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Thursday, October 23, 2014

सांई बाबा की भक्ति के विरुद्ध अभियान का औचित्य नहीं-हिन्दी चिंत्तन लेख(sai baba ki bhakti ke viruddh abhiyan ka auchitya nahin-hindi thought article on sai baba of shirdi)



            एक हिन्दू धार्मिक गुरु ने शिर्डी के सांई बाबा की भक्ति के विरुद्ध अभियान चलाया हुआ है। इसमें एक तर्क यह दिया जा रहा है कि उनकी पूजा करने पर लक्ष्मी नाराज हो जाती है।  हमें हैरानी इस बात की है कि स्वयं को ब्रह्मज्ञानी कहलाने वाले लोग श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों का आशय नहीं समझते इसी कारण उसमें वर्णित  मनोविज्ञान से वह अनभिज्ञ हैं। श्रीमद्भागवगीता में चार प्रकार के भक्तों के-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी का-वर्णन किया गया है। इन चारों का अस्तित्व रहना ही है इसलिये ज्ञानी को सहअस्तित्व का भाव रखना चाहिये। श्रीमद्भागवत गीता में  यह भी बता दिया है कि ज्ञानी भक्त जो भगवान को प्रिय हैं उनकी संख्या नगण्य ही रहेगी। इसलिये सारे संसार को ज्ञानी बना देने का सपना देखना महान अज्ञानता का लक्षण है।
            हम यहां सांईं बाबा की भक्ति  के समर्थक नहीं है पर विरोध भी नहीं करते।  जिन धार्मिक गुरु ने सांई बाबा की भक्ति का विरोध किया उन्होंने ही दलित वर्ग के मंदिर प्रवेश को भी निषिद्ध बताया है।  ऐसा लगता है कि हमारे देश में कुछ धर्माचार्य समाज में विघटन कर अपना काम सिद्ध करना चाहते हैं। कहा जाता है कि दो हजार वर्ष यह देश गुलाम रहा पर यह सत्य कोई नहीं स्वीकार कर रहा कि इसके लिये हमारा सामाजिक वैमनस्य रहा है। इस तरह का वैमनस्य फैलाना भारतीय धर्म के विरोधियों को अपने ऊपर प्रहार करने का अवसर देने जैसा होगा।
            वैसे तो समस्त मंदिरों में आमजन का प्रवेश सहजता से होता है  पर जिनमें निजी प्रभाव अधिक होता है वहां आम श्रद्धालू अपनी सुविधा से जाता है।  इसके अलावा हमारे जहां मूर्तिपूजा अधिक होती है इसलिये चारों प्रकार के भक्त मंदिरों जाते जरूर हैं पर आर्ती और अर्थार्थी तो अपने काम की सिद्धि के लिये इधर उधर चक्कर भी मारते हैं।  उनकी पीड़ाओं का निवारण तथा कार्यसिद्ध समय के अनुसार स्वतः होता ही है पर किसी का यकीन प्राचीन देवता से हटकर किसी सांसरिक मनुष्य पर जम जाये तो उसे समझाना कठिन है। सांसरिक मनुष्य पर यकीन करने वाले मनुष्य को रोकना या धमकाना जोखिम भरा भी हो सकता है यह बात धर्म को समूह में बनाये रखने वाले कथित धार्मिक विद्वानों को समझना चाहिये।
            अगर मान लीजिये किन्हीं सांईं बाबा के भक्तों के पास भले ही  भाग्य से धन आया हो पर वह उनकी कृपा मानता है तो वह ऐसे धर्माचार्यों पर गुस्सा होंगे। आज आप उनको हिन्दू कहकर दुत्कार रहे हो कल वह धर्म परिवर्तन करने लगे तो क्या करेंगे? हालांकि इस तरह की आशंका  इसलिये नहं है क्योंकि सांईबाबा के अधिकतर भक्त हिन्दू ही हैं और अन्य देवी देवताओं के प्रति उनमें हृदय में आस्था कम नहीं है।  यही कारण है कि सांई बाबा के मंदिरों में अन्य देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित की जाती हैं। वहां रामनवमी, कृष्णजन्माष्टमी, गणेश चतुर्थीं और दीपावली जैसे पर्व मनाये ही जाते हैं।
            मुख्य बात यह है कि एक योग साधक और गीता पाठक होने के नाते हम दूसरे की भक्ति पर आक्षेप करना अनुचित मानते हैं। वैसे ही हमारे देश में आर्थिक, सामाजिक तथा शारीरिक तनाव अधिक हैं ऐसे में कोई सांई बाबा की भक्ति से प्रसन्नता प्राप्त कर रहा है तो एक ज्ञानी की नज़र में बुरा नहीं है।  अब इस तरह के अभियान को अधिक हवा देना ठीक नहीं है।  जहां तक इस तरह के अभियान से संतोषी माता की भक्ति समाप्त करने का दावा किया जाता है पर यह उनका भ्रम है।  आज भी अनेक लोग संतोषी माता का व्रत रखते हैं। इसलिये सांईबाबा के विरुद्ध अभियान चलाने वाले इस तरह के दावे कर अपने को सिद्ध नहीं प्रमाणित कर सकते।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Saturday, October 18, 2014

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर यात्रा से हुई अध्यात्मिक स्वर्णिम अनुभूति-हिन्द लेख(amrisar ke swarn mandir ya harmindar sahib ki yatra se mili swarnim anubhuti, A Golden expirence of A Golden temple in amritsar)



            हमने  11 अक्टुबर से 13 अक्टुबर 2014 शनिवार से मंगलवार तक अमृतसर के स्वर्ण मंदिर-जिसे हरमिंदर साहब भी कहा जाता है-पर जो समय बिताया वह वास्तव में स्वर्णिम स्मृति की तरह हमारे मन मस्तिष्क में जीवन भर रहेगा। वहां रहने के लिये गुरुद्वारा प्रबंध समिति के कार्यकर्ता ने हमें श्री बाबा दीपसिंह बाबा निवास प्रदान किया।  वह हरमिंदर साहिब से करीब एक किलोमीटर दूर होगा। उसे ढूंढने में हमें परेशान हुई। ऐसा लगा कि हमें असहयोग के मार्ग पर धकेला गया पर वहां कमरे में तीन दिन रहे तब लगा कि जिन महानुभाव ने हमें वहां भेजा उनकी हृदय में हमारे लिये सामान्य पर पवित्र भाव ही था।

            जिस तरह की सफाई, पेयजल तथा अन्य व्यवस्थायें वहां देखने को मिलीं वह रोमांचित करने वाली थी।  उस निवास के सामने ही श्रीबाबादीपसिंह गुरुद्वारा था जहां हमने हरमिंदर साहिब के बाद सबसे अधिक भीड़ देखी।  वहां लंगर और चाय की व्यवस्था भी थी।  हरमिंदर साहिब में तो लंगर की व्यवस्था इस तरह चल रही थी जैसे कि कारखाना या कोई उद्योग चलता हो।  बर्तनों के आपस में टकराने से निकले स्वर ऐसे आभास दे रहे थे कहीं कोई मशील चल रही हो।  हरमिंदर साहिब के सामने ही रामदास सराय में पर्यटकों के लिये अपनी देह स्वच्छ करने की व्यवस्था थी। वहां सेवादार इस तरह सक्रिय थे जैसे कि किसी कारखाने में कार्यरत हों। उसकी निरंतर सफाई इस तरह जारी थी जैसे कि वहां व्यवसायिक स्थान हो। 

            सभी स्थानों पर लंगरों  नियमित सेवादार तो नियुक्त थे पर ऐसे लोग भी कार्य कर रहे थे जिनके हृदय में गुरुभक्ति कूट कूट कर भरी रहती है। लंगर में अनेक आम तीर्थप्रेमी भी बर्तन आदि साफ करने का काम कर अपने हृदय के सेवा भाव का परिचय दे रहे थे।  सिख गुरुओं ने परोपकार तथा श्रम को अत्यंत महत्व दिया है।  हमारा मानना तो यह है कि आज के युग में श्रीमद्भागवत गीता तथा गुरुग्रंथ साहिब के संदेशों में जिस तरह अकुशल शारीरिक श्रम को सम्मान योग्य माना गया है उस हृदय में धारण करना ही चाहिये।
गुरु ग्रंथ साहिब में कहा गया है कि
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जो रतु पीवहि माणसा तिन किउ निरमलु चीतु।
            हिन्दी में भावार्थ-जिस व्यक्ति में दूसरे मनुष्य का रक्त पीने की आदत है उसका मन कभी निर्मल हो ही नहीं सकता।
आप गवाए सेवा करे ता किछ पाए मान
            हिन्दी में भावार्थ-अपना अहंकार त्याग कर सेवा करें तभी कुछ सम्मान मिल सकता है।
            कहा जाता है कि सिख धर्म का प्रादुर्भाव ही हिन्दू संस्कृति या धर्म की रक्षा के लिये हुआ।  यह अलग बात है कि आधुनिक  राजनीतिक द्वंद्वों के चलते  हिन्दू और सिख धर्म को प्रथक प्रथक बताने का प्रयास हो रहा है।  हरमिंदर साहिब में जाने पर यह पता चलता है कि वहां हर धर्म, वर्ण और समाज का धर्म प्रेमी अत्यंत श्रद्धभाव  हृदय में स्थापित कर आता है।  भारत ही नहीं वरन् पूरे विश्व में सिख धर्म गुरुओं के प्रति सकारात्मक रुचि है।  आज जब भौतिक विलासिता के प्रभाव में शारीरिक श्रम के अभाव हो गया है तब हम मनुष्यों में बढ़ते मानसिक रोगों का दुष्प्रभाव भी देख सकते हैं।  इतना ही नहीं धन, पद और प्रतिष्ठा का संग्रह कर चुके लोगों में जो अहंकार भाव दिखता है उसकी वजह से समाज में वैमनस्य भी बढ़ा है।  हालांकि लोगों का धर्म के प्रति झुकाव भी बढ़ा दिखता है पर सच यह है कि धार्मिक स्थानों पर पर्यटन की दृष्टि से मन बहलाने में ही उनकी रुचि अधिक दिखती है।  गुरुओं के संदेशों पर अमल करने वाले कितने हैं यह अलग से चर्चा का विषय है पर एक बात निश्चित है कि गुरु सेवा में निरंतर निष्काम भाव से लगे लोगों गुरुग्रंथ साहिब के संदेशों के प्रचार में सक्रियता प्रशंसनीय है।  इसके अलावा जो परोपकार में लगे हैं तो उन्हें ज्ञानी ही कहा जाना चाहिये।
            एक योग साधक तथा ज्ञान प्रिय होने के नाते अमृतसर की यह यात्रा हमारे लिये अत्यंत रुचिकर रही। हमने जो देखा उस पर लगातार लिखते ही रहेंगे। हम जैसे लोगों के लिये भौतिक स्वर्ण से अधिक ज्ञान का स्वर्ण महत्वपूर्ण रहता है जो  ऐसे स्थानों पर जाने पर स्वाभाविक रूप से प्राप्त होता है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Saturday, October 4, 2014

फेसबुक के हिन्दी भाषी प्रारूप में अनावश्यक हिंग्लिश शब्द न लायें-हिन्दी लेख(unneccesary chenge in facebook hindi languase-hindi article on facebook)





            जनसंपर्क, प्रचार तथा लोकप्रियता का जो बाज़ार हिन्दी भाषियों से कमाते हैं उनमें आत्मविश्वास की  भारी कमी है या नित्य चलायमान बने रहने की परंपरा के तहत भाषा से छेड़छाड़ उसके प्रबंधक तथा कार्यकर्ता कर रहे हैं यह कहना कठिन है। हम बात कर रहे हैं फेसबुक पर अभी हाल ही में हिन्दी प्रारूपण में हिंग्लिश शब्द जोड़ने की।  अभी तक हमें दो शब्द दिखाई दिये। एक तो हिन्दी के पुष्टिकरण  की जगह हिंग्लिश  का कंफर्म (conform) दूसरा  मुखपृष्ठ की  जगह होम (home) कर दिया गया है। हमारी दृष्टि से अब समय आ गया है कि हिंग्लिश और हिन्दी वालों को अलग अलग कर देखा जाना चाहिये। कम से कम स्थापित, प्रचलित तथा आदत में जो शब्द आदत में आ गये हैं, उनमें हिन्दी प्रारूपण अपनाने वाले अंतर्जालीय प्रयोक्ताओं का हृदय विदीर्ण करने के लिये ऐसे परिवर्तन नहीं करना चाहिये जो अनावश्यक हों। हमारा मानना है कि फेसबुक पर किये गये ऐसे परिवर्तन एकदम अनावश्यक हैं।
            पहली बात तो हम यह बता दें कि हमने आज तक अपने संपर्क में आये जितने भी युवाओं को फेसबुक पर कार्य करते देखा है वह अंग्रेजी प्रारूप का उपयोग करते हैं।  वह सभी हिंग्लिश वाले हैं। उनमें से कोई भी हिन्दी प्रारूप का उपयोग करना चाहेगा यह हमें लगता नहीं है।  हम जैसे अंग्रेजी से निरक्षर लोग ही फेसबुक का हिन्दी प्रारूप अपनाये हुऐ हैं। देवनागरी हिन्दी में यह सोचते हुए भी लिखना जारी रखे हुए हैं कि इससे व्यापक आधार पर अभिव्यक्ति का आधार नहीं मिलता।  हिंग्लिश वाले हमसे पढ़ेंगे या हम उनको पढ़ायेंगे यह भ्रम हमें नहीं है। हिन्दी दिवस पर हिन्दी प्रयोकताओं को सामान्य समझने वाले अंग्रेजी प्रेमी भाषाई व्यवसायिक विद्वानों के कथित महान विचार सुनने के पश्चात् तो हमें यह भी लगने लगा है कि हिन्दी में हिंग्लिश मिलाने पर प्रतिकूल लिखना भी व्यर्थ है।
            यह पता नहीं है कि फेसबुक पर इस तरह का  परिवर्तन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विद्वान भारतीय सलाहकारों की राय पर हुआ या फिर भारत में स्थित किन्हीं कार्यकर्ताओं या उनके समूह ने ऐसा कर अपनी निरंतर सक्रियता का प्रमाण देकर प्रबंधकों को प्रसन्न करने का प्रयास किया यह कहना कठिन है।  कम से कम हिन्दी भाषियों को प्रयोक्ता की तरह अपने रचना उत्पादों के लिये बाज़ार बनाने वालों को अब हिंग्लिश तथा हिन्दी भाषियों को अलग अलग दृष्टिकोण से देखने का विचार कर ही लेना चाहिये।  उन्हें अब अंग्रेजी रोमन लिपित अंतर्जालीय प्रारूपों में हिन्दी से लोकप्रिय या प्रचलित शब्द रोमन लिपि में लिखना चाहिये।  हिन्दी प्रारूपण का उपयोग केवल हम जैसे अंग्रेजी से अपरिचित लोग ही करते हैं।  उनको ऐसे होम या कंफर्म शब्द अटकते हुए पढ़ने पढ़ते हैं।  स्वर के साथ ही सोच भी तोतली हो जाती है। हिन्दी प्रारूपण एक बार बनाकर उससे मुंह ही फेर लें तो अच्छा है क्योंकि हम जैसे प्रयोक्ता उसी से खुश रहते हैं।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Sunday, September 28, 2014

विश्व योग दिवस मनाने का सुझाव सराहनीय-हिन्दी चिंत्तन लेख( concept and thought of vishwa yog diwas or world yoga day is good-hindi thought article)



            प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने संबोधन में सारे विश्व में योग दिवस मनाने का प्रस्ताव दिया है। इस तरह की बात विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक मंच पर अधिकारिक रूप से पहली बार कही गयी है इसलिये इसका महत्व निश्चित रूप से बहुत है।  इसकी भारत में स्वाभाविक रूप से प्रतिकूल प्रतिक्रिया हुई।  हम जैसे अध्यात्मिक और ज्ञान साधकों के लिये इस तरह के घटनाक्रम न केवल रुचिकर होते हैं बल्कि शोध का अवसर भी प्रदान करते हैं।
            देश में अनेक प्रतिक्रियायें आयीं। उनमें एक योग शिक्षक ने एक  महत्वपूर्ण बात कही कि योग के विषय पर जब कोई साधना करने वाला बोलता है तब उसका महत्व बहुत होता है।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं योग साधना करते हैं इसलिये उनके पास इस विषय पर बोलने का अधिकार है।  उन्होंने एक तरह से अपना अनुभव बांटा है।  इसकी हमारे जैसे लोगों पर सुखद प्रतिक्रिया होती है पर जब हम अन्य लोगों को योग विषय बोलते और लिखते हुए देखते हैं तो यह यकीन करना कठिन होता है कि उनके पास योग का कोई ज्ञान भी है। मोदी जी को योग साहित्य का ज्ञान भी है यह देखकर प्रसन्नता होती है पर उनके संबोधन पर प्रसन्न होने वालों में ऐसे लोग भी हैं जो केवल भारतीय विचाराधारा के प्रचार पर ही उछलते हैं पर उसके मूल सिद्धांतों को नहीं समझते।
            जिस योग साधना की बात होती है वह अनेक लोगों के लिये इसलिये कठिन नहीं है क्योंकि   उसमें समय और श्रम का व्यय होता है जिससे आज के भौतिक प्रभाव में फंसे समाज के अनेक लोग बचना चाहते हैं।  योग साधना मनुष्य को शक्तिशाली, आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी सहज वाणी का प्रवाहक बनाती है। इसके प्रभाव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे योग साधना में निरंतर सक्रिय रहने वाले  लोग ही अनुभव कर सकते हैं।
            योग के आठ भाग हैं।  आमतौर से लोग प्राणायाम और आसनों को ही योग साधना समझते हैं।  एक तरह से समाज इसे  व्यायाम समझता है जबकि मोदी ने अपने संबोधन में यह स्पष्ट रूप से बताया कि यह एक व्यापक सिद्धि प्रदान करने वाली साधना है। हम यहां बता दें कि इस सिद्धि का यह आशय कतई नहीं समझना चाहिये कि इससे कोई आकाश से तारे जमीन पर उतार कर ला सकता है। योग साधना मनुष्य के व्यवहार, विचार तथा व्यक्तित्व में ऐसे तत्व स्थापित कर देती है कि वह इस जीवन सागर में बिना थपेड़ों के तैरता है-हमारा अभिप्राय यही है।
            मुख्य बात संकल्प की है।  श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार परमात्मा के संकल्प के आधार पर संसार के सारे भूत स्थित हैं पर वह किसी में स्थित नहीं है।  उससे यह समझना चाहिये कि जिस तरह का हमारा संकल्प होगा उसी तरह का संसार हमारे सामने होगा पर हम उसमें नहीं समा सकते।  हमारी समस्या यह है कि  परमात्मा के इस संसार का भाग अपने ही अपने ही संकल्प के कारण सामने आता है हम उसमें समाना चाहते हैं या सोचते हैं कि वह हमारे अंदर समा जाये।  मकान मिला तो उसमें हम समाना चाहते हैं या चाहते हैं कि वह हमारे अंदर समाज जाये। इसी तरह का दृष्टिकोण संतान, धन, वाहन तथा अन्य भौतिक उपलब्धियों के बारे में रहता है। ऐसा हो नहीं सकता पर हमारा पूरा जीवन इसी प्रयास में नष्ट हो जाता है। देखा जाये तो हर इंसान योग करता ही है।  अज्ञानी लोग  भौतिकता से जुड़ने का प्रयास करते हैं। इसे हम असहज योग भी कह सकते हैं क्योंकि अंतत इससे तनाव ही पैदा होता है। उनका मन उन्हें अपना बंधुआ बना लेता है। सहज योगी स्वयं से जुड़कर संसार के विषयों से अपनी आवश्यकतानुसार संबंध रखते हैं।  वह कभी मन से कभी किसी भी विषय से संयोग करने के लिये बाध्य नहीं किये जाते।
            विश्व में योग दिवस मनाये जाने के प्रस्ताव पर भी अनेक लोग विश्व का अध्यात्मिक गुरु बनने का सपना देखकर प्रसन्न हो रहे हैं। हमारा मानना है कि भारत की यह पहले से बनी बनायी छवि है जिसके लिये प्रथक प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। पतंजलि योग साहित्य के अलावा हमारी श्रीमद्भावगत गीता भी एक ऐसा स्वर्णिम ज्ञान ग्रंथ है जिससे पूरा विश्व परिचित है।
            हम तो यह चाहते हैं कि विश्व समुदाय से पहले हमारे ही देश का अपना रुग्ण मानसिकता से बाहर आये। योग की बातें बहुत होती हैं पर साधना करने वालों की संख्या अभी भी नगण्य है। विश्व में क्रांति आने की हमारी कल्पना तभी सफल होगी जब हम पहले अपने देश में योग साधना को दिन चर्या का एक अभिन्न भाग बनायेंगे।  हम जैसे अप्रचारित योग साधकों के पास ऐसे साधन नहीं होते कि अपने इस प्राचीन विज्ञान पर जनसामान्य में अपनी बात कह सकें, इसलिये प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी जैसे प्रतिष्ठित लोग जब योग विषय का प्रचार करते हैं तो मन प्रसन्न कर लेते हैं। इसके लिये हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आभारी भी है कि उन्होंने योग प्रचार के लिये वह भूमिका निभाई जिसकी हम प्रतिष्ठित लोगों से अपेक्षा करते हैं।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Sunday, September 21, 2014

ग्रंथों के सतत अध्ययन से भी ज्ञान और विज्ञान में पारंगत होना संभव-हिन्दी चिंत्तन लेख(granthon ke satat adhyayan se bhi gyan aur vigyan mein paarangat hona sambhav-hindi chinttan)



            भारत में यह प्रकृति की कृपा कहें या प्राचीन ऋषियों, मुनियों तथा तपस्वियों का प्रभाव कि हमारे यहां  लोग स्वाभाविक रूप से धर्मभीरु होते हैं।  हम लोग  संसार के दृश्यव्य विषयों में लिप्त जितना होते हैं उतनी ही हमारी रुचि अध्यात्म के अदृश्यव्य तत्वों में भी रहती है।  यही कारण है कि हमारे यहां बरसों से ही प्रवचन, सत्संग और परमात्मा की एकांत साधना की परंपरा रही है।  यह अलग बात है कि लोगों को धार्मिक शिक्षा की व्यवसायीकरण आधुनिक शिक्षा की तरह सदियों पहले ही हो गया है पर इसका आभास लोग सहजता से नहीं करते।  जहां अनेक निष्काम योगियों, साधुओं और संतों भारतीय अध्यात्म दर्शन का रथ अपने तप से खींचा वही अनेक कामनावान विद्वानों ने आमजन से दक्षिणा के नाम पर पैसा कमाने तथा समाज में अपनी प्रभावी छवि बनाये रखने के लिये धर्म प्रचार का व्यवसाय अपनाया।  यह अलग बात है कि वह निष्काम और सन्यासी होने का दावा करते रहे हैं पर उनके रहन सहन और चाल चलने से यह स्पष्ट होता रहा है कि वह वास्तव में वैसे त्यागी हैं नहीं जैसा दावा करते हैं।
            यही कारण है कि आजकल अनेक धर्मभीरु लोग सच्चे गुरु की तलाश में रहते हैं। अनेक लोग प्रश्न करते हैं कि सच्चा गुरु ढूंढना मुश्किल हो गया है तो कैसे अध्यात्म ज्ञान कहां से प्राप्त करें? पाखंड गुरु से प्राप्त ज्ञान गेय नहीं हो पता। इस समस्या के कारण अनेक लोगों की ज्ञान पिपासा शांत नहीं हो पाती।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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यथायथा हि पुरुषः शास्त्रंसमधिगच्छति।
तथा विजानाति विज्ञानं चास्य रोचते।
            हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य निरंतर शास्त्रों का अभ्यास करता है वह अंततः ज्ञान और विज्ञान में दक्षता प्राप्त ही कर लेता है। सतत अध्ययन से उसकी रुचि ज्ञान और विज्ञान में बढ़ती जाती है।
            हमारा मानना है कि इसके दो ही उपाय हैं। एक तो यह कि इन्हीं पेशेवर रट्टा लगाने वाले गुरुओं से प्रवचन सुने पर उनके पास जाकर उनकी निजी गतिविधियों पर ध्यान न लगायें।  उनके आश्रम या दरबार में जो स्थान हो उसके सामने ही बैठे, सत्संग सुने और ध्यान लगायें फिर वहां से चले आयें।  दरबार के पीछे या गुरु के अंतपुर में कभी न जायें। सीधी बात कहें तो पर्दे पर देखें उसके पीछे क्या इसमें दिलचस्पी न लें।  अगर वह आपने कोई अनैतिक या असहनीय विषय देखा तो आपका मन खराब होगा।  मन में कुविचार आने से अपनी ही हानि होती है। यह संसार संकल्प के आधार पर ही निर्मित होता है।  इसलिये अपने ंसकल्प में शुद्ध विषयों का संग्रह करें। जिस तरह अर्थ संग्रह की सीमा रखना चाहिये उसी तरह धर्म संग्रह में यही नियम लागू होता है। गुरु से शिक्षा प्राप्त करनें उसके आश्रम या दरबार में चिपक कर न रह जायें।
            दूसरा उपाय यह कि अपने ही प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करें। पेशेवर गुरु यह प्रचारित जरूर करते हैं कि इस संसार में उद्धार के लिये किसी दैहिक गुरु होना चाहिये पर महान धनुर्धर एकलव्य ने हमें इस बंधने से भी मुक्त कर दिया है कि गुरु हमेशा सामने बैठा रहे।  अनेक महान लोगों ने ग्रंथों को अपना गुरु बनाया और महान ज्ञान अर्जित किया।  इसलिये नियमित रूप से अध्ययन करें तो भी ज्ञान और विज्ञान विषय स्वतः आत्मसात हो जाता है। इसलिये दैहिक गुरु होने पर अधिक चिंता नहीं करना चाहिये।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Saturday, September 13, 2014

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-मदांध के पास जाना व्यर्थ (katilaya ka arthshastra-madandh ke pas jaana vyarth)hindu hindi religion thouhg



            इस संसार में जिसके पास भी धन, पद, बल और प्रतिष्ठा की बहुतायत है वह मदांध होता ही है। अगर मायावी सिद्धांत  की बात करें तो जिनके पास संसार के सुख हैं वह उसे सर्वशक्तिमतान की कृपा मानते हैं और उनकी दृष्टि में जिनके पास अभाव हैं वह भाग्यहीन हैं।  इतना ही नहीं मायावी लोगों के गुरु भी आम लोगों को यही संदेश देते हैं कि अगर सर्वशक्मिमान की कृपा होगी तो जरूर धन मिल जायेगा। ऐसे में अगर सामान्य मनुष्य वैभव शाली पुरुषों से दया की आशा करता है तो उसे अज्ञानी ही कहा जा सकता है। ऐसे लोगों के पास याचना करने वाले जाते हैं पर उन्हें वादे या आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिलता।  अनेक बार तो अपमान भी इन याचकों को झेलना पड़ता है।  सच बात तो यह है कि जिनके पास अभाव है वह जब याचक बनकर धनवानों के पास जाते हैं तो अपना आत्म सम्मान तथा आत्मविश्वास दोनो ही गंवाते हैं।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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स्निग्धदीपशिखालोकविलेभितक्लिचनः।
मृत्युमृच्छत्य सन्देहात् पतंगः सहसा पतन्।।

     हिन्दी में भावार्थ-दीपक की स्निग्ध शिखा के दर्शन से जिस पतंगे के नेत्र ललचा जाते हैं और वह उसमें जलकर जान देता है। यह रूप का विषय है इसमें संदेह नहीं है।

गन्धलुब्धो मधुकरो दानासवपिपासया।
अभ्येत्य सुखसंजवारां गजकर्णझनज्झनाम्||

     हिन्दी में भावार्थ-गंध की वजह से लोभी हो चुका दान मद रूपी आसव पीने की इच्छा करने वाला भंवरा सुख का अनुभव कराने वाली झनझन ध्वनि हाथी के कान के समीप जाकर मरने के लिये ही करता है।

      इस संसार में रहकर विषयों से परे तो रहा नहीं जा सकता। देह तथा मन की क्षुधायें इस बात के लिये बाध्य करती हैं जीवन में निरंतर सक्रिय रहा जाये। विषयों से परे नहीं रहा जा सकता पर उनमें आसक्ति स्थापित करना अपने लिये ही कष्टकारक होता है। यही आसक्ति मतिभ्रष्ट कर देती है और मनुष्य गलत काम कर बैठता है।
      सच बात यह है कि पेट देने वाले ने उसमें पड़ने वाले अन्न की रचना भी कर दी है पर मनुष्य का यह भ्रम है कि वह इस संसार के प्राणियों द्वारा ही दिया जा रहा है। जो ज्ञानी लोग दृष्टा की तरह इस जीवन को देखते हैं वह विषयों से लिपटे नहीं रहते। कथित रूप से अनेक संत मनुष्यों को विषयों से परे रहने का उपदेश जरूर देते हैं पर स्वयं भी उससे मुक्त नहीं हो पाते। दरअसल विषयों से दूर रहने की आवश्यकता नहंी बल्कि उनमें लिप्त नहीं होना चाहिये। अज्ञानी लोग आसक्ति वश ऐसे काम करते हैं जिनमें उनकी स्वयं की हानि होती है। धनी, बाहूबली, तथा उच्च पदारूढ़ लोगों के पास जाकर चाटुकारिता इस भाव से करते हैं जैसे कि कोई उन पर मुफ्त में कुपा करेगा। नतीजा यह होता है कि उनके हाथ निराशा हाथ लगती है और कभी कभी तो अपमानित भी होना पड़ता है।
      इस संसार में सुंदर दिखने वाली हर चीज एक दिन पुरानी पड़ जाती है। सुखसुविधाओं के साधन चाहे जितने जुटा लो एक दिन कबाड़ में बदल जाते हैं। अलबत्ता यह साधन मनुष्य को आलसी बना देते हैं जो समय आने पर मनुष्य को तब शत्रु लगता है जब विपत्ति आती है क्योंकि उनका सामना करने का सामर्थ्य नहीं रह जाता। अतः जीवन की इन सच्चाईयों को समझते हुए एक दृष्टा की तरह समय बिताना चाहिये।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, September 4, 2014

अपनी भक्ति का प्रचार करने वालों से सावधान रहें-संत कबीर दर्शन के आधार पर चिंत्तन लेख(apni bhakti ka prachar karne walon se savdhan rahe-A Hindu hindi religion thought based on sant kabir darshan)



            मानव स्वभाव है कि वह दूसरे पर अपनी श्रेष्ठता दिखाना चाहता है।  इसके लिये वह कई उपाय करता है। इनमें एक है सर्वशक्तिमान के प्रति भक्ति के स्वरूप के आधार पर स्वयं को श्रेष्ठ साबित करना। विश्व के करीब करीब सभी धर्मों में धरती के बाहर स्वर्ग की कल्पना की चर्चा की जाती है हालांकि भारतीय धर्मों में भी कहीं कहीं इस तरह की चर्चा है पर श्रीमद्भागवत गीता में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि इस तरह का विचार अज्ञान का प्रमाण है।  यही कारण है कि  हमारे तत्वज्ञानी मानते हैं कि अगर आदमी संयम के साथ जीवन बिताये तो वह इसी धरती पर ही सुख के साथ जीवन बिता सकता है जो कि स्वर्ग भोगने के समान है।  मगर कुछ लोगों को इस बात की बेचैनी रहती है कि वह समाज में श्रेष्ठता साबित करें। वही दूसरों के सामने अपनी भक्ति का प्रचार करते हैं।

संत कबीर दास कहते हैं कि
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मान बड़ाई देखि कर, भक्ति करै संसार।
जब देखैं कछु हीनता, अवगुन धरै गंवार।
            हिंदी में भावार्थ-संत कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों की देखादेखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं पर जब वह नहीं मिलता वह मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं।
मान बड़ाई ऊरमी, ये जग का व्यवहार।
दीन गरीबी बन्दगी, सतगुरु का उपकार।।
      हिंदी में भावार्थ-संत शिरोमणि कबीरदास का कहना है कि जिस तरह दुनियां का व्यवहार है उससे देखकर तो यही आभास होता है कि मान और बड़ाई दुःख का कारण है। सतगुरु की शरण लेकर उनकी कृपा से जो गरीब असहाय की सहायता करता है, वही सुखी है।

     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में ऐसे अनेक लोग हैं जो अपनी धार्मिक छबि बनाये रखने के लिये भक्ति का दिखावा करते हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो गुरु बनकर अपने लिये शिष्य समुदाय का निर्माण कर अपनी रोजी रोटी चलाते हैं। ऐसे दिखावे की भक्ति करने वाले अनेक लोग हैं। इसके विपरीत जो भगवान की वास्तव में भक्ति करते हैं वह उसका प्रयार नहीं करते न ही अपना ज्ञान बघारते हैं।
     भक्त और ज्ञानी की पहचान यह है कि वह कभी अपनी भक्ति और ज्ञान शक्ति का बखान नहीं करते बल्कि निर्लिप्त भाव से समाज सेवा करते हुए अपना जीवन यापन करते हैं। अपनी सच्ची भक्ति और ज्ञान के कारण कुछ लोग महापुरुषों की श्रेणी में आ जाते हैं उनको देखकर अन्य लोग भी यही प्रयास करते हैं कि उनकी पूजा हो। यह केवल अज्ञान का प्रमाण है अलबत्ता अपने देश में धार्मिक प्रवचन एक व्यवसाय के रूप में चलता रहा है। इस कारण तोते की तरह किताबों को रटकर लोगों को सुनाते हुए खूब कमाते हैं। उनको देखकर कुछ लोग यह सोचते हुए भक्ति का दिखावा करते हैं कि शायद उनको भी ऐसा ही स्वरूप प्राप्त हो। अनेक लोग संतों की सेवा में इसलिये जाते हैं कि हो सकता है कि इससे उनको किसी दिन उनकी गद्दी प्राप्त हो जाये। ऐसे में भक्ति और ज्ञान तो एक अलग विषय हो जाता है और वह मठाधीशी के चक्कर में राजनीति करने लगते हैं। किताबों को रटने की वजह से उनको शब्द ज्ञान याद तो रहता है ऐसे में वह थोड़ा बहुत प्रवचन भी कर लेते हैं पर उनकी भक्ति और ज्ञान प्रमाणिक नहीं है। वैसे भी अपने पौराणिक ग्रंथों का अध्ययन हर आदमी इतना तो कर ही लेता है कि उसे सारी कथायें याद रहती हैं। नहीं भी अध्ययन करे तो इधर उधर सुनकर उसे बहुत सारी कथायें याद आ ही जाती हैं। । किसी आदमी ने वह भी नहीं किया हो तो अपने अध्यात्मिक दर्शन के कुछ सूक्ष्म सत्य-निष्काम कर्म करो, परोपकार करो, दया करो और माता पिता की सेवा करे जैसे जुमले- सुनाते हुए श्रोताओं और दर्शकों की कल्पित कहानियों से मनोरंजन करता है। उनको सम्मानित होते देख अन्य लोग भक्ति में जुट जाते हैं यह अलग बात है कि कामना सहित यह भक्ति किसी को भौतिक फल दिलाती है किसी को नहीं।
      फिर भक्ति हो या ज्ञानार्जन अगर कामना सहित किया जाये और सफलता न मिले तो आदमी संसार में दोष ढूंढने लगता है। यह केवल भक्ति या ज्ञान के विषय में नहीं है बल्कि साहित्य और कला के विषयों में भी यही होता है। आदमी आत्ममुग्ध होकर अपना काम शुरु करता है पर जब उसे सफलता नहीं मिलती तो वह निराश हो जाता है। निष्कर्ष यह है कि सम्मान पाने का मोह आदमी के लिये दुःख का कारण बनता है। एक बात याद रखें सम्मान पाने की चाह पूरी नहीं हुई तो दुःख तो होगा और अगर पूरी भी हो गयी तो अपमान भी हो सकता है। जहां सुख है वहां दुःख भी है। जहां आशा है वहां निराशा भी है। जहां सम्मान है वहां अपमान भी है। अगर सम्मान मिल गया तो चार लोग आपके दोष निकालकर अपमान भी कर सकते हैं।
      इसलिये अच्छा यही है कि अपने कर्म निष्काम भाव से करें। इस संसार में निर्विवाद सम्मान पाने का बस एक ही तरीका है कि आप गरीब को धन और अशिक्षित को शिक्षा प्रदान करें। प्रयोजन रहित दया करें। ऐसे काम बहुत कम लोग करते हैं। जो सभी कर रहे हैं उसे आप भी करें तो कैसा सम्मान होगा? सम्मान तो उसी में ही संभव है जो दूसरे लोग न करते हों। 
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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