समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
-------------------------


Saturday, February 14, 2015

संतुष्ट गरीब किसी धनिक से बेहतर-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन लेख(santush garib kisi dhanik se behatar-A Hindu hindu religion thought based on patanjali yog sahitya)



            कहा जाता है कि संतोष सबसे बड़ा धन है पर आज हम जब समाज में इस सिद्धांत के आधार पर दृष्टि डालते हैं तो आभास होता है कि लोग माया की दृष्टि से अधिक धनी जरूर हो गये पर मानसिक रूप से बहुत दरिद्र हैं।  स्थिति यह है कि धन, पद और प्रतिष्ठा के अभाव से त्रस्त अनेक लोग आत्महत्या कर स्वयं को जीवन से मुक्ति दिला देते हैं।  नश्वर देह को समय से पहले ही नष्ट करना अने लोगों को  अच्छा लगने लगा है।
            हमारे एक मित्र ने एक किस्सा सुनाया जो  हमें अत्यंत रुचिकर लगा । वह मित्र अपनी धर्मपत्नी के साथ मंडी गये थे।  वहां उनका एक परिचित दूधिया अपनी साइकिल छायादार स्थान पर खड़ी कर गर्मी में बटी खा रहा था।  उसके पास आठ दस बटियां थीं। सभी जानते हैं कि गर्मी में बटियां खाने से पानी की कमी नहीं होती।  हमारे मित्र ने उस दूधिया से कहा-अरे, इतनी सारी बटियां जमा कर रखी हैं। सभी खाओगे या बचाकर घर ले जाओगे?’’
            उस दूधिया ने कहा कि-‘‘सभी खाऊंगा। मेरा घर यहां से सात  किलोमीटर दूर है। इस गर्मी में साइकिल चलाते हुए यही बटियां मेरे पेट में कूलर का काम करेंगी।’’
            हमारे मित्र ने उसकी आंखों में जो आत्मविश्वास देखा उससे वह आत्मविभोर हो गये।  उन्होंने अपनी पत्नी से कहा-‘‘पता नहीं यह गलतफहमी अनेक समाज सेवकों  को क्यों है कि गरीब और परिश्रमी लोग जीवन में मुश्किलों से हार जाते हैं। ऐस लोगों को देखो तो लगता है कि गरीब होना ही दुःख का प्रमाण नहीं है।  इस लड़के की आंखों में जो आत्मविश्वास था वह हम जैसे सभ्रांत वर्ग के बच्चों के पास कहां होता है? सबसे बड़ी बात यह कि गरीबों को भिखारी मानकर विचार नहीं करना चाहिए।’’

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
---------------
वयमिह परितृष्टा वल्कलैस्त्वं दुकूलैस्सभ इह परितोषे निर्विशेषो विशेषः।
स तु भवतु दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः।।
            हिन्दी में भावार्थ-हे राजन्! हम पेड़ की छाल के वस्त्र पहनकर संतुष्ट हैं तो तुम रेशमी परिधान पहनकर प्रसन्न हो। संतोष तो हम दोनों को ही है तब विरोध वाली बात कहां है? इसमें विशेष कुछ नहीं है। दोनों ही संतुष्ट है तब अंतर नहीं है। मगर जो दरिद्र है पर जिसकी इच्छायें अधिक है उसका अगर मगर संतोष से भर जाये तो धनिक और दरिद्र में अंतर कहां रह जाता है।

            आधुनिक राज्यव्यवस्थाओं में पूरे विश्व के शिखर पुरुष हमेशा ही गरीबों के मसीहा होने का दावा करते हैं यह अलग बात है कि उनके प्रशासनिक तंत्र की नीतियां और कार्यशैली इसके विपरीत दिखती हैं।  गरीब, बेसहारा, बूढ़े, कमजोर तथा विकलांग की सेवा के नारे पूरे विश्व में लगते हैं।  तब ऐसा लगता है कि बस इस धरती पर देवता प्रकट होने वाले ही है।  ऐसा होता नहीं क्योंकि इस तरह के नारे लगाने वालों का उद्देश्य केवल प्रचार के माध्यम से अपना अर्थ साधने का होता है।  सभी गरीब भीख नहीं मांगते और श्रम से जीने वाले सभी लोग धनिक होने का सपना देखकर अपना समय भी नष्ट नहीं करते।  अभावों में जीने वाले जिंदा हैं तो संपन्न लोगों को अपनी रक्षा की चिंता खाये जाती है।
            इसलिये किसी गरीब को देखकर उस पर हंसना नहीं चाहिये और न ही अपनी संपन्नता के मद में रहकर जीवन बिताना चाहिये। जिसके पास मन का संतोष है वही सबसे बड़ा धनी है। बढ़त राजरोगों के बढ़़ते प्रभाव से तो यही निष्कर्ष निकलता है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Sunday, February 1, 2015

ध्यान से वृत्तियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन लेख(dhayan se vritiyo par niyantran paya ja sakta hai-A Hindu hindi thought article based on patanjali yoga sahitaya)




                                                       यह संसार चक्र अपनी गति से चलता है।  सदियों से अनेक मनुष्य इस धरती पर जन्मे फिर काल कलवित हो गये। यह अलग बात है कि अपने जीवनकाल में हर मनुष्य यही सोचता है कि उसकी सांसे भौतिक वस्तुओं की तरह  संपत्ति है।  जीवन निर्वाह के कर्मो को वह इतनी रुचि के साथ करता है अपने अध्यात्म या आत्म के प्रति लापरवाह हो जाता है। लाभ पर हंसना और हानि होने पर रोकर वह पूरा जीवन बिता देता है।  इसके विपरीत योग तथा ज्ञान साधक जीवन के हर पल का सहजता से आनंद उठाते हैं।  वह जानते हैं कि लोभ से निराशा, राग से द्वेष, मोह से वियोग तथा अविद्या से भय के भाव का स्थायी संयोग है।  जो  घट गया वह  आज स्मृतियों में है  और जो चल रहा है वह भी स्मृतियों का ही भाग हो जायेगा।  इसलिये अपने अंदर राग या कामना का भाव नहीं आने देते क्योंकि बाद के भाव द्वेष और निराशा का भी उनको अनुमान होंता है। इसलिये विषयों में वह सीमित भाव हिन्दी में भावार्थ-अविद्या, मोह, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश यह पांच प्रकार के क्लेश हैं।

पतंजलि योग में कहा गया है कि

--------------------

अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः।

                                                       हिन्दी में भावार्थ-अविद्या, मोह, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश यह पांच प्रकार के क्लेश हैं।

सुखानुशयी राग।



सुखानुशयी राग।

                                                       हिन्दी में भावार्थ-सुख भोगने की जो इच्छा हृदय में रहती है उसे राग कहा जाता है।

दुःखानुशायी द्वेषः।

                                                       हिन्दी में भावार्थ-दुःख के अनुभव के पीछे जो भाव है उसे द्वेष कहते हैं।

ध्याहेयास्तदृवृत्त्यः।

                                                       हिन्दी में भावार्थ-ऐसी वृत्तियों का त्याग ध्यान से ही किया जा सकता है।

                                                       संसार का हर  विषय हमारी देह से जुड़ा है पर वह अंतिम सत्य नहीं है। जिस तरह देह को धारण करने वाला ही अंतिम शक्ति है उसी तरह सांसरिक विषयों से अधिक अध्यात्मिक ज्ञान महत्वपूर्ण है। एक बात तय है कि देह का सांसरिक विषयों से जिस तरह संयोग होता है उसी तरह उसके कर्म के परिणाम अच्छे और बुरे दोनों तरह का संयोजन करते हैं। जहां राग है वहां क्लेश है और जहां कामना है वहां निराशा उत्पन्न होगी यह निश्चित है।  इस तरह के संयोग का ध्यान से ही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।  ध्यान और योग में सक्रिय लोग विषयों से जुड़ने के बाद उनसे परिणाम प्रतिकूल होने पर निराशा नहीं होते क्योंकि वह राग से परे होते हैं।  अपनी दैहिक आवश्यकता की पूर्ति के लिये प्रयास रहते हैं पर वस्तुओं में कामना नहीं रखते क्योंकि जानते हैं कि  एक दिन वह पुरानी हो जायेंगी तब निराशा का भाव आयेगा।
            ध्यान से वृत्तियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन लेखसे संपर्क रखते हैं ताकि उनसे निराशा या तनाव न हो।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Thursday, January 22, 2015

बेहतर राज्य प्रबंध से ही भारतीय धर्म की रक्षा संभव-हिन्दी चिंत्तन लेख(behatar rajya prabandh se hee bhartiya dharma ki raksha sambhav-hindi thought article)



            इस समय भारत के कुछ धार्मिक ठेकेदार अपने समूहों को प्रसन्न करने के लिये बेतुके बयान दे रहे हैं पर हम यहां केवल भारतीय धर्म से संबद्ध लोगों की बात करें।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार ज्ञानी को देशकाल, समय, क्षेत्र तथा समाज की वर्तमान स्थिति देखकर अपना विचार व्यक्त करना चाहिये। जो ऐसा नहीं करता वह ज्ञानी नहीं है।
            हमारे भारतीय धर्म के कुछ कथित विद्वान समाज में चार, आठ अथवा दस पुत्र पैदा करने का जो ज्ञान बघार रहे हैं क्या वह उन्हें पता नहीं है कि जन्म पुत्र और पुत्री दोनों में से किसी का भी हो सकता है।  हमने समाज में ऐसे लोग भी देखे हैं कि जिनको छह बच्चे हुए जो लड़के थे। ऐसे भी देखे कि सात लड़कियां एक ही क्रम में हुईं।  अनेक कथित धार्मिक ठेेकेदार भारतीय नारियों से पुत्र देने की मांग कर रहे हैं।  इनमें से तो कुछ इतने बड़े हैं कि उनकी पहचान महान व्यक्तित्व की है।  कितने शर्म की बात है कि यह नारियों से नर की मांग कर रहे हैं पर यह भूल जाते हैं कि नर ही नर पैदा हुए तो फिर आगे कौन जन्म का आधार बनेगा? हिन्दू समाज में नारियों की संख्या कम हो गयी है शायद उन्हें इसका पता नहीं है। मध्यम वर्ग के लड़कों के लिये लड़कियां अत्यंत कम हो गयी हैं।  हमारे कुछ प्रदेशों में नारियों से नर की संख्या इतनी अधिक है कि वहां वधु दिलाने के चुनावी सभाओं में वादे तक किये जाते हैं।
            टीवी और समाचार पत्रों में प्रचार पाने तथा अपने शिष्यों में अपने धर्म का रक्षक दिखने की कामना करने वाले ऐसे कथित धार्मिक ठेकेदार इतने अज्ञानी हो सकते हैं यह आज तक नहीं पता था। वह कहते हैं कि हर क्षेत्र के लिये हमें पुत्र दो। धर्म की रक्षा के लिये आबादी बढ़ाओ। जब तक प्रचार माध्यम सीमित थे अनेक लोगों ने धर्म नाम पर अपनी पवित्र छवि बना ली पर अब उनकी व्यापकता के चलते अब पता लग रहा है कि वैचारिक रूप से वह कितने निम्न स्तर के हैं।      विवादास्पर बयानों से यह प्रचार माध्यम  में बहसों का केंद्र तो बनते हैं पर उद्घोषक इन्हें मूर्ख  तथा सांप्रदायिक कहते हुए थकते नहीं है। कभी कभी तो लगता है कि बाज़ार और प्रचार प्रबंधकों से प्रायोजित  यह धार्मिक नायक एक पूर्ववत योजना के तहत अपने धनदाता स्वामियों को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं।
            हम यह कहते हुए थकते नहीं हैं कि भारत में कभी सनातन या हिन्दू धर्म मानने वाले ही लोग थे। अब पश्चिम से आई धार्मिक विचाराधाराओं के बढ़ते प्रभाव पर हम चिंता कर रह हैं तो यह भी विचार करना चाहिये कि हमारे हिन्दू धर्म से ही जैन, सिख तथा बौद्ध धर्म का प्रादुर्भाव हुआ है। इस पर मनन करना चाहिये।  दरअसल हमारे यहां की शासन व्यवस्था हमेशा ही विवादों का केंद्र रही हैं। पहले राजशाही को कोसते थे तो अब आधुनिक लोकतंत्र पर भी अनेक लोग प्रश्न उठा रहे हैं।  एक अध्यात्मिक साधक होने के नाते हमारा विचार है कि हमारे देश की समस्या यह है कि राजसी कर्म में-जिसमें शासन, व्यापार तथा समाज सेवा जैसे विषय भी शािमल हैं-शिखर पर पहुंचे लोग तामसी वृतियों में लिप्त हो जाते हैं। जब हम राज धर्म की बात करते हैं तो शासन, व्यापार तथा सामाजिक संस्थाओं में इसका पालन होना आवश्यक है। हमारे यहां अहंकार की भावना से बहुत कम ऐसे राजसी पुरुष हैं जो किसी लघु को प्रगति की राह पर चलाकर उच्चतक शिखर पर पहुंचाकर गौरव अनुभव करें। अधिकतर तो किसी को छोटा दिखाकर अपनी श्रेष्ठता का आनंद लेना चाहते हैं।  इसी प्रवृत्ति ने समाज में हमेशा वैमनस्य का भाव स्थापित कर रखा है।
            कहा जाता है कि भारत विश्व का अध्यात्मिक गुरु है।  सच है क्योंकि हमारे ऋषियों, मुनियों तथा तवस्वियों ने जिस ज्ञान रहस्य का संचय किया वह अनुपम है पर इसके पीछे यह भी देखना चाहिये कि उन्हें ऐसा अज्ञानी समाज मिला जिसे देखकर वह अनुसंधान कर सके।  जिस तरह गुलाब का फूल कांटों तथा कमल का फूल कीचड़ में खिलता है उसी तरह ज्ञान की अनुभूति अज्ञान के अंधेरे में होती है। हमारे यहां माया की भौतिक उपलब्धि भी परमात्मा की कृपा से जोड़ी जाती है। यही कारण है कि भौतिक रूप से संपन्न स्वयं को महान भक्त प्रमाणित करने के लिये प्रयासरत रहते हैं। अपना वैभव हजम नहीं होता और वह समाज के सामने उसका प्रदर्शन कर वैमनस्य बढ़ाते हैं।  बड़े और छोटे वर्गों के बीच समन्वय का काम राज्य का है और यकीन मानिए कहीं न कहीं विदेशी धार्मिक विचाराधाराओं का आना हमारे राजसी पुरुषों की नाकामी का प्रमाण है। हम यह कहते हैं कि हमारे यहां भारतीय धर्म मानने वालों की संख्या कम हो रही है तो इसके पीछे हमारे आर्थिक और सामाजिक कारण हैं।  उन्हें दूर किये बिना आबादी बढ़ाने का विचार करना व्यर्थ है।  जितनी बड़ी संख्या में अभी भी हैं पहले उनको सामाजिक रूप से तो स्थापित कर लें तब भविष्य का विचार करें।  इसलिये प्रयास यह करना चाहिये कि सुशासन एक नारा बनकर नहीं रहे वरन् उसे प्रजा के बीच चलते हुए दिखना चाहिए। कम से कम जैसे योग तथा ज्ञान साधक को इसके अलावा कोई मार्ग नहीं दिखता। इन कथित धर्म के ठेकेदारों को अगर अपनी नेकनीयती प्रमाणित करनी है तो बजाय वह आबादी बढ़ने का नारा देने के राजसी पुरुषों को भ्रष्टाचार से दूर रहने तथा सार्वजनिक जीवन में सादगी अपना का संदेश देना चाहिये। यही आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Saturday, January 17, 2015

भारत का आम हिन्दू अध्यात्मिक रूप से ज्ञानी है-हिन्दी चिंत्तन लेख(bharat ka aam hindu adhyatmik roop se gyani hai-hindi thought article)



            अभी हाल ही में एक फिल्म से हमारे देश के धार्मिक संगठनों के लिये हास्यास्पद स्थिति का निर्माण किया।  इस फिल्म के विरोध अभियान चलाते समय में रणनीति तथा धरातल के सत्य का उनको ज्ञान नहीं था-यह बात साफ प्रतीत होती है।  एक सामान्य फिल्म जो तीन दिन में दम तोड़ देती एक निरर्थक विरोध अभियान ने उसने इतिहास के सबसे अधिक राजस्व कमाने वाली फिल्म बना दिया।  अगर हिन्दू धर्म की रक्षा का अभियान इन कथित लोगों को युद्ध स्तर पर चलाना है तो नीतियां भी व्यवहारिक अपनाना चाहिए। बिना रणनीति के कोई रण नहीं जीता जा सकता।  कम से कम उन्हें इस विषय में चाणक्य और विदुर नीति का अध्ययन तो अवश्य करना चाहिये।

      जब कोई सेनापति युद्ध के लिये जब निकलता है तो अपने अस्त्र शस्त्र के भंडार के साथ ही अपने सैनिकों के पराक्रम की व्यापकता और सीमा दोनों का ही अध्ययन कर लेता है।  इतना ही नहीं वह अपनी प्रजा की मानसिकता का भी विचार करता है।  हमारे भारत में कथित धर्म रक्षक हवा में ही शब्द बाण छोड़कर आत्ममुग्ध हो जाते हैं।  उन्हें न तो अपने समाज के संपूर्ण विचारों का ज्ञान है न यह जानते हैं कि आर्थिक, सामाजिक तथा पारिवारिक कारणों से वह मध्यम वर्ग कितने भारी तनाव में सांस ले रहा है जो धर्म के लिये बौद्धिकता का दान देता है। उसी तरह उस निम्न वर्ग के लिये अपने अस्तित्व का संघर्ष अत्यंत जटिल हो गया है जो धर्म की रक्षा के लिये अपना श्रम दान करता है।  पैसा दान करने वाला उच्च वर्ग भी अब अपने सात्विक लक्ष्य पाने की बजाय स्वार्थवश ही करता है।  सामाजिक तथा आर्थिक विषयों में तीनों वर्ग समन्वय स्थापित नहीं कर पा रहे-बल्कि कहीं कहीं वैमनस्य की भावना भी बढ़ रही है।

      ऐसे में फिल्म को लेकर कथित धर्म रक्षकों का अभियान न केवल टांय टांय फिस्स हुआ वरन् उससे फिल्म बनाने वालों को कमाई अधिक ही हो गयी।  उससे भी अधिक अब हंसी महिलाओं को चार बच्चे पैदा करने की प्रेरणा देने पर उड़ रही है। जिस तरह महिलाओं को एक वस्तु मानकर यह बात कही गयी है वह अत्यंत अपमानजनक है।  इन लोगों का एक तरह से इसी तरह की मान्यता है कि महिलायें तो केवल बच्चे पैदा करने की मशीन है। इससे ज्यादा उसका महत्व नहीं है।

      चार बच्चे पैदा करने की प्रेरणा के लिये विचित्र बातें कही जा रही हैं।

      1-चार बच्चे इसलिये पैदा करो क्योंकि दूसरे समूह के लोग चालीस कर रहे हैं।

      2-एक बच्चा सीमा पर भेज दो। एक संतों को दे दो। दो अपने पास रख लो।

      निहायत ही हास्यास्पद तर्क हैं। पहली बात तो यह कि बच्चे से आशय इनका लड़के से ही है।  क्या यह मानते हैं कि इनकी राय पर चलने वाली औरते केवल लड़के को ही जन्म देंगी? क्या गर्भवती होने पर वह भ्रुण परीक्षण कराने जायेंगी।  क्या जब तक चार लड़के जन्म लें तब तक लड़कियों का जन्म उनको स्वीकार्य होगा? इससे तो बच्चों की संख्या आठ से दस तक जा सकती है।  आज स्वास्थ्य का जो स्तर है उसमें यह संभव नहीं लगता।  इस तरह तो कन्या भ्रुण हत्या को प्रोत्साहन मिलेगा?। हमें मालुम है कि देश की सामान्य महिलायें समझदार हैं और इस तरह के बयानवीरों की असलियत जानती हैं।  दूसरी बात यह कि सीमा पर जाने का मतलब सेना में भर्ती होने से ही है।  उस पर दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि देश में बेरोजगारी इतनी है कि किसी स्थान विशेष पर चार या पांच सौ सैनिकों की भर्ती के लिये शिविर लगता है तो वहां चालीस से पचास हजार लड़के भर्ती होने के लिये आ जाते हैं।  अनेक जगह तो भीड़ बेकाबू होने से उपद्रव भी हो चुके हैं।  पहले तो इस देश के युवकों को पूरी तरह भर्ती करा लें जो मौजूद हैं।  संतों को देने का सवाल एकदम अधार्मिक है।  कहीं भी किसी जगह इस तरह का संदेश नहीं है।

      हम यहां यह स्पष्ट कर दें कि भारत की विश्व में पहचान श्रीमद्भागवत गीता के कारण अधिक है।  उसमें जो अध्यात्मिक ज्ञान है वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पूर्व काल में था।  धार्मिक वस्त्र पहनकर स्वयं को विद्वान समझने वाले लोगों को अपने अध्यात्मिक ज्ञान के बारे में कितना पता है यह तो पता नहीं पर इतना तय है कि उनमें अपने समाज को लेकर आत्मविश्वास की भारी कमी है। वह शायद नहीं जानते कि भारत का आम हिन्दू अध्यात्मिक रूप से ज्ञानी है।

प्रस्तुत है इस पर एक कविता

--------------------------

सच्चाई यह है कि
संख्या बल से
युद्ध नहीं जीते जाते।

पराक्रमियों का संरक्षण
समाज अगर न पा सके
शांति से दिन नहीं बीते जाते।

कहें दीपक बापू बुद्धि के वीरों पर
दो गुणा दो बराबर चार का सिद्धांत
असर नहीं करता
एक और ग्यारह की योजना से
करते किला फतह,
भीड़ बढ़ाकर नहीं चाहते कलह,
अपनी सोच से बढ़ते आगे
बांटते हैं वह सभी को प्रसन्नता
स्वयं भी सुख पीते जाते।
---------------------

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Friday, January 9, 2015

भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से इतर अन्य विचाराधाराऐं राजनीतिक आधार पर चलती हैं-हिन्दी चिंत्तन लेख (bhartiya adhyatmik darshan se itar anya vichardharaen rajneetik adhar par chaltee hain-hindi hindu thought article)



            फ्रांस के पेरिस में लगातार आतंकवादी हमलों से वहां के वातावरण जो भावनात्मक विष मिश्रित हो रहा है उसे कोई समझ नहीं पा रहा है।  ऐसा लगता है कि विश्व में मध्य एशिया से निर्यातित आतंकवाद के मूल तत्व को कोई समझ नहीं पा रहा है। हमारे देश में कथित रूप से जो सर्व धर्म समभाव या धर्म निरपेक्ष का राजनीतिक सिद्धांत प्रचलित है वह विदेश से आयातित है और भारतीय दर्शन या समाज की मानसिकता का उससे कोई संबंध नहीं है। पहले तो सर्व धर्म शब्द ही भारतीय के लिये एक अजीब शब्द है।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन में कहीं भी हिन्दू धर्म का नाम नहीं है वरन् उसे आचरण और कर्म से जोड़ा गया है।  कभी कभी सर्व धर्म भाव या धर्मनिरपेक्ष शब्द कौतूहल पैदा करता है।  इस संसार में आचरण या कर्म के आशय से प्रथक अनेक कथित धर्म हो सकते हैं-यह बात भारतीय ज्ञान साधक के लिये सहजता से गेय नहीं हो पाती।
            जब हम यह दावा करते हैं कि हमारे देश में विभिन्नता में एकता रही है तो उसका आम जनमानस में  पूजा पद्धति के प्रथक प्रथक रूपों की स्वीकार्यता से है। हम जैसे अध्यात्मिक ज्ञान साधकों के लिये किसी की भी पूजा पद्धति या इष्ट के रूप पर प्रतिकूल टिप्पणी करना अधर्म करने वाला काम होता है। सर्वधर्म समभाव तथा धर्म निरपेक्ष शब्द अगेय लगते हैं पर इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी मूल भावना से कोई विरोध है।  इसके बावजूद विश्व में प्रचलित कथित धर्मों के नाम पर चल रही गतिविधियों का आंकलन करना जरूरी लगता है।  स्पष्टतः मानव में अदृश्य सर्वशक्तिमान के प्रति जिज्ञासा तथा सम्मान का भाव रहता है।  इसी का दोहन के करने के लिये अनेक प्रकार की पूजा पद्धतियां तथा इष्ट के रूप में निर्मित किये गये।  यहां तक सब ठीक है पर उससे आगे जाकर अज्ञात सर्वशक्तिमान  के आदेश के नाम पर मनुष्य जीवन के रहन सहन, खान पान तथा पहनावे तक के नियम भी बनाने की प्रक्रिया चतुर मनुष्यों की अपना स्थाई समूह बनाकर अपना वैचारिक सम्राज्य विस्तार की इच्छा का परिणाम लगता है।  वह इसमें सफल रहे हैं।  पूजा पद्धतियां और इष्ट के रूप अब मनुष्य के लिये धर्म की पहचान बन गये हैं।  उससे भी आगे रहन सहन, पहनावे और खान पान में अपने शीर्ष पुरुषों के सर्वशक्तिमान के संदेश के नाम पर बिना चिंत्तन किये अनुसरण इस आशा में करते हैं कि इस धरती पर इस नश्वर देह के बिखरने के बाद आकाश में भी बेहतर स्थान मिलेगा। पूजा पद्धतियां और सर्वशक्तिमान के रूप ही लोगों की पहचान अलग नहीं कर सकते क्योंकि इनके साथ मनुष्य एकांत में या कम जन समूह में संपर्क करता है जबकि खान पान, रहन सहन तथा पहनावे से ही असली धर्म की पहचान होती है।  हम एक तरह से कहें कि जिस तरह सर्व धर्म समभाव या धर्म निरपेक्षता राजनीतिक शब्दकोष से आये हैं उसी तरह विभिन्न धर्मों से जुड़े शब्द भी प्रकट हुए हैं।  हम सीधी बात कहें तो पूजा पद्धति और इष्ट के रूप से आगे निकली धर्म की पहचान उसके शिखर पुरुषों की राजनीतिक विस्तार करती है।  ऐसे में जब हम जैसे चिंत्तक विभिन्न नाम के धर्मों को देखते हैं तो सबसे पहला यह प्रश्न आता है कि उसकी सक्रियता से राजनीतिक लाभ किसे मिल रहा है?
            इतिहास बताता है कि मध्य एशिया में हमेशा ही संघर्ष होता रहा है। परिवहन के आधुनिक साधनों से पूर्व विश्व के मध्य में स्थित होने के कारण दोनों तरफ से आने जाने वाले लोगों को यहां से गुजरना होता था।  इसलिये यह मध्य एशिया पूरे विश्व के लिये चर्चा का विषय रहा है।  तेल उत्पादन की वजह से वहां माया मेहरबान है और ऐसे में इस क्षेत्र के प्रति विश्व के लोगों का आकर्षण होना स्वाभाविक रहा है।  ऐसे में मध्य एशिया ने अपनी पूजा पद्धति और इष्ट के रूप के साथ मनुष्य जीवन में हस्तक्षेप करने वाली प्रक्रियाओं को जोड़कर अपने धर्म का प्रचार कर अपना साम्राज्य सुरक्षित किया है।  इस क्षेत्र में अन्य पूजा पद्धतियों या इष्ट के रूप मानने वालों को स्वीकार नहीं किया जाता मगर इसके बावजूद उन पर सर्वधर्म समभाव या धर्मनिरपेक्ष भाव अपनाने का का दबाव कोई नहीं डाल सकता।  अलबत्ता इन्होंने अपने दबाव से भिन्न पूजा पद्धतियों और इष्ट के रूप मानने वालों को  सर्वधर्म समभाव या धर्मनिरपेक्ष भाव अपनाने का दबाव डाला।  इनके पास तेल और गैस के भंडार तथा उससे मिली आर्थिक संपन्नता से विश्व के मध्यवर्गीय समाज का वहां जाने के साथ  अपने क्षेत्र में ही प्रमुख धार्मिक स्थान होने की वजह से जो शक्ति मिली उससे मध्य एशिया के देशों की ताकत बढ़ी।  यह क्षेत्र आतंकवाद का निर्यातक इसलिये बना क्योंकि अपना भावनात्मक साम्राज्य विश्व में बदलाव से नष्ट होने की आशंका यहां के शिखर पुरुषों में हमेशा रही है।
            हमें इनकी गतिविधियों पर कोई आपत्ति नहीं है पर हम यह साफ कहना चाहते हैं कि पूजा पद्धति और इष्ट के रूप के आगे जाकर कथित रूप से अन्य परंपरायें शुद्ध रूप से राजसी विषय है-स्पष्टत । सात्विक भाव का इनसे कोई संबंध नहीं है। हमारा भारतीय अध्यात्मिक दर्शन जिसे सुविधा के लिये हम हिन्दू संस्कृति का आधार भी कह सकते हैं वह केवल पूजा पद्धति के इर्दगिर्द ही रहा है।  इतना ही नहीं जीवन को सहन बनाने के लिये योग साधना जैसी विधा इसमें रही है जिसमें आसन, प्राणायाम तथा ध्यान के माध्यम से समाधि का लक्ष्य पाकर व्यक्त्तिव में निखार लाया जा सकता है।  भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का आधार ग्रंथ श्रीमद्भागवत गीता स्वर्णिम शब्दों का भंडार है  सांसरिक विषय का रत्तीभर भी उल्लेख  नहीं है।  स्पटष्तः कहा गया है कि अध्यात्मिक ज्ञान होने पर मनुष्य राजसी विषय में भी सात्विकता से सक्रिय रह कर सहज जीवन बिता सकता है।  खान पान, पहनावे, तथा रहन सहन के साथ ही कोई ऐसा धार्मिक प्रतीक चिन्ह नहीं बताया गया जिससे अलग पहचान बनी रहे। हमारी पहचान दूसरे कथित धर्मों से अलग इसलिये दिखती है क्योंकि उनके मानने वाले अपनी विशिष्ट पहचान के लिये बाध्य किये गये दिखते हैं।
            जिस तरह पूरे विश्व में कथित धर्मों के बीच संघर्ष चल रहा है उसके आधार पर हमारी यही राय बनी है कि उनके आधार राजनीतिक ही हैं। हमारे देश के लोग यह कहते हैं कि धर्म को राजनीति से नहीं जोड़ना चाहिये तो उन्हें यह समझना होगा कि इस नियम का पालन केवल भारतीय अध्यात्मिक विचारधाराओं में ही होता है।  बाहर से आयातित सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा साहित्य विचाराधारायें शुद्ध रूप से राजनीतिक पृष्ठभूमि वाली हैं। अगर ऐसा न होता तो रहन सहन, खान पान तथा पहनावा जो भौगोलिक आधारों पर तय होना चाहिये उसके लिये सर्वशक्तिमान के आदेश बताने की जरूरत नहीं होती। 
---------------------------------
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Saturday, January 3, 2015

अज्ञानियों की ज्ञानियों से निभना कठिन-हिन्दी चिंत्तन लेख(agyaniyon ki gyani se nibhna kathin-hindi thought article)



            इस संसार में चार तरह के के भक्त पाये जाते हैं-आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  श्रीमद्भागवत् गीता में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि उन्हें ज्ञानी भक्त ही प्रिय है।  यह सभी मानते हैं कि श्रीगीता हमारी धार्मिक विचाराधारा का आधार ग्रंथ है पर आधुनिक संदर्भ में उसको समझ पाने की क्षमता उन लोगों में नहीं हो सकती जो धर्म से ही भौतिक समृद्धि की आशा करते हैं। इस तरह की भौतिक समृद्धि आर्ती तथा अर्थार्थी भाव वाले भक्त से धन मिलने पर ही संभव है जिनके लिये अध्यात्मिक तत्वज्ञान केवल सन्यासियों का विषय है।  उनके लिये अंदर के प्राणों से अधिक बाह्य विषयों की तरफ आकर्षित मन ही स्वामी होता है। आर्त भाव से अपनी समस्याओं के निराकरण तो अर्थार्थी अपनी भौतिक सिद्धि के लिये देव मूर्तियों पर धन चढ़ाते हैं।  वह चमत्कारों तथा दुआओं पर यकीन करते हैं।  उन्हें यह समझाना कठिन है कि सांसरिक विषयों का संचालन माया से स्वतः ही होता है।  अध्यात्मिक ज्ञान से प्रत्यक्षः समृद्धि नहीं आती पर देह, मन और पवित्रता की वजह से जो आनंद प्राप्त होता है  उसका मूल्य मुद्रा से आंका नहीं जा सकता। मगर समाज का अधिकांश वर्ग पश्चिमी प्रभाव के कारण प्रत्यक्ष प्रभुता में ही आनंद ढूंढ रहा है ऐसे में किसी से ज्ञान चर्चा भी व्यर्थ लगती है।


कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
----------------
निरालोके हि लोकेऽस्मिन्नासते तत्रपण्डिताः।
जात्यस्य हि मणेर्यत्र काचेन समता मता।।
                        हिंदी में भावार्थ- अज्ञान के अंधेरे में रहने वाले अज्ञानी के पास विद्वान रहना पसंद नहीं करते।  जहां मणि हो वहां कांच का काम नहीं होता उसी तरह विद्वान के पास अज्ञानी के लिये कोई स्थान नहीं है।

            हम अक्सर समाचारों में यह सुनते हैं कि दक्षिण के एक मंदिर तथा महाराष्ट्र के  मुख्य संाई बाबा पर करोड़ों का चढ़ावा आता है।  वहां सोने के मुकुट और सिंहासन चढ़ाये जाते हैं।  एक बात निश्चित है कि छोटी रकम का चढ़ावा कोई सामान्य इंसान कर सकता है पर अगर भारी भरकम की बात हो तो यकीनन ईमानदारी की आय से यह संभव नहीं है। हम देख रहे हैं जैसे जैसे देश में काले धन की मात्रा बढ़ रही है वैसे वैसे ही चढ़ावा भी बढ़ रहा है।  हम यह कह सकते हैं कि जिस तरह नैतिकता का पैमाना नीचे जा रहा है वैसे ही पाखंड का स्तर ऊंचा जा रहा है। अध्यात्मिक ज्ञान से प्रत्यक्षः समृद्धि नहीं आती पर देह, मन और पवित्रता की वजह से जो आनंद प्राप्त होता है  उसका मूल्य मुद्रा से आंका नहीं जा सकता। मगर समाज का अधिकांश वर्ग पश्चिती प्रभाव के कारण प्रत्यक्ष प्रभुता में ही आनंद ढूंढ रहा है ऐसे में किसी से ज्ञान चर्चा भी व्यर्थ लगती है।
            अध्यात्मिक ज्ञान साधकों के लिये धर्म के नाम पर कर्मकांडों का तमाशा अधिक महत्व नहीं रखता पर अपने मन की बात सार्वजनिक रूप से कहते भी नहीं है क्योंकि श्रीमद्भागवत गीता में स्पष्टतः कहा गया है कि ज्ञानी कभी भी अज्ञानियों को अपनी भक्ति से विमुख करने का प्रयास न करे।  न ही वह उनकी राय का अनुमन करे।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Tuesday, December 30, 2014

शक्तिशाली देश चाहते हो तो मनोरंजन और व्यसनों के दासत्व से मुक्ति पाओ-कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर चिंत्तन लेख(shaktishali desh chahte ho to manoranjan aur vyasaon ke dasatva se mukti pao-A Hindu hindu religion thought based on kautilya ka arthshastra)



                             भारत एक विशाल प्राकृतिक संपन्न देश है। विश्व में क्षेत्रफल की दृष्टि से अनेक बड़े देश हैं पर उनमें प्राकृतिक और मानवीय संसाधन की दृष्टि से अनेक दोष हैं। भारत में सभी प्रकार के खनिज पाये जाते हैं तो जलसंपदा भी यहां बहुत है।  उनके दोहन के लिये जनसंपदा भी कम नहंी है। अनेक देश बड़े हैं और उनकी उनके पास प्राकृत्तिक संपदा भी बहुत है पर जनसंख्या अधिक नहीं है जिससे वह उसका पूर्ण दोहन नहीं कर पाते।  अनेक देशों का क्षेत्रफल बड़ा है पर वहां जमीन में न पानी है  और न ही खनिज संपदा।  उन बड़े  देशों में संपन्नता है पर भारत जैसा अध्यात्मिक ज्ञान नहंी है। भारत विश्व मे अपने अध्यात्मिक ज्ञान के कारण भी जाना जाता है।  यही कारण है कि भारत के विरोधी राष्ट्र उस पर शासन करने के लिये यहां भेदनीति अपनाते हैं। अध्यात्मिक ज्ञान के कारण  आम भारतीय धर्मभीरु व्यक्ति  बौद्धिक रूप से दृढ़ होता है इसलिये यहां के समाज पर शासन सहज नहीं है।  यही कारण है कि यहां नये मानसिक भौतिक तथा मानसिक व्यसन निर्यात किये जाते हैं।
                             कार्ल मार्क्स ने कहा था कि धर्म अफीम की तरह होता है।  यह पाश्चात्य विचाराधाराओं पर पूर्णतः सही लगता है भारत में धर्म निजी नियंत्रण बनाये रखना वाला सिद्धांत है।  भारत में विदेशी विचाराधाराओं की तरह मार्क्सवाद भी आया है।  इसके मानने वाले समाज सेवा को व्यसन की तरह करते हैं।  उन्हें भारतीय अध्यात्मिक दर्शन अफीम का तत्व लगता है।  इतना ही नहीं मार्क्स के शिष्य हर विदेशी राजनीतिक, धार्मिक तथा सामाजिक विचार को भारतीय विचाराधाराओं से  श्रेष्ठ मानते हैं।  अंग्रेंजोें ने भारत को गुलाम बनाये रखने के लिये ऐसी शिक्षा पद्धति अपनाई कि आज हर शिक्षार्थी नौकरी यानि गुलामी के लिये तत्पर रहता है।  उससे भी काम न चला तो क्रिकेट जैसा खेल थोप दिया। भारत की बुद्धि का हरण उन्होंने इस कदर किया कि फिल्म और क्रिकेट के नायक यहां भगवत्स्वरूप प्रचारित हो रहे हैं।  प्रचार माध्यम उनकी आड़ में ढेर सारी आय अर्जित कर रहे हैं। धर्म, अर्थ और समाज सेवा के क्षेत्र में सक्रिय शिखर पुरुष धनार्जन के नशे में लग ेहुए हैं तो आम लोग मनोरंजन के दास हो गये हैं।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

--------------

स्फीतं त्रीणि बलं शक्यमाधातुं पानवर्त्मनि।

हृस्वप्रयासव्यायामादितिसैन्यं समुत्पतेत्।।

            हिन्दी में भावार्थ-शत्रु की सेना अगर बल में अधिक हो तो उसे मद्यपान के व्यसन में लगाकर  व्यायाम में लग होने पर उसे आक्रमण कर दें।

                              अभी हाल ही में भारत में बढ़ते मादक द्रव्य पर समाचार आये थे।  चार दिन चर्चा चली पर नतीजा वही ढाक के तीन पात!  अंग्रेजों ने यहां शासन कर यह समझ लिया था कि यहां का अध्यात्मिक ज्ञान जितना प्रबल उतना ही यहा लोग मानसिक रूप से कमजोर है।  उनकी कमजोरियों पर  अनुसंधान के कारण ही यहां के ऋषि, मुनि और तपस्वियों ने महान ज्ञान स्थापित किया। इस ज्ञान के रहते भारतीयों पर शासन कठिन है इसलिये उन्होंने विदेशी विचारधाराऐं यहां प्रवाहित कीं।  अंग्रेजों ने इसलिये ही अपनी शिक्षा पद्धति, खेल तथा मनोरंजन के साधन के रूप में स्थापित किया ताकि यहां से जाने के बाद भी उनका प्रभाव बना रहे।  इधर यह भी चर्चा होती रही कि फिल्मों के प्रदर्शन, क्रिकेट में सट्टे और मादक द्रव्यों से आतंकवादी संगठन पैसा अर्जित कर रहे हैं फिर भी हमारे देश के लोग मनोरंजन के दासत्व से मुक्त नहीं हो पा  रहे।  एक तरह से मद्यपान-फिल्म, क्रिकेट और मादक द्रव्य-इस देश पर विदेशी कब्जा हो गया है। हमारा मानना है कि अगर हमारे देश के लोग कम से कम दो वर्ष फिल्म, क्रिकेट और मादक द्रव्यों से दूर रहें तो यहां वातावरण अत्यंत सहज हो जायेगा।  भारत को व्यसनों में धकेलने वाले तब निराश हो कर चुप हो जायेंगे।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

अध्यात्मिक पत्रिकाएं