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Sunday, February 1, 2015

ध्यान से वृत्तियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन लेख(dhayan se vritiyo par niyantran paya ja sakta hai-A Hindu hindi thought article based on patanjali yoga sahitaya)




                                                       यह संसार चक्र अपनी गति से चलता है।  सदियों से अनेक मनुष्य इस धरती पर जन्मे फिर काल कलवित हो गये। यह अलग बात है कि अपने जीवनकाल में हर मनुष्य यही सोचता है कि उसकी सांसे भौतिक वस्तुओं की तरह  संपत्ति है।  जीवन निर्वाह के कर्मो को वह इतनी रुचि के साथ करता है अपने अध्यात्म या आत्म के प्रति लापरवाह हो जाता है। लाभ पर हंसना और हानि होने पर रोकर वह पूरा जीवन बिता देता है।  इसके विपरीत योग तथा ज्ञान साधक जीवन के हर पल का सहजता से आनंद उठाते हैं।  वह जानते हैं कि लोभ से निराशा, राग से द्वेष, मोह से वियोग तथा अविद्या से भय के भाव का स्थायी संयोग है।  जो  घट गया वह  आज स्मृतियों में है  और जो चल रहा है वह भी स्मृतियों का ही भाग हो जायेगा।  इसलिये अपने अंदर राग या कामना का भाव नहीं आने देते क्योंकि बाद के भाव द्वेष और निराशा का भी उनको अनुमान होंता है। इसलिये विषयों में वह सीमित भाव हिन्दी में भावार्थ-अविद्या, मोह, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश यह पांच प्रकार के क्लेश हैं।

पतंजलि योग में कहा गया है कि

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अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः।

                                                       हिन्दी में भावार्थ-अविद्या, मोह, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश यह पांच प्रकार के क्लेश हैं।

सुखानुशयी राग।



सुखानुशयी राग।

                                                       हिन्दी में भावार्थ-सुख भोगने की जो इच्छा हृदय में रहती है उसे राग कहा जाता है।

दुःखानुशायी द्वेषः।

                                                       हिन्दी में भावार्थ-दुःख के अनुभव के पीछे जो भाव है उसे द्वेष कहते हैं।

ध्याहेयास्तदृवृत्त्यः।

                                                       हिन्दी में भावार्थ-ऐसी वृत्तियों का त्याग ध्यान से ही किया जा सकता है।

                                                       संसार का हर  विषय हमारी देह से जुड़ा है पर वह अंतिम सत्य नहीं है। जिस तरह देह को धारण करने वाला ही अंतिम शक्ति है उसी तरह सांसरिक विषयों से अधिक अध्यात्मिक ज्ञान महत्वपूर्ण है। एक बात तय है कि देह का सांसरिक विषयों से जिस तरह संयोग होता है उसी तरह उसके कर्म के परिणाम अच्छे और बुरे दोनों तरह का संयोजन करते हैं। जहां राग है वहां क्लेश है और जहां कामना है वहां निराशा उत्पन्न होगी यह निश्चित है।  इस तरह के संयोग का ध्यान से ही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।  ध्यान और योग में सक्रिय लोग विषयों से जुड़ने के बाद उनसे परिणाम प्रतिकूल होने पर निराशा नहीं होते क्योंकि वह राग से परे होते हैं।  अपनी दैहिक आवश्यकता की पूर्ति के लिये प्रयास रहते हैं पर वस्तुओं में कामना नहीं रखते क्योंकि जानते हैं कि  एक दिन वह पुरानी हो जायेंगी तब निराशा का भाव आयेगा।
            ध्यान से वृत्तियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन लेखसे संपर्क रखते हैं ताकि उनसे निराशा या तनाव न हो।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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