समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
-------------------------


Thursday, October 31, 2013

अनुकूल संगति के लिये उद्यान तथा मंदिर उत्तम स्थान-हिन्दी चिंत्तन लेख(anukool sangati ki liye udyan tatha madir uttam sthan-hindi chinttan lekh)



                        आमतौर से हर मनुष्य देखने में एक जैसे ही लगते हैं पर आचार, विचार, रहन सहन, खाने पीने तथा व्यवहार की दृष्टि से उनमें भिन्नता का आभास तब  होता है जब उसने कोई दूसरा व्यक्ति उनसे संपर्क करता है। अनेक बार दो लोग एक जैसे लगते हैं तो अनेक लोग भी एक जैसे स्वभाव के नहीं लगते।  इसके दो कारण है एक तो यह कि लोग अपने रहन सहन, खान पान, आचार विचार तथा व्यवहार के अनुसार ही हो जाते हैं। दूसरा कारण उल्टा भी होता है कुछ लोग अपनी मूल प्रकृत्ति के अनुसार ही रहन, सहन, खान पान, आचार विचार तथा व्यवहार करने लगते हैं।  इन दोनों कारणों में श्रीमद्भागवत गीता का गुण और कर्म विभाग सिद्धांत लागू होता है। एक तो मनुष्य वह होता है जो अपनी मूल प्रकृत्ति के अनुसार सात्विक, राजस तथा तामसी कार्य करता है तो दूसरा वह होता है जो अपने कर्म के अनुसार ही अपने स्वभाव की प्रकृत्ति का हो जाता है। इस चक्र को योग तथा ज्ञान साधक अनुभव कर सकते हैं।
                        हम देखते हैं कि सहकर्म में लिप्त लोगों के बीच आपसी संपर्क सहजता से बनता है। जिसको निंदा करनी है उसे निंदक मिल जाते हैं दूसरे प्रशंसा करते हैं तो उनको प्रशंसक मिल जाते हैं। यही स्थिति आदतों की भी है। जो जुआ खेलते हैं उनको जुआरी और जो शराब पीते हैं उन्हें शराबी मिल जाते है। स्थिति यह है कि व्यसन में फंसा मनुष्य कुंऐं के मेंढक की तरह हो जाता है जिसे अज्ञान का अंधेरा ही पसंद होता है।  आमतौर से हम देखते भी हैं कि बुरी संगत सहजता से मिलती है पर अच्छी संगत के लिये प्रयास करने पड़ते है।  बाज़ार में सहजता से व्यसनी मिल जाते हैं  पर सत्संगी को ढूंढना पड़ता है। ऐसे में समस्या यह आती है कि हम सहज प्रकृत्ति के लोग कहां ढूंढे।
                        हमारा मानना है कि हमें मंदिरों और पार्कों में सहज प्रकृत्ति के लोग मिल ही जाते हैं। दरअसल मंदिरों और पार्कों में आया व्यक्ति कहीं न कहीं से मन से स्वच्छ होता ही है भले ही वह पूरे दिन असहज वातावरण में रहता हो।  जब हम मंदिर जाते हैं तो वहां आये लोग अत्यंत शांत और सद्भाव से संपन्न  होने के कारण हमारे मन तथा चक्षुओं को आकर्षित करते हैं। वहां कोई मित्र मिल जाये तो उसे  भी प्रसन्नता होती है तो हमें भी अधिक सुख  मिलता है। इस प्रसन्नता का सामान्य सुख से ज्यादा मोल है। यह भी कह सकते हैं कि इस प्रसन्नता का सुख अनमोल है।  उसी तरह प्रातःकाल किसी उद्यान में आया व्यक्ति भी निर्मल भाव से जुड़ जाता है। वहां घूमते हुए लोग एक दूसरे को अत्यंत निर्मल भाव से देखते हैं। यह अलग बात है कि इसकी उनको स्वतः अनुभूति नहीं होती। उनमें अनेक लोग तो केवल इसलिये एक दूसरे को जानने लगते हैं क्योंकि दोनों ही वहां प्रतिदिन मिलते हैं। इस प्रकार की आत्मीयता मिलना एक संयोग है जो कि व्यसन के दुर्योग से मिली संगति से कहीं बेहतर है।
                        हमने देखा है कि योग शिविरों में जाने पर अनेक ऐसे लोगों से मिलने और उनको सुनने का सौभाग्य मिलता है जिनकी कल्पना सामान्य जीवन में नहीं की थी।  इसी अनुभव के आधार पर हम यह लेख लिख रहे है। हमारे कहने का अभिप्राय यही है कि अगर आप यह चाहते हैं कि आप एक बेहतर जीवन जियें तो पहले अपनी देह तथा मन  के लिये अनुकूल  वातावरण, मित्र तथा आत्मीय लोगों का चयन करें।  वातावरण, रहन सहन, आचार विचार, तथा खान पान के साथ ही संगति के अनूकूल बनने के बाद जीवन को सुखमय बनाने का कोई दूसरा उपाय करना शेष नहीं रह जाता।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Saturday, October 19, 2013

संतगिरी के काम पुलिसगिरी से नहीं हो सकते-हिन्दी चिंत्तन लेख (sant giri ke kaam pulice giri ka nahin ho sakte-hindi chinttan lekh,hindu thought article)



                                    गुरुनानक देव जी के बारे में एक कथा सुनायी जाती है।  एक बार वह भ्रमण करते हुए गंगा नदी के तट पर गये।  वहां उन्होंने देखा कि कुछ लोग नदी में नहाने के समय अपने हाथों से जल भरकर पितरों को अर्पित कर रहे हैं।  उन्होंने एक व्यक्ति से पूछा-‘‘यह क्या कर रहे हो?’’
                        उसने जवाब दिया कि-‘‘हम पूर्व की तरफ मुंख कर पितरों को अपनी पवित्र नदी गंगा में नहाने के बाद जलांजलि दे रहे है।’’
                        गुरुनानक देव जी फौरन नदी में उतर गये और अपने हाथों जल भरकर पश्चिम की तरफ मुख कर उसे  अर्पित करने लगे।
                        यह देखकर आसपास खड़े लोग आश्चर्य चकित रह गये। उन्हें लगा कि यह भोला इंसान शायद कोई गलती कर रहा है। वहां उपस्थित एक आदमी ने उनसे कहा-‘‘यह क्या रहे हो? पश्चिम की तरफ मुख कर नहीं वरन् पूर्व की तरफ जलांजलि दी जाये तभी पितरों को लाभ होता है।
                        गुरुनानक जी तत्काल जवाब दिया-‘‘मैं पितरों को नहीं वरन् अपने खेतों के पास जल भेज रहा हूं।  मेरे खेत इस नदी के पश्चिम दिशा में स्थित है।’’
                        लोग हंसने लगे। एक ने कहा-‘‘अरे, यहां जल देने से खेतों में नहीं पहुंचेगा।’’
 गुरुनानक जी ने कहा-‘‘हंसने की बात नहीं है। जब तुम्हारे इतनी दूर आकाश में स्थित पितरों को यहां दिया गया जल पहुंच सकता है तो मेरे खेत तो जमीन पर ही स्थित है। क्यों नहीं पहुंचेगा?’’
                        यह कथा हिन्दू समाज में व्याप्त अंधविश्वासों के विरुद्ध श्रीगुरुनानक जी के अभियान को  दृढ़ संकल्पित ढंग से संचालन करने की की शक्ति को प्रमाणित करती है।  इसका तात्पर्य यह है कि  अंग्रेजों के आने से पूर्व भी हमारे देश में समाज सुधार का अभियान प्रचलित था। गुरुनानक जी एक महापुरुष थे जिनको नये अध्यात्मिक युग का प्रवर्तक माना जा सकता है।  इसके अलावा भी संत कबीर, रहीम तथा रविदास जी ने भी अंधविश्वासों के विरुद्ध अपना अभियान अत्यंत प्रभावशाली ढंग से चलाया। रविदास का यह कथन ‘‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’’ समग्र भारतीय दर्शन के पूर्ण सार को  एक पंक्ति में  ही व्यक्त कर देता है।
                        इन महान संतों ने अंधविश्वास के विरुद्ध अभियान नकारात्मक ढंग से नहीं चलाया बल्कि सकारात्मक रुख अपनाते हुए ईश्वर के प्रति विश्वास पैदा किया।  यह मत करोकभी नहीं कहा वरन् यह करोका संदेश दिया।  अंधविश्वासों के प्रति लोगों का मोह भंग करने के लिये लोगों में उसके प्रति अरुचि पैदा करने की बजाय विश्वास के प्रति चेतना लाना ही समाज सुधार का श्रेष्ठ रूप है।
                        हम आजकल अपने देश में ऐसे लोगों को सक्रिय देख रहे हैं जो कथित रूप से समाज सुधारक बनकर यह प्रयास कर रहे हैं कि कानून बनाकर अंधविश्वासों को रोका जाये।  तय बात है कि यह लोग कुछ अंग्रेज तथा वामपंथ समाज से प्रभावित हैं। यह लोग अपने आपको प्रगतिशील बताकर यह दावा करते हैं कि समाज में व्याप्त कुरीतियां ही इस समाज का सबसे बड़ा संकट है।  हम ऐसे लोगों से सहमत नहीं है।  दरअसल यह लोग स्वयं तो सुविधाभोगी है और उन्हें तमाम तरह के सम्मान भी मिले हुए हैं पर  उन्हें समाज में कथित रूप से जनविद्वान होने की श्रेणी की सदस्यता नहीं मिल पाती। इसलिये वह चिढ़ते हैं।  वह चाहते हैं कि लोगों की भीड़ कथित साधुओं, संतों, तांत्रिकों और मांत्रिकों के पास न आकर उनके कल्पित सिद्धि को प्रणाम करे ताकि उनके अहंकार की भूख मिट सके।
                        एक योग और ज्ञान साधक के रूप में हमारे अभ्यास का अनुभव तो यही कहता है कि इस संसार में अंधविश्वास और विश्वास के बीच कोई संघर्ष नहीं है। भक्त चार प्रकार के-आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी-होते हैं।  ज्ञानी अपने विश्वास की प्रमाणिकता प्राप्त कर चुके होते हैं इसलिये वह कभी कथित कर्मकांडों का निर्वाह कर फल की आशा नहीं करते जबकि बाकी तीनों के अपने अपने लक्ष्य होते हैं।  इन चारों में कोई में भी किसी को बुरा कहना नहीं है।  श्रीमद्भागवत गीता के कथन के आधार पर हमें चारों प्रकार के भक्तों की उपस्थिति स्वीकार करनी होगी।  यह अलग बात है कि प्रथम तीन एक दूसरे के विचार पर प्रहार करते हैं और ज्ञानी कभी ऐसा नहीं करते। 
                        दूसरे को अंधविश्वासी कहकर स्वयं को ज्ञानी साबित करना सहज हो सकता है पर अपने ज्ञान से दूसरे में विश्वास कायम करना एक कठिन प्रक्रिया है और आजकल के कथित सुधारक ऐसे परिश्रम से बचने के लिये नारे लगाते हैं। वह राज्य से अंधविश्वास रोकने की आशा करते हैं जबकि हमारा मानना है कि सच्चे संतों का यह काम है।  राज्य से प्रजा हित के लिये बेहतर प्रयास करते रहने की अपेक्षा करना ठीक है पर उनसे संत जैसे समाज सुधार की आशा नहीं की जा सकती। संतगिरी से किये जाने वाले काम पुलिसगिरी से नहीं हो सकते। जो लोग कानून के सहारे अंधविश्वासों को खत्म करना चाहते हैं उनको पता होना चाहिये कि इस देश में आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक तथा व्यक्तिगत रूप से लोग परेशान रहने पर कहीं न कहीं जाकर अपना तनाव खत्म करने का मार्ग ढूंढते है। तंत्र मंत्र से उनकी समस्यायें दूर नहीं होती यह सत्य है पर उनके कुछ समय तक तनाव समाप्त होकर आशावादी बने रहने का जो उनपर सकारात्मक प्रभाव होता है वह कोई बुरा नहीं है। कम से कम उनकी समस्यायें हम खत्म नहीं कर सकते तो उनके तनाव का मार्ग रोकने का प्रयास भी नहीं करना चाहिये।



दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Sunday, October 13, 2013

रामनवमी और दशहरे का दिन आनंदमय हो-हिन्दी लेख(ramnawami aur dashahare ka din anandmay ho-hindi article or lekh or editorial)



                        आज पूरे देश में रामनवमी मनायी जा रही है।  इस बार की रामनवमी पर मौसम का मिजाज कुछ अजीब प्रकार का है।  आमतौर पिछले अनेक वर्षों तक इन दिनों गुलाबी ठंड पड़ती रहती और ऐसा लगता  जैसे कि सर्दी दस्तक देने वाली है। अब विश्व में बढ़ती गर्मी ने इसे बदल दिया है।  स्थिति यह रही है कि पिछले अनेक वर्षों से धूप में गर्मी रहती रही तो फिर बरसात भी जमकर हुई।  पहले त्यौहार मौसम का आभास देते थे पर अब वह बात नहीं रही।  कल रात हमारे शहर में जमकर वर्षा हुई।  आज धूप निकली तो फिर उमस भरा माहौल बन गया है। कल रात जब बरसात हो रही थी तो हम किसी मंदिर में थे और लग नहीं रहा था कि सहजता से घर पहुंच पायेंगे।  बरसात थोड़ी कम हुई तो गाड़ी में चल पड़े पर फिर पानी की बूंदें तेज हो गयीं।  बरसात में भीगने से डर नहीं लगता पर इस मौसम में यह खतरा उठाना ठीक नहीं है यह भी सच है।  सुबह जब देखा तो पाया कि आसमान साफ है।  सूर्य नारायण अपने निर्धारित समय पर अपना शांत गोलाकार  चेहरा लेकर प्रकट हुए। कहीं किसी बादल से उनको चुनौती नहीं  मिली। ऐसा लग रहा था कि कुछ देर बात वह अपना रौद्र रूप दिखायेंगे।
                        इस बार का मौसम हमारे क्षेत्र में अजीब रहा है। पिछली बार  जून माह में ही जमकर बरसात तो बाद में पता लगा कि केदारनाथ में इसी बरसात ने कहर बरपा दिया।  बाद में बरसात ऐसी बंद हुई कि लगने लगा कि शायद इस बार बरसात नहीं होगी। फिर बरसात हुई तो बादलों ने समुद्र से उठाया पानी जमकर जमीन पर छिड़का।  फिर लापता हो गये। जुलाई अगस्त का का मौसम विचित्र रहा।  बरसात होती तो ऐसा लगता है कि थमेगी नहीं और थमती तो धूप सीधी  आक्रामक रूप दिखाती।  जुलाई और अगस्त के महीने बरसात के साथ गुजारे कि गर्मी के साथ कहना मुश्किल लगता है।  हम कहें कि हमारे यहां आजकल गर्मी पड़ रही है तो फिर बरसात भी हो रही है।  कोई एक मौसम नहीं जम पा रहा। वर्षा ने कीर्तिमान बनाये हैं पर गर्मी से निजात नहीं दिला पायी।  इस बरसात को देखकर हमें क्रिकेट के भगवान के सन्यास की याद आती है। इस भगवान ने अपने श्रेष्ठ दिनों में बल्लेबाजी में जमकर कीर्तिमान बनाये पर उस दौर में बीसीसीआई की टीम ने ही उस दौरान अपनी नाकामी सबसे अधिक देखी। क्रिकेट का भगवान खेलता तो भी टीम हारी और नहीं खेले तो जीतने का सवाल ही नहीं उठता।  बरसात के दौरान बूंदें पत्थर की तरह बरसीं। रिमझिम बरसात का आनंद उठाने का अवसर कम ही मिला।
                        इस बार रामनवमी की पूर्व संध्या पर जब हमारे ग्वालियर में बरसात हो रही थी तो उधर उड़ीसा के गोपाल गंज में चक्रवात दस्तक दे रहा था।  पहले बताया कि यह चक्रवात अत्यंत हानिकारक सिद्ध होगा।  इस बार सरकार की तैयारियों से जानों की हानि नगण्य रही जो कि अच्छी बात है।  कम से कम रामनवमी पर किसी आपदा ने देश के  जनमानस को किसी संकट का अहसास नहीं करने  दिया वह एक सुखदायक बात लगती है। इस प्रकोप से जो  धन और वन संपदा नष्ट हुई है उसे  पुनः स्थापित करने का प्रयास किया जायेगा ऐसी आशा है।
                        आंध्रप्रदेश का एक क्षेत्र श्रीकाकुलम में भी इस चक्रवात ने अपना रौद्र रूप दिखाया था। वहां जमकर रात भर बरसात हुई। आज सुबह वहां भी धूप निकली।  मतलब ठीक हमारे ग्वालियर जैसा मौसम वहां भी दिखाई दिया। उस समय हमेें इस चक्रवात पर लिखने का विचार चल ही रहा था। कल ग्वालियर में भी तेज हवा के साथ ही बौछारें आयी थीं। हमारे साथ बरसात में बचने के लिये एक छत के नीचे खड़े अनेक लोग उसे उसी तूफान का प्रकाप बता रहे थे।  हालांकि यह थोड़ा अविश्वसनीय लगा क्योंकि हमारी तब तक की जानकारी यह थी कि उस समय तक उस चक्रवात ने धरती पार नहीं की थी।  ऐसे में ग्वालियर के वातावरण को उस तूफान से जोड़ना थोड़ा अजीब लगा।
                        अब भारत में धार्मिक विद्वानों ने भी कम संकट कम खड़ा नहीं किया है।  हर पर्व के दो दिन बना दिये हैं।  नतीजा यह है कि कोई भी पर्व ढंग से एकसाथ नहीं मनाया जा पाता।  रामनवमी दो तो दशहरे भी दो।  पर्वो में समाज में दिखने वाली  एकरूपता पोथापंथियों ने ही खत्म कर दी है।  सच बात तो यह है कि ज्ञानसाधक भक्तों के लिये निराकार भक्ति श्रेष्ठ होती है पर जो सकाम तथा साकार भक्ति करते हैं उनके लिये संकट खड़ा हो जाता है। हमने बरसों से देखा है कि जिस दिन रामनवमी है उसी दिन मनाई जाती  है। जिस जिन जन्माष्टमी है उसी दिन मंदिरों में भीड़ रहती है।  अब पिछले कई बरसों से कथित पोथीपंथियों ने समाज की एकरूपता का कचड़ा कर दिया है। इसका कारण यह लगता है कि आजकल टीवी चैनल पर कुछ अधिक ज्योतिषी दिखने लगे हैं। जो अपनी पोथियों से मुहूर्त वगैरह का समय बताते हैं  पूरे देश के मंदिरों के सेवक उनके कार्यक्रम देखकर अपनी पूजा का समय  तय करते हैं। यह मुहूर्त पहले भी होते थे पर सरकारी और गैर सरकारी कैलेंडर ही पर्वों का दिन तय कर देते थे। उस समय कभी समाज में भिन्नता नहीं दिखी।  तब  पोथीपंथियों के फतवों पर किसी का ध्यान इस तरफ नहीं जाता था।  निष्काम और निराकार ज्ञान साधकों के लिये आज भी सरकारी कैलैंडर वाला  दिन ही मान्य किया जाताहै है पर जब उनकों पर्वों के अवसर  साकार भक्तों से संगत करनी होती है तब भारी कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
                        हमारे लिये रामनवमी कल थी और दशहरा आज है।  हमें पोथीपंथियों से कोई मतलब नहीं है। धर्म को लेकर हमारे मन में कोई संशय नहीं है। हमारा मानना है कि धर्म का आशय है अपने तय किये मार्ग पर चलना न कि पोथीपंथियों को अपना गुरु बनाकर उनके शब्दों का अनुकरण करना। बहरहाल इस रामनवमी और दशहरे की सभी पाठकों तथा ब्लॉग लेखकों को बधाई। जय श्रीराम।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Sunday, October 6, 2013

शिवालय और शौचालयों पर चलती बहस के बीच-हिन्दी लेख(shivalay aur shauchalayon par chalti bahas ke beech-hindi lekh or article



                        इस समय प्रचार माध्यमों में शिवालय और शौचालयों पर बहस चल रही है।  कभी किसी ने पहले कहा कि मंदिरों से ज्यादा महत्वपूर्ण शौचालय हैं तो अब किसी ने शिवालयों से अधिक  शौचालयों को अनिवार्य बता दिया।  हम यहां उन विभूतियों का नाम नहीं ले रहे भी-भले भी उन्होंने यह  सदाशयतावश ही यह बयान दिये-क्योंकि हमारा मुख्य लक्ष्य इस विषय पर अपनी बात कहना है।  प्रचार माध्यमों ने तो इन बयानों को महत्व इसलिये दिया क्योंकि यह प्रसिद्ध लोगों ने दिये पर ऐसे बयान अक्सर आपसी बातचीत में भी आते रहते हैं।  दरअसल एक योग साधक के लिये शौचालय तथा शिवालय का प्रथक प्रथम महत्व है। दोनों के महत्व में कोई साम्यता नहीं है। अगर भारतीय अध्यात्म दृष्टि से आधुनिक संदर्भ में इस विषय को देखों तो यह विवाद ही अनावश्यक नज़र आता है।
                        जिस तरह संसार के दो रूप हैं एक भौतिक तथा दूसरा अध्यात्मिक उसी तरह देहधारी जीवों के भी हैं।  भौतिक  रूप तो वह है जिसमें भूत सक्रिय दिखता है पर देह को धारण करने वाला अध्यात्म यानि आत्मा अप्रकट है। हम संसार में जितने भी प्राणी देख रहे हैं वह भौतिक तथा अध्यात्म का संयुक्त समन्वय होते हैं। अंतर इतना है कि दो हाथ पैर वाले इंसान की बुद्धि अत्यंत रहस्यमय है इसलिये उसे लाभ भी हैं तो हानि भी दिखती है।  जो मनुष्य बुद्धि का बेहतर उपयोग करता है वह अपनी रचनात्मक प्रकृत्ति से समाज को कुछ देता है जबकि उसके गलत इस्तेमाल वाला आदमी इतना खतरनाक हो जाता है कि उसे कुत्ते और सांप से खतरनाक कहा जा सकता है। मनुष्य के अलावा अन्य जीवधारियों में कुछ खतरनाक है पर उनकी सीमायें हैं।  कुत्ता भौंकता है पर हमेशा काटने नहीं आता। सांप भी जब पांव पास हो तभी काटता है। यह दोनों जीव लक्ष्य कर किसी पर हमला नहीं करते। अगर कुत्ते और सांप को मालुम हो कि वह कितना खतरनाक हैं तो वह समाज में कोहराम मचा दें मगर प्रकृति ने उनकी बृद्धि को सीमित रखा है।  मनुष्य की स्थिति इससे अलग है।  अगर उसे लगे कि वह दूसरे की हानि कर सकता है तो वह चाहे जहां जिस पर हमला कर सकता है। अपनी गली और घर से दूर जाकर भी हमला करता है।  यही कारण है कि मनुष्य की बुद्धि पर नियंत्रण करने के लिये हमारे ऋषि मुनियों से अध्यात्म ज्ञान का सृजन किया है।
                        हमारे देश में घर के अंदर ही  शौचालय बनाने की परंपरा पुरानी नहीं है।  यहां प्रकृत्ति की कृपा से सर्वत्र कृषि भूमि रही दूसरी बात यह कि उसमें मनुष्य और पशुओं के शरीर से निकलने वाली गंदगी को ठिकाने लगाने की भी शक्ति रही है।  अधिकतर लोग खेती तथा पशुपालन पर निर्भर रहे इसलिये शौचालयों के लिये अलग से बनाने की परंपरा नहीं बनी।  खेतों में ही शौच करने की परंपरा बन गयी।  अलबत्ता बुद्धि और मन की निर्मलता के लिये जगह जगह शिवालय बने।  देश के अंदर ऐसा कोई गांव नहीं होगा जहां शिवालय न बना हो।
                        अब आते हैं असली बात पर!  आधुनिक सभ्य समाज ने शहर बनाये जिसमें घर में ही शौचालयों की अनिवार्यता अनुभव की जाती है। जब तक शहर और उसके बाज़ार सीमित रहे घर पर शौचालयों की अनिवार्यता की सीमा चली उनका विस्तार हुआ तो अब सार्वजनिक जगहों पर भी शौचालयों की आवश्यकता अनुभव होती है।  ऐसा नहीं है कि सरकार या समाज का इस पर ध्यान नहीं गया।  हमने देखा  कि अनेक शहरों में अनेक पेशाबघर और शौचालय बने।  इतना ही नहीं जब तक महिलायें घरों तक सीमित थी उनके लिये सार्वजनिक स्थानों पर  अलग से व्यवस्था नहीं थी पर अब अनुभव की जाने लगी हैं।  हमने तो यह अनुभव किया है कि महिलाओं के लिये बाज़ारों तथा सार्वजनिक स्थानों पर एक अभियान के साथ शौचालयों का निर्माण किया जाना चाहिये था।  पहले बाज़ार में महिलायें कम घूमती दिखती थीं पर अब तो संख्या बढ़ गयी है। हमें एक बात पता है जब देह में कोई उदिग्नता उत्पन्न होती है तब उसका विसर्जन जब तक न किया जाये मस्तिष्क भारी विचलित रहता है पर बाहर कोई दूसरा मनुष्य  उसे कोई पढ़ नहीं पाता। दूसरी बात यह कि अपने अंदर आये उस तनाव को बाहर जल्दी निकाल देना चाहिये यह सभी स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं। तन का तनाव शौचालय और मन का शिवालय से दूर होता है-एक योग साधक के रूप में हमारा यह अनुभव है, दूसरे लोग इसे न माने यह उनकी मर्जी है।
                        दोनों की तुलना की भी जा सकती है और नहीं भी।  जिन लोगों के पास योग साधना का साहित्य है वह उसमें पढ़ सकते हैं कि मनुष्य के जीवन में शौच को लेकर भी सावधानी बरतने को कहा गया है।  यहां यह भी बता दें कि शौच का आशय हमेशा ही पूर्ण रूप से बाह्य या भौतिक शुद्धि से है।  यह  आशय भी न केवल शरीर की सफाई से है वरन जहां हम रहते हैं वहां  भी स्चच्छता का वातावरण बनाये रखना इसमें शामिल है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है और स्वच्छ स्थान पर हमारी बुद्धि भी सुखद अनुभव करती है।  स्वस्थ देह और स्वच्छ स्थान पर अध्यात्मिक साधना करने पर ही सहजता  अनुभव की जा सकती है। हालांकि एक बात तय है कि शौचालय तो सभी मनुष्य जाते हैं पर देवालय सभी जायें यह आवश्यक नहीं है।  यह तो हर किसी के अपने विवेक पर निर्भर है कि वह मन और बुद्धि के विकार किस तरह विसर्जित करता है।
                        एक सामान्य योग साधक कभी राज्य से यह अपेक्षा नहीं करता कि वह शिवालय बनाये पर अभ्यास के कारण क्षेत्र का ज्ञान होने के से वह जरूर चाहेगा कि राज्य व्यवस्था शहरों में नहीं वरन् गांवों में शौचालयों की सार्वजनिक जगहों पर स्थापना करे।  शिवालय तो भक्त बना ही लेते हैं। इतना ही नहीं भक्ति भाव वाले ऐसे अनेक जागरुक भक्त अपने देवस्थानों के परिसर में शौचालय भी बनवाते हैं ताकि किसी भक्त की देह में विकार उत्पन्न हो तो वह उसका विसर्जन करे। अलबत्ता मुद्दा अगर सार्वजनिक स्थानों पर शौचालय बनवाने का है तो यहा काम राज्य ही कर सकता है।  अगर कोई दूसरा करेगा तो अतिक्रमण होने पर उसे ढहाया जा सकता है। यह अलग बात है कि अगर किसी भी धर्म का देवस्थान अगर बना हो तो उसे सहजता से कोई हटा भी नहीं सकता।  एक सामान्य योग साधक शिवालय और शौचालयों के बीच चल रहे विवाद में अधिक समय तक रुद्धि नहीं ले सकता क्योंकि प्रचार माध्यमों पर प्रायोजित किसी भी विषय पर  बहस के परिणाम कभी दृष्टिगोचर नहीं होते।  बहरहाल सार्वजनिक स्थानों पर शौचालयों की अधिक से अधिक सुविधा हो यह मांग करते हुए यह हमारा अपने ब्लॉगों  पर छठा पाठ है। ईमानदारी की  बात यह  है कि हम अपनी भोगी पीड़ा का बयान कर रहे हैं पर सच यह है कि यह करोड़ों लोग इसे प्रतिदिन झेलते हैं।  एक अध्यात्मिक साधक होने के नाते हमारा मानना है कि तन की शुद्धता के बिना मन शुद्ध और स्वस्थ नहीं रह सकता। शिवालय तो समाज स्वयं ही बना लेता है पर सार्वजनिक स्थानों पर शौचालयों के लिये राज्य से अपेक्षा की जा सकती है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Sunday, September 29, 2013

विदुर नीति-दूसरे के आक्रोशित वचन पर क्षमा की नीति अपनायें(vidur neeti-doosre ke akroshit vacha par kshama ki neeti apnayen)



            शक्ति की पहचान किसी पर आक्रमण करने से नहीं वरन् सहनशीलता दिखाने पर होती है। हमारे देश में थोड़ी थोड़ी बात पर विवाद होने पर भारी हिंसा हो जाती है। इतना ही नहीं भाषा, जाति, धर्म, तथा क्षेत्र के नाम पर बने समूहों में अनेक बार आपसी संघर्ष हो जाते हैं।  इन समूहों के शिखर पुरुषों आपस में उठते बैठते हैं पर अवसर आने पर इस तरह लड़ते हैं जैसे कि उनका पूरा जीवन ही अपने समूहों के कल्याण के लिये अर्पित हो।  दरअसल यह उनका पाखंड होता है। इस तरह वह विभिन्न समूहों को आपस में लड़ाकर आम जन की स्थिति कमजोर करते हैं।  इससे वह डर जाता है और अपने ही शिखर पुरुषों के प्रति वफादार बना रहता है।  ऐसे शिखर पुरुष हमेशा ही फूट डालो और राज्य करोकूटनीति का सहारा लेते हैंे।  वह जानते हैं कि लोगों में अपनी जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र को लेकर एक विशेष प्रकार का पूर्वाग्रह रहता है और वह अपने समूहों के सम्मान का मिथ्या अहंकार पालते हैं।  समूहों के अंतर्गत भले ही सदस्यों के आपसी विवाद होते हैं पर किसी अन्य समूह के सदस्य से विवाद हो जाये तो वह सामूहिक संघर्ष में बदलने का प्रयास इन्हीं शिखर पुरुषों के माध्यम से किया जाता है।  यही कारण है कि प्राचीन समय से भारत एक विभाजित राष्ट्र रहा।  राजाओं के मध्य छोटी छोटी बातों पर संघर्ष होते रहते थे जिसके कारण धीरे धीरे विदेशी आक्रांता यहां स्थापित होते गये।
            हमारे देश में अहिंसा के सिद्धांत का प्रचार अनेक महापुरुषों ने किया है। इसका कारण यह है कि प्राचीन काल में इस तरह के हिंसक सामूहिक संघर्ष होते रहे हैं।  खासतौर से जब भाषा, संस्कृति और धर्म एक हों पर क्षेत्रों के राजा प्रथक हों तब लोगों के बीच इस तरह के विवाद होते ही रहे होंगे। राजसी प्रवृत्ति अहंकार के भाव को जन्म देती है और वही हिंसा के परिणाम की सृजक है।  अहंकार वश आदमी अपने ही समूह में दूसरे लोगों  को अपने आगे कुछ नहीं समझता और सामूहिक विषय हो तो एक समूह दूसरे को अपने से हेय प्रमाणित करने के लिये पूरी शक्ति लगा देता  है।  कहने का अभिप्राय यह है कि व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से  एक दूसरे को अपमानित करने का प्रयास का अवसर मिलने पर उसका उपयोग करने से   कोई नहीं चूकता। यही कारण है कि हमारे देश की छवि ऐसे संघर्षों के कारण विश्व में कभी अच्छी नहीं  रही।
विदुरनीति में कहा गया है कि
-----------------
आक्रुश्यमानो नाक्रोशेन्मन्युरेव तितिक्षतः।
आक्रोष्टारं निर्दहति सुकुतं चास्य विन्दवि।।
          हिन्दी में भावार्थ-कोई मनुष्य दूसरे के आक्रोशित वचन बोलने पर भी  उसे क्षमा कर दे तो  रुका हुआ प्रतिआक्रोश उस दूसरे व्यक्ति को जला डालता है। उसके सारे पुण्य नष्ट हो जाते हैं।
नाक्रोशी स्यान्नवमानी परस्य मित्रद्रोही नोत नीचोपसेवी।
न चाभिमानी न च हीनवृत्तो रूक्षां वांच रुषर्ती वर्जयीत।।
          हिन्दी में भावार्थ-दूसरे के प्रति न आक्रोशित वचन कहें न किसी का अपमान करें। न मित्रों से द्रोह करें तथा नीच पुरुषों की कतई सेवा न करें। सदाचार से हीन एंव अभिमान न हो। रुखी तथा रोष भरी वाणी का परित्याग करें।
            हमारे देश में आज भी हालत कोई बेहतर नहीं है।  राजशाही की बजाय लोकतंत्र की व्यवस्था स्थापित हो गयी पर इसके बावजूद सामूहिक संघर्ष होते रहते हैं।  इसका कारण यही है कि लोग मौका मिलने पर  अपना आक्रोश तो व्यक्त करते हैं पर दूसरे का समझ नहीं पाते।  एक आक्रोशित वचन कहता है तो दूसरा उससे भी ज्यादा आक्रामक होकर बोलता है।  इस प्रवृत्ति का त्याग कर देना चाहिये।  जब कोई एक आदमी के साथ दूसरा बदतमीजी करता है और वह खामोश रहता है तो बदतमीज आदमी को ही उसका पाप पीछे लगकर दंड देता है।  हालांकि दूसरे का अपमान झेलने में सहनशीलता की शक्ति होना आवश्यक है। यह शक्ति बाहर प्रत्यक्ष प्रहार नहीं करती वरन् अप्रत्यक्ष रूप से इसका प्रभाव दिखाई देता है।
            इस क्षमा प्रवृत्ति के साथ ही  यह भी निश्चय करना चाहिये कि कभी किसी का अपमान नहीं करेंगे। न ही मित्रों के साथ विश्वासघात करेंगे और न ही नीच पुरुषों के सेवा करेंगे तो जो अंततः समाज के लिये घातक होते हैं।  इस तरह हम समाज के सुधरने की बजाय स्वयं ही सुधर जायें यही हमारे लिये अच्छा है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Sunday, September 22, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-बुद्धिमान क्लेश के समय भी अपना जीवन शुद्ध रखे(kautilya ka arthsharta-buddhiman klish ke samay bhi apna jiwan shuddh rakhen)



                        सांसरिक जीवन में उतार चढ़ाव आते ही रहते हैं। हम जब पैदल मार्ग पर चलते हैं तब कहीं सड़क अत्यंत सपाट होती है तो कहीं गड्ढे होते हैं। कहीं घास आती है तो कहंी पत्थर पांव के लिये संकट पैदा करते हैं।  हमारा जीवन भी इस तरह का है। अगर अपने प्राचीन ग्रंथों का हम निरंतर अभ्यास करते रहें तो मानसिक रूप से परिपक्वता आती है। इस संसार में सदैव कोई विषय अपने अनुकूल नहीं होता। इतना अवश्य है कि हम अगर अध्यात्मिक रूप से दृढ़ हैं तो उन विषयों के प्रतिकूल होने पर सहजता से अपने अनुकूल बना सकते हैं या फिर ऐसा होने तक हम अपने प्रयास जारी रख सकते हैं।  दूसरी बात यह भी है कि प्रकृति के अनुसार हर काम के पूरे होने का एक निश्चित समय होता है।  अज्ञानी मनुष्य उतावले रहते हैं और वह अपने काम को अपने अनुकूल समय पर पूरा करने के लिये तंत्र मंत्र तथा अनुष्ठानो के चक्कर पड़ जाते हैं।  यही कारण है कि हमारे देश में धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के पाखंडी सिद्ध बन गये हैं। ऐसे कथित सिद्धों की संगत मनुष्य को डरपोक तथा लालची बना देती है जो कथित दैवीय प्रकोप के भय से ग्रसित रहते हैं।  इतना ही नहीं इन तांत्रिकों के चक्कर में आदमी इतना अज्ञानी हो जाता है कि वह तंत्र मंत्र तथा अनुष्ठान को अपना स्वाभाविक कर्म मानकर करता है।  उसके अंदर धर्म और अधर्म की पहचान ही नहीं रहती।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
----------------------
अपां प्रवाहो गांङ्गो वा समुद्रं प्राप्य तद्रसः।
भवत्यपेयस्तद्विद्वान्न्श्रयेदशुभात्कम्।।
                        हिन्दी में भावार्थ-गंगाजल जब समुद्र में मिलता है तो वह पीने योग्य नहीं रह जाता। ज्ञानी को चाहिये कि वह अशुभ लक्षणों वाले लोगों का आश्रय न ले अन्यथा उसकी स्थिति भी समुद्र में मिले गंगाजल की तरह हो जायेगी।
किल्श्यन्नाप हि मेघावी शुद्ध जीवनमाचरेत्।
तेनेह श्लाध्यतामेति लोकेश्चयश्चन हीयते।।
                        हिन्दी में भावार्थ-बुद्धिमान को चाहे क्लेश में भी रहे पर अपना जीवन शुद्ध रखे इससे उसकी प्रशंसा होती है। लोकों में अपयश नहीं होता।
                        हमारे देश में अनेक ज्ञानी अपनी दुकान लगाये बैठे हैं। यह ज्ञानी चुटकुलों और कहानियों के सहारे भीड़ जुटाकर कमाई करते हैं। इतना ही नहीं उस धन से न केवल अपने लिये राजमहलनुमा आश्रम बनाते हैं बल्कि दूसरों को अपने काम स्वयं करने की सलाह देने वाले ये गुरु अपने यहां सारे कामों के लिये कर्मचारी भी रखते हैं।  एक तरह से वह धर्म के नाम पर कपंनियां चलाते हैं यह अलग बात है कि उन्हें धर्म की आड़ में अनेक प्रकार की कर रियायत मिलती है।  मूल बात यह है कि हमें अध्यात्मिक ज्ञान के लिये स्वयं पर ही निर्भर होना चाहिये। दूसरी बात यह भी है कि ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे धारण भी करना चाहिये।  यही बुद्धिमानी की निशानी है। बुद्धिमान व्यक्ति तनाव का समय होने पर भी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता।  यही कारण है कि बुरा समय निकल जाने के बाद वह प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।  लोग उसके पराक्रम, प्रयास तथा प्रतिबद्धता देखकर उसकी प्रशंसा करते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Sunday, September 15, 2013

मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन-बालक यदि अनाचार होतो उसे भी कड़ा दंड देना चाहिये( thought article based on manu smriti-balak yadi anachari ho to use bhee kada dan dena chahiye)




                        हमारे देश में यह देखा गया है कि अनेक नाबालिग युवक बलात्कार और हत्या के आरोप में लिप्त पाये जा रहे हैं।  हमारे देश में किशोर अपराधियों के लिये अलग से कानून है पर उसकी व्याख्या अनेक आम लोगों की समझ में नहीं आती। क्या किसी युवक की आयु अट्ठारह वर्ष से तीन, चार, या छह माह से कम हो तो उसका अपराध इसलिये कम हो जाता है कि वह बालिग नहीं है। प्रकृति का ऐसा कौनसा नियम है कि अट्ठारह वर्ष होने पर व्यक्ति को पूर्ण ज्ञान हो जाता है, अगर उसकी यह आयु एक महीने या पंद्रह दिन भी कम हो तो इसका मतलब यह है कि वह पूर्ण ज्ञानी नहीं है। हास्यास्पद तो बात तब होगी जब किसी ने बालिग होने के एक दिन पहले अपराध किया हो और उस पर किशोरो के अपराध वाले कानून के तहत मुकदमा चले। दूसरी बात यह है कि बुद्धि का कौनसा पैमाना है कि यह मान लिया जाये कि मनुष्य सोलह वर्ष की आयु में कम ज्ञानी और अट्ठारह वर्ष होने पूर्ण ज्ञानी हो जाता है।
                        अभी एक मामला सामने आया जिसमें एक सामूहिक बलात्कार तथा हत्या के आरोप में एक नाबालिग होने के बात सामने आयी।  हैरानी की बात यह है कि इसी नाबालिग ने ही सबसे बड़ा अपराध में बढ़चढ़कर भाग लिया था पर उसे किशोर न्याय के नियमों के अनुसार हल्की सजा दी गयी।  उसके सहअपराधियों ने स्पष्ट किया कि हमें उकसाने तथा सर्वाधिक अपराध करने में उसी का हाथ है।  जब मामला सामने आया तो पता नहीं जांच एजेंसियां उम्र का विषय क्यों लेकर बैठ गयीं? दूसरी बात यह कि उसकी आयु की जांच स्वास्थ्य विशेषज्ञों से ही कराने की बात कही गयी, पर पता नहीं वह हुई कि नहीं- कहीं पढ़ा या सुना था बाद में इस बारे में कोई खबर नहीं मिली।  हमारा मानना है कि इस प्रकरण को मनोवैज्ञानिकों के पास भी भेजा जाये। वही जांच करें कि उस कथित नाबालिग की बौद्धिक आयु क्या है? जिन लोगों का जांच और अभियोजन काम काम है उन्हें मनोविज्ञानिक आधार भी लेना चाहिये।  यह कानून में नहीं लिखा है पर यह भी कहां लिखा है कि अपराध जघन्य होने पर बौद्धिक आयु का परीक्षण नहीं होगा अथवा अपराध की प्रकृत्ति देखकर यह निर्णय नहीं होगा कि यह अपराध करना ही बालिग होने का प्रमाण है। खासतौर से तब जब नाबालिग अपराधी पर पहले भी अपराधिक प्रकरण दर्ज होने की बात सामने आती हो-यह भी कहीं हमने पढ़ा या सुना था।  एक अध्यात्मिक ज्ञान साधक होने के आधार पर हमारी यह राय है कि अपराध की प्रकृत्ति देखा जाना चाहिये।  अगर दिन या माह की कमी से अपराध की प्रकृत्ति करे कम माना जायेगा तो न्याय में विसंगतियां अवश्य आयेंगी।
मनुस्मति में कहा गया है कि
-------------------
गुरुं वा बालबुद्धौ वा ब्राह्म्ण वा बहुतश्रुतम।
अतितायिनमायांन्तं हन्यादेवाविचारवन्।।
हिन्दी में भावार्थ-यदि गुरु, बालक, वृद्ध या विद्वान या बहुचर्चित मनुष्य अत्याचारी हो तो उसे मृत्युदंड दिया जाना चाहिये।     
परस्य पत्न्या पुरुषः सम्भाषां योजयन् रहः।
पूर्वामाक्षारितो दोषैः प्राप्नुयात्पूर्वसाहसम्।।
                        हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य पहले से ही कुख्यात हो और परायी स्त्री से अकेेले में मिलने का प्रयास करता हो उसे भी कड़ा दंड देना चाहिये।
                        हमारे देश में पश्चिमी सभ्यता के अनुसार कानून बनते हैं। इतना ही नहीं जघन्य अपराधियों के लिये मानव अधिकारों जैसे प्रश्न उठाये जाते हैं।  यह माना जाता है कि सभी मनुष्य दैवीय प्रकृत्ति के हैं और अगर किसी से गलती हो जाये तो उसे सुधारा जा सकता है। इसके विपरीत हमारा अध्यात्मिक दर्शन मानता है कि आसुरी प्रकृत्ति के लोगों को कभी सुधारा नहीं जा सकता। भारतीय क्षेत्र की प्रकृत्ति ऐसी है कि यहां यदि आदमी दैवीय प्रकृत्ति  का है तो वह छोटे अपराध करने से भी डरता है और आसुरी है तो सिवाय अपराध के उसे कुछ नहीं सूझता।  यही कारण है कि मनुस्मृति में अपराधों के लिये कड़े दंड का प्रावधान किया गया है। दूसरी बात यह भी है कि अपराध और अत्याचार में अंतर होता है। अपराध हो तो किसी नाबालिग  पर पश्चिमी आधार पर बने कानून के अनुसार मामला चले हम इसका प्रतिवाद नहीं करते पर जब अत्याचार का मामला हो तब कम से कम हमने अध्यात्मिक दर्शन के आधार पर इसका समर्थन करना थोड़ अजीब लगता है।  हमारा यह तो मानना है कि बालिग की आयु अट्ठारह वर्ष ही रहे। किशोर कानून भी बना है तो बुरी बात नहीं है पर जघन्य अपराध के समय इस विषय की अनदेखी करते हुए अपराधियों को न्यायालय के समक्ष पेश करना चाहिये।  हमारे देश के न्यायाधीशों में इतनी विद्वता है कि वह इस बात को समझेंगे मगर उनके सामने अभियोजन पक्ष को ही मामला लाना होता है वह स्वयं कोई ऐसा आदेश नहीं दे सकते।  अगर देंगे तो तमाम तरह के विवाद खड़े कर न्यायालयों पर टिप्पणियां करने वाले कथित मानवाधिकार कार्यकर्ता भी इस देश में कम नहीं है। इन कार्यकर्ताओं का मुख्य लक्ष्य चर्चित मामलों में अपनी टांग फंसाकर प्रचार पाना होता है। यही कार्यकर्ता मनुस्मृति को भी अप्रासंगिक मानते हैं क्योंकि उनको अपने प्रसंगों के माध्यमों से प्रचार तथा लोकप्रियता मिलती है।          

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


अध्यात्मिक पत्रिकाएं