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Sunday, March 29, 2009

भर्तृहरि दर्शन: अपने मन की इच्छाएं ज़िंदगी भर (article on hindu dharm in hindi) हैं

खलालापाः सोढाः कथमपि तदाराधनपरैर्निगृह्यह्यान्तर्वाष्पं हसितमपि शून्येन मनसा।
कृतश्चित्तस्तम्भः प्रहसितधियाम´्जलिरपित्वमाशे मोघाशे किमपरमतो नर्तयसि माम्

हिंदी में भावार्थ-भर्तृहरि जी कहते हैं कि दुष्ट लोगों की सेवा करते हुए उनके अनेक व्यंग्यात्मक कथन सुनने पड़े। दुःख के कारण अंदर के आंसुओं को किसी तरह बाहर आने से रोका और उनको प्रसन्न करने के लिये जबरन चेहरे पर हंसी लाने का प्रयास किया। अपने मन को समझाकर उन्हें प्रसन्न करने के लिये उनके सामने अनेक बार हाथ जोड़े। अपने अंदर जो आशायें और आकांक्षायें हैं वह पता नहीं कितना नचायेंगी

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आदमी के मन में अनेक प्रकार की आशायें, आकांक्षायें और इच्छायें होती हैं जो उनको उनको अपने स्वामी या उच्च पदस्थ व्यक्ति की जीहुजूरी के लिये बाध्य करती हैं। जो सोने का चम्मच मूंह में लेकर पैदा हुए हैं वह निरीह लोगों के मन की बात को नहीं समझ सकते। धन, पद और बाहूबल से संपन्न लोगों के सामने अनेक प्रकार के लोग हाथ जोड़े खड़े रहते हैं पर वह मन से कभी उनके नहीं होते। अपनी आशाओं और आशाओं की पूर्ति के लिये उनके सामने उनकी प्रशंसा और पीठ पीछे निंदा कर अपने मन हल्का करते हैं। संसार में माया का प्रभाव है और वह अनेक प्रकार से मनुष्य को उलझाये रहती हैं। अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिये एक मनुष्य को माया दूसरे का गुलाम बना देती हैं।
कई बार गुलामी और नौकरी से ऊबा आदमी व्यथित हो जाता है पर वह अपनी जगह से हट नहीं सकता क्योंकि उसे अपनी आशाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिये माया की जरूरत होती है और वह इसलिये नाचता रहता है और सोचता भी है कि कब वह इससे मुक्ति पाये पर वह कभी आजाद नहीं हो पाता। उसका मन ही उसको उकसाता है और वही उसको पिंजरे में रहने को भी बाध्य करता है।
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Wednesday, March 11, 2009

भर्तृहरि दर्शन:सहायता कर सभी को सुनाएं नहीं

पद्माकरं दिनकरो विकची करोति
चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम्
नाभ्यर्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति
संत स्वयं परहिते विहिताभियोगाः


हिंदी में आशय-बिना याचना किये सूर्य नारायण संसार में प्रकाश का दान करते है। चंद्रमा कुमुदिनी को उज्जवलता प्रदान करता है। कोई प्रार्थना नहीं करता तब भी बादल वर्षा कर देते हैं। उसी प्रकार सहृदय मनुष्य स्वयं ही बिना किसी दिखावे के दूसरों की सहायता करने के लिये तत्पर रहते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समाज सेवा करना फैशन हो सकता है पर उससे किसी का भला होगा यह विचार करना भी व्यर्थ है। टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में समाज सेवा करने का समाचार आना एक विज्ञापन से अधिक कुछ नहीं होता। कैमरे के सामने बाढ़ या अकाल पीडि़तों को सहायता देने के फोटो देखकर यह नहीं समझ लेना चाहिये कि वह मदद है बल्कि वह एक प्रचार है। बिना स्वार्थ के सहायत करने वाले लोग कभी इस तरह के दिखावे में नहीं आते। जो दिखाकर मदद कर रहे हैं उनसे पीछे प्रचार पाना ही उनका उद्देश्य है। इससे समाज का उद्धार नहीं होता। समाज के सच्चे हितैषी तो वही होते हैं जो बिना प्रचार के किसी की याचना न होने पर भी सहायता के लिये पहुंच जाते हैं। जिनके हृदय में किसी की सहायता का भाव उस मनुष्य को बिना किसी को दिखाये सहायता के लिये तत्पर होना चाहिये-यह सोचकर कि वह एक मनुष्य है और यह उसका धर्म है। अगर आप सहायता का प्रचार करते हैं तो दान से मिलने वाले पुण्य का नाश करते हैं।
कहते हैं कि दान या सहायता देते समय अपनी आँखें याचक से नहीं मिलाना चाहिए क्योंकि इससे अपने अन्दर अंहकार और उसके मन में कुंठा के भाव का जन्म होता है। दान या सहायता में अपने अन्दर इस भाव को नहीं लाना चाहिए कि "मैं कर रहा हूँ*, अगर यह भाव आया तो इसका अर्थ यह है कि हमने केवल अपने अहं को तुष्ट किया।
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