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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Thursday, September 15, 2016

योग जब माया उत्पादन का उद्योग बन जाये-पतंजलि योग दर्शन विक्रय योग नहीं (Than yoga made a Industry-A Article on Patanjaliyoga

भारतीय दर्शन के अनुसार देवी सरस्वती तथा देवी लक्ष्मी का बैर है। वह दोनों एक जगह एक साथ नहीं रहती। इसे कोई अंधविश्वास कहे या विश्वास पर हमारी नज़र से यह एक प्रकृति सिद्धांत है कि जिनके पास ज्ञान बुद्धि अधिक है वह माया का संग्रह अधिक नहीं करते हैें और जो करते हैं भले ही ज्ञान के विक्रेता हों पर बुद्धि के खजांची नहीं हो सकते।
हमारे देश के प्राचीन ग्रंथों की सरस कथायेंए महान ऋषितुल्य लेखकों की पवित्र रचनायें तथा धार्मिक नायकों की भूमिकायें अध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार के लिये महान संदर्भ का कार्य करती हैं। हमारा योग साहित्य तथा श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान इतना सरस है कि जितना पढ़ो उतनी ही जिज्ञासा बढ़ती जाती है। शर्त यही है कि सुनकर गुनो और पढ़कर समझो। बौद्धिक अनुसंधान कर अपने चिंत्तन से से निष्कर्ष निकालो। मगर पेशेवरों ने ऐसा जादू इस समाज पर किया है कि वह ग्रंथों का रटकर गुरु पदवी धारण करते हुए शिष्य संग्रह दक्षिणा की राशि के लिये करने मे लगे रहते है। कहने का अभिप्राय यह है कि भारतीय दर्शन विश्व में सबसे श्रेष्ठ व पूर्ण है। मजे की बात यह है कि भारतीय ज्ञान का विक्रय ही सबसे ज्यादा होता है। ज्ञान की पुस्तकें रटकर काम क्रोध तथा मोह त्यागने का नारे लगाने वाले मायापति हो जाते हैं। जिस तरह कलाए साहित्यए फिल्म तथा पत्रकारिता के शीर्ष पुरुष अपनी छवि के नकदीकरण के लिये समाजसेवा में आते हैं उसी तरह धार्मिक शिखरों के स्वामी भी नकदीकरण के मोह से नहीं बच पाते। इस प्रयास में उनकी छवि का रूप बदलता है इसका अहसास तक उनको नहीं होता। अनेक बुद्धिमान जन इनके प्रति अपनी धारणा बदलने लगते हैं.यह अलग बात है कि उनको पता नहीं होता।
सरस्वती पुत्र लक्ष्मीपति होकर भी इतराते हैं पर यह ज्ञान साधक वह सिद्ध जानते हैं कि इन देवियों का बैर अत्यंत वैज्ञानिक सिद्धांत है जिसे बदलने की क्षमता बड़े से बड़े योगी में नहीं होती।
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नोट.कृपया इसे किसी परम सिद्ध योगचार्य तथा उसके प्रबंधक से न जोड़ें जो कभी योग के स्तंभ माने जाते थे और अब उनके उद्योग प्रबंधन तथा की संग्रहीत माया की चर्चा होने लगी है। योगाचार्य की छवि बदल कर उद्योगपति जैसे उनका प्रचार हो रहा है। हमने उनकी प्रशंसा में अपने ब्लॉग पर अनेक पाठ डाले जिसके लिये आलोचनात्मक टिप्पणियां भी झेलनी पड़ी। स्थिति यह है कि योग के प्रवर्तक महर्षि पतंजलि अब दवाओं के प्रचार नायक बना दिये गये हैं। टीवी पर पतंजलि का नाम जोड़कर दिखाये जा रहे विज्ञापनों यह अहसास होने लगा है कि अभी तक ज्ञान ही विक्रय योग्य था पर योग तो उससे अधिक दाम दिलाने वाला विषय बन गया है। बहरहाल उन दोनों की आलोचना करना उद्देश्य नहीं है पर अगर कोई करता है तो हम उसके जिम्मेदार नहीं है।

Sunday, September 11, 2016

सेवाओं की आवश्यकतानुसार विषयों के स्नातक नियुक्त किये जायें (Reservation in Acording Subject and Graduate)

               कभी कभी अंतर्जाल पर ऐसे प्रश्न सामने आ जाते हैं जिनके उत्तर हमारे चिंत्तन से भरपूर मस्तिष्क में सदैव मौजूद रहते हैं। वैसे अगर एक दो पंक्ति में चाहें तो उसका उत्तर संबंधित की दीवार पर ही लिख दें पर भाषा की विशेषज्ञता के अभाव में नहीं लिखते। फिर जो ऐसे प्रश्न उठाते हैं उन्हें सीधे उत्तर देने में यह संकोच होता है कि वह हमारी उपाधि या योग्यता पता करने लगें जो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अध्ययन से अधिक नहीं है। एक तरह से उसके छात्र हैं न कि शिक्षक।
          बहरहाल फेसबुक में ढेर सारे अनुयायियों से जुड़े उन विद्वान ने एक विश्वविद्यालय के चुनाव में विज्ञान संकाय के छात्रों के अन्य संकायों से आधार पर मतदान करने पर यह सवाल उठाया था कि ‘विज्ञान के संकाय के अन्य छात्रों से अलग क्यों सोचते हैं?’
           इस प्रश्न पर सीधे तो नहीं पर अलग से हमारी एक सोच रही है। पुस्तकें मनुष्य की मित्र हैं और जैसे मित्र की संगत होती है उसके गुण उसमें आ ही जाते हैं।  विज्ञान व गणित के सूत्र छात्र के दिमाग में उलझन के बाद सुलझन की प्रक्रिया का दौर चलाते हैं जिससे उसकी बुद्धि में आक्रामकता या उष्णता आती है। एक तरह से बुद्धि तीक्ष्ण हो जाती है। कला, वाणिज्य तथा विधि के अध्ययन करने वालों में वह उष्णता नहीं आती पर शीतलता के कारण उनकी चिंत्तन क्षमता अधिक बढ़ती है।  सीधी बात कहें तो यह कि विज्ञान तथा गणित का अध्ययन मस्तिष्क को तीक्ष्ण करता है जिससे किसी अन्य विषय पर ज्यादा देर तक पाठक सोच नहीं सकता और जबकि अन्य विषय के अध्ययन करने वाला सहजता के कारण ठहराव से चिंत्तन करने का आदी हो जाता है।  यह अलग बात है कि अध्ययन करने के बाद अभिव्यक्त होने की शैली एक बहुत बड़ा महत्व रखती है। वह सभी में समान नहीं होती-किसी में तो होती भी नहीं है। उसका पुस्तकों के अध्ययन से कोई संबंध नहीं है। 
                अंग्रेज दुनियां के सबसे अहकारी लोग माने जाते हैं और उनकी शिक्षा प्रणाली अपनाने के कारण हमारे यहां भी यही स्थिति है। गणित तथा विज्ञान के छात्र जीवन से संबंधित अन्य विषयों में जानते नहीं है और अन्य विषयों के स्नातक अपने अलावा किसी के तर्क को  मानते नहीं है। यही कारण है कि आधुनिक शिक्षा साक्षरता के साथ ही सामाजिक अंतर्द्वंद्वों को भी बढ़ा ही रही है।
           आखिरी बात यह है कि हमारा यह भी मानना है कि सरकारी सेवाओं में विषयों के आधार पर लोगों को नियुक्त करना चाहिये। बैंक तथा लेखा सेवाओं में वाणिज्य स्नातक तो प्रबंध में विशेषज्ञता की उपाधि लेने वालों को प्रशासनिक सेवाओं में रखना चाहिये। गणित व विज्ञान के विशेषज्ञों को केवल तकनीकी सेवाओं में रखना चाहिये। उनमें मानवीय संवेनाओं की बजाय नवनिर्माण की क्षमता अधिक होती है जिसकी प्रशासनिक सेवाओं में अधिक आवश्यकता नहीं होती। प्रशासनिक सेवाओं में वाणिज्य स्नातक भी चल सकते हैं क्योंकि प्रबंध उनका विषय होता हैं। कला के स्नातकों का उन सेवाओं में करना चाहिये जहां मानवीय संवेदनाओं की अधिक आवश्यकता होती है। उन विद्वान प्रश्नकर्ता की दीवार पर अपना इतना बड़ा उत्तर रख नहीं सकते थे सो यहां चैंप दिया।
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-दीपक ‘भारतदीप’

Wednesday, September 7, 2016

काल्पनिक विलास रोग के फैलता वायरस कौन ढूंढेगा-हिन्दी व्यंग्य लेख (Dream Troble viras denger for Society-Hindi Article)

        उस दिन एक चैनल पर एक मनोरोग की चर्चा आ रही थी जिसमें बताया गया कि आदमी अपने चक्षुओं से कोई बेहतर वस्तु, विषय या व्यक्ति देखता है तो उसके साथ दिमाग में स्वयं को श्रेष्ठ रूप से जुड़ा अनुभव करता है। हम अपनी भाषा में कहें तो वह ‘काल्पनिक विलास’ पालता है। चर्चा में बताया गया कि जब कोई आदमी किसी बड़े क्रिकेट खिलाड़ी को देखता है तो उसे लगता है कि वह स्वयं भी बड़ा क्रिकेट खिलाड़ी है। अगर किसी ने अच्छा काम किया है तो वह कल्पना करता है कि वह भी ऐसा ही कर रहा है। हमारे देश में ’कल्पना’ रोगियों की संख्या कितनी है मालुम नहीं पर रुपहले पर्दे पर नायक नायिकाओं के अभिनय को देखकर लोग वैसा दिखने तथा करने का अभिनय स्वयं को ही करके दिखाना चाहते हैं।  सेल्फी और मोटर साइकिल पर सवारी के दौरान मोबाइल पर बातें करते लोग ऐसी ही ‘कल्पना रोग’ के शिकार दिखते हैं।  रास्ते में अनेक लोग मोटर साइकिल चलाते हुए कान से मोबाइल पर बात करते हुए इस तरह चलते हैं जैसे कि सामने कोई कैमरा उनके अभिनय को रिकार्ड कर रहा है जिसे बाद में कहीं दिखाया जायेगा।  सेल्फी  तथा वाहन चलाते हुए मोबाइल पर बात करते हुए अनेक दुर्घटनायें हो रही हैं उससे तो लगता है कि हमारे देश में कल्पना रोग भी फैल गया है। एक बात समझ में नहीं आती कि किसी उद्यान, मूर्ति या तालाब के पास सेल्फी लेकर हम किसे दिखाना चाहते हैं और क्यों?
         एक सवाल हम अपने आप से पूछें कि क्या हमें पता है कि किसी को सेल्फी दिखाने पर वह हृदय से प्रभावित होता है या केवल शाब्दिक प्रशंसा कर रहा जाता है?
    इसका जवाब हम स्वयं ही ढूंढें कि हमें कोई सेल्फी दिखाता है तो हमारी बाह्य प्रतिक्रिया तथा आंतरिक प्रतिकिया में अंतर होता है या नहीं।
   कम से कम इस लेखक का अनुभव तो यही रहा है कि किसी भी आदमी का व्यवहार, विचार और व्यक्तित्व अगर भौतिक रूप से सुखदायक हो तो वह हर जगह प्रभाव डालता है। जीवन में अनेक ऐसे लोग मिले जिन्होंने अपने साथ हुई मुलाकातों में प्रभावित किया तो ऐसे भी मिले जो अपने सामानों का प्रदर्शन करते रहे और हम उदासीन भाव से देखते सुनते रहे। यह अलग बात है कि बाहर जाहिर होने नहीं दिया।  हमारा मानना है कि अपने सामान से प्रभावित करने वाले लोगों में अपने ही व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर संदेह होता है जिसे वह प्रदर्शन कर छिपाना चाहते हैं।  शाब्दिक ज्ञान के अभाव में लोग अर्थ में ही अनर्थ करते हैं-यानि अपने धन से ही अपने को बुद्धिमान, प्रतिभावान तथा मिलनसार साबित करने का प्रयास करते हैं। वैसे ही हमारे यहां धनियों मेें ढेर सारी कमियों के बाद भी उन्हें खानदानी, सभ्य और बुद्धिमान हमारा संपूर्ण समाज मानता है। बहरहाल कल्पना रोग के फैलते वायरस पर भी कोई अनुसंधान होना चाहिये। हम ध्यान क्रिया को इसका उपाय मानते हैं पर यह सभी के लिये नहीं सुझा रहे।

Monday, September 5, 2016

फेसबुक की आभासी दुनियां में बीते सपने फिर सत्य की तरह सामने आ रहे हैं (FaceBook and Past DReam of Life)

अगर हम अपने प्राचीन दर्शन का अध्ययन करें तो यह निष्कर्ष भी आता है कि इस प्रथ्वी पर जीवन ब्रह्मा जी की निद्रा की अवस्था देखे जा रहे सपने में रहता है। जब वह जाग्रत होते हैं तो सब शून्य हो जाता है। हम जब रात को सोते हैं तो इसी तरह अनेक प्राणी सपने में आते हैं। कभी दुःख तो कभी सुख आता है। जब हम जागते हैं तो एकदम अचंभा होता है कि जो निद्रा के दौरान स्वप्न था वह सब गायब हो गया। लगता है कि हम जागे हैं और सत्य सामने हैं। सत्य का यह भ्रम भी हो सकता है क्योंकि जो सामने है वह भी तो कभी लुप्त होना ही है। संभव है कि हम सपने में जो व्यक्ति देखें हों वह उतने पल तक सांसे लेकर अपने सत्य होने की अनुभूति करते हों जैसे हम ब्रह्मा जी के सपने में जी रहे हैं। हमारी जाग्रत अवस्था भी ब्रह्मा का सपना हो सकती है। पता नहीं हम हैं भी या नहीं।
मगर जब तक सांसें ले रहे हैं तब यह अहसास रखना ही चाहिये कि हम इस धरती पर मौजूद हैं। फकीर हो या सन्यासी वह इस जीवन को भ्रम मानते हैं पर सांसें लेते समय उन्हें भी अपने अस्तित्व की निरंतरंता की अनुभूति जरूर होती है। पिछले सात दिनों से फेसबुक पर कुछ ऐसी ही अनुभूति भी हो रही है जो सपने तथा सत्य के बीच अंतर्द्वंद्व से भरी है। ज्ञान साधना करते हुए हमने यह देखा कि हर दिन कल देखा गया सपना हो जाता है। अनेक लोग ऐसे हैं जो हमसे कार्यालय, घर तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर मिले फिर अदृश्य हो गये। उनकी यादें ऐसे ही रहीं जैसे कि जागने पर सपने की होती थी-अब हमें रात के सपने याद नहीं रहते जो कि अच्छी निद्रा का प्रमाण होता है। हमारे दो फेसबुक हैं। एक पर हम करीब आठ वर्ष से सक्रिय हैं। इसका संबंध ब्लॉग के समय से हुआ था इसलिये सार्वजनिक मित्रों से संपर्क हुआ। एक निजी था जिसमें हमारे दो चार रिश्तेदार ही हुआ करते थे। कभी सोचा नहीं था कि फेसबुक समय के साथ इतना विराट रूप धारण करेगा। समय के साथ निजी फेसबुक पर कुछ मित्र आये। पिछले तीन महीने में कार्यालय के एक दा ेमित्रों ने इसका अनुसरण किया तो उससे बाकी लोगों की नज़र में आये। फिर हमने देखा कि फेसबुक हमारे उन्हें मित्रों को सामने रख रहा है जिन्होंने हमें छोड़ा या हम उन्हें छोड़ आये। हमने सोचा चलो अब उन्हें मित्र बनाते हैं। अचानक मित्रों की संख्या बढ़ गयी। यादों में बीते सपने की तरह मौजूद व्यक्तित्व फिर इस आभासी दुनियां में -इंटरनेट के पुराने लेखक इंटरनेट को इसी नाम से जानते हैं-जागते हुए लौट आये हैं। यह आभास दिलचस्प है। सपनों के बारे में एक पश्चिमी वैज्ञानिक कहते हैं कि रात को देखे सपने अगर सुबह उठने पर याद आयें तो इसका अर्थ यह है कि आप ढंग से सोये नहीं। सपनो के बारे में हमारे यहां कुछ लोग कहते हैं कि ब्रह्म मुहूर्त में देखे गये सपने सत्य होते हैं। हमारा मानना है कि सांसों का चलना सत्य है इसलिये जब तक ले रहे हैं शान से जीना चाहिये।
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Saturday, September 3, 2016

क्लेश से बचने के लिये राग का त्याग करना सहज नहीं-हिन्दी लेख (Raga ka Tyag karne par Kilesh ka bacha ja sakta hai-Hindu Religion Article)

       17 महीने पूर्व ही सेवा से प्रथक होने का निर्णय करना आसान नहीं होता पर हमारे लिये एकदम सहज था।  इसकी पृष्ठभूमि पिछल दस वर्षो में बन रही थी। हमें लगने लगा था कि अब इस नौकरी नाम के राग से मुक्त होकर उन्मुक्तता से विचरण करना चाहिये। पतंजलि योग के सिद्धांतों के अनुसार ‘क्लेश का जनक राग है’। सोलह वर्ष पूर्व जब उच्चरक्तचाप तथा वायुविकार का शिकार हुए थे तब लगने लगा था कि हमारा जीवन अब पतन की तरफ जा रहा है।  उसी दौरान ही भारतीय योग संस्थान के शिविर में योग साधना का प्रशिक्षण लिया। वहां आसन, प्राणायाम व ध्यान का अभ्यास करने लगे।  उसके बाद आया अंतर्जाल का युग जिसने हमारे जीवन की धारा बदल दी।  हिन्दी व अंग्रेजी टंकण के अभ्यास ने यहां ब्लॉग लेखन में भारी मदद की। लिखने के लिये हमने चाणक्य, कबीर, तुलसी, रहीम तथा अन्य संतों के दर्शन से जुड़ी सामग्री का अध्ययन किया।  कहा जाता है कि ‘करत करत अभ्यास, मूर्ख भये सुजान’। अपने बारे में हम कह सकते हैं कि ‘लिखत लिखत दिखत दिखत, अहंकारी भये निरंकारी’। दस वर्ष पूर्व जब श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन का पाठ करना तो दंग रह गये।  इस सृष्टि का सत्य जिस तरह सामने आया उसे देखकर लगा कि जैसे यह एकदम नया है। महापुरुषों के दर्शन की आधुनिक संदर्भ में व्याख्या करने के अभ्यास ने श्रीगीता के अध्ययन में सुविधा प्रदान की। हमारे एक सहकर्मी मित्र अजय गौड़ हैं। उन्होंने यह सुझाव दिया कि श्रीगीता के हम उस संस्करण का अध्ययन करें जिसमें महात्मय बताने वाली कथायें न हों वरन् सीधे संस्कृत के श्लोक हिन्दी में अनुवादित हों उसे पढ़ें और समझें।
श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन ने ध्यान की क्रिया के लिये प्रेरित किया।  कार्यालय परिसर में ही स्थित श्रीहनुमान के मंदिर में हमने जब ध्यान लगाने का अभ्यास प्रारंभ किया तो उसने अंतर्चक्षु खोल दिये।  पतंजलि योग साहित्य में राग व क्लेश के सहसंबंध के सिद्धांत की व्याख्या जब हमने अंतर्जाल पर लिखी तो वह आत्मसात हो गयी।  उसके बाद लगने लगा कि जीवन का नष्टप्रायः होना तय है पर उससे पहले उन्मुक्त भाव से जीने के लिये रागों का त्याग करना आवश्यक है। यह सत्य है कि जब तक जीवन है काम, क्रोध, मोह, लोभ तथा अहंकार जैसे राग नहीं छूटते पर योग साधना तथा ज्ञान के अभ्यास से इनकी समय समय पर धारा अवरुद्ध की जा सकती है। ध्यान इसमें ब्रह्मास्त्र का काम करता है।  यह अनुभव हुआ कि गरीब हो या अमीर सभी धन कमाते हैं पर पूरा उपयोग नहीं कर पाते-भविष्य में धनाभाव का संकट न हो इसलिये जूझते रहते हैं।  हमसे लोगों ने पूछा था कि ‘सेवानिवृत्ति के बाद क्या करोगे? हम कहते थे कि ‘मौज करेंगे’। लोगों को इस बात पर यकीन नहीं हुआ।
हमारे बड़े मामाजी श्री मैहरसिंह कुर्सीजा विद्युत विभाग से अधीक्षण यंत्री पद से निवृत्त हुए हैं।  जब हम छोटे थे तब वह नवयुवक थे और चंदामामा तथा नंदन किताबें अपने घर पर लाते थे।  अक्षरज्ञान होने पर हम नानी के घर जाकर पढ़ते थे। वहां  अंतर्मन में लेखक पैदा हुआ। उसके बाद मामा हनुमान चालीस पढ़ने लगे। उनकी देखादेखी हमारे अंदर भी अध्यात्मिक भाव पैदा हुआ।  हम जब किराये के मकान में रहते थे हमारी माताजी ने तब एक ंपंडित जी से तुलसीदास का रामचरित मानस पढ़ने के लिये लिया। हमने भी उसे पढ़ा।  हमारे अंदर एक लेखक ने तब युवा रूप लिया।  मामाजी के निरंतर संपर्क के कारण हमारे अंदर अध्यात्मिक तत्व हमेशा रहे।  उसके योग साधना तथा श्रीगीता के अभ्यास ने उसे बृहत रूप दे दिया।
सेवा का त्याग कोई त्याग नहीं है। हमारा उद्देश्य अपने व्यक्तित्व को एक स्थान पर केंद्रित करना है ताकि कोई रचनात्मक कार्य कर सकें। यही रचनात्मकता हमें मौज प्रदान करती है। हम अपने माता पिता तथा मामा का इस बात के लिये आभार व्यक्त करते रहें हैं कि उन्होंने हमारे अंदर जीवन से संघर्ष तथा अध्यात्म के जो गुण स्थापित किये वही हमारी शक्ति है। हमारा मानना है कि जिसके अंदर बालपन में ही अध्यात्म का तत्व स्थापित हुआ वही सुखी है वरना बड़ी उम्र में तो भटकाव से बचना मुश्किल है।  केवल मंदिर में घूमने या भजन की चौपाल में बैठकर समय पास हो सकता है पर हृदय में अपनी ही आयु का बोझ उठाना कठिन लगता है। हमने तो यह भी देखा है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी लोग एक बार फिर दूसरी सेवा ढूंढतें हैं। पुरुष के लिये कमाते रहना जिंदा रहने का सबसे सरल बहाना है।  कहते हैं कि समय पास करना जरूरी है।  समय तो पास होता ही है चाहें हम करें या नहीं। प्रश्न यह है कि हम उसे आनंद से पास कर रहे हैं या तनाव से।  तय बात है कि जहां राग होगा वहां क्लेश होगा।  राग सीमित होेंगे तो क्लेश भी कम होगा-यह बात पढ़ने सुनने में अजीब लगे पर यही सच भी है।
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Thursday, September 1, 2016

समाज सेवा के लिये शासकीय सेवा छोड़ आये हम-हिन्दी लेख (VRS for Social Servic-Parsonal Hindi Artcile)

33 वर्ष केंद्रीय सेवा से कल हमने स्वेच्छा से निवृत्ति ले ली। कार्यालय महालेखाकार (लेखा व हकदारी-प्रथम) मध्यप्रदेश नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक के अधीनस्थ एक संगठन है जिसमें राज्य सरकार का लेखा रखा जाता है। जनता से इसका सीधा जुड़ाव नहीं है इसलिये वेतन के अलावा कोई अन्य राशि हमारे खाते में कभी नहीं जमा हुई।  सेवा के प्रारंभिक वर्षों में पहले लगता था कि दुर्भाग्य से ईमानदारी अपने हिस्से आयी, पर बाद के वर्षों में लगा कि यह हमारा सौभाग्य ही है कि कोई हमारी आर्थिक ईमानदारी पर संदेह नहीं कर सकता।  समय पूर्व सेवा से हटने के कारणों पर अनेक बातें हो सकती हैं।  मूल बात हमारे साथ यह थी कि आर्थिक रूप से हमारी स्थिति ठीकठाक थी। उसके बाद हमें लगा कि अब जीवन में कुछ सार्वजनिक रूप से कार्य करना चाहिये। पिछले 16 वर्षों से योग साधना अभ्यास, 12 वर्षों से श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन तथा 10 वर्षों से अंतर्जाल पर अध्यात्मिक लेखन के लिये चाणक्य, विदुर, कबीर, गुरुवाणी, तुलसीदास, रहीम तथा अन्य अनेक महान विभूतियों की रचनाओं के संपर्क ने हमारे अंदर के एक ऐसे लेखक को जिंदा रखा जो चिंतन करने का आदी हो गया है। अनेक लोग अंतर्जाल पर संदेश देकर सामाजिक तथा अध्यात्मिक विषयों के सम्मेलनों के लिये व्याख्यान देने का आमंत्रण देते पर हम कार्यालयीन दबावों के चलते स्वीकार नहीं कर पाये। अब सोचा कि योग, गीता तथा भारतीय अध्यात्मिक विषयों को वर्तमान संदर्भों से जोड़ने के अभियान पर मुक्त भाव से विचरेंगे।
नौकरी चाहे बुरी हो या अच्छी वह नौकरी होती है। बंधा हुआ धन मिलता है पर अनेक प्रकार के बंधनों की शर्त भी जुड़ी होती है। नौकरी ऐसा सुविधाभोगी जीव बना देती है कि मामूली दुविधा भी विकट लगती है। जिन लोगों को जीवन गुजारने के लिये संघर्ष करना पड़ता है वह सोचते हैं कि नौकरी वाला सुखी है-इस भ्रम के कारण बाबू जाति बदनाम भी हुई है।  इतनी कि जिन बाबूओं को वेतन के अलावा अन्य परिलब्धि नहीं होती सामान्यजन उनको भी संदेह की दृष्टि से देखते है। कोई यकीन ही नहीं करता कि बाबू होकर भी हम कमाई नहीं कर रहे।
हमारा कार्यालय एक बृहद भवन में स्थित है।  जब हम प्रारंभ में आये तो चार से पांच हजार कर्मचारी काम करते थे।  अब संख्या हजार भी नहीं है। अनेक लोगों को सेवा में आते और जाते देखा। हमारे अनेक मित्र सेवानिवृत्त हो गये। नये आये मित्र बने। जीवन के साथ सेवा भी काफिले की तरह चलती रहीं।  अंततः हम भी निकल आये। अनेक प्रकार के अनुभव तथा कहानियां जेहन में है जो समय आने पर लिखते रहेंगे।  कुछ लोगों की याद हमेशा सतायेगी तो कुछ का हम अब भी पीछा करेंगे। जब सेवा में गये तो जीवन के प्रति उत्साह था तो छोड़ते समय भी सार्वजनिक रूप से कुछ करने का विचार जोर मार रहा है। निश्चित रूप से इस सेवा ने हमें जीवन में एक ऐसा आर्थिक संबल प्रदान  किया जिससे समाज की बौद्धिक सेवा सहजता से की जा सकती है।  हम नौ वर्ष से अंतर्जाल पर सक्रिय है तब अनेक मित्र पूछते थे कि तुम्हें वहां कौन पढ़ता है? हम मुस्कुराकर रह जाते थे। हैरानी इस बात की है कि सेवा से प्रथक होने से चार पांच माह पूर्व ही कार्यालय के अनेक परिचित ही फेसबुक पर मित्र बनते गये। स्मार्टफोन ने अंतर्जाल का उपयोग बढ़ाया है। कुछ लोग कहते हैं कि सोशल मीडिया ने आपसी संपर्क कम किया है पर सच यह है कि फेसबुक हमारे साथ ऐसे मित्रों को जोड़े रखेगा जिन्हें अब हम सहजता से नहीं मिल पायेंगे।

Tuesday, August 9, 2016

खेलने से ज्यादा खिलाड़ियों का मजाक उड़ाना ज्यादा आसान-ओलंपिक पर हिन्दी लेख(A Hindi Article and editorial On RioOlympic2016 Rio2016)

                             ऑलंपिक में भारत एक भी पदक नहीं जीते तो हमें शर्म नहीं आयेगी? एक कथित लेखिका ने वहां गये भारतीय खिलाड़ियों का मजाक उड़ाते हुए लिखा है कि ‘सेल्फी लो और वापस आओ। यह पैसे की बर्बादी हैै।’
                     जिन लोगों का खेल से ज्यादा बकवास पर अधिक विश्वास है या फिल्म और क्रिकेट में अपने शब्द खर्च किये हैं ऐसे लेखक विचारक अंतर्राष्ट्रीय खेल जगत और भारत की स्थिति का आंकलन किये बिना बकवास करते हैं। एक समय हॉकी में भारत और पाकिस्तान का दबदबा था-बुजुर्ग लेखिका को शायद पता नहीं होगा उस समय हॉकी मैदान पर खेली जाती थी न कि टर्फ पर-इस कारण दोनों देशों में हॉकी का पता हुआ।  टर्फ का विकास ही हॉकी में एशियाई वर्चस्व समाप्त करने के लिये किया गया। आज पाकिस्तान की टीम ऑलंपिक में नहीं है और हमारी भी अधिक संघर्ष नहीं कर पायेगी पर इसमें शर्मिंदा होने की बात नहीं क्योंकि हमारे देश के लोग धरती पर ही खेलते हैं। यहां नकली मैदान सहज उपलब्ध नहीं है। स्थिति यह हो गयी है कि पहले उबड़ खाबड़ मैदान पर हाकी खेलते बच्चे मिल जाते थे पर आज उसकी जगह क्रिकेट खेली जाती है।  क्रिकेट भी अब इसलिये बचा  कृत्रिम मैदान तैयार करने के लिये ब्रिटेन इसलिये तैयार नहीं हैं क्योंकि वह उसका जनक है और परंपरा तोड़ना वहां के लोग सही नहीं समझते।  हम कभी ऐसी जिद्द नहीं पालते। यह क्रिकेट  प्राकृतिक मैदान  जो चल रहा है वह ब्रिटेन की वजह से है। अगर इसमें भी बदलाव हो जाता तो भारत वहां से भी लापता हो जाता। उसी तरह कुश्ती तथा ऊंची कूद मेें भी गद्दों का उपयोग होने लगा है जबकि हमारे देश के बालक धरती या रेत से शुरुआत करते हैं। जब रेत पर कुश्ती होती थी तब कुश्ती में हमारे पहलवानों का भी नाम होता था। इतना ही नहीं खेलों के नियम भी पश्चिमी तथा विकसित देशों की सुविधा से बनते बिगड़ते हैं। जिसे समझने में भारतीय खिलाड़ी देरी करते हैं। जबतक  समझ पायें तब तक नियम बदल दिये जाते हैं।  हमने बचपन में रेत पर अभ्यास किये हैं। कबड्डी क्रिकेट और हाकी प्राकृतिक मैदान पर ही खेला। इसलिये पता है कि खेल में दमखम लगता है। यह अलग बात है कि लेखक हो गये पर इतना पता है कि खेलने से ज्यादा खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर बकवास करना ज्यादा आसान है।
                        हमारे देश के खिलाड़ी वहां गये हैं सभी प्रशंसा के पात्र हैं। पैसे की बर्बादी जैसा विषय अगर बहस पटल पर लाया जाये तो बहुत सारे संदर्भ मिल जायेंगे। जो पैसा उन पर खर्च हुआ है वह सामान्य जनमानस का ही है जो जानता है कि विदेशी धरती, मैदान तथा नियम भारतीय खिलाड़ियों के लिये हमेशा अनुकूल नहीं होते। एक खेलप्रेमी होने पर भी हमें भारत की हार से निराशा नहीं होती क्योंकि पता है ऑलंपिक का आयोजन ही  पश्चिमी व विकसित देशों को आत्ममुग्धता की स्थिति प्रदान करने के लिये किया जाता है। ऐसे में भारतीय खिलाड़ी संघर्ष करते हुए वहां पहुंचते हैं-यही पर्याप्त है।
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