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Wednesday, September 7, 2016

काल्पनिक विलास रोग के फैलता वायरस कौन ढूंढेगा-हिन्दी व्यंग्य लेख (Dream Troble viras denger for Society-Hindi Article)

        उस दिन एक चैनल पर एक मनोरोग की चर्चा आ रही थी जिसमें बताया गया कि आदमी अपने चक्षुओं से कोई बेहतर वस्तु, विषय या व्यक्ति देखता है तो उसके साथ दिमाग में स्वयं को श्रेष्ठ रूप से जुड़ा अनुभव करता है। हम अपनी भाषा में कहें तो वह ‘काल्पनिक विलास’ पालता है। चर्चा में बताया गया कि जब कोई आदमी किसी बड़े क्रिकेट खिलाड़ी को देखता है तो उसे लगता है कि वह स्वयं भी बड़ा क्रिकेट खिलाड़ी है। अगर किसी ने अच्छा काम किया है तो वह कल्पना करता है कि वह भी ऐसा ही कर रहा है। हमारे देश में ’कल्पना’ रोगियों की संख्या कितनी है मालुम नहीं पर रुपहले पर्दे पर नायक नायिकाओं के अभिनय को देखकर लोग वैसा दिखने तथा करने का अभिनय स्वयं को ही करके दिखाना चाहते हैं।  सेल्फी और मोटर साइकिल पर सवारी के दौरान मोबाइल पर बातें करते लोग ऐसी ही ‘कल्पना रोग’ के शिकार दिखते हैं।  रास्ते में अनेक लोग मोटर साइकिल चलाते हुए कान से मोबाइल पर बात करते हुए इस तरह चलते हैं जैसे कि सामने कोई कैमरा उनके अभिनय को रिकार्ड कर रहा है जिसे बाद में कहीं दिखाया जायेगा।  सेल्फी  तथा वाहन चलाते हुए मोबाइल पर बात करते हुए अनेक दुर्घटनायें हो रही हैं उससे तो लगता है कि हमारे देश में कल्पना रोग भी फैल गया है। एक बात समझ में नहीं आती कि किसी उद्यान, मूर्ति या तालाब के पास सेल्फी लेकर हम किसे दिखाना चाहते हैं और क्यों?
         एक सवाल हम अपने आप से पूछें कि क्या हमें पता है कि किसी को सेल्फी दिखाने पर वह हृदय से प्रभावित होता है या केवल शाब्दिक प्रशंसा कर रहा जाता है?
    इसका जवाब हम स्वयं ही ढूंढें कि हमें कोई सेल्फी दिखाता है तो हमारी बाह्य प्रतिक्रिया तथा आंतरिक प्रतिकिया में अंतर होता है या नहीं।
   कम से कम इस लेखक का अनुभव तो यही रहा है कि किसी भी आदमी का व्यवहार, विचार और व्यक्तित्व अगर भौतिक रूप से सुखदायक हो तो वह हर जगह प्रभाव डालता है। जीवन में अनेक ऐसे लोग मिले जिन्होंने अपने साथ हुई मुलाकातों में प्रभावित किया तो ऐसे भी मिले जो अपने सामानों का प्रदर्शन करते रहे और हम उदासीन भाव से देखते सुनते रहे। यह अलग बात है कि बाहर जाहिर होने नहीं दिया।  हमारा मानना है कि अपने सामान से प्रभावित करने वाले लोगों में अपने ही व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर संदेह होता है जिसे वह प्रदर्शन कर छिपाना चाहते हैं।  शाब्दिक ज्ञान के अभाव में लोग अर्थ में ही अनर्थ करते हैं-यानि अपने धन से ही अपने को बुद्धिमान, प्रतिभावान तथा मिलनसार साबित करने का प्रयास करते हैं। वैसे ही हमारे यहां धनियों मेें ढेर सारी कमियों के बाद भी उन्हें खानदानी, सभ्य और बुद्धिमान हमारा संपूर्ण समाज मानता है। बहरहाल कल्पना रोग के फैलते वायरस पर भी कोई अनुसंधान होना चाहिये। हम ध्यान क्रिया को इसका उपाय मानते हैं पर यह सभी के लिये नहीं सुझा रहे।

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