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Thursday, November 15, 2012

मनुस्मृति से संदेश-भिक्षा लेने और देने के भी नियम होते हैं (manu smriti se sandesh-bhiksha lene aur dene ka bhee niyam hote hain)

            हमारे देश में बरसों से भिक्षा मांगने और देने की एक धार्मिक परंपरा रही है। इसमें भी भिक्षा मांगने वाले भिक्षुक और देने वाले गृहस्थ के लिये भी नियम होते इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को  है।  दरअसल भिक्षा हमारी दान परंपरा का वह हिस्सा है जिसमें सांसरिक धर्म का निर्वाह होता है।  दान के बारे में कहा जाता है कि वह हमेशा सुपात्र को दिया जाना चाहिए। गृहस्थ का कुपात्र को दिया गया दान   निष्फल हो जाता है और दुष्ट को दान देने पर तो पाप भी लगता है।  उसी तरह भिक्षा लेना भी केवल उन सन्यासियों का कार्य है जो संसार में धनोपार्जन त्यागी भाव होने के कारण नहीं करते। भिक्षा लेकर अपनी देह का पालन पोषण वह धर्म पालन की दृष्टि से करते हैं न कि उनका यह एक पूर्णकालिक व्यवसाय होता है।  अपना पेट भरने के बाद वह समाज निर्माण का प्रयास करते हैं। इस सन्यासियों के मुख, वाणी और चक्षृओं में तप का तेज दिखाई देता है।  
                                    एककालं चरेद्भेक्षं न प्रसजोत विस्तरे।
                               भैक्षे प्रसक्तो हि यतिर्विषयेष्वपि सज्जति।।
          हिन्दी में भावार्थ-
एक बार भिक्षा मांगकर सन्यासी को उसी से अपना पालन करना चाहिए।  एक से अधिक बार भीख मांगने वाला सन्यासी विषयों में घिरने लगता है।
                      विघूमे सन्ममुसले ज्याङ्गारे भुक्तवञ्जने।
                    वृत्ते शराव सम्पाते भिक्षां नित्यं यतिश्चरेत्।।
            हिंदी में भावार्थ-
सन्यासी को उसी घर से  भिक्षा मांगनी चाहिए जहां चूल्हा ठंडा हो चुका हो। उस घर में कूटने और पीसने का काम पूरा होने पर खानी पीने के बर्तन धोकर रख दिये गये हों।
                 यह अलग बात है कि इस भिक्षा का स्वरूप अब बदलकर भीख के रूप में दिखता है। अब भिखारी मंदिरों के द्वारों पर खड़े होकर जिस  तरह भीख मांगते हैं उसे देखकर नहीं लगता कि वह कोई त्यागी हैं।  उनके चेहरे पर अकर्मण्यता, लालच और लोभ के भाव आसानी से देखे जा सकते हैं।  अनेक खास अवसरों पर ऐसे भिखारी सारा दिन भीख मांगते हैं। अनेक श्रद्धालु उनको खाना खिलाते हैं पर उसके बाद वह फिर वहीं भीख मांगने लगते हैं। कुछ धर्मभीरु भीख में धन या भोजन प्रदान कर  यह सोचते हैं कि उन्होंने महान दान किया है। अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में उनका यह प्रयास वृथा होता है।  अनेक सामाजिक विशेषज्ञ तो इस प्रकार की भीख को पापपूर्ण मानते हैं क्योंकि इस कार्य में त्यागी लोग नहीं बल्कि आलसी और लालची लोग लगे हैं।  अनेक जगह छोटे छोटे बच्चे भीख मांगते हैं। सामाजिक विशेषज्ञ मानते हैं कि उन बच्चों को भीख देकर उनको भविष्य में अकर्मण्यता के साथ जीवन बिताने के लिये प्रेरित किया जाता है। देखा यह गया है कि अनेक लोगों को भीख मांगने की आदत बचपन से ही लग जाती है और वृद्धावस्था तब वह उससे छूट नहीं पाते।  इसलिये भीख की इस नयी परंपरा से समाज में जो विकृत्तियां आई हैं उसे रोकने के लिये हमें अपने ग्रंथों में वर्णित भिक्षा परंपरा के नियमों की जानकारी रखनी चाहिए।



संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Saturday, November 10, 2012

विदुर नीति-भोजन वह करो जो पच सके (vidur neeti-bhojan vah karen jo pach sake)

                 धन, पद और शक्ति की संचय में लगे पूरे विश्व समाज का ध्यान अपने शरीर पर कम मन पर अधिक रहता है।  लोग बाहरी आंखों से संसार की रंगीनियों  को देखने में इतना ध्यान लगाते हैं कि उनको इस बात का आभास ही नहीं होता कि उनकी देह समय से पूर्व ही विकारो के जाल में फसती जा रही है।  अब तो स्थिति यह है कि दिमागी तनाव से पैदा होने वाले रोग छोटे बच्चों और युवकों में भी दिखाई देने लगे  है। विश्व के मनोवैज्ञानिक समाज में मनोविकारों की बढ़ती संख्या से चिंतित हैं।  पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञ इसके लिये भोजन, रहन सहन और अप्राकृतिक कार्यशैली को बताते हैं। हालत यह है कि अनेक मनोवैज्ञानिक यह बात  कहते हुए नहीं चूकते कि अब यह बात लगाना भी कठिन है कि हम से बात कर रहा व्यक्ति मनोरोगी है या हम स्वयं ही हैं।  उनकी बात ठीक है पर भोजन, रहन सहन और कार्यशैली के सुविधाभोगी होने से उपजे मनोरोगों का परिणाम क्या हो रहा है, इस पर अभी तक कोई चिंत्तन सामने नहीं आ रहा है।

विदुरनीति में कहा गया है कि
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भक्ष्योत्तमप्रतिाच्छन्नं मत्स्यो वडिशमायसम्।
लोभाभिपाती ग्रसते नानुबन्धनवेक्षते।।
      हिन्दी में भावार्थ-मछली हमेशा ही भोजन की लालच में कांटा पकड़कर उसमें बिना किसी विचार के फस जाती है।’’
यच्छक्यं ग्रसितु ग्रस्यं परिणमेच्च यत्
हितं च परिणामे यत् तदाद्यं भूतिमिच्छता।।
      हिन्दी में भावार्थ- अपनी उन्नति की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को सदैव ऐसा भोजन करना चाहिए जो पच सके।
    पूरे विश्व के प्रचार माध्यम पूंजीपतियों के हाथ में है और वह केवल आर्थिक विकास की बात करते हुए समाज को भ्रमित कर रहे हैं।  वास्तविकता यह है कि विकास केवल भौतिक ही नहीं वरन् आध्यात्मिक भी होता है पर इसके प्रति कोई जागरुक नहीं है। वास्तविकता यह  है कि जब मनुष्य को भौतिकता का चरम मिलता है तब उसके अंदर एक खालीपन दिखाई देता है।  यह खालीपन उसके आध्यात्मिक विषयों के अभाव की तरफ संकेत करता है। कहा जाता है कि इस ंसार में न गरीब सुखी है न अमीर! तब प्रश्न उठता है कि लोग अमीर होकर कौनसा सुख पाते है? सीधी बात यह है कि सुख कहीं मिलता नहीं बल्कि उसे अंदर अनुभव किया जाता है। इस अनुभूति के लिये यह आवश्यक है कि अध्यात्मिक ज्ञान होना चाहिए वरना तो जिस तरह मछली फसती है आदमी भी फस ही रहा है।  स्थति यह है कि फास्ट फूड के नाम पर ऐसा भोजन करने की आदत लोगों में बढ़ी गयी है जो कि जिससे देह में ऊर्जा का निर्माण नहीं होता। बाज़ार में बनने वाले खाद्य पदार्थों में शुद्धता का अभाव होता है पर वहां खाने वालों की भीड़ इस बात का प्रमाण है कि लोग अपने स्वास्थ्य को बेजुबान मछलियों की तरह  दाव पर लगा रहे हैं।

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Sunday, November 4, 2012

पतंजलि योग विज्ञान-वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता से युक्त सम्प्रज्ञात योग (patanjaili yoga vigyan or sicence)

       भारतीय योग साहित्य की चर्चा चारों तरफ है पर मुख्य रूप से आसन तथा प्राणायाम जैसे दो भागों पर ही विद्वान लोग अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।  कुछ लोगों ने समय समय पर  यम, नियम और ध्यान पर भी अपनी राय रखी है पर पतंजलि योग साहित्य के बारे सही ज्ञान बहुत कम लोगों को हैं।  यह सत्य है कि योग से मन को बुद्धि से और बुद्धि को आत्मा से जोड़ कर परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव अपने अंदर करना सहज हो जाता है पर ऐसा करने के लिये पतंजलि योग के सूत्रों का ज्ञान होना आवश्यक है।  इसमें योग के अनेक रूपों का वर्णन है। जब मनुष्य योग के बाह्य रूप से अवगत होकर अपनी साधना करता है तब उसके अंदर अनेक प्रकार की आंतरिक सिद्धियां स्वतः आती है जो कि योग साधना का चरम स्तर होता है।          
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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  वितर्कविचारान्नदास्मितानुगमात्सप्रज्ञातः।।
हिन्दी में भावार्थ-वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता के संबंध से युक्त सम्प्रज्ञातयोग है।
तत्परं पुरुषख्यांतेर्गुणवैतृष्ण्यम्।।
हिन्दी में भावार्थ-पुरुष के ज्ञान से प्रकृति के गुणों में तृष्णा का सर्वथा अभाव हो जाता है। यह परम वैराग्य है।
    मुख्य बात यह है कि ज्ञान साधक जब इस संसार की त्रिगुणमयी माया से अवगत हो जाता है तब वह बाहरी विषयों में निर्लिप्त और निष्काम भाव से कर्म करता है। अपनी दैहिक क्रियाओं से होने वाली उपलब्धियों को फल नहीं बल्कि कर्म का ही विस्तार मानता है।  उसे यह आभास हो जाता है कि शारीरिक और बौद्धिक श्रम से उसे मिला धन अंततः उसके पास न रहकर दूसरी जगह व्यय होना है।  उसने जो मकान बनाये या वाहन खरीद एक दिन वह उसका साथ छोड़ देंगे।  इतना ही नहीं जिस देह को धारण किये है एक दिन उससे भी वह छोड़ जायेगा।  तब उसमें वैराग्य भाव पैदा होता है जो उसमें जीवन के प्रति आत्मविश्वास पैदा करने के साथ ही परमात्मा की पहचान भी कराता है।  तब आदमी सांसरिक विषयों से दैहिक रूप से प्रथक तो नहीं होता पर आत्मिक रूप से उसका लक्ष्य नहीं रह जाता। वह एक दृष्टा की तरह अपने जीवन को देखता हुआ हर क्षण का आनंद लेता है।  वह ध्यान, धारणा तथा समाधि जैसी विद्याओं में पारंगत होकर कर्मयोगी बन जाता है। यही भारतीय योग साधना का चरम स्तर है।
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Wednesday, October 24, 2012

राज्य के मंत्रियों को योग्य होना चाहिए-कौटिल्य का अर्थशास्त्र

           मूलतः हर मनुष्य में दूसरे पर शासन करने की प्रवृत्ति होती है जो अंततः अहंकार की अग्नि से पैदा होती है। यह बुरा भी नहीं है पर जिस मनुष्य में अपने शासित लोगों का हित करने की बजाय उनका दोहन करने का लक्ष्य होता है  वह उसको भ्रष्ट, निकृष्ट और दुष्ट बना देता है। आधुनिक लोकतंत्र ने पूरे विश्व में राजनीति शास्त्र की बजाय केवल नारे देने वालों को राज्य पद पर प्रतिष्ठित करना प्रारंभ किया है।  इतना ही नहीं राजनीति की बजाय अन्यत्र विषयों में पारंगत और प्रतिष्ठित लोगों के लिये राजकाज में आने की प्रवृत्ति बढ़ी है।  कहने का अभिप्राय यह है कि राजनीति से अनभिज्ञ लोग राजधर्म से भी अनभिज्ञ होते हैं और जब वह राजकाज करते हैं तो वह उसमें वह सफल नहीं हो पाते।  इसके परिणाम प्रजा को भोगने पड़ते हैं।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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शास्त्रचक्षुनृपस्तस्मान्महामात्यमते स्थितः।
धर्मार्थप्रतिपातीनि व्यसननि परित्येत्।।

                ‘हिन्दी में भावार्थ-किसी भी राज्य प्रमुख के पास शास्त्रों का ज्ञान होना आवश्यक है।  उसे हमेशा ही योग्य मंत्रियों के साथ दिखना चाहिए।  धर्म और अर्थ के लिये घातक व्यसनों को वह त्याग दे।
      राज्य करना भी एक तरह से कला है।  जिस तरह समाज में कला का व्यवसायीकरण हुआ है वैसे ही राजनीति भी पेशा बन गयी है।  अनेक लोग तो अपने राजनीति से इतर व्यवसायों, संगठनों तथा सामाजिक हितों की रक्षा के लिये पदारूढ़ होने की  कामना करते हैं।  वह सफल भी होते हैं। उनका लक्ष्य केवल पद पर बैठकर अपने तथा परिवार की रक्षा करना होता है इसलिये प्रजाहित की न तो उनमें दिलचस्पी रहती है न ही कोई वह योजना बनाते हैं।  इसी कारण पूरे विश्व में भ्रष्टाचार और अराजकता का वातावरण बन गया है।  अलबत्ता पद बचाये रखने के लिये ऐसे लोग  नारे अवश्य दिया करते हैं।  यही कारण है कि इस समय विश्व के अनेक देशों में असंतोष का वातावरण बन गया है।  अनेक जगह खूनी संघर्ष चल रहे हैं।  अनेक राज्य प्रमुख अपने ही देश के विद्रोहियों से जान बचाते फिर रहे हैं। यह राज्य प्रमुख केवल बंदूक के सहारे पदों पर आ गये पर जनहित करने की समझ उनमें कभी नहीं दिखी। हमारे देश को अंग्रेजों से राजनीतिक स्वतंत्रता मिले साठ साल से अधिक समय हो गया है पर आज भी अनेक विद्वान मानते हैं कि अधूरी आजादी ही मिली है।  इसलिये राजनीति में सक्रिय होने वाले लोगों को पहले राजनीति शास्त्र का अध्ययन करना चाहिए।
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Saturday, October 6, 2012

सामवेद से संदेश-आलसी मनुष्य को देवता पसंद नहीं करते (asli manushya ko devata pasand nahin larte)

         ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना की तो देवता तथा मनुष्यों की उत्पति हुई।  उन्होंने कहा कि मनुष्य देवताओं की आराधना करें तो देवता मनुष्य को उसका  फल देंगे। अध्यात्म और सांसरिक विषयों के बीच जीव की देह पुल का काम करती है। सांसरिक विषयों में सहजता से संबंध रखना आवश्यक है। इसलिये आवश्यक है कि उन विषयों से संबंधित कार्य करते हुए हृदय में शुद्धि हो। सांसरिक विषयों में फल की कामना का त्याग नहीं किया जा सकता  पर उसके लिये ऐसे गलत मार्ग का अनुसरण भी नहीं किया जाना चाहिए जिससे बाद में संकट का सामना करना पड़े।  दूसरी बात यह भी है कि अपने कर्म के परिणाम की आशा दूसरे का दायित्व नहीं मानते हुए आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करना चाहिए।। 
सामवेद में कहा गया है कि
..................................
देवाः स्वप्नाय न स्पृहन्ति।
 
हिन्दी में भावार्थ-देवता आलसी मनुष्य को प्रेम नहीं करते।
देवाः सुन्वन्तम् इच्छान्ति। 
हिन्दी में भावार्थ-देवता कर्मशील मनुष्य को प्रेम नहीं करते हैं।
           जीवन को सुचारु रूप से चलाने क्रे लिये कर्मशील होना आवश्यक है। आलस्य मनुष्य का शत्रु माना जाता है। देह से परिश्रम न करना ही आलस्य है यह सोचना गलत है वरन् मस्तिष्क को सोचने के ले कष्ट देने से बचना भी इसी श्रेणी में आता है। आधुनिक सुविधाभोगी जीवन ने आदमी की देह के साथ ही उसके मस्तिष्क की सक्रियता पर भी बुरा प्रभाव डाला है। लोग प्रमाद तथा व्यसन में अधिक रुचि इसलिये लेते हैं कि उनके मस्तिष्क को राहत मिले। यही राहत आलस्य का रूप है।  इससे बचना चाहिए। अध्यात्म ज्ञान प्राप्त करने यह आलस्य स्वमेव दूर होता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, September 16, 2012

यजुर्वेद से सन्देश-प्रेम से रहना सीखें (yajurvd se sandesh -prem se rahana seekhe)

                     आजकल पूरे विश्व में ऋण लेकर अपने लिये सुख साधन जुटाने की प्रवृत्ति बढ़ी गयी है।  दूसरे के घर की रोशनी देखकर आदमी अपने घर में कर्ज लाकर आग लगाने को तैयार दिखता है।  सुख किश्तों पर मिलता है पर दुःख कभी एकमुश्त चला आता है।  कर्ज लेकर सामान लेने वाले जब ब्याज और मूलधन नहीं चुका पाते तब उनके पास सिवाय भारीसंताप में फंसे रहने  अलावा  कोई चारा नहीं रहता।  विलाप करते रहने के सिवाय उनके पास अन्य  मार्ग नहीं रहता।  आदमी अब दूसरों पर अपनी निर्भरता इस कदर बढ़ा चुका है कि सड़क पर सिर उठाकर चलने की उसकी मनःस्थिति नहीं रही।  आवश्यकताओं ने आदमी को मजबूर बना दिया है और वह कभी किसी सामाजिक संघर्ष में जमकर लड़ नहीं सकता।
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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दृते छोड़ मां ज्योवते सांदृशि जीव्यासं ज्योवते सदृशि जीष्यासम्।।
                    हिन्दी में प्रार्थना का भावार्थ-‘‘हे समर्थ! मुझे शक्तिशाली बनाओ ताकि सब मुझे मैत्री भाव प्रदान करें।  हम सभी एक दूसरे को प्रेममयी दृष्टि से देखें।
मयि त्यांदिन्द्रियं बृहन्मयि दक्षो मयि क्रतुः।।
                   हिन्दी में इस प्रार्थना का अर्थ--‘‘मुझे महान शक्ति प्रदान करो। दक्षता प्रदान करो ताकि अपने कर्तव्य का निर्वाह कर सकूं।’’ 
                      इतना ही नहीं ईश्वर से प्रार्थना करते समय हर आदमी केवल अपने लिये लोकोपयोगी  सामान की याचना करता है।  कोई भी आदमी अपने लिये बल और बुद्धि नहीं मांगता जिससे इस संसार की समस्याओं से निपटा जा सकता है।  कहा जाता है कि जैसा आदमी  के हृदय में संकल्प रहता है वैसा ही उसके लिये यह संसार हो जाता है। आजकल लोग भोग प्रवृत्तियों को तो धारण कर लेते हैं पर योग संस्कार के अभाव में उनकी तृप्ति दूसरे की सहायता से कर्ज, दान या उधार लेकर ही होती है।  यह सब ग्रहण करना अशक्त आदमी का प्रमाण है इसलिये जहां तक हो सके ईश्वर से अपने लिये बल और बुद्धि की याचना करना चाहिए। किसी दूसरे के आगे हाथ फैलाने से अच्छा है उसके आगे हाथ फैलाया जाये जो सभी का दाता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Sunday, September 9, 2012

विदुर नीति और दर्शन-जैसा कोई व्यवहार कर उसे वैसा ही उत्तर दें (vidur neeti-jase ko taisa jawab den)

    मनुष्य जीवन में समय का बहुत महत्व है।  समय का विभाजन समझने वाले अपने कर्म का सहजता से संपन्न कर सकते हैं।  प्रातःकाल का समय धर्म, दोपहर का अर्थ, सांयकाल का ध्यान चिंतन  तथा रात्रि को मो़क्ष यानि निद्रा के लिये हैं।  जब हम अर्थ के लिये कार्य करते हैं तब उस समय हमारे अंदर राजस कर्म के भाव होता है तब  उसके नियमों का पालन करना आवश्यक है।   राजस कर्म में जीवन यापन  के लिये धन कमाना होता है। उस समय हमारे अंदर अपनी देह के लिये भौतिक साधन जुटाना ही लक्ष्य होता है। ऐसे में हमारा वास्ता ऐसे लोगों से पड़ता है जो राजस बुद्धि से काम करते हैं जिनका लक्ष्य भी वही होता है।  उनसे सात्विकता की आशा व्यर्थ हैं।  उस समय जो कपट करे उसका प्रतिवाद करना चाहिये। जो ईमानदारी से पेश आये तो उसकी प्रशंसा करना चाहिए।
यस्मिन यथ वर्तते यो मनुष्यस्तस्मिस्तथा वर्तित्व्यं स धर्मेः।
मायाचारी मायया वर्तितव्यः साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः।।
           हिन्दी में भावार्थ-जैसा व्यवहार दूसरा मनुष्य करे वैसा ही हमें भी करना चाहिए यही धर्म है। अगर कोई कपट से पेश आये तो उसका प्रत्युत्तर भी उसी तरह देना चाहिए। जिसका व्यवहार अच्छा हो उसे सम्मान देना चाहिए।
न निह्नवं मन्त्रतस्य गच्छेतफ संसृष्टमन्त्रस्य कुसङ्गतस्य।
न च ब्रुयान्नश्वसिमि त्वयीति सकारणं व्यपदेशं तु कुर्यात्।।
        हिन्दी में भावार्थ-जब कोई राजा दुष्ट सहायकों के साथ मंत्रणा कर रहा हो तब उस समय उसकी बात का प्रतिवाद न करे। उसके सामने अपना अविश्वास भी न जताये तथा कोई बहाना बनाकर वहां से निकल आयें।
           समाज में राज्य, अर्थ तथा धर्म के शिखर पुरुषों पर बैठे लोगों के साथ व्यवहार करते समय अपनी तथा उनकी स्थिति पर विचार करना चाहिए।  आजकल हर क्षेत्र में तामसी प्रवृत्ति के लोग सक्रिय हैं।  प्रकृति का नियम है कि सज्जन लोगों का संगठन सहजता से नहीं बनता क्योंकि उसकी उनको आवश्यकता भी नहीं होती। इसके विपरीत दुष्ट तथा स्वार्थी तत्वों का संगठन आसानी से बन जाता है।  ऐसे में अपने सार्वजनिक जीवन में इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमारे व्यवहार में आने वाले लोगों का कर्म किस प्रकृत्ति के हैं।  जहां दुष्ट लोगों का समूह हो वहां अपनी बुद्धिमानी, चातुर्य तथा ज्ञान बघारना ठीक नहीं है।  चुपचाप वहां से निकल जायें।  ऐसे लोगों केवल अपना काम निकालने के लिये तत्पर होते हैं।  उनसे सात्विकता और सहृदय की आशा करना स्वयं को धोखा देने के अलावा कुछ नहीं है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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