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Sunday, October 13, 2013

रामनवमी और दशहरे का दिन आनंदमय हो-हिन्दी लेख(ramnawami aur dashahare ka din anandmay ho-hindi article or lekh or editorial)



                        आज पूरे देश में रामनवमी मनायी जा रही है।  इस बार की रामनवमी पर मौसम का मिजाज कुछ अजीब प्रकार का है।  आमतौर पिछले अनेक वर्षों तक इन दिनों गुलाबी ठंड पड़ती रहती और ऐसा लगता  जैसे कि सर्दी दस्तक देने वाली है। अब विश्व में बढ़ती गर्मी ने इसे बदल दिया है।  स्थिति यह रही है कि पिछले अनेक वर्षों से धूप में गर्मी रहती रही तो फिर बरसात भी जमकर हुई।  पहले त्यौहार मौसम का आभास देते थे पर अब वह बात नहीं रही।  कल रात हमारे शहर में जमकर वर्षा हुई।  आज धूप निकली तो फिर उमस भरा माहौल बन गया है। कल रात जब बरसात हो रही थी तो हम किसी मंदिर में थे और लग नहीं रहा था कि सहजता से घर पहुंच पायेंगे।  बरसात थोड़ी कम हुई तो गाड़ी में चल पड़े पर फिर पानी की बूंदें तेज हो गयीं।  बरसात में भीगने से डर नहीं लगता पर इस मौसम में यह खतरा उठाना ठीक नहीं है यह भी सच है।  सुबह जब देखा तो पाया कि आसमान साफ है।  सूर्य नारायण अपने निर्धारित समय पर अपना शांत गोलाकार  चेहरा लेकर प्रकट हुए। कहीं किसी बादल से उनको चुनौती नहीं  मिली। ऐसा लग रहा था कि कुछ देर बात वह अपना रौद्र रूप दिखायेंगे।
                        इस बार का मौसम हमारे क्षेत्र में अजीब रहा है। पिछली बार  जून माह में ही जमकर बरसात तो बाद में पता लगा कि केदारनाथ में इसी बरसात ने कहर बरपा दिया।  बाद में बरसात ऐसी बंद हुई कि लगने लगा कि शायद इस बार बरसात नहीं होगी। फिर बरसात हुई तो बादलों ने समुद्र से उठाया पानी जमकर जमीन पर छिड़का।  फिर लापता हो गये। जुलाई अगस्त का का मौसम विचित्र रहा।  बरसात होती तो ऐसा लगता है कि थमेगी नहीं और थमती तो धूप सीधी  आक्रामक रूप दिखाती।  जुलाई और अगस्त के महीने बरसात के साथ गुजारे कि गर्मी के साथ कहना मुश्किल लगता है।  हम कहें कि हमारे यहां आजकल गर्मी पड़ रही है तो फिर बरसात भी हो रही है।  कोई एक मौसम नहीं जम पा रहा। वर्षा ने कीर्तिमान बनाये हैं पर गर्मी से निजात नहीं दिला पायी।  इस बरसात को देखकर हमें क्रिकेट के भगवान के सन्यास की याद आती है। इस भगवान ने अपने श्रेष्ठ दिनों में बल्लेबाजी में जमकर कीर्तिमान बनाये पर उस दौर में बीसीसीआई की टीम ने ही उस दौरान अपनी नाकामी सबसे अधिक देखी। क्रिकेट का भगवान खेलता तो भी टीम हारी और नहीं खेले तो जीतने का सवाल ही नहीं उठता।  बरसात के दौरान बूंदें पत्थर की तरह बरसीं। रिमझिम बरसात का आनंद उठाने का अवसर कम ही मिला।
                        इस बार रामनवमी की पूर्व संध्या पर जब हमारे ग्वालियर में बरसात हो रही थी तो उधर उड़ीसा के गोपाल गंज में चक्रवात दस्तक दे रहा था।  पहले बताया कि यह चक्रवात अत्यंत हानिकारक सिद्ध होगा।  इस बार सरकार की तैयारियों से जानों की हानि नगण्य रही जो कि अच्छी बात है।  कम से कम रामनवमी पर किसी आपदा ने देश के  जनमानस को किसी संकट का अहसास नहीं करने  दिया वह एक सुखदायक बात लगती है। इस प्रकोप से जो  धन और वन संपदा नष्ट हुई है उसे  पुनः स्थापित करने का प्रयास किया जायेगा ऐसी आशा है।
                        आंध्रप्रदेश का एक क्षेत्र श्रीकाकुलम में भी इस चक्रवात ने अपना रौद्र रूप दिखाया था। वहां जमकर रात भर बरसात हुई। आज सुबह वहां भी धूप निकली।  मतलब ठीक हमारे ग्वालियर जैसा मौसम वहां भी दिखाई दिया। उस समय हमेें इस चक्रवात पर लिखने का विचार चल ही रहा था। कल ग्वालियर में भी तेज हवा के साथ ही बौछारें आयी थीं। हमारे साथ बरसात में बचने के लिये एक छत के नीचे खड़े अनेक लोग उसे उसी तूफान का प्रकाप बता रहे थे।  हालांकि यह थोड़ा अविश्वसनीय लगा क्योंकि हमारी तब तक की जानकारी यह थी कि उस समय तक उस चक्रवात ने धरती पार नहीं की थी।  ऐसे में ग्वालियर के वातावरण को उस तूफान से जोड़ना थोड़ा अजीब लगा।
                        अब भारत में धार्मिक विद्वानों ने भी कम संकट कम खड़ा नहीं किया है।  हर पर्व के दो दिन बना दिये हैं।  नतीजा यह है कि कोई भी पर्व ढंग से एकसाथ नहीं मनाया जा पाता।  रामनवमी दो तो दशहरे भी दो।  पर्वो में समाज में दिखने वाली  एकरूपता पोथापंथियों ने ही खत्म कर दी है।  सच बात तो यह है कि ज्ञानसाधक भक्तों के लिये निराकार भक्ति श्रेष्ठ होती है पर जो सकाम तथा साकार भक्ति करते हैं उनके लिये संकट खड़ा हो जाता है। हमने बरसों से देखा है कि जिस दिन रामनवमी है उसी दिन मनाई जाती  है। जिस जिन जन्माष्टमी है उसी दिन मंदिरों में भीड़ रहती है।  अब पिछले कई बरसों से कथित पोथीपंथियों ने समाज की एकरूपता का कचड़ा कर दिया है। इसका कारण यह लगता है कि आजकल टीवी चैनल पर कुछ अधिक ज्योतिषी दिखने लगे हैं। जो अपनी पोथियों से मुहूर्त वगैरह का समय बताते हैं  पूरे देश के मंदिरों के सेवक उनके कार्यक्रम देखकर अपनी पूजा का समय  तय करते हैं। यह मुहूर्त पहले भी होते थे पर सरकारी और गैर सरकारी कैलेंडर ही पर्वों का दिन तय कर देते थे। उस समय कभी समाज में भिन्नता नहीं दिखी।  तब  पोथीपंथियों के फतवों पर किसी का ध्यान इस तरफ नहीं जाता था।  निष्काम और निराकार ज्ञान साधकों के लिये आज भी सरकारी कैलैंडर वाला  दिन ही मान्य किया जाताहै है पर जब उनकों पर्वों के अवसर  साकार भक्तों से संगत करनी होती है तब भारी कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
                        हमारे लिये रामनवमी कल थी और दशहरा आज है।  हमें पोथीपंथियों से कोई मतलब नहीं है। धर्म को लेकर हमारे मन में कोई संशय नहीं है। हमारा मानना है कि धर्म का आशय है अपने तय किये मार्ग पर चलना न कि पोथीपंथियों को अपना गुरु बनाकर उनके शब्दों का अनुकरण करना। बहरहाल इस रामनवमी और दशहरे की सभी पाठकों तथा ब्लॉग लेखकों को बधाई। जय श्रीराम।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


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