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Thursday, April 10, 2014

भर्तृहरि नीति शतक-सज्जन लोगों से मित्रता धीरे धीरे बढती है(bhartrihari neeti shatak-sajjan logon se mitrata dheere dheere badhti hai)



      मारे अध्यात्म दर्शन के अनुसार मित्रता में पैमाने बहुत ऊंचे हैं| एक सहृदय मित्र मिल जाए तो वह अनेक  संक्रमण काल में बंधुबांधवों से अधिक सहायक सिद्ध होता है|  यह अलग बात है कि आजकल लोग सहकर्मी, सहपाठी, सहजातीय, सहधर्मी तथा सहविचारक को अपना स्वाभाविक मित्र मान लेते हैं| किसी को मित्र मान लेना या प्रचारित करना बुरा नहीं है, मुश्किल तब आती है जब अपने दिमाग में स्थापति कर उस पर यकीन किया जाता है| दरअसल मनुष्य को अपनी  दिनचर्या के दौरान दूसरे लोगों से संपर्क बनाना ही पड़ता है| इनमें से कुछ लोगों से नियमित भेंट  होती है जिससे पूर्ण परिचय होने के साथ ही उनके प्रति प्रगाढ़ता का भाव आता है, पर यह एक ऐसी  स्वाभाविक स्थिति है जिसमें मित्रता की  पहचान नहीं हो पाती| मित्रता की पहचान तो उस समय होती है जब मनुष्य परेशानीं में होने के कारण असहज होता है, और सच्चा मित्र उस समय मनोबल बढ़ाने का काम करता है|
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।
            हिंदी में भावार्थ-जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्द्ध  में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।
दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर।।
     हिंदी में भावार्थ-कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान हो  तो भी उसका साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।
            यह बात हमेशा ध्यान रखें कि सज्जन व्यक्तियों से मित्रता धीरे-धीरे बढ़ती है और स्थाई रहती है। सज्जन लोग अपना स्वार्थ न होने के कारण बहुत शीघ्र किसी  से मित्रता नहीं करते पर जब वह धीरे-धीरे आपका स्वभाव समझने लगते हैं तो फिर स्थाई मित्र हो जाते हैं-उनकी मित्रता ऐसे ही बढ़ती है जैसे पूर्वाद्ध में सूर्य की छाया बढ़ती जाती है। इसके विपरीत दुर्जन लोग अपना स्वार्थ निकालने के लिए बहुत जल्दी मित्रता करते हैं और उसके होते ही उनकी मित्रता वैसे ही कम होने लगती है जैसे उत्तरार्द्ध  में सूर्य का प्रभाव कम होने लगता है।
       पड़ौस तथा कार्यस्थलों में हमारा संपर्क अनेक ऐसे लोगों से होता है जिनके प्रति हमारे हृदय में क्षणिक आत्मीय भाव पैदा हो जाता है। वह भी हमसे बहुत स्नेह करते हैं पर यह यह संपर्क नियमित संपर्क के कारण मौजूद हैं।  उन कारणों के परे होते ही-जैसे पड़ौस छोड़ गये या कार्य का स्थान बदल दिया तो-उनसे मानसिक रूप से दूरी पैदा हो जाती है।  इस तरह यह बदलने वाली मित्रता वास्तव में सत्य नहीं होती। मित्र तो वह है जो दैहिक रूप से दूर होते भी हमें स्मरण करता है और हम भी उसे नहीं भूलते। इतना ही नहीं समय पड़ने पर उनसे सहारे का आसरा मिलने की संभावना रहती है।  अतः स्थितियों का आंकलन कर ही किसी को मित्र मानकर उससे आशा करना चाहिये।जहां तक हो सके दुष्ट और स्वार्थी लोगों से मित्रता नहीं करना चाहिये जो कि कालांतर में घातक होती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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