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Thursday, April 10, 2014

भर्तृहरि नीति शतक-सज्जन लोगों से मित्रता धीरे धीरे बढती है(bhartrihari neeti shatak-sajjan logon se mitrata dheere dheere badhti hai)



      मारे अध्यात्म दर्शन के अनुसार मित्रता में पैमाने बहुत ऊंचे हैं| एक सहृदय मित्र मिल जाए तो वह अनेक  संक्रमण काल में बंधुबांधवों से अधिक सहायक सिद्ध होता है|  यह अलग बात है कि आजकल लोग सहकर्मी, सहपाठी, सहजातीय, सहधर्मी तथा सहविचारक को अपना स्वाभाविक मित्र मान लेते हैं| किसी को मित्र मान लेना या प्रचारित करना बुरा नहीं है, मुश्किल तब आती है जब अपने दिमाग में स्थापति कर उस पर यकीन किया जाता है| दरअसल मनुष्य को अपनी  दिनचर्या के दौरान दूसरे लोगों से संपर्क बनाना ही पड़ता है| इनमें से कुछ लोगों से नियमित भेंट  होती है जिससे पूर्ण परिचय होने के साथ ही उनके प्रति प्रगाढ़ता का भाव आता है, पर यह एक ऐसी  स्वाभाविक स्थिति है जिसमें मित्रता की  पहचान नहीं हो पाती| मित्रता की पहचान तो उस समय होती है जब मनुष्य परेशानीं में होने के कारण असहज होता है, और सच्चा मित्र उस समय मनोबल बढ़ाने का काम करता है|
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।
            हिंदी में भावार्थ-जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्द्ध  में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।
दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर।।
     हिंदी में भावार्थ-कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान हो  तो भी उसका साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।
            यह बात हमेशा ध्यान रखें कि सज्जन व्यक्तियों से मित्रता धीरे-धीरे बढ़ती है और स्थाई रहती है। सज्जन लोग अपना स्वार्थ न होने के कारण बहुत शीघ्र किसी  से मित्रता नहीं करते पर जब वह धीरे-धीरे आपका स्वभाव समझने लगते हैं तो फिर स्थाई मित्र हो जाते हैं-उनकी मित्रता ऐसे ही बढ़ती है जैसे पूर्वाद्ध में सूर्य की छाया बढ़ती जाती है। इसके विपरीत दुर्जन लोग अपना स्वार्थ निकालने के लिए बहुत जल्दी मित्रता करते हैं और उसके होते ही उनकी मित्रता वैसे ही कम होने लगती है जैसे उत्तरार्द्ध  में सूर्य का प्रभाव कम होने लगता है।
       पड़ौस तथा कार्यस्थलों में हमारा संपर्क अनेक ऐसे लोगों से होता है जिनके प्रति हमारे हृदय में क्षणिक आत्मीय भाव पैदा हो जाता है। वह भी हमसे बहुत स्नेह करते हैं पर यह यह संपर्क नियमित संपर्क के कारण मौजूद हैं।  उन कारणों के परे होते ही-जैसे पड़ौस छोड़ गये या कार्य का स्थान बदल दिया तो-उनसे मानसिक रूप से दूरी पैदा हो जाती है।  इस तरह यह बदलने वाली मित्रता वास्तव में सत्य नहीं होती। मित्र तो वह है जो दैहिक रूप से दूर होते भी हमें स्मरण करता है और हम भी उसे नहीं भूलते। इतना ही नहीं समय पड़ने पर उनसे सहारे का आसरा मिलने की संभावना रहती है।  अतः स्थितियों का आंकलन कर ही किसी को मित्र मानकर उससे आशा करना चाहिये।जहां तक हो सके दुष्ट और स्वार्थी लोगों से मित्रता नहीं करना चाहिये जो कि कालांतर में घातक होती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, April 6, 2014

इस संसार में सच्चा समाज सेवक अधिक नहीं होते-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख (is sansar mein sachcha samaj sewak adhik nahin hote-bhartrihari neeti shatak ka adhar par chinntan lekh)



            आधुनिक प्रचार माध्यमों के आत्म विज्ञापन की सुविधा प्रदान की है जिसका वह लोग लाभ उठाते हैं जिनके पास बृहद आर्थिक संगठन हैं।  स्थिति यह है कि  आर्थिक शिखर पुरुष  छोड़ भलाई सारे काम करते हैं पर अपने प्रचार प्रबंधकों के माध्यम से अपनी छवि देवत्व की बना लेने में सफल हो जाते हैं।  इतना ही नहीं  अपने श्रमिकों, कर्मचारियों और पूरे समाज को शोषण करने के बावजूद ऐसे धनपति प्रचार माध्यमों से अपनी छवि इस तरह बनाते हैं जैसे कि वह अत्यंत विनम्र और दयालु हों।  इसके अलावा भी कला, साहित्य, पत्रकारिता, फिल्म तथा समाज के क्षेत्र में भी कथित रूप से नायकत्व वाली छवि धारण किये अनेक लोग आत्म विज्ञापन के जरिये ही अपना कार्य व्यापार चला रहे हैं। कुछ लोग तो ऐसे हैं जो स्वयं कभी परमार्थ नहीं कर पाते मगर सार्वजनिक जीवन में सक्रिय अन्य लोगों की निंदा कर यह प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं कि वह स्वयं ही श्रेष्ठ है। इतना ही धार्मिक क्षेत्र में भी अब विज्ञापन के जरिये कथित सिद्ध सामग्री बेचने के ऐसे प्रयास हो रहे हैं जिसे देखकर अध्यात्मिक ज्ञानियों की आंखें फटी रह जाती है।
भर्तृहरि नीति शातक में कहा गया है कि

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मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णास्त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः|
परगुणपनमाणून्पर्वतीकृत्य नित्यं
निजहृवि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः||

     हिंदी में भावार्थ- जिनकी देह मन और वचन की शुद्धता और पुण्य के अमृत से परिपूर्ण है और वह परोपकार से सभी का हृदय जीत लेते हैं। वह तो दूसरों को गुणों को बड़ा मानते हुए प्रसन्न होते हैं पर ऐसे सज्जन इस संसार में कितने हैं?

     वैसी देखा जाए तो दूसरों के दोष गिनाते हुए अपने गुणों का बखान तथा दिखाने के लिये समाज के कल्याण में जुटे कथित लोगों की कमी नहीं है। आत्म विज्ञापन से प्रचार माध्यम भरे पड़े हैं। अपने अंदर गुणों का विकास कर सच्चे हृदय से समाज सेवा करने वालों का तो कहीं अस्तित्व हीं दिखाई नहीं देता। अपनी लकीर को दूसरे की लकीर से बड़ा करने वाले बुद्धिमान अब कहां हैं। यहां तो सभी जगह अपनी थूक से दूसरे की लकीर मिटाने वाले हो गये हैं। ऐसे लोगों की सोच यह नहीं है कि वह समाज कल्याण के लिये कार्य कैसे करें बल्कि यह है कि वह किस तरह समाज में दयालू और उदार व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध हों। प्रचार करने में जुटे लोग, गरीबों और मजबूरों के लिये तमाम तरह के आयोजन करते हैं पर वह उनका दिखावा होता है। मैंने यह अच्छा काम कियाया मैंने उसको दान दियाजैसे वाक्य लोग स्वयं ही बताते हैं क्योंकि उनके इस अच्छे काम को किसी ने देखा ही नहीं होता। देखेगा भी कौन, उन्होंने किया ही कहां होता है?
      इस संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो परोपकार और दया काम चुपचाप करते हैं पर किसी से कहते नहीं। हालांकि उनकी संख्या बहुत नगण्य है पर सच तो यह है कि संसार के सभी सभ्य समाज उनके त्याग और बलिदान के पुण्य से चल रहे हैं नकली दयालू लोग तो केवल अपना प्रचार करते हैं। आत्म प्रचार में लगे लोगों को अपने छवि बनाने के प्रयासों से ही समय नहीं मिलता तब वह समाज से कैसे कर सकते हैं?
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, April 3, 2014

परमात्मा के नाम स्मरण के अलावा अन्य प्रयास व्यापारिक प्रवृत्ति का परिचायक-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(parmatma ke nam smaran ka alawa anya prayas vyaparik priviti ka parichayak-a hindu religion thought based on bharitrihari niti shatak)



      हमारे देश में धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के भ्रम इस तरह प्रचलित हो गये हैं कि लोग यह समझ नहीं पाते कि आखिर परमात्मा की भक्ति का कौनसा तरीका प्रभावकारी है? यह भ्रम भारत में सदियों से सक्रिय उन पेशेवर शिखर पुरुषों के कारण है जो लोगों की इंद्रियों को बाहर सक्रिय कर उनसे आर्थिक लाभ पाने के लिये यत्नशील होते हैं। समाज में अंतर्मुखी होकर परमात्मा की भक्ति करने के लिये वह उपदेश जरूर देते हैं पर उसकी जो विधि बताते हैं वह बर्हिमुखी भक्ति की  ही प्रेरक होती है।  भारत में गुरु शिष्य तथा सत्संग की परंपरा का इन पेशेवर धार्मिक ठेकेदारों ने जमकर उठाया है।  गुरु बनकर वह जीवन भर के लिये शिष्य को अपने साथ बांध लेते हैं।  शायद ही कोई शिष्य हो जो ज्ञान प्राप्त कर इन गुरुओं के सानिध्य से मुक्त हो पाता हो।  इतना ही नहीं ऐसे धार्मिक ठेकेदार अपने धर्म की दुकान भी किसी शिष्य की बजाय अपने ही घर के किसी सदस्य को सौंपते हैं।  कहने का  अभिप्राय यह है कि अपने पूरे जीवन में धार्मिक व्यवसाय के दौरान एक भी ऐसा शिष्य तैयार नहीं कर पाते जो उनके बाद कोई संभाल सके। सत्संग के नाम पर यह अपने सामने श्रोताओं की भीड़ एकतित्र कर रटा हुआ ज्ञान देते हैं और कभी प्रमाद वाली बातें भी कर माहौल को हल्का करने का दावा भी करते हैं।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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किं वेदै स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रैर्महाविस्तरैः स्वर्गग्रामकुटीनिवाफलदैः कर्मक्रयाविभमैः।
मुक्तवैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानलं स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलन। शेषाः वणिग्वृत्तयः।।
     हिन्दी में भावार्थ-वेद, स्मृतियां और पुराणों के पठन,  शास्त्रों के सूत्रों के विस्तार तथा किसी स्वर्गरूप कुटिया में रहकर स्वर्ग पाने के लिये तप करने से कोई लाभ नहीं होता। संसार में कष्ट से रहित मुक्तभाव सेे विचरण करने के लिये परमात्मा के नाम का स्मरण करने के अलावा अन्य कर्मकांड व्यापारिक प्रवृत्ति का ही प्रतीक हैं।
      वेद, पुराण, शास्त्र तथा अन्य प्राचीन धार्मिक ग्रंथों  के सू़त्र रटकर सुनाने वाले हमारे समाज में बहुत लोग हैं। हमारे देश में कथित रूप से अनेक धर्मों का अस्तित्व स्वीकार किया जाता है जबकि सच यह है कि शुद्ध आचरण ही मनुष्य के धमभीरु होने का परिचायक है।  हमारे देश में विभिन्न धार्मिक पहचान वाले समूह हैं जिनके तयशुदा रंग के वस्त्र पहनकर कथित ठेकेदार  ऐसा पाखंड करते हैं कि वह देश में अपने धार्मिक समूह के खैरख्वाह है।  ऐसे लोग धार्मिक ही  नहीं आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा प्रचार के क्षेत्र में अपने संपर्क बनाते हैं। अवसर आने पर इस तरह बयान देते हैं कि गोया कि उनके वाक्य सर्वशक्तिमान के श्रीमुख से प्रकट हुए हैं।
      हमारे देश के लोगों में अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति झुकाव सदैव रहा है इसलिये समाज का एक बड़ा वर्ग इन धार्मिक गुरुओं के चक्कर में नहीं पड़ता पर जिस तरह यह लोग प्रचार करते हैं उससे तो बाहरी देशों में यह धारण बनती है कि भारत के नागरिक अधंविश्वासी हैं।  हम जैसे योग तथा ज्ञान साधकों की दृष्टि से स्थिति ठीक विपरीत है पर चूंकि गुणीजन स्वतः प्रचार नहीं करते जबकि यह पेशेवर धार्मिक ठेकेदार अपने विज्ञापन के लिये धन भी व्यय करते हैं तो ऐसा लगता है कि उनका समाज पर उनक भारी प्रभाव है।
      योग साधना, भक्ति तथा चिंत्तन एकांत में की जाने वाली क्रियायें हैं।  एक तरह से यह ज्ञान यज्ञ होता है जबकि कर्मकांड द्रव्यमय यज्ञ हैं जिसको हमारे अध्यात्मिक दार्शनिक अधिक महत्व नहीं देते।  पेशेवर धार्मिक लोग समाज को इसी द्रव्यमय यज्ञ के लिये प्रेरित करते हैं जबकि ज्ञान यज्ञ से ही परमात्मा की अनुभूति की जा सकती है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, March 29, 2014

अध्यात्मिक पुरुष और देहधारी के भेद का ज्ञान आवश्यक-पतंजलि योग दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(adhyatmik purush aur dehdhari ke bhed ka gyan avashyak-A hindu religion thought ariticle based on patanjali yoga darshan)



      हमारी इंद्रियां स्वतः काम करती हैं जबकि हमारा भ्रम यह रहता है कि हम उन्हें चला रहे हैं।  कान, नाक, आंख, जीभ बुद्धि तथा हाथ पांव स्वचालित हैं।  हम सोते हैं तब भी वह प्रयासरत रहते हैं जबकि उस समय हम मोक्ष की स्थिति में होने के कारण उन पर अंतदृष्टि नहीं रख पाते।  ऐसे में जाग्रत अवस्था में उनकी सक्रियता देखकर यह सोचते हैं कि हम सारी क्रियायें कर रहे हैं।  इन इंद्रियों के स्वतंत्र होने का यह भी प्रमाण है कि रात्रि को ऐसे विचित्र स्वप्न आते हैं जिनके बारे में हम जाग्रत अवस्था में सोच भी नहीं पाते। जैसा कि आधुनिक विज्ञान कहता है कि सोते समय मनुष्य का वह दिमाग काम करता है जो जाग्रत अवस्था में सुप्त होता है।
      इसकी अनुभूति हम तभी कर सकते हैं जब अपने हृदय की तरफ दृष्टिपात करें।  यह क्रिया ध्यान से ही हो सकती है। जब हम शांत होकर अपना ध्यान हृदय की तरफ केंद्रित करेंगे तब हमारी सारी इंद्रिया शिथिल हो जाती है।  जब ध्यान की चरम स्थिति समाधि आती है तब हमारा संपर्क अपने आप यानि आत्मा से हो जाता है। उस समय यह पता चलता है कि बुद्धि और हृदय में भेद है। इस भेद का ज्ञान न होने पर इंद्रियां जिन भोगों के साथ संपर्क करती हैं वह हमारे प्रतीत होते हैं।  ऐसा लगता है कि हम भोग कर रहे हैं। सच यह है कि इंद्रियां सांसरिक विषयों से संपर्क स्वाभाविक रूप से करती हैं और हम उनको अपना भोग समझ बैठते हैं। देह को जीवित रखने का प्रयास इंद्रियां स्वचालित ढंग से करती हैं और हमें लगता है कि हम सारी क्रियायें कर रहे हैं। इसे तभी समझा जा सकता है जब हम हृदय के विषय में निरंतर ध्यान के माध्यम से उसकी क्रियायें देखते रहें।

पतंजलि योग दर्शन में कहा गया है कि
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हृदये चित्त संवित्।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-हृदय में संयम करने से चित्त के स्वरूप का ज्ञान हो जाता है।
सत्त्वपुरुषयोरत्न्तासंकीर्णयोः प्रत्यायाविशेषो भोगःपराथत्स्वार्थसंयमकात्पुरुषज्ञानम्।।
      सामान्य हिन्दी में भावार्थ-बुद्धि और पुरुष परस्पर भिन्न हैं। इन दोनों के भेद प्रतीत न होना ही भोग है। परार्थ प्रतीति से भिन्न जो स्वार्थ प्रतीति है उसमें संयम करने से संयम हो जाता है।

      अक्सर हमारे अंतर्मन में अच्छा भोजन करने, सुंदर दृश्य देखने, सुगंध के नासिका में आने, कानों से मधुर स्वर सुनने और हाथों से प्रिय वस्तु या व्यक्ति को छूने की इच्छा होती है। यह सब हमारे मन और बुद्धि का खेल है। जाग्रत अवस्था में इंद्रियां इन्हीं इंद्रियों के वशीभूत होकर काम करती है तो रात्रि में इनके बिना भी उनकी सक्रियता बंद नहीं होती।  हम सोते समय भी सांस ग्रहण करते हैं और मस्तिष्क सपने देखता है तो हाथ पांव भी हिलते हैं पर ज्ञान के अभाव में यह सत्य नहीं समझ पाते कि यह उनका स्वाभाविक कर्म है। उस समय हमारा हृदय शांत होता है इसलिये उसकी अनुभूति नहीं कर पाते। अगर हम योगासन, ध्यान, मंत्र जाप और अध्यात्मिक पाठ  निरंतर करते रहें तब जाग्रत अवस्था में इन इंद्रियों की सक्रियता से कभी स्वयं को जुड़ाव अनुभव नहीं होगा। पुरुष और बुद्धि का भेद जानने के बाद हम   उन पर नियंत्रण कर सकते हैं। इतना ही नहीं निरंतर योगाभ्यास करने पर  यह अनुभव भी कर सकते हैं कि हम एक नहीं दो लोग हैं।  एक अध्यात्मिक पुरुष और दूसरा देहधारी! यह विचार आने पर हमारा आत्मविश्वास बढ़ जाता है।  हम लोगों ने देखा होगा कि योगी लोग कभी अपने अकेलेपन को लेकर चिंतित नहीं होते। योगाभ्यास तथा ज्ञान साधना से उनके बाह्य ही नहीं बल्कि आंतरिक व्यक्तित्व में दृढ़ता आती है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Tuesday, March 25, 2014

समाज की स्थिरता से ही राष्ट्र की रक्षा संभव-कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर चिंत्तन(samaj ki sthirta se rashtra ki raksha sambhav-kautilya ka arthshastra ka aadhar par chinntan lekh)



      हम जब किसी राष्ट्र की स्थिरता की बात करते हैं तो यह भूल जाते हैं कि उसमें सक्रिय सामाजिक समूहों में भी स्थिरता होना चाहिये।  समाज की  परिवारों  और परिवारों  की स्थिरता व्यक्ति में अंतर्निहित होती है।  हम आज जब देश की स्थिति को देखते हैं तो राष्ट्र की स्थिरता को लेकर भारी चिंत्तायें व्याप्त हैं। इधर हमारे यहां विकास के दावे भी किये जा रहे हैं उधर राष्ट्र में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक तनावों की चर्चा भी हो रही है। यह विरोधाभास हमारी उन नीतियों का ही परिणाम है जिसमें किसी मनुष्य के लिये  अर्थार्जन ही एक श्रेष्ठ और अंतिम लक्ष्य माना जाता है।  अर्थार्जन में भी केवल पेट की रोटी तक ही सीमित लक्ष्य माना गया है।  यह आज तक समझा नहीं गया कि उदर की भूख की शांत होने के बाद भी मनुष्य ही नहीं पशु पक्षी भी  सीमित नहीं रहते। सभी जीवों मे नरमादा होते हैं और जो कहीं न कहीं अगली पीढ़ी का सृजन करते हैं।  यह कामुक प्रवृत्ति सभी में होती हैं पर मनुष्य को उसके लिये भी अर्थ का सृजन संचय के लिये  करना पड़ता है। पशु पक्षी विवाह पद्धति नहीं अपनाते जबकि मनुष्य को इसे सामाजिक बाध्यता के रूप में स्वीकार करना ही पड़ता है। मनुष्य की संचयी प्रवृत्ति का ऐसे अर्थशास्त्री कतई अध्ययन नहीं करते जिनका लालन पालन धनपति करते हैं।
      हमारे देश के कुछ विद्वान अर्थशास्त्री गरीबी रेखा की सीमा के लिये एक राशि तय करते हैं। उसमें वह मनुष्य के खाने और कपड़े का ही हिसाब रखते हैं। उनका मानना है कि एक मनुष्य को खाने और कपड़े के अलावा जिंदा रहने के लिये कुछ अन्य नहीं चाहिये।  वातानुकूलित कक्षों में उनके इस चिंत्तन को मजाक ही माना जाता है।  वह मनुष्य में व्यापत उस संचयी प्रवृत्ति का आभास होते हुए भी तार्किक नहीं मानते जिसमें वह विश्ेाष अवसरों पर व्यय करने के लिये बाध्य होता है। वह मनुष्य को केवल एक पशु की श्रेणी में रखकर अपनी राय देते हैं।  इस तरह के चिंत्तन ने ही देश की अर्थव्यवस्था को भारी निराशाजनक दौर में पहुंचा दिया है। महंगाई, बेरोजगारी तथा अपराध देश में बढ़ते जा रहे हैं।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

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जलान्नायुधयन्त्राछृर्य धीरयोधरधिष्ठितं।

निवासाय प्रशस्यन्ते भमुजां भूतिच्छितां।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जल, अन्न, शस्त्र और यन्त्रों से सम्पन्न, धीर वीर योद्धाओं के साथ ही योग्य मंत्रियों तथा आचार्यों से रक्षित दुर्ग की ही महत्ता होती है।

      एक तरह से हम देश में शुद्ध रूप से पूंजी पर आधारित अर्थव्यवस्था  का एक विकट रूप देख रहे हैं जिसमें मानवीय संवेदनाओं के साथ ही संस्कृति, संस्कार और परंपराओं के निर्वाह की बाध्यता को कोई स्थान नहीं है। सच बात तो यह है कि अमीर और गरीब के बीच स्थित एक समन्वित कड़ी मध्यम वर्ग रहा है जिसकी परवाह किसी को नहीं है।  यह लड़खड़ा रहा है और इससे जो समाज में अस्थिरता का वातावरण है वह अत्यंत चिंत्ताजनक है।  यह वर्ग अन्य दोनों वर्गों की बौद्धिक सहायता करने के साथ ही अपने श्रम के साथ ही सक्रिय भी रहता है।
      हम यहां इस वर्ग के लिये कोई याचना नहीं कर रहे बल्कि इतना कहना चाहते हैं कि देश की स्थिरता में इसी वर्ग का अन्य दोनों की अपेक्षा कहीं अधिक योगदान रहता है। अगर देश में समाज में निजी पूंजी का प्रभाव बढ़ा और मध्यम वर्ग केवल कंपनियों की नौकरी के इर्दगिर्द ही सिमटा तो कालांतर में ऐसे संकट उत्पन्न होंगे जिसकी कल्पना तक हम अभी नहीं कर सकते।  इसलिये देश के आर्थिक रणनीतिकारों को इस तरफ ध्यान जरूर देना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, March 23, 2014

रहीम संदेश-गुणीजन राजा तो राजा गुणीजनों की परवाह नहीं करता(rahim sandesh-gaunijan raja to raja gunijanon ki paravah nahin karata)



      श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार इस संसार  में तीन प्रकृत्तियों के लोग पाये जाते हैं-सात्विक, राजसी और तामसी।  इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि इन तीन प्रकार की प्रकृत्ति के लोग संसार में हमेशा मौजूद रहेंगे और कोई कितना भी ज्ञान ध्यान कर ले किसी भी एक प्रकार की  मनुष्यों की प्रकृत्ति को यहां से विलुप्त नहीं कर सकता।  तामसी प्रकृत्ति के लोग इस संसार में न स्वयं को बल्कि दूसरों को भी कष्ट देते हैं पर अगर कोई चाहे कि अपने अभियान या आंदोलन से सारे संसार के मनुष्यों को सात्विक या राजसी प्रकृत्ति का बना दे तो वह संभव नहीं है। यह अलग बात है कि कथित रूप से अनेक धर्मों के ठेकेदार अपने कथित शांति अभियानों में पूरे विश्व में स्वर्ग की स्थापना का सपना दिखाते हैं।
      इस संसार में सात्विक लोगों की अपेक्षा राजसी प्रकृत्ति के लोगों की संख्या अधिक रहती है।  इसका कारण यह है कि इस देह का भरणपोषण करने के लिये अर्थकर्म में राजसी प्रकृत्ति से ही सक्रिय रहा जा सकता है।  यहीं से सात्विक और राजसी प्रकृत्ति का अंतर्द्वंद्व प्रारंभ हो जाता है।  सात्विक प्रकृत्ति के लोग एक सीमा तक ही राजसी कर्म करने के बाद अपनी मूल सात्विक प्रकृत्ति में स्थिर हो जाते हैं जबकि राजसी प्रकृत्ति के लोग हमेशा ही उसमें लिप्त रहते हैं।  राजसी कर्म में सीमा तक सक्रिय रहने के कारण सात्विक लोग उच्च राजसी पुरुषों की परवाह नहीं करते तो राजसी पुरुष उनकी सीमित आर्थिक उपलब्धियों तथा गतिविधियों  के कारण उनका सम्मान नहीं करते।

कविवर रहीम कहते हैं कि

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भूप गनत लघु गुनिन को, गुनी गनत लघु भूप।

रहिमन गिर तें भूमि लौं, लखो तो एकै रूप।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-राजा गुणीजनों को अपने से छोटा मानता है तो गुणीजन भी राजा की परवाह नहीं करते। सच्चाई यह है धरती से पर्वत तक सभी लोग एक समान ही है।
      एक बात सत्य है कि इस विश्व में सभी लोग एक समान हैं। सभी का दाता राम है।  राजसी पुरुषों में यह खुशफहमी रहती है कि वह अपने परिवार तथा समाज का संचालन कर रहे हैं जबकि सात्विक प्रकृत्ति तो अकर्मण्यता के भाव की जनक है। इतना ही नहीं वह सात्विक लोगों को स्वार्थपरक या उदासीन कहकर निंदा भी करते हैं।  इसके विपरीत सात्विक लोग यह मानते हैं कि राजसी कर्म में अधिक लिप्पता तथा उपलब्धि अनावश्यक रूप से संकट पैदा करती है।  इस प्रकार का द्वंद्व स्वाभाविक है पर सात्विक लोग इसे एक सहज संबंध मानते हैं तो राजसी पुरुष इस द्वंद्व में उपेक्षासन के माध्यम से अपनी नाराजगी दिखाते हैं।  वह सात्विक लोगों से मुंह फेरकर यह दिखाते हैं कि समाज में उनकी श्रेष्ठ छवि है। चालाक राजसी प्रकृत्ति के मध्यम कर्म में लिप्त लोग उनकी चाटुकारिता अपना कार्य साधते हैं जिससे उच्च राजसी पुरुषों को अधिक भ्रम हो जाता है। यही भ्रम कालांतर में उनके लिये संकट का कारण बनता है। सात्विक लोग किसी भ्रम में न पड़कर सत्य तथा ज्ञान के साथ जीवन आनंद से बिताते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Friday, March 21, 2014

जीवन में सकारात्मक भाव अपनाना चाहिये-विदुर नीति के आधार पर चिंत्तन लेख(jiwan mei sakaratmak bhav apnana chahiye-vidur neeti ka aachar par chinttan lekh)



      मनुष्य के लिये यह संसार वैसा ही बन जाता है जैसा उसका संकल्प होता है। जिनके अंदर नकारात्मक प्रकृत्ति है वह हमेशा ही तनाव में रहते हैं। वह कोई भी काम प्रारंभ करते हैं तो संकटों का आना प्रारंभ हो जाता है जिससे वह उसे बंद कर देते हैं । ऐसे लोग हमेशा ही वार्तालाप में मित्रों के सामने अपने तनाव तथा बीमारियों की चर्चा कर उन्हें भी निराश करते हैं।  इसके विपरीत जिनका मस्तिष्क सदैव सकारात्मक विचारों से प्रेरित होकर काम करते हैं उनके लिये उनका यही संसार अत्यंत अद्भुत हो जाता है। कहा जाता है कि जैसा बोओगे वैसा काटोगे।  यही स्थिति मनुष्य की कार्यशैली पर भी लागू होती है। एक व्यक्ति अहंकारवश किये गये आग्रह को ठुकरा देता है पर वही नम्रता से कहने पर मान जाता है। उसी तरह कुछ लोग काम निकालने के लिये अत्यंत विनम्रता का भाव दिखाते हुए सफल होते हैं जबकि अहंकार दिखाने वाले हमेशा ही निराशा का शिकार होते हैं।
      कहने का अभिप्राय यह है कि  हमें अपने जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिये। हर व्यक्ति के अंदर बीमारियां तथा तनाव होते हैं पर कुछ उनको भुलाकर अपनी दिनचर्या उत्साह से करते हैं तो कुछ उनका बोझ ढोते हुए चलते हैं। जिनके मन में उत्साह है वह जीवन में ऊंचे लक्ष्य प्राप्त करते हैं पर जो मस्तिष्क में बीमारी, निराशा तथा तनाव का बोझ लेकर चलते हैं वह न केवल स्वयं नाकाम रहते हैं वरन् अपने संगी साथियों को भी हताश करते हैं।

विदुर नीति में कहा गया है कि
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न श्रद्दधाति कल्याणं परेभ्योऽप्यात्मशङ्कितः।
निराकरोति मित्राणि यो दै सोऽधमपूरुषः।।
     हिन्दी में भावार्थ-जिनका अपने पर ही विश्वास नहीं है वह अन्य व्यक्ति से भी अपने कल्याण की अपेक्षा नहीं कर पाते। अपने मित्रों को भी अपने से भी परे करता है। ऐसा व्यक्ति अधम माना जाता है।

      जैसा कि कुछ लोग पानी से  आधे भरे  ग्लास के लिये कहते हैं आधा खाली हैदूसरे कहते हैं कि आधा भरा हुआ है। यह दृष्टिकोण की भिन्नता की पहचान कराने वाला उदाहरण है।  कोई वस्तु हमारे पास नहीं है उसकी चिंता करने की बजाय जो उपलब्ध है उससे अपने काम में बेहतर परिणाम निकालने का प्रयास करना सकारात्मक दृष्टिकोण का भावा दर्शाता है।  इसके विपरीत साधनों की कमी, सहयोगियों के उपेक्षा भाव तथा लक्ष्य की विकटता का विचार करते हुए निष्क्रिय हो जाना नकारात्मक भाव को दर्शाता है।  नकारात्मक भाव के लोगों के पास मित्र न के बराबर होते हैं और सकारात्मक भाव के लोगों के पास एक बड़ा मित्र समूह हो जाता है। इसलिये जीवन में सकारात्मक भाव अपनाते हुए अपना कर्म करना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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