समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
-------------------------


Showing posts with label #HindiArticle. Show all posts
Showing posts with label #HindiArticle. Show all posts

Wednesday, April 19, 2017

अंतर्जाल पर सौम्य व सुंदर तस्वीर दिखाने वाले सदाबहार बने रहें (Internet And Beutiful Foto)


                                 हमारे दो फेसबुक खाते हैं। पहले सार्वजनिक फेसबुक के एक या दो वर्ष दूसरा  केवल निजी संपर्क वाले लोगों के लिये ही बिनाया था। देखते देखते वहां मित्रों का झुंड बन गया। हम दस वर्ष से अंतर्जाल पर सक्रिय है। आरंमिक दौर में अपने जैसे ही फुर्सतिया लेखकों ने हमें प्रोत्साहित किया पर फेसबुक के बाद वह छूट गये। इनमें से कुछ आज भी साथी हैं। तब हिन्दी भाषा इतनी नहीं लिखी और पढ़ी जाती थी जितनी अब।  अंतर्जाल पर निजी मित्र तो कोई था ही नहीं। उस समय जब हम लोगों को बताते थे कि हम अंतर्जाल पर लिखते हैं तो मासूमियत से देखते थे। अब निजी संपर्क वाला ऐसा कौनसा नाम है जिसे ढूंढने निकले और वह मिले नहीं।  कईयों को हम देखते हैं पर उन्हें अपना फेसबुक दिखाने नहीं जाते।  भूले बिसरे लोगों को ढूंढ निकाला। उम्र की कोई सीमा नहीं देखी।  सतर से अस्सी वर्ष के  लोगों को फेसबुक से ढूंढ निकाला। हम सतत फेसबुक नहीं बैठते-समय नहीं ढूंढते, मिलता है तो बैठ जाते हैं।
                    हमारी राय में फेसबुक पर मनोविज्ञान का अध्ययन सहजता से किया जा सकता है। दोनों फेसबुक पर एक मजेदार बात हमने देखी है। निजी संपर्क वालों में एक पहचान और सार्वजनिक संपर्क वाले पर दो मित्र महिलाओं की सौम्य, सुंदर तथा आकर्षक तस्वीरों डालते हैं। दोनों की उम्र समान होगी पर जातीय पहचान अलग है। इनकी तस्वीरें एक ही दिन में एक से दस तक हो सकती हैं। तय बात है कि यह लोग स्वयं उनका संग्रह नहीं करते बल्कि यहीं अंतर्जाल से निकालते होंगे। जब हम अपनी  घरेलू स्तंभ देखते हैं तो एक दो पोस्ट के बाद इनकी तस्वीरें आती रहती हैं। अगर कोई इनकी उम्र देखे तो शायद व्यंग्यात्मक टिप्पणी भी कर सकता है पर हम जैसे सकारात्मक विचार वाले तो इनके प्रयासों की सराहना ही करेगा। यह हमें श्रृगार रस का असमय सेवन कराते हैं जो बोझिल वातावरण को भी रसदार बना देता है।  बस एक ही विचार आता है यार यह इतनी सारी तस्वीरों लाते कहां से हैं? हम पूछते नहीं क्योंकि लगता है कि उनक अंतर्जाल साधना बाधित न हो। हम शब्दप्रेमी हैं और पढ़ने लिखने में ही हमारी रुचि है फिर भी इतना जरूर कहना चाहेंगे कि ऐसे माननीय लोग सदाबहार बने रहें।

Friday, March 24, 2017

हिन्दी भाषा में रोमियो शब्द के तीन आशय होते हैं-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन (Three meaning in Hindi Languvase-Hind Satire Thought)

                                         हिन्दी भाषा में किसी भी संज्ञा के तीन अर्थ होते हैं।  किसी भी शब्द का  अर्थ तथा भाव प्रसंग की अनुसार लिया जाता है। हम यहां उत्तरप्रदेश में चल रहे एंटी रोमियो अभियान का मजाक उड़ाने वाले प्रगति तथा उलटपंथियों के हिन्दी ज्ञान पर ही सवाल उठा रहे हैं क्योंकि वह शेक्सिपियर को अपना आदर्श मानते हैं और उनके एक पात्र का अपमान सहन नहीं कर रहे।  विश्व में हिन्दी एकमात्र ऐसी भाषा है जो जैसी बोली जाती है वैसी लिखी जाती है यह कहा जाता है पर हमारा मानना है कि इसमें शब्दों के भाव वैसे नहीं होते जैसे बोले जाते हैं वरन् यह उन प्रसंगों का संदर्भ तय करता है।
                      हम अपनी दृष्टि से रोमियो ही नहीं वरन् मजनूं और रांझा के परिप्रेक्ष्य में भी इन्हें मान सकते हैं। हम रोमियो का शाब्दिक आशय लें तो वह शेक्सिपियक के नाटक का एक पात्र है जिसने जूलियट से प्रेम किया था।  
                        लाक्षणिक अर्थ तब आता है जब कोई प्रेमिका अपने प्रेमी से कहे-‘वाह रे मेरे रोमियो।’ यहां उसके प्रेमी का नाम रोमियो नहीं है पर वह लक्षणों से उसकी पहचान बता रही हैं।
             तय बात है कि व्यंजन विधा में उस तरफ इशारा किया जाता है जहां किसी के प्रेम का मजाक उड़ाना हो। प्रेमी तब तक प्रेमी नहीं माना जा सकता जब तक प्रेमिका ने उसका प्रणय निवेदन स्वीकार नहीं किया है। ऐसे में उसका नाम न रोमियो है न ही उसके लक्षण प्रेमी जैसे हैं तब उस पर रोमियो की ताना जड़कर मजाक उड़ाया जा रहा है।  हमारे यहां साहित्य विधा में व्यंजना शैली का बहुत महत्वपूर्ण हैं।  संस्कृति तथा हिन्दी में अनेक महान लेखक तो ऐसे हैं कि उनकी हर रचना तीनों विधाओं में एक साथ पूर्ण लगती है। यह पढ़ने वाले पर है वह कितना प्रखर है?  सजग पाठक हमेशा व्यंजना शैली में अर्थ लेता है क्योंकि वही उसके व्यक्तित्व निर्माण में सहायक होती है। वह इस तरह रचना को पढ़ता है जैसे वह उसमें से अपने लिये ज्ञान बढ़ा सके।  जहां हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान की बात करें तो यहां अध्यात्मिक रूप से राधा कृष्ण का प्रेम ही सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है। इस प्रेम की व्याख्या तीनों विधाओं में होती है तो अध्यात्मिक ज्ञानी भी इसके पवित्र भाव की व्याख्या करते हैं।
              सीधी बात कहें तो उत्तरप्रदेश में रोमियो शब्द से आशय उन लोगों की तरफ है जो इकतरफा प्रेम की चाहत में लड़कियों को परेशान करते हैं और व्यंजना विधा में इसे एंटरोमियो अभियान नाम दिया गया है। इसके शाब्दिक या लाक्षणिक अर्थों पर बहस एक बकवास लगती है। हालांकि इस बहाने प्रगति तथा उलटपंथी यह बताना नहीं भूल रहे कि वह विदेशी साहित्य के महान ज्ञाता है।
---------
                      पहले भारत फिर अमेरिका और अब उत्तरप्रदेश में सत्तापरिवर्तन ने पाक के मीडिया को भारी बेचैन कर दिया है। हैरानी इस बात की है कि जिस हिन्दू धर्म या संस्कृति का अपना नंबर एक दुश्मन मानते हैं वह स्वाभाविक रूप से उसका हिस्सा हैं पर स्वयं को अरेबिक संस्कृति से जुड़ा दिखना चाहते हैं। बात धर्म की करते हैं पर उनको यह मालुम नहीं कि एक अरबी और एक हिन्दू जब आपस में कहीं मिलेंगे तो वह धर्म की बजाय अन्य विषयों पर स्वाभाविक विचार विमर्श करते हें। अरब की धार्मिक विचाराधारा के पाकिस्तानी अनुयायी इस भ्रम में है कि उनकी संस्कृति भी अरबी है या होना चाहिये-अरब वाले इनको अरेबिक मानते नहीं और यह स्वयं को हिन्दू कहना नहीं चाहते। इस अंतर्द्वंद्व ने पाकिस्तानियों की मानसिक रूप से वहां के विद्वानों को भी विक्षिप्त कर दिया है।  वहां का उदार विचारक भी भी हिन्दू के प्रति सद्भाव दिखाने में हिचकता है्र्र-वह भी हिन्दू संस्कृति के उज्जवल पक्ष को नहीं देखता। पाकिस्तानियों को विचार विमर्श देखकर हमें लगता है कि हमें कभी उनसे सद्भाव की आशा नहीं करना चाहिये।

Sunday, January 8, 2017

अगर प्रबंध कौशल है तो मादक पदार्थों तथा सट्टे वाले क्रिकेट व्यापार पर रोक लगाकर दिखायें-हिन्दी संपादकीय #If the Are Good State manager so should Ban on Batting Cricket-Hindi Editorial)


                            हम शराब पीने का समर्थन नहीं करते पर एक योग व ज्ञान साधक के रूप में हमारा मानना है कि अपनी पंसद दूसरों पर थोपना अहंकार है। शराब न पीने के लिये प्रेरणा उत्पन्न करने का प्रयास करना चाहिये पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि स्वयं पीने की नियमित आदत से मुक्त होने पर इतराना चाहिये।
               इधर कुछ दिन से अंतर्जाल पर कुछ लोग शराब पर प्रतिबंध लगाने को एक आदर्श कदम मानने लगे हैं। दरअसल शराब पर प्रतिबंध लगाना एक सहज कदम है पर उससे मुश्किल उसके अवैध उत्पादन तथा वितरण रोकना है-इससे जहरीली शराब बनने तथा राजस्व हानि दोनो की आशंका रहती है। गुजरात में शराब पर प्रतिबंध है पर वहां के अनुभवी बताते हैं कि वहां चाहे जहां शराब मिल सकती है-बस महंगे दाम चुकाने होते हैं। अभी बिहार की चर्चा भी खूब हो रही है पर वहां अवैध शराब बनने और बिकने के समाचार भी आते हैं।
                 शराब पर प्रतिबंध लगाने की वकालत करने वालों को हम यह भी बता दें कि इस समय देश में मादक द्रव्य पदार्थों की बिक्री और उनका सेवन जमकर हो रहा है। यह महंगेे तथा स्वास्थ्य के लिये भयावह होते हैं।  हम पंजाब में युवाओं के जिस नशे को लेकर चिंतित रहते हैं वह शराब नहीं वरन् पाकिस्तान से आने वाले यही मादक पदार्थ हैं।  वैसे पंजाब ही नहीं पूरा देश ऐसे नशों की जाल में फंसा है जिनका अवैध रूप से वितरण होता है। देखा जाये तो युवा कौम बुरी तरह से इसके जाल में फंसी है।
               इधर शराब के साथ ही तंबाकू का भी विरोध होता है। हम बता दें कि सादा तंबाकू का सेवन भी चूने के साथ होता है।  यह भी ठीक नहीं है पर इससे ज्यादा खतरनाक तो पाउच में बिकने वाले तंबाकू निर्मित पदार्थ हैं। उनके विज्ञापन भी बेधड़क दिखते हैं।  विशेषज्ञ उन पर ही प्रतिबंध की मांग करते हैं पर उसकी आड़ में सादा तंबाकू पर रोक लगाने की बात होती है। कुछ लोग मानते हैं कि सादा तंबाकू के साथ अगर सुपारी न खायी जाये तो वह अधिक कष्टकारक नहीं होती-पर इसका आशय यह नहीं कि हम उसका समर्थन करें पर इतना जरूर कहते हैं कि सादा तंबाकू का सेवन हमारे यहां सदियों से हो रहा है इसलिये उस पर रोक की बजाय पाउच वाले तंबाकू पर बैन लगाना चाहिये। 
              हमारा तो यह कहना है कि शराब तथा तंबाकू पर सेवन पर राजकीय प्रतिबंध लगाकर लोकप्रियता का सूत्र अपनाने वाले अगर मादक पदार्थों के वितरण व सेवन को रोककर बतायें तो हम माने कि वह कुशल प्रबंधक हैं। देश में इन खतरनाक मादक पदार्थों की बिक्री जमकर हो रही है। इतना ही नहीं मादक द्रव्य के सौदागर बहुत ताकतवर भी माने जाते हैं। अगर आप हमें कट्टर समझें तो आपत्ति नहीं है तब भी कहेंगे कि उच्च स्तरीय क्रिकेट भी सट्टे के लिये प्रेरक है उस पर भी प्रतिबंध लगा दिया जाये। न लगाया जाये तो उसका सीधा प्रसारण रोक दिया जाये।  हमने मादक द्रव्य पदार्थों के सेवन और सट्टे पर पैसा खर्च करने वालों के हाल देखें है।  शराब या सादा तंबाकू बंदी तो सरलता से लोकप्रियता दिलाने वाली है इसलिये कोई भी कर सकता है पर अगर प्रबंध का कौशल  और पराक्रम है तो तीव्र मादक पदार्थों पर सट्टे वाले क्रिकेट पर रोक लगाकर दिखायें।

अध्यात्मिक पत्रिकाएं