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Tuesday, April 22, 2014

चाटुकारिता में जीवन व्यर्थ न करें-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख (chatukarita mein jiwan vyarth na karen-bhartrihare neeti shatak)



            वर्तमान भौतिक युग में जिनके पास अधिक धन, उच्च पद और प्रतिष्ठा है उनका आभा मंडल समाज में इतना व्यापक होता है कि हर सामान्य आदमी उनके पास पहुंचकर अपना कल्याण पाना चाहता है।  यह अलग बात है कि ऐसे कथित महापुरुष सामान्य लोगों से कहीं अधिक डरपोक, लालची तथा अहंकारी होते हैं।  अपनी उपलब्धि का मद उन्हें हमेशा ही धेरे रहता है। यह समाज का शोषण कर सारी सफलता प्राप्त करते हैं पर सामान्य आदमी फिर उनसे दयालुता दिखाने की आशा करता है।  देखा यही जा रहा है कि वही शिखर पुरुष समाज में प्रतिष्ठ प्राप्त करता है जो अपने इर्दगिर्द चाटुकारों की सेना एकत्रित करता है।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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दुरारध्याश्चामी तुरचलचित्ताः क्षितिभुजो वयं
तु स्थूलेच्छाः सुमहति बद्धमनसः
जरा देहं मृत्युरति दयितं जीवितमिदं
सखे नानयच्छ्रेयो जगति विदुषेऽन्यत्र तपसः।।
     हिंदी में भावार्थ- जिन राजाओं का मन घोड़े की तरह दौड़ता है उनको कोई कब तक प्रसन्न रख सकता है? हमारी अभिलाषाओं  और आकांक्षाओं  की तो कोई सीमा ही नहीं है। सभी के मन में अधिक धन, बड़ा पद तथा प्रतिष्ठत छवि  पाने की लालसा स्वाभाविक रूप से होती  है। इधर शरीर बुढ़ापे की तरह बढ़ रहा होता है। मृत्यु पीछे पड़ी हुई होती  है। इन सभी को देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि भक्ति और तप के अलावा को अन्य मार्ग ऐसा नहीं है जो हमारा कल्याण कर सके।

     लोगों के मन में धन पाने की लालसा बहुत होती है और इसलिये वह धनिकों, उच्च पदस्थ एवं बाहुबली लोगों की और आशा भरी दृष्टि स ताकते हुए  उनकी चमचागिरी करने के लिये तैयार रहते हैं। उनकी चाटुकारिता में कोई कमी नहीं करते। चाटुकार लोगों  को यह आशा रहती है कि कथित ऊंचा आदमी उन पर रहम कर उनका कल्याण करेगा। यह केवल भ्रम है। जिनके पास वैभव है उनका मन भी हमारी तरह चंचल होता है और वह अपना काम निकालकर भूल जाते हैं या अगर कुछ देते हैं तो केवल चाटुकारिता  के कारण नहीं बल्कि कोई सेवा करा कर। वह भी जो प्रतिफल देते हैं तो वह भी न के बराबर। इस संसार में बहुत कम ऐसे लोग हैं जो धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त कर उसके मद में डूबने से बच पाते हैं।  अधिकतर लोग तो अपनी शक्ति के अहंकार में अपने से छोटे आदमी को कीड़े मकौड़े जैसा समझने लगते हैं और उनकी चमचागिरी करने पर भी कोई लाभ नहीं होता।  अगर ऐसे लोगों की निंरतर सेवा की जाये तो भी सामान्य से कम प्रतिफल मिलता है।
      सच तो यह है कि आदमी का जीवन इसी तरह गुलामी करते हुए व्यर्थ चला जाता हैं। जो धनी है वह अहंकार में है और जो गरीब है वह केवल बड़े लोगों की ओर ताकता हुआ जीवन गुंजारता है। जिन लोगों का इस बात का ज्ञान है वह भक्ति और तप के पथ पर चलते हैं क्योंकि वही कल्याण का मार्ग है।इस संसार में प्रसन्नता से जीने का एक ही उपाय है कि अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए ही जीवन भर चलते रहें।  अपने से बड़े आदमी की चाटुकारिता से लाभ की आशा करना अपने लिये निराशा पैदा करना है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’ 
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, April 19, 2014

राजनीति में रूप बदलना ही पड़ता है-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(rajneeti mein roop badalnaa hee padta hai-bhartrihari neeti shatak ka aadhar par chinttan lekh)



      यह एक ध्रुव सत्य है कि राजनीति करने वाले को अनेक तरह के रंग दिखाने ही पड़ते हैं। जो अपना जीवन शांति, भक्ति और अध्यात्म ज्ञान के साथ बिताना चाहते हैं उनके लिये राजनीति करना संभव नहीं है। ज्ञानी लोग इसलिये राजनीति से समाज में परिवर्तन की आशा नहीं करते बल्कि वह तो समाज और पारिवारिक संबंधों में राज्य के हस्तक्षेप का कड़ा विरोध भी करते हैं।  सामान्य भाषा में राजनीति का सीधा आशय राज्य प्राप्त करने और उसे चलाने के कार्य करने के लिये अपनायी जाने वाली नीति से है। बहुरंगी और आकर्षक होने के कारण अधिकतर लोगों को यही करना रास आता है। अन्य की बात तो छोडि़ये धार्मिक किताब पढ़कर फिर उसका ज्ञान लोगों को सुनाकर पहले उनके दिल में स्थान बनाने वाले कई कथित गुरु राजनीति को स्वच्छ बनाने के लिये उसमें घुस जाते हैं-यह लोकतंत्र व्यवस्था होने के कारण हुआ है क्योंकि लोग राजनीति विजय को प्रतिष्ठा का अंतिम चरम मानते हैं। लेखक, पत्रकार, अभिनेता-अभिनेत्रियां तथा अन्य व्यवसायों मं प्रतिष्ठत लोग राजनीति के अखाड़े को पसंद करते हैं। इतना ही नहीं अन्य क्षेत्रों में प्रसिद्ध लोग राजनीति में शीर्ष स्थान पर बैठे लोगों की दरबार में हाजिरी देते हैं तो वह भी उनका उपयोग करते हैं। लोकतंत्र में आम आदमी के दिलो दिमाग में स्थापित लोगों का उपयोग अनिवार्य आवश्यकता बन गया है। कोई व्यक्ति अपने लेखन, कला और कौशल की वजह से कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो वह उससे सतुष्ट नहीं होता वरन उसे   लगता है कि स्वयं को चुनावी राजनीति में आकार कोई प्रतिष्टित किये  स्थापित किये बिना वह अधूरा है।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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सत्याऽनृता च परुषा प्रियवादिनी च

हिंस्त्रा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या |

नित्यव्यया प्रचुरनित्य धनागमा च

वारांगनेव नृपनीतिनेक रूपा ||

     हिंदी में भावार्थ-राज्यकर्म में लिप्त राजाओं को राजनीति करते हुए बहुरुपिया बनना ही पडता है। कभी सत्य तो कभी झूठ, कभी दया तो कभी हिंसा, कभी कटु तो कभी मधुर कभी, धन व्यय करने में उदार तो कभी धनलोलुप, कभी अपव्यय तो कभी धनसंचय की नीति अपनानी पड़ती है क्योंकि राजनीति तो बहुरुपिया पुरुष और स्त्री की तरह होती है।

      यहाँ हम बता दें कि राजनीति से हमारा आशय आधुनिक चुनावी राजनीति  से है| व्यापक रूप से इस शब्द का अर्थ विस्तृत है|  राजसी कर्म हर व्यक्ति को करने होते हैं और उसे उसके लिए नीतिगत ढंग चलना ही होता है| यानी अपने अर्थकर्म के लिए रजा हो या रंक सभी को राजनीति करनी ही होती है|
      राजनीति तो बहुरुपिये की तरह रंग बदलने का नाम है। लोकप्रियता के साथ कभी अलोकप्रिय भी होना पड़ता है। हमेशा मृद भाषा से काम नहीं चलता बल्कि कभी कठोर वचन भी बोलने पड़ते हैं। हमेशा धन कमाने से काम नहीं चलता कभी व्यय भी करना पड़ता है-लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो भारी धन का व्यय करने का अवसर भी आता है तो फिर उसके लिये धन संग्रह भी करना पड़ता है। कभी किसी को प्यार करने के लिये किसी के साथ घृणा भी करना पड़ती है।
      यही कारण है कि अनेक लेखक,कलाकार और प्रसिद्ध संत चुनावी  राजनीति से परे रहते हैं। हालांकि उनके प्रशंसक और अनुयायी उन पर दबाव डालते हैं पर वह फिर भी नहीं आते क्योंकि राजनीति में हमेशा सत्य नहीं चल सकता। अगर हम अपने एतिहासिक और प्रसिद्ध संतों और लेखकों की रचनाओं को देखें तो उन्होंने राजनीति पर कोई अधिक विचार इसलिये नहीं रखा क्योंकि वह जानते थे कि राजनीति में पूर्ण शुद्धता तो कोई अपना ही नहीं सकता। आज भी अनेक लेखक, कलाकर और संत हैं जो राजनीति से दूर रहकर अपना कार्य करते हैं। यह अलग बात है कि उनको वैसी लोकप्रियता नहीं मिलती जैसे राजनीति से जुड़े लोगों को मिलती है पर कालांतर में उनका रचना कर्म और संदेश ही स्थाई बनता है। राजनीति विषयों पर लिखने वाले लेखक भी बहुत लोकप्रिय होते है पर अंततः सामाजिक और अध्यात्मिक विषयों पर लिखने वालों का ही समाज का पथप्रदर्शक बनता है।
      राजनीति के बहुरूपों के साथ बदलता हुआ आदमी अपना मौलिक स्वरूप खो बैठता है और इसलिये जो लेखक, कलाकर और संत राजनीति में आये वह फिर अपने मूल क्षेत्र के साथ वैसा न ही जुड़ सके जैसा पहले जुडे थे। इतना ही नहीं उनके प्रशंसक और अनुयायी भी उनको वैसा सम्मान नहीं दे पाते जैसा पहले देते थे। सब जानते हैं कि राजनीति तो काजल  की कोठरी है जहां से बिना दाग के कोई बाहर नहीं आ पाता। वैसे यह वह क्षेत्र से बाहर आना पसंद नहीं करता। हां, अपने पारिवारिक वारिस को अपना राजनीतिक स्थान देने का मसला आये तो कुछ लोग तैयार हो जाते हैं।

      आखिर किसी को तो राजनीति करनी है और उसे उसके हर रूप से सामना करना है जो वह सामने लेकर आती है। सच तो यह है कि राजनीति करना भी हरेक के बूते का नहीं है इसलिये जो कर रहे हैं उनकी आलोचना कभी ज्ञानी लोग नहीं करते। इसमें कई बार अपना मन मारना पड़ता है। कभी किसी पर दया करनी पड़ती है तो किसी के विरुद्ध हिंसक रूप भी दिखाना पड़ता है। आखिर अपने समाज और क्षेत्र के विरुद्ध हथियार उठाने वालों को कोई राज्य प्रमुख कैसे छोड़ सकता है? अहिंसा का संदेश आम आदमी के लिये ठीक है पर राजनीति करने वालों को कभी कभी अपने देश और लोगों पर आक्रमण करने वालों से कठोर व्यवहार करना ही पड़ता हैं। राज्य की रक्षा के लिये उन्हें कभी ईमानदार तो कभी शठ भी बनना पड़ता है। अतः जिन लोगों को अपने अंदर राजनीति के विभिन्न रूपों से सामना करने की शक्ति अनुभव हो वही उसे अपनाते हैं। जो लोग राजनेताओं की आलोचना करते हैं वह राजनीति के ऐसे रूपों से वाकिफ नहीं होते। यही कारण है कि अध्यात्मिक और सामाजिक ज्ञानी राजनीति से दूर ही रहते हैं न वह इसकी आलोचना करते हैं न प्रशंसा। अनेक लेखक और रचनाकार राजनीतिक विषयों पर इसलिये भी नहीं लिखते क्योंकि उनका विषय तो रंग बदल देता है पर उनका लिखा रंग नहीं बदल सकता।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, April 13, 2014

नाटकीयता से समाज सेवा नहीं होती-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(natkiyata se samaj sewa nahin hotee-bhartrihari neeti sahtak)

     जकल साहित्य, कला, पत्रकारिता, फिल्म, टी.वी., खेल तथा अर्थ के क्षेत्र में शिखर पर पहुंचे लोग अंशकालिक रूप से समाज  के गरीब, बेसहारा, अनाथ  तथा बीमार लोगों की सहायता करने का कार्य करने का दावा करते हैं|  चूंकि इन लोगों का नाम प्रचार जगत में अपने मूल कर्म की वजह से वैसे ही चमकता इसलिये इन्हें अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने का प्रयास तो वैसे भी नहीं माना जा सकता पर कहीं न कहंी अंतर्मन में  महापुरुष की अपनी छवि बनाने की चाहत होती है जिसे वह पूरी करना चाहते हैं। अगर हम देश के समाज सेवकों की कुल संख्या का सही आंकलन करें तब यह प्रश्न उठेगा कि फिर इस देश में इतनी सारी गरीब और बेबसी कैसे अब भी विद्यमान है?
            दूसरी तरफ यह भी सच है कि मजबूरी लोगों की सहायता करना हमारे देश की रक्त प्रवाह करने वाली धमनियों में है इसलिये यह भी संभव नहीं है कि सभी समाजसेवक गलत हैं।  सच यह है कि जो वास्तव में हृदय से समाजसेवा करते हैं उनके दिमाग में कभी भी अपनी छवि महापुरुष के रूप में स्थापित नहीं करते।  उनक लक्ष्य केवल एक ही रहता है कि वह ऐसा कर अपने मानव होने पर संतोष कर सकें।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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पद्माकरं दिनकरो विकची करोति
चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम्|
नाभ्यर्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति
संत स्वयं परहिते विहिताभियोगाः||
     हिंदी में भावार्थ- बिना याचना किये सूर्य नारायण संसार में प्रकाश का दान करते है। चंद्रमा कुमुदिनी को उज्जवलता प्रदान करता है। कोई प्रार्थना नहीं करता तब भी बादल स्वयं ही वर्षा कर देते हैं। उसी प्रकार सहृदय मनुष्य स्वयं ही बिना किसी दिखावे के दूसरों की सहायता करने के लिये तत्पर रहते हैं।
       आज के आधुनिक युग में समाज सेवा करना फैशन हो सकता है पर उससे किसी का भला होगा यह विचार करना भी व्यर्थ है। टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में समाज सेवा करने वालों  समाचार नित्य प्रतिदिन  आना एक विज्ञापन से अधिक कुछ नहीं होता। कैमरे के सामने बाढ़ या अकाल पीडि़तों को सहायता देने के फोटो देखकर यह नहीं समझ लेना चाहिये कि वह मदद है बल्कि वह एक प्रचार है। बिना स्वार्थ के सहायता  करने वाले लोग कभी इस तरह के दिखावे में नहीं आते। जो दिखाकर मदद कर रहे हैं उनसे पीछे प्रचार पाना ही उनका उद्देश्य है। इस तरह की समाज सेवा की गतिविधियों में वही लोग सक्रिय देखे जाते हैं जिनकी समाजसेवक की छवि छद्म रूप होती है जबकि दरअसल उनका लक्ष्य दूसरा ही होता है| उनके प्रयासों से  समाज का उद्धार कभी नहीं होता। समाज के सच्चे हितैषी तो वही होते हैं जो बिना प्रचार के किसी की याचना न होने पर भी सहायता के लिये पहुंच जाते हैं। जिनके हृदय में किसी की सहायता का भाव उस मनुष्य को बिना किसी को दिखाये सहायता के लिये तत्पर होना चाहिये-यह सोचकर कि वह एक मनुष्य है और यह उसका धर्म है। अगर आप सहायता का प्रचार करते हैं तो दान से मिलने वाले पुण्य का नाश करते हैं।   इसलिए समाज सेवा हमेशा ही निष्काम भाव से करना चाहिए|
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, April 12, 2014

सफ़ेद और काले धन की पहचान करना जरूरी-विदुर नीति के आधार पर चिंत्तन लेख(safed aur kaale dhan ki pahachan karna jaroori-a hindi thought article based on viudru neeti)



      ज के भौतिक युग में सभ्य, बुद्धिमान और ज्ञानी होने का प्रमाण केवल धनी होना ही रह गया है| जिसके पास धन, उच्च पद अथवा प्रसिद्धि है उसे चर्चे समाज में हर व्यक्ति एक नायक की तरह ही करता है|  स्थिति यह है कि धार्मिक क्षेत्र में भी सुविधा संपन्न आश्रम बनवाने, धनिक लोगों का शिष्य समुदाय एकत्रित करने  तथा प्रचार समूहों में विज्ञापन से गुरुपद  धारण करने वाले अनेक महानुभाव प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंचकर समाज में भ्रम फैलाते हैं| ज्ञान का रट्टा लगाकर दूसरों से धन एकत्रित करना गुरु शब्द का पर्याय बन गया है| पर्दे के सामने किसके वचन कैसे हैं यह सभी को सुनाई देता है पर दीवारों के पीछे उनका आचरण कैसा  है यह कोई नहीं देखता| आदमी आम हो या खास अधिकतर लोगों की बुद्धि का दायरा संकुचित हो गया है और धन अच्छा है या बुरा कोई समझना भी नहीं चाहता| जिसके पास धन है उसके सर्वगुण संपन्न होने का दाम करते हुए अनेक चाटुकार लोग मिल जायेंगे|

विदुर नीति में कहा  गया है कि
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असंविभागो दुष्टात्मा कृतघ्नो निरपत्रपः।
तादृंनारिधपो लोके वर्जनीवो नारधिपः।।
           
हिंदी में भावार्थ-अपने व्यक्ति अपने आश्रितों में अपनी धन संपत्ति को ठीक से बंटवारा नहीं करे तो दुष्ट कृतघ्न और निर्लज्ज है उसे इस लोक में त्याग देना चाहिए।
न बुद्धिर्धनलाभाय न जाह्यमसद्धये।
लोकपर्यावृतांत प्राज्ञो जानाति नेतरः।।
           
हिंदी में भावार्थ- धन केवल बुद्धि से ही प्राप्त होता है या मूर्खता के कारण आदमी दरिद्र रहता है, ऐसा कोई नियम नहीं है। इस संसार के नियमों को केवल विद्वान पुरुष ही जानते हैं।
     जिन लोगों के पास धन नहीं है या अल्पमात्रा में है उन्हें धनवान लोग मूर्ख और अज्ञानी मानते हैं। अक्सर धनवान  लोग कहते हैं कि अक्ल की कमी के कारण लोग गरीब होते हैं। इतना ही नहीं इन धनवानों के इर्दगिर्द अपने स्वार्थ कि वजह से मंडराने वाले चाटुकार लोग भी उनकी बुद्धि का महिमामंडन करते हुए नहीं थकते|

      उनका यह तर्क गलत और बेहूदा है। अगर उनका तर्क सही माना जाए तो सवाल उठता है कि  अनेक धनवान अपनी बौद्धिक त्रुटियों का कारण गरीब क्यों हो जाते हैं? जिनके पास धन और संपत्ति विपुल मात्रा में वह अपने व्यवसाय में हानि उठाने या अपने बच्चों की गलत संगत के कारण उनके द्वारा किये जा रहे अपव्यय कि वजह से संकटग्रस्त होकर निर्धनता को प्राप्त हो जाते हैं। तब उनके बारे में क्या यह कहना चाहिये किवह अक्ल के कारण ही अमीर हुए और अब उसके न रहने से गरीब हो गये।या अब धन नहीं है तो उनके पास अक्ल भी नहीं होगी।
      कहने का तात्पर्य है कि यह धारणा भ्रांत है कि बुद्धि या अक्ल के कारण कोई अमीर या गरीब बनता है। संसार का अपना एक चक्र है। शाश्वत सत्य कभी नहीं बदलता पर माया तो महाठगिनी है। आज इस घर में सुशोभित है तो कल वह किसी दूसरे दरवाजे पर जायेगी। लक्ष्मी के नाम का एक पर्यायवाची शब्द चंचलाभी है। वह हमेशा भ्रमण करती हैं। अतः हमेशा ही अमीरों को बुद्धिमान और गरीबों को बुद्धिहीन मानने वालों को अपने विचार बदलना चाहिए।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, April 10, 2014

भर्तृहरि नीति शतक-सज्जन लोगों से मित्रता धीरे धीरे बढती है(bhartrihari neeti shatak-sajjan logon se mitrata dheere dheere badhti hai)



      मारे अध्यात्म दर्शन के अनुसार मित्रता में पैमाने बहुत ऊंचे हैं| एक सहृदय मित्र मिल जाए तो वह अनेक  संक्रमण काल में बंधुबांधवों से अधिक सहायक सिद्ध होता है|  यह अलग बात है कि आजकल लोग सहकर्मी, सहपाठी, सहजातीय, सहधर्मी तथा सहविचारक को अपना स्वाभाविक मित्र मान लेते हैं| किसी को मित्र मान लेना या प्रचारित करना बुरा नहीं है, मुश्किल तब आती है जब अपने दिमाग में स्थापति कर उस पर यकीन किया जाता है| दरअसल मनुष्य को अपनी  दिनचर्या के दौरान दूसरे लोगों से संपर्क बनाना ही पड़ता है| इनमें से कुछ लोगों से नियमित भेंट  होती है जिससे पूर्ण परिचय होने के साथ ही उनके प्रति प्रगाढ़ता का भाव आता है, पर यह एक ऐसी  स्वाभाविक स्थिति है जिसमें मित्रता की  पहचान नहीं हो पाती| मित्रता की पहचान तो उस समय होती है जब मनुष्य परेशानीं में होने के कारण असहज होता है, और सच्चा मित्र उस समय मनोबल बढ़ाने का काम करता है|
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।
            हिंदी में भावार्थ-जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्द्ध  में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।
दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर।।
     हिंदी में भावार्थ-कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान हो  तो भी उसका साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।
            यह बात हमेशा ध्यान रखें कि सज्जन व्यक्तियों से मित्रता धीरे-धीरे बढ़ती है और स्थाई रहती है। सज्जन लोग अपना स्वार्थ न होने के कारण बहुत शीघ्र किसी  से मित्रता नहीं करते पर जब वह धीरे-धीरे आपका स्वभाव समझने लगते हैं तो फिर स्थाई मित्र हो जाते हैं-उनकी मित्रता ऐसे ही बढ़ती है जैसे पूर्वाद्ध में सूर्य की छाया बढ़ती जाती है। इसके विपरीत दुर्जन लोग अपना स्वार्थ निकालने के लिए बहुत जल्दी मित्रता करते हैं और उसके होते ही उनकी मित्रता वैसे ही कम होने लगती है जैसे उत्तरार्द्ध  में सूर्य का प्रभाव कम होने लगता है।
       पड़ौस तथा कार्यस्थलों में हमारा संपर्क अनेक ऐसे लोगों से होता है जिनके प्रति हमारे हृदय में क्षणिक आत्मीय भाव पैदा हो जाता है। वह भी हमसे बहुत स्नेह करते हैं पर यह यह संपर्क नियमित संपर्क के कारण मौजूद हैं।  उन कारणों के परे होते ही-जैसे पड़ौस छोड़ गये या कार्य का स्थान बदल दिया तो-उनसे मानसिक रूप से दूरी पैदा हो जाती है।  इस तरह यह बदलने वाली मित्रता वास्तव में सत्य नहीं होती। मित्र तो वह है जो दैहिक रूप से दूर होते भी हमें स्मरण करता है और हम भी उसे नहीं भूलते। इतना ही नहीं समय पड़ने पर उनसे सहारे का आसरा मिलने की संभावना रहती है।  अतः स्थितियों का आंकलन कर ही किसी को मित्र मानकर उससे आशा करना चाहिये।जहां तक हो सके दुष्ट और स्वार्थी लोगों से मित्रता नहीं करना चाहिये जो कि कालांतर में घातक होती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, April 6, 2014

इस संसार में सच्चा समाज सेवक अधिक नहीं होते-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख (is sansar mein sachcha samaj sewak adhik nahin hote-bhartrihari neeti shatak ka adhar par chinntan lekh)



            आधुनिक प्रचार माध्यमों के आत्म विज्ञापन की सुविधा प्रदान की है जिसका वह लोग लाभ उठाते हैं जिनके पास बृहद आर्थिक संगठन हैं।  स्थिति यह है कि  आर्थिक शिखर पुरुष  छोड़ भलाई सारे काम करते हैं पर अपने प्रचार प्रबंधकों के माध्यम से अपनी छवि देवत्व की बना लेने में सफल हो जाते हैं।  इतना ही नहीं  अपने श्रमिकों, कर्मचारियों और पूरे समाज को शोषण करने के बावजूद ऐसे धनपति प्रचार माध्यमों से अपनी छवि इस तरह बनाते हैं जैसे कि वह अत्यंत विनम्र और दयालु हों।  इसके अलावा भी कला, साहित्य, पत्रकारिता, फिल्म तथा समाज के क्षेत्र में भी कथित रूप से नायकत्व वाली छवि धारण किये अनेक लोग आत्म विज्ञापन के जरिये ही अपना कार्य व्यापार चला रहे हैं। कुछ लोग तो ऐसे हैं जो स्वयं कभी परमार्थ नहीं कर पाते मगर सार्वजनिक जीवन में सक्रिय अन्य लोगों की निंदा कर यह प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं कि वह स्वयं ही श्रेष्ठ है। इतना ही धार्मिक क्षेत्र में भी अब विज्ञापन के जरिये कथित सिद्ध सामग्री बेचने के ऐसे प्रयास हो रहे हैं जिसे देखकर अध्यात्मिक ज्ञानियों की आंखें फटी रह जाती है।
भर्तृहरि नीति शातक में कहा गया है कि

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मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णास्त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः|
परगुणपनमाणून्पर्वतीकृत्य नित्यं
निजहृवि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः||

     हिंदी में भावार्थ- जिनकी देह मन और वचन की शुद्धता और पुण्य के अमृत से परिपूर्ण है और वह परोपकार से सभी का हृदय जीत लेते हैं। वह तो दूसरों को गुणों को बड़ा मानते हुए प्रसन्न होते हैं पर ऐसे सज्जन इस संसार में कितने हैं?

     वैसी देखा जाए तो दूसरों के दोष गिनाते हुए अपने गुणों का बखान तथा दिखाने के लिये समाज के कल्याण में जुटे कथित लोगों की कमी नहीं है। आत्म विज्ञापन से प्रचार माध्यम भरे पड़े हैं। अपने अंदर गुणों का विकास कर सच्चे हृदय से समाज सेवा करने वालों का तो कहीं अस्तित्व हीं दिखाई नहीं देता। अपनी लकीर को दूसरे की लकीर से बड़ा करने वाले बुद्धिमान अब कहां हैं। यहां तो सभी जगह अपनी थूक से दूसरे की लकीर मिटाने वाले हो गये हैं। ऐसे लोगों की सोच यह नहीं है कि वह समाज कल्याण के लिये कार्य कैसे करें बल्कि यह है कि वह किस तरह समाज में दयालू और उदार व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध हों। प्रचार करने में जुटे लोग, गरीबों और मजबूरों के लिये तमाम तरह के आयोजन करते हैं पर वह उनका दिखावा होता है। मैंने यह अच्छा काम कियाया मैंने उसको दान दियाजैसे वाक्य लोग स्वयं ही बताते हैं क्योंकि उनके इस अच्छे काम को किसी ने देखा ही नहीं होता। देखेगा भी कौन, उन्होंने किया ही कहां होता है?
      इस संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो परोपकार और दया काम चुपचाप करते हैं पर किसी से कहते नहीं। हालांकि उनकी संख्या बहुत नगण्य है पर सच तो यह है कि संसार के सभी सभ्य समाज उनके त्याग और बलिदान के पुण्य से चल रहे हैं नकली दयालू लोग तो केवल अपना प्रचार करते हैं। आत्म प्रचार में लगे लोगों को अपने छवि बनाने के प्रयासों से ही समय नहीं मिलता तब वह समाज से कैसे कर सकते हैं?
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, April 3, 2014

परमात्मा के नाम स्मरण के अलावा अन्य प्रयास व्यापारिक प्रवृत्ति का परिचायक-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(parmatma ke nam smaran ka alawa anya prayas vyaparik priviti ka parichayak-a hindu religion thought based on bharitrihari niti shatak)



      हमारे देश में धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के भ्रम इस तरह प्रचलित हो गये हैं कि लोग यह समझ नहीं पाते कि आखिर परमात्मा की भक्ति का कौनसा तरीका प्रभावकारी है? यह भ्रम भारत में सदियों से सक्रिय उन पेशेवर शिखर पुरुषों के कारण है जो लोगों की इंद्रियों को बाहर सक्रिय कर उनसे आर्थिक लाभ पाने के लिये यत्नशील होते हैं। समाज में अंतर्मुखी होकर परमात्मा की भक्ति करने के लिये वह उपदेश जरूर देते हैं पर उसकी जो विधि बताते हैं वह बर्हिमुखी भक्ति की  ही प्रेरक होती है।  भारत में गुरु शिष्य तथा सत्संग की परंपरा का इन पेशेवर धार्मिक ठेकेदारों ने जमकर उठाया है।  गुरु बनकर वह जीवन भर के लिये शिष्य को अपने साथ बांध लेते हैं।  शायद ही कोई शिष्य हो जो ज्ञान प्राप्त कर इन गुरुओं के सानिध्य से मुक्त हो पाता हो।  इतना ही नहीं ऐसे धार्मिक ठेकेदार अपने धर्म की दुकान भी किसी शिष्य की बजाय अपने ही घर के किसी सदस्य को सौंपते हैं।  कहने का  अभिप्राय यह है कि अपने पूरे जीवन में धार्मिक व्यवसाय के दौरान एक भी ऐसा शिष्य तैयार नहीं कर पाते जो उनके बाद कोई संभाल सके। सत्संग के नाम पर यह अपने सामने श्रोताओं की भीड़ एकतित्र कर रटा हुआ ज्ञान देते हैं और कभी प्रमाद वाली बातें भी कर माहौल को हल्का करने का दावा भी करते हैं।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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किं वेदै स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रैर्महाविस्तरैः स्वर्गग्रामकुटीनिवाफलदैः कर्मक्रयाविभमैः।
मुक्तवैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानलं स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलन। शेषाः वणिग्वृत्तयः।।
     हिन्दी में भावार्थ-वेद, स्मृतियां और पुराणों के पठन,  शास्त्रों के सूत्रों के विस्तार तथा किसी स्वर्गरूप कुटिया में रहकर स्वर्ग पाने के लिये तप करने से कोई लाभ नहीं होता। संसार में कष्ट से रहित मुक्तभाव सेे विचरण करने के लिये परमात्मा के नाम का स्मरण करने के अलावा अन्य कर्मकांड व्यापारिक प्रवृत्ति का ही प्रतीक हैं।
      वेद, पुराण, शास्त्र तथा अन्य प्राचीन धार्मिक ग्रंथों  के सू़त्र रटकर सुनाने वाले हमारे समाज में बहुत लोग हैं। हमारे देश में कथित रूप से अनेक धर्मों का अस्तित्व स्वीकार किया जाता है जबकि सच यह है कि शुद्ध आचरण ही मनुष्य के धमभीरु होने का परिचायक है।  हमारे देश में विभिन्न धार्मिक पहचान वाले समूह हैं जिनके तयशुदा रंग के वस्त्र पहनकर कथित ठेकेदार  ऐसा पाखंड करते हैं कि वह देश में अपने धार्मिक समूह के खैरख्वाह है।  ऐसे लोग धार्मिक ही  नहीं आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा प्रचार के क्षेत्र में अपने संपर्क बनाते हैं। अवसर आने पर इस तरह बयान देते हैं कि गोया कि उनके वाक्य सर्वशक्तिमान के श्रीमुख से प्रकट हुए हैं।
      हमारे देश के लोगों में अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति झुकाव सदैव रहा है इसलिये समाज का एक बड़ा वर्ग इन धार्मिक गुरुओं के चक्कर में नहीं पड़ता पर जिस तरह यह लोग प्रचार करते हैं उससे तो बाहरी देशों में यह धारण बनती है कि भारत के नागरिक अधंविश्वासी हैं।  हम जैसे योग तथा ज्ञान साधकों की दृष्टि से स्थिति ठीक विपरीत है पर चूंकि गुणीजन स्वतः प्रचार नहीं करते जबकि यह पेशेवर धार्मिक ठेकेदार अपने विज्ञापन के लिये धन भी व्यय करते हैं तो ऐसा लगता है कि उनका समाज पर उनक भारी प्रभाव है।
      योग साधना, भक्ति तथा चिंत्तन एकांत में की जाने वाली क्रियायें हैं।  एक तरह से यह ज्ञान यज्ञ होता है जबकि कर्मकांड द्रव्यमय यज्ञ हैं जिसको हमारे अध्यात्मिक दार्शनिक अधिक महत्व नहीं देते।  पेशेवर धार्मिक लोग समाज को इसी द्रव्यमय यज्ञ के लिये प्रेरित करते हैं जबकि ज्ञान यज्ञ से ही परमात्मा की अनुभूति की जा सकती है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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