ रस नहीं, यह रहीम जग होय
मंड़ए तर की गाँठ में, गाँठ गाँठ रस होय


कविवर रहीम कहते हैं कि यह संसार खोजकर देख लिया है, जहाँ परस्पर ईर्ष्या आदि की गाँठ है, वहाँ आनंद नहीं है. महुए के पेड़ की प्रत्येक गाँठ में रस ही रस होता है क्योंकि वे परस्पर जुडी होतीं हैं.

जलहिं मिले रहीम ज्यों, कियो आपु सम छीर
अंगवहि आपुहि आप त्यों, सकल आंच की भीर


कविवर रहीम कहते हैं कि जिस प्रकार जल दूध में मिलकर दूध बन जाता है, उसी प्रकार जीव का शरीर अग्नि में मिलकर अग्नि हो जाता है.
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जहां दो मनुष्यों में एक दूसरे के प्रति ईष्र्या है वहां किसी के दिल में भी संतोष नहीं रहा सकता। अक्सर लोग आपस में एक दूसरे के प्रति प्रेम होने का दावा करते हैं पर उनके मन में आपस में ही द्वेष, कटुता और ईष्र्या का भाव रहता है। इस तरह वह स्वयं को धोखा देते हैं। प्रेम तो तभी संभव है जब एक दूसरे की सफलता पर हृदय मेंं प्रसन्नता का भाव हो। हालांकि मूंह पर दिखाने के लिये एक मित्र अपने दूसरे मित्र की, भाई अपने भाई की या रिश्तेदार अपने दूसरे रिश्तेदार की सफलता पर बधाई देते हैं पर हृदय में कहीं न कहीं ईष्र्या का भाव होता है। यह दिखावे का प्रेम है और इस पर स्वयं को कोई आशा नहीं करना चाहिये क्योंकि न हम स्वयं दूसरे से वास्तव में प्रेम नहीं करते और न ही कोई हमें करता है। जहां ईष्र्या की गांठ हैं वहां प्रेम हो ही नहीं सकता।
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Wednesday, March 18, 2009

रहीम के दोहे: नीच लोगों की संगत से कलंक स्वयं पर भी लगता है

रहिमन नीचन संग बसि, लगत कलंक न काहि
दूध कलारी कर गहे, मद समझै सब ताहि

कविवर रहीम जी का कहना है कि निम्न प्रवृत्ति के लोगों के संगत करने पर कभी न कभी कलंकित होना तो तय ही है। दूध का बर्तन अगर कलारी में रखा हो तो भी उसे शराब ही समझा जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य अगर स्वयं सज्जन है तो उसे दुष्ट लोगों की संगत से बचना चाहिये-यह तय बात है कि एक मनुष्य के व्यवहार,विचार, और कार्य को दूसरे पर भी प्रभाव होता है। जहां तक दुर्गुणी, दुष्ट और दुव्र्यसनी लोगों को सवाल है उनके लिये यह माया ही संसार है और भक्ति, भलाई, और भावुकता एकदम बकवास है। वह दूसरों को भी ऐसा करने को उकसाते हैं।
अधिकतर मामलों में आपने यह सुना तो होगा कि अमुक व्यक्ति दूसरे की संगत में बिगड़ गया और पर यह नहीं सुना होगा कि वह सुधर गया। कई बार अपराधियों के मां बाप अपने बच्चोंे की तरफ से सफाई देते हैं कि ‘हमारा बच्चा तो ठीक है पर दूसरे की संगत में बिगड़ गया, पर जो उपलब्धियों के शिखर पर पहुचंते हैं उनके मां बाप यह नहीं कहते कि दूसरे की संगत में बन गया।
तय बात है कि संगत का प्रभाव होता है-अच्छा भी बुरा भी-यह अलग बात है कि अच्छी संगत को लोग आकर्षक नहीं मानते बल्कि ऐसे लोगों के साथ संगत करने से प्रसन्न होते हैं जो दलाल या दादा टाईप के हों। एक बात बजे की बात है कि ऐसे लोगों की छबि उनकी नजरों के अच्छी नहीं होती और उनके मित्रों को भी वह ऐसे ही देखते हैं-अगर ऐसे लोग उनके मित्र नहीं हुए तो। जब स्वयं दलाल और दादा टाईप के लोगों से दोस्ती करते हैं तब यह बात भूल जाते हैं।
जिन अंतविरोधों में सभी रह रहे हैं उनको देखना चाहिये पर यह बात संशयरहित है कि दुष्ट की संगत से कभी न कभी अपने लिये संकट का कारण बनती है। यदि संकट का कारण न बने तो भी समाज में दुष्ट के कारण सज्जन की छबि भी खराब होती ही है।
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Monday, March 16, 2009

संत कबीर के दोहे:प्रेम के दावे करने वालों को पता ही नहीं होता कि उसका स्वरूप क्या है

गुणवेता और द्रव्य को, प्रीति करै सब कोय
कबीर प्रीति सो जानिये, इनसे न्यारी होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि गुणवेताओ-चालाक और ढोंगी लोग- और धनपतियों से तो हर कोई प्रेम करता है पर सच्चा प्रेम तो वह है जो न्यारा-स्वार्थरहित-हो।

प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय
जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम करने की बात तो सभी करते हैं पर उसके वास्तविक रूप को कोई समझ नहीं पाता। प्रेम का सच्चा मार्ग तो वही है जहां परमात्मा की भक्ति और ज्ञान प्राप्त हो सके।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-टीवी चैनलों और पत्र पत्रिकाओं में आजकल प्रेम पर बहुत कुछ दिखाया और लिखा जाता है। यह प्रेम केवल स्त्री पुरुष के निजी संबंध को ही प्रोत्सािहत करता है। हालत यह हो गयी है कि अप्रत्यक्ष रूप से विवाहेत्तर या विवाह पूर्व संबंधों का समर्थन किया जाने लगा है। यह क्षणिक प्रेम एक तरह से वासनामय है मगर आजकल के अंग्रेजी संस्कृति प्रेमी और नारी स्वतंत्रता के समर्थक विद्वान इसी प्रेम में शाश्वत जीवन की तलाश कर हास्यास्पद दृश्य प्रस्तुत करते हैं। एक मजे की बात यह है कि एक तरफ सार्वजनिक स्थलों पर प्रेम प्रदर्शन करने की प्रवृति को स्वतंत्रता के नाम पर प्रेमियों की रक्षा की बात की जाती है दूसरी तरफ प्रेम को निजी मामला बताया जाता है। कुछ लोग तो कहते हैं कि सब धर्मों से प्रीति का धर्म बड़ा है। अब अगर उनसे पूछा जाये कि इसका स्वरूप क्या है तो कोई बता नहीं पायेगा। इस नश्वर शरीर का आकर्षण धीमे धीमे कम होता जाता है और उसके साथ ही दैहिक प्रेम की आंच भी धीमी हो जाती है।

वैसे सच बात तो यह है कि प्रेम तो केवल परमात्मा से ही हो सकता है क्योंकि वह अनश्वर है। हमारी आत्मा भी अनश्वर है और उसका प्रेम उसी से ही संभव है। परमात्मा से प्रेम करने पर कभी भी निराशा हाथ नहीं आती जबकि दैहिक प्रेम का आकर्षण जल्दी घटने लगता है। जिस आदमी का मन भगवान की भक्ति में रम जाता है वह फिर कभी उससे विरक्त नहीं होता जबकि दैहिक प्रेम वालों में कभी न कभी विरक्ति हो जाती है और कहीं तो यह कथित प्रेम बहुत बड़ी घृणा में बदल जाता है।
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Sunday, March 15, 2009

रहीम संदेश: गरीबों का सच में भला करे वही है बड़ा मनुष्य

जे गरीब पर हित करै, ते रहीम बड़लोग
कहाँ सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग


कविवर रहीम कहते हैं जो छोटी और गरीब लोगों का कल्याण करें वही बडे लोग कहलाते हैं। कहाँ सुदामा गरीब थे पर भगवान् कृष्ण ने उनका कल्याण किया।

आज के संदर्भ में व्याख्या- आपने देखा होगा कि आर्थिक, सामाजिक, कला, व्यापार और अन्य क्षेत्रों में जो भी प्रसिद्धि हासिल करता है वह छोटे और गरीब लोगों के कल्याण में जुटने की बात जरूर करता है। कई बडे-बडे कार्यक्रमों का आयोजन भी गरीब, बीमार और बेबस लोगों के लिए धन जुटाने के लिए कथित रूप से किये जाते हैं-उनसे गरीबों का भला कितना होता है सब जानते हैं पर ऐसे लोग जानते हैं कि जब तक गरीब और बेबस की सेवा करते नहीं देखेंगे तब तक बडे और प्रतिष्ठित नहीं कहलायेंगे इसलिए वह कथित सेवा से एक तरह से प्रमाण पत्र जुटाते हैं। मगर असलियत सब जानते हैं इसलिए मन से उनका कोई सम्मान नहीं करता।


जिन लोगों को इस इहलोक में आकर अपना मनुष्य जीवन सार्थक करना हैं उन्हें निष्काम भाव से अपने से छोटे और गरीब लोगों की सेवा करना चाहिऐ इससे अपना कर्तव्य पूरा करने की खुशी भी होगी और समाज में सम्मान भी बढेगा। झूठे दिखावे से कुछ नहीं होने वाला है।वैसे भी बड़े तथा अमीर लोगों को अपने छोटे और गरीब पर दया के लिये काम करते रहना चाहिये क्योंकि इससे समाज में समरसता का भाव बना रहता है।

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Saturday, March 14, 2009

अर्जुन की राह न मिले तो एकलव्य का अनुसरण करें-चिंतन

गुरु की महिमा का वर्णन करना कठिन है पर जीवन की सार्थकता और अध्यात्मिक शांति के लिये किसी से ज्ञान लेना बहुत आवश्यक है। अक्सर आपस में ही लोग एक दूसरे स यह पूछते हैं कि ‘योग्य गुरू की पहचान क्या है और उसे कैसे ढूंढा कैसे जाये? इसका उत्तर यही है कि जो सांसरिक विषयों की चर्चा किये बिना अध्यात्म का ज्ञान प्रदान करे वही सच्चा गुरु है। अध्यात्म ज्ञान वह है जिससे आदमी अपने को पहले पहचानने के बाद परमात्मा और उसके बनाये इस संसार को समझ सकता है। अगर कोई गुरु सांसरिक विषयों पर बोलता है तो समझ लीजिये वह स्वयं ज्ञानी नहीं है भले ही वह तत्व ज्ञान बताता हो पर उसे धारण किये हुए नहीं होता।

वैसे जो भी अध्यात्मिक ज्ञान है वह हमारे प्राचीन ग्रंथों में लिखा हुआ है और उसे पढ़कर कोई भी साधक सिद्ध बन सकता है। सिद्ध से आशय यह नहीं है कि वह कोई चमत्कार करने लगेगा बल्कि जो अपना जीवन परमार्थ, परोपकार तथा भगवान भक्ति के साथ शांतिपूर्ण ढंग से व्यतीत करता है वही सिद्ध है। उसी अध्यात्म ज्ञान को पढ़कर और पढ़ाकर उसकी विवेचना करने वाला व्यक्ति ही गुरु बन सकता है। अगर कोई ऐसा गुरु नहीं मिलता तो फिर इसका एक उपाय यह है कि अपने प्राचीन ग्रंथ पढ़ने के लिये स्वयं ही तैयार हो जायें और पढ़ते हुए उसकी मन ही मन विवेचना करें। गुरु की उपस्थिति अगर आवश्यक हो तो कोई एक तस्वीर अपने सामने रख लें। नहीं तो एक पत्थर ही रख लें और उसे अपने मन में गुरु का स्थान दें।

वैसे तो योग्य गुरु मिलना हर युग में कठिन रहा है क्योंकि अगर ऐसा होता तो अनेक सच्चे संत इस बात को दोहराते नहीं कि योग्य गुरु की शरण लो। संत कबीर समेत सभी भक्ति कालीन कवियों ने योग्य गुरु की शरण लेने का संदेश दिया है। बिना गुरु के जीवन को समझना कठिन हैं ऐसे में अगर हम अर्जुन नहीं बन सकते तो एकलव्य ही बन जायें। एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य की मूर्ति बनाकर ही धनुर्विद्या का का ज्ञान प्राप्त किया था। अतः अपने किसी पूज्यनीय या किसी प्राचीन गुरु की तस्वीर या किसी चित्रकार द्वारा रेखाचित्रों के द्वारा बनाया गया या पत्थर पर गढ़ा गया चित्र ही सामने रख लें। अगर अपने अंदर अध्यात्मिक शांति और सहजता अनुभव करें तो उस कल्पित गुरु की दक्षिणा के नाम किसी सुपात्र को अपनी श्रद्धा और सामथर््यानुसार आर्थिक राशि या वस्तु का दान करें। हमारे प्राचीन ग्रंथों में अघ्यात्म का संपूर्ण सार श्रीगीता में हैं बस उसे पढ़ने और समझने की है। उसे पढ़ें और ऐसे लोगों की संगत करें तो अध्यात्मिक विषयों में रुचि लेते हों। उनकी बात सुने, कहीं लिखा हुआ मिले तो पढ़ें और अपने कल्पित गुरू को सामने रखकर उसका अध्ययन करें।

वैसे कोई गुरु मिल जाये तो अच्छी बात, पर नहीं मिलता तो यही भी एक तरीका है। एकलव्य भी एक अध्यात्मिक पुरुष थे और अर्जुन भी। दोनों ही योग्य शिष्यों के रूप में समान रूप से प्रसिद्ध हैं। अगर कोई योग्य गुरु नहीं मिलता तो हम श्री अर्जुन का अनुकरण नहीं कर सकते और ऐसे में एकलव्य का मार्ग की अपनाया जा सकता है।
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Thursday, March 12, 2009

संत कबीर वाणी: फल की इच्छा करने वाले सेवक नहीं कहलाते

फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम
कहैं कबीर सेवक नहीं, कहैं चौगुना दाम


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो मनुष्य अपने मन में इच्छा को रखकर निज स्वार्थ से सेवा करता है वह सेवक नही क्योंकि सेवा के बदले वह कीमत चाहता है। यह कीमत भी चौगुना होती है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हमने देखा होगा कई लोग समाज की सेवा का दावा करते हैं पर उनका मुख्य उद्देश्य केवल आत्मप्रचार करना होता है। कई लोग ऐसे भी हैं जिन्होने अपने नाम से सेवा संस्थान बना लिए है और दानी लोगों से चन्दा लेकर तथाकथित रूप से समाज सेवा करते हैं और मीडिया में अपनी ‘समाजसेवी’की छबि का प्रचार करते हैं ऐसे लोगों को समाज सेवक तो माना ही नहीं जा सकता। इसके अलावा कई धनी लोगों ने अपने नाम से दान संस्थाए बना रखी हैं और वह उसमें पैसा भी देते हैं पर उनका मुख्य उद्देश्य करों से बचना होता है या अपना प्रचार करना-उन्हें भी इसी श्रेणी में रखा जाता है क्योंकि वह अपनी समाज सेवा का विज्ञापन के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
कुल मिलाकर समाजसेवा आजकल एक व्यापार की तरह हो गयी है। सच्चा सेव तो उसे माना जाता है जो बिना प्रचार के निष्काम भाव से सच्ची सेवा करते हैं। अपने भले काम का प्रचार करने का आशय यही है कि कोई आदमी उसका प्रचार कर फायदा उठाना चाहता है। कई बार ऐसा भी होता है कि हम जब कोई भला काम कर रहे होते हैं तो यह भावना मन में आती है कि कोई ऐसा करते हुए हमें देखें तो इसका आशय यह है कि हम निष्काम नहीं हैं-यह बात हमें समझ लेना चाहिये। जब हम कोई भला काम करें तो यह ‘हमारा कर्तव्य है’ ऐसा विचार करते हुए करना चाहिये। उसके लिये प्रशंसा मिले यह कभी नहीं सोचें तो अच्छा है। इससे एक तो प्रशंसा न मिलने पर निराशा नहीं होगी और काम भी अच्छा होगा।
संत कबीर संदेशः फल की चाहा में मन से काम नहीं होता
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भर्तृहरि दर्शन: मूंह की चाँद से तुलना करना घटियापन का प्रमाण

स्तनौ मांसग्रन्थी कनककलशावित्यूपमिती मुखं श्लेष्मागारं तदपि च शशांकेन तुलितम्।
स्रवमूलक्लिन्नं करिवरकरस्र्धि जघनंमुहूर्निद्यं रूपं कविजन विशेषैर्गुरुकृतिम्

हिंदी में भावार्थ-मांस पिण्ड से बनी नारी देह का कवियों ने बहुत घृणित ढंग से वर्णन किया है। वह ख्ंाखारने और थूकने के लिये जो मुख उपयोग में आता है उसकी तुलना चंद्रमा से करते हैं जो कि निंदनीय है।

अजानन्दाहात्भ्यं पततु शालभे दीपदहने स मीनोऽप्यज्ञानाद्वडियुतमश्नातु पिशितम्।
विजानंतोऽप्येतेवयमिह विषज्जालजटिलाः न मुंजचामः कामानहह गहनो मोह महिमा

हिंदी में भावार्थ-अपने अज्ञान के कारण पंतगा दीपक की लौ की तरफ आकर्षित होकर उसमें प्रवेश कर प्राण गंवा देता है और मछली कांटे में फंस जाती है पर मनुष्य तो इस संसार में भोग विलास के में यह जानते हुए भी लिप्त होता है कि उसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-देखा जाये तो स्त्री के प्रति कवियों के मन में आकर्षण सदियोेंं से है। वह उसकी देह की व्याख्या कर उसे बहुत सुंदर प्रतिपादित करते हैं जबकि देखा जाये तो स्त्री और पुरुष दोनों की देह मांस पिंड से ही बनी है। इस देह के साथ अच्छाई और बुराई दोनों ही समान रूप से जुड़ी हैं।
प्रत्येक मनुष्य की देह में विकार होते हैं। इतना ही नहीं हम अपने मुख से मिठाई खायें या करेला उनको हमारी देह के अंग ही कचड़े के रूप में परिवर्तित कर देते हैं। वह कचड़ा जब निष्कासन अंगों से बाहर आता है तो हम ही उसे देखना नहीं चाहते। कहने का तात्पर्य यह है कि यह देह मांस के पिंड से बनी है पर स्त्री की देह पर अनेक रसिक कवि ऐसी टिप्पणियां लिखते हैं जो हास्यास्पद और निंदनीय है। यह परंपरा आज भी चली आ रही है। हमारे यहां सूफी भक्ति की भी परंपरा शुरु हुई है पर उसमें गीत इस तरह लिखे गये जैसे वह निरंकार ईश्वर के लिये गाये जा रहे हैं पर उसे दैहिक प्रेम करने वाले लोग अपने संदर्भ में लेते हैं। फिल्मों में कई ऐसे गीत हैं जिनका सृजन तो निरंकार के लिये किया जाता है पर दृश्य में नायक या नायिक दिखाई देती है।
पतंगा अपने अज्ञान के कारण दीपक की लौ में जलकर भस्म होता है पर उसे भी प्रेम का प्रतीक बना दिया गया है। एक तरह से रसिक कवि न केवल स्वयं ही अज्ञानता के अंधेरे में होते हैं बल्कि अपनी कविताओं से दूसरे लोगों को भी भ्रमित करते हैं।
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Wednesday, March 11, 2009

भर्तृहरि दर्शन:सहायता कर सभी को सुनाएं नहीं

पद्माकरं दिनकरो विकची करोति
चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम्
नाभ्यर्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति
संत स्वयं परहिते विहिताभियोगाः


हिंदी में आशय-बिना याचना किये सूर्य नारायण संसार में प्रकाश का दान करते है। चंद्रमा कुमुदिनी को उज्जवलता प्रदान करता है। कोई प्रार्थना नहीं करता तब भी बादल वर्षा कर देते हैं। उसी प्रकार सहृदय मनुष्य स्वयं ही बिना किसी दिखावे के दूसरों की सहायता करने के लिये तत्पर रहते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समाज सेवा करना फैशन हो सकता है पर उससे किसी का भला होगा यह विचार करना भी व्यर्थ है। टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में समाज सेवा करने का समाचार आना एक विज्ञापन से अधिक कुछ नहीं होता। कैमरे के सामने बाढ़ या अकाल पीडि़तों को सहायता देने के फोटो देखकर यह नहीं समझ लेना चाहिये कि वह मदद है बल्कि वह एक प्रचार है। बिना स्वार्थ के सहायत करने वाले लोग कभी इस तरह के दिखावे में नहीं आते। जो दिखाकर मदद कर रहे हैं उनसे पीछे प्रचार पाना ही उनका उद्देश्य है। इससे समाज का उद्धार नहीं होता। समाज के सच्चे हितैषी तो वही होते हैं जो बिना प्रचार के किसी की याचना न होने पर भी सहायता के लिये पहुंच जाते हैं। जिनके हृदय में किसी की सहायता का भाव उस मनुष्य को बिना किसी को दिखाये सहायता के लिये तत्पर होना चाहिये-यह सोचकर कि वह एक मनुष्य है और यह उसका धर्म है। अगर आप सहायता का प्रचार करते हैं तो दान से मिलने वाले पुण्य का नाश करते हैं।
कहते हैं कि दान या सहायता देते समय अपनी आँखें याचक से नहीं मिलाना चाहिए क्योंकि इससे अपने अन्दर अंहकार और उसके मन में कुंठा के भाव का जन्म होता है। दान या सहायता में अपने अन्दर इस भाव को नहीं लाना चाहिए कि "मैं कर रहा हूँ*, अगर यह भाव आया तो इसका अर्थ यह है कि हमने केवल अपने अहं को तुष्ट किया।
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Sunday, March 8, 2009

अहिंसा धर्म की प्रवर्तक तो सीता जी थीं-आलेख (article on ram, balmiki ramayan, sita and ahinsa)

बाल्मीकी रामायण एक प्राचीनतम ग्रंथ है। देखा जाये तो भगवान श्री रामचंद्र जी का चरित्र अत्यंत प्राचीनतम माना जाता है। वैसे तो हमारे यहां भगवान के अवतार उनसे पूर्व भी हुए हैं पर भगवान श्रीरामचंद्र जी से एक ऐसी सभ्यता प्रारंभ होती है जिसे आचरण की दृष्टि से मजबूत माना जाता है। हम इस समय विश्व में प्रचलित धर्म या विचाराधाराओं को देखें तो उसमें भगवान श्रीरामचंद्र जी का चरित्र सबसे अधिक प्राचीन है। एक बात जो महत्वपूर्ण है वह यह कि विश्व में अहिंसा धर्म की बहुत चर्चा होती है तो उसकी चर्चा भी उसी में मिलती है। वैसे भगवान श्रीकृष्ण जी ने भी अहिंसा धर्म का प्रतिपादन किया है पर भगवान श्रीरामचंद्र के काल में उनकी पत्नी श्रीसीता जी ने भी अपने पति को अहिंसा धर्म के प्रेरित किया था। इस संबंध में इस लेखक ने एक पाठ लिखा था जो आज प्रस्तुत किया जा रहा है। वैसे अधिकतर लोग कहते हैं कि सभी प्रकार के विचार या धर्म पुरुषों द्वारा सृजित किये गये हैं। उनका यह तर्क भारतीय दृष्टिकोण से तो ठीक नहीं हैं क्योंेकि हमारे यह सभी धार्मिक महानायकों के साथ उनकी स्त्रियों को भी उतनी ही श्रद्धा से देखा जाता है क्योंकि वह अपने समय कोइ निष्क्रिय भूमिका में नहीं रहतीं थीं। यह अलग बात है कि कालांतर में उनको ऐसा प्रस्तुत किया गया। ऐसे में यह पाठ इस आशय से प्रस्तुत किया जा रहा है कि हमारे समाज के निर्माण में स्त्रियों की भूमिका भी कोई कम नहीं है।

इस पाठ को पढ़ने से तो यह लगता है कि अहिंसा धर्म की एक तरह से प्रतिपादक थीं। उन्होेंने भगवान श्रीरामचंद्र जी को अहिंसा धर्म में प्रवृत्त रहने का आग्रह किया। भले ही यह स्त्रियो के सुकोमल भाव के कारण उन्होंने ऐसा किया पर फिर भी अहिंसा धर्म के प्रतिपादकों में उनका नाम सबसे पहले आता है। फिर अनेक ज्ञानी और विद्वान लोग अहिंसा के प्रतिपादकों में उनका नाम पहले क्यों नहीं लेते? श्रीसीता जी की तो स्पष्ट मान्यता थी कि हथियार रखने मात्र से ही आदमी के मन में हिंसा का भाव आता है। फिर उन्होंने अहिंसा का धर्म सही रूप में प्रस्तुत किया कि अपने प्रति अपराध न करने वाले व्यक्ति के प्रति हिंसा अनुचित है। अर्थात जो अपराध करता है उसको दंड देने का वह विरोध नहीं करती। ऐसा विचार शायद ही किसी ने रखा हो। बहरहाल यह लेख पुनः प्रस्तुत है।
वाल्मीकि रामायण से-शस्त्रों का संयोग ह्रदय में विकार का उत्पादक
अपने वन प्रवास के दौरान सुतीक्षण के आश्रम से निकलकर जब श्री राम अपनी धर्म पत्नी सीताजी और भ्राता लक्ष्मण में साथ आगे चले। अपने पति द्वारा राक्षसों के वध करने के प्रतिज्ञा से वह दुखी थीं इसलिए उन्होने इससे हटने के लिए उनसे हिंसा छोड़ने का आग्रह किया और निम्नलिखित कथा सुनाई

पूर्वकाल की बात है किसी पवित्र वन में जहाँ मृग और पक्षी बडे आनंद से रहते थे वहीं एक सत्यवादी एवं पवित्र तपस्वी निवास करते थे। उन्हीं की तपस्या में विघ्न डालने के लिए शचिपति इन्द्र किसी योद्धा का रूप धारण कर हाथ में तलवार एक दिन उनके आश्रम पर आये। उन्होने मुनि के आश्रम में अपना उतम खड्ग रख दिया। पवित्र तपस्या में लगे हुए मुनि को धरोहर के रूप में वह खड्ग दे दिया। उस शस्त्र को पाकर मुनि प्रसन्नता के साथ उस धरोहर की रक्षा में लग गए, वे अपने विश्वास की रक्षा के लिए वन में विचरते समय भी उसे अपने साथ रखते थे। धरोहर की रक्षा में तत्पर रहने वाले वे मुनि फल-मूल लेने के लिए जहाँ-कहीं भी जाते, उस खड्ग की साथ लिए बिना नहीं जाते। तप ही जिनका धन था उस मुनि ने प्रतिदिन शस्त्र ढोते रहने के कारण क्रमश: तपस्या का निश्चय छोड़कर अपनी बुद्धि को क्रूरतापूर्ण बना लिया। फिर तो अधर्म ने उन्हें आकृष्ट कर लिया। वे मुनि प्रमादवश रोद्र कर्म में तत्पर हो गये और उस शस्त्र के सहवास से अंतत: उनको में नरक जाना पडा।

इस प्रकार शस्त्र का संयोग होने के कारण पूर्वकाल में उन तपस्वी मुनि को ऐसी दुर्दशा भोगनी पडी। जैसे आग का संयोग ईंधन के जलाने का कारण होता है उसी प्रकार शस्त्रों का संयोग शस्त्रधारी के हृदय में विकार का उत्पादक कहा गया है।

आगे सीता जी कहतीं हैं कि-'मेरे मन में आपके प्रति जो स्नेह और विशेष आदर है उसके कारण मैं आपको उस प्राचीन घटना की याद दिलाती हूँ तथा यह शिक्षा भी देती हूँ कि आपको धनुष लेकर किसी तरह बिना कारण के ही वन में रहने वाले राक्षसों के वध का विचार नहीं करना चाहिए। आपका बिना किसी अपराध के किसी को मारना संसार के लोग अच्छा नहीं समझेंगे। अपने मन और इन्दिर्यों को वश में रखने वाले वीरों के लिए वन में धनुष धारण करने का इतना प्रयोजन है कि वे संकट में पड़े हुए प्राणियों की रक्षा करें।''

अरण्यकाण्ड के नौवें सर्ग से लिए गया यह वृतांत इस उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है कि लोग अस्त्रों-शस्त्रों को शौक के लिए अपने पास भी रखते है और उसके जो परिणाम आते हैं वह बहुत भयावह होते हैं ।
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