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Saturday, March 29, 2014

अध्यात्मिक पुरुष और देहधारी के भेद का ज्ञान आवश्यक-पतंजलि योग दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(adhyatmik purush aur dehdhari ke bhed ka gyan avashyak-A hindu religion thought ariticle based on patanjali yoga darshan)



      हमारी इंद्रियां स्वतः काम करती हैं जबकि हमारा भ्रम यह रहता है कि हम उन्हें चला रहे हैं।  कान, नाक, आंख, जीभ बुद्धि तथा हाथ पांव स्वचालित हैं।  हम सोते हैं तब भी वह प्रयासरत रहते हैं जबकि उस समय हम मोक्ष की स्थिति में होने के कारण उन पर अंतदृष्टि नहीं रख पाते।  ऐसे में जाग्रत अवस्था में उनकी सक्रियता देखकर यह सोचते हैं कि हम सारी क्रियायें कर रहे हैं।  इन इंद्रियों के स्वतंत्र होने का यह भी प्रमाण है कि रात्रि को ऐसे विचित्र स्वप्न आते हैं जिनके बारे में हम जाग्रत अवस्था में सोच भी नहीं पाते। जैसा कि आधुनिक विज्ञान कहता है कि सोते समय मनुष्य का वह दिमाग काम करता है जो जाग्रत अवस्था में सुप्त होता है।
      इसकी अनुभूति हम तभी कर सकते हैं जब अपने हृदय की तरफ दृष्टिपात करें।  यह क्रिया ध्यान से ही हो सकती है। जब हम शांत होकर अपना ध्यान हृदय की तरफ केंद्रित करेंगे तब हमारी सारी इंद्रिया शिथिल हो जाती है।  जब ध्यान की चरम स्थिति समाधि आती है तब हमारा संपर्क अपने आप यानि आत्मा से हो जाता है। उस समय यह पता चलता है कि बुद्धि और हृदय में भेद है। इस भेद का ज्ञान न होने पर इंद्रियां जिन भोगों के साथ संपर्क करती हैं वह हमारे प्रतीत होते हैं।  ऐसा लगता है कि हम भोग कर रहे हैं। सच यह है कि इंद्रियां सांसरिक विषयों से संपर्क स्वाभाविक रूप से करती हैं और हम उनको अपना भोग समझ बैठते हैं। देह को जीवित रखने का प्रयास इंद्रियां स्वचालित ढंग से करती हैं और हमें लगता है कि हम सारी क्रियायें कर रहे हैं। इसे तभी समझा जा सकता है जब हम हृदय के विषय में निरंतर ध्यान के माध्यम से उसकी क्रियायें देखते रहें।

पतंजलि योग दर्शन में कहा गया है कि
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हृदये चित्त संवित्।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-हृदय में संयम करने से चित्त के स्वरूप का ज्ञान हो जाता है।
सत्त्वपुरुषयोरत्न्तासंकीर्णयोः प्रत्यायाविशेषो भोगःपराथत्स्वार्थसंयमकात्पुरुषज्ञानम्।।
      सामान्य हिन्दी में भावार्थ-बुद्धि और पुरुष परस्पर भिन्न हैं। इन दोनों के भेद प्रतीत न होना ही भोग है। परार्थ प्रतीति से भिन्न जो स्वार्थ प्रतीति है उसमें संयम करने से संयम हो जाता है।

      अक्सर हमारे अंतर्मन में अच्छा भोजन करने, सुंदर दृश्य देखने, सुगंध के नासिका में आने, कानों से मधुर स्वर सुनने और हाथों से प्रिय वस्तु या व्यक्ति को छूने की इच्छा होती है। यह सब हमारे मन और बुद्धि का खेल है। जाग्रत अवस्था में इंद्रियां इन्हीं इंद्रियों के वशीभूत होकर काम करती है तो रात्रि में इनके बिना भी उनकी सक्रियता बंद नहीं होती।  हम सोते समय भी सांस ग्रहण करते हैं और मस्तिष्क सपने देखता है तो हाथ पांव भी हिलते हैं पर ज्ञान के अभाव में यह सत्य नहीं समझ पाते कि यह उनका स्वाभाविक कर्म है। उस समय हमारा हृदय शांत होता है इसलिये उसकी अनुभूति नहीं कर पाते। अगर हम योगासन, ध्यान, मंत्र जाप और अध्यात्मिक पाठ  निरंतर करते रहें तब जाग्रत अवस्था में इन इंद्रियों की सक्रियता से कभी स्वयं को जुड़ाव अनुभव नहीं होगा। पुरुष और बुद्धि का भेद जानने के बाद हम   उन पर नियंत्रण कर सकते हैं। इतना ही नहीं निरंतर योगाभ्यास करने पर  यह अनुभव भी कर सकते हैं कि हम एक नहीं दो लोग हैं।  एक अध्यात्मिक पुरुष और दूसरा देहधारी! यह विचार आने पर हमारा आत्मविश्वास बढ़ जाता है।  हम लोगों ने देखा होगा कि योगी लोग कभी अपने अकेलेपन को लेकर चिंतित नहीं होते। योगाभ्यास तथा ज्ञान साधना से उनके बाह्य ही नहीं बल्कि आंतरिक व्यक्तित्व में दृढ़ता आती है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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