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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Sunday, September 21, 2014

ग्रंथों के सतत अध्ययन से भी ज्ञान और विज्ञान में पारंगत होना संभव-हिन्दी चिंत्तन लेख(granthon ke satat adhyayan se bhi gyan aur vigyan mein paarangat hona sambhav-hindi chinttan)



            भारत में यह प्रकृति की कृपा कहें या प्राचीन ऋषियों, मुनियों तथा तपस्वियों का प्रभाव कि हमारे यहां  लोग स्वाभाविक रूप से धर्मभीरु होते हैं।  हम लोग  संसार के दृश्यव्य विषयों में लिप्त जितना होते हैं उतनी ही हमारी रुचि अध्यात्म के अदृश्यव्य तत्वों में भी रहती है।  यही कारण है कि हमारे यहां बरसों से ही प्रवचन, सत्संग और परमात्मा की एकांत साधना की परंपरा रही है।  यह अलग बात है कि लोगों को धार्मिक शिक्षा की व्यवसायीकरण आधुनिक शिक्षा की तरह सदियों पहले ही हो गया है पर इसका आभास लोग सहजता से नहीं करते।  जहां अनेक निष्काम योगियों, साधुओं और संतों भारतीय अध्यात्म दर्शन का रथ अपने तप से खींचा वही अनेक कामनावान विद्वानों ने आमजन से दक्षिणा के नाम पर पैसा कमाने तथा समाज में अपनी प्रभावी छवि बनाये रखने के लिये धर्म प्रचार का व्यवसाय अपनाया।  यह अलग बात है कि वह निष्काम और सन्यासी होने का दावा करते रहे हैं पर उनके रहन सहन और चाल चलने से यह स्पष्ट होता रहा है कि वह वास्तव में वैसे त्यागी हैं नहीं जैसा दावा करते हैं।
            यही कारण है कि आजकल अनेक धर्मभीरु लोग सच्चे गुरु की तलाश में रहते हैं। अनेक लोग प्रश्न करते हैं कि सच्चा गुरु ढूंढना मुश्किल हो गया है तो कैसे अध्यात्म ज्ञान कहां से प्राप्त करें? पाखंड गुरु से प्राप्त ज्ञान गेय नहीं हो पता। इस समस्या के कारण अनेक लोगों की ज्ञान पिपासा शांत नहीं हो पाती।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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यथायथा हि पुरुषः शास्त्रंसमधिगच्छति।
तथा विजानाति विज्ञानं चास्य रोचते।
            हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य निरंतर शास्त्रों का अभ्यास करता है वह अंततः ज्ञान और विज्ञान में दक्षता प्राप्त ही कर लेता है। सतत अध्ययन से उसकी रुचि ज्ञान और विज्ञान में बढ़ती जाती है।
            हमारा मानना है कि इसके दो ही उपाय हैं। एक तो यह कि इन्हीं पेशेवर रट्टा लगाने वाले गुरुओं से प्रवचन सुने पर उनके पास जाकर उनकी निजी गतिविधियों पर ध्यान न लगायें।  उनके आश्रम या दरबार में जो स्थान हो उसके सामने ही बैठे, सत्संग सुने और ध्यान लगायें फिर वहां से चले आयें।  दरबार के पीछे या गुरु के अंतपुर में कभी न जायें। सीधी बात कहें तो पर्दे पर देखें उसके पीछे क्या इसमें दिलचस्पी न लें।  अगर वह आपने कोई अनैतिक या असहनीय विषय देखा तो आपका मन खराब होगा।  मन में कुविचार आने से अपनी ही हानि होती है। यह संसार संकल्प के आधार पर ही निर्मित होता है।  इसलिये अपने ंसकल्प में शुद्ध विषयों का संग्रह करें। जिस तरह अर्थ संग्रह की सीमा रखना चाहिये उसी तरह धर्म संग्रह में यही नियम लागू होता है। गुरु से शिक्षा प्राप्त करनें उसके आश्रम या दरबार में चिपक कर न रह जायें।
            दूसरा उपाय यह कि अपने ही प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करें। पेशेवर गुरु यह प्रचारित जरूर करते हैं कि इस संसार में उद्धार के लिये किसी दैहिक गुरु होना चाहिये पर महान धनुर्धर एकलव्य ने हमें इस बंधने से भी मुक्त कर दिया है कि गुरु हमेशा सामने बैठा रहे।  अनेक महान लोगों ने ग्रंथों को अपना गुरु बनाया और महान ज्ञान अर्जित किया।  इसलिये नियमित रूप से अध्ययन करें तो भी ज्ञान और विज्ञान विषय स्वतः आत्मसात हो जाता है। इसलिये दैहिक गुरु होने पर अधिक चिंता नहीं करना चाहिये।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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