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Saturday, October 30, 2010

कबीर दास के दोहे-भक्ति करने से मान न मिलने पर मूर्ख दुःखी होते हैं (kabir das-bhaki aur samman)

मान बड़ाई ऊरमी, ये जग का व्यवहार।
दीन गरीबी बन्दगी, सतगुरु का उपकार।।
संत शिरोमणि कबीरदास का कहना है कि जिस तरह दुनियां का व्यवहार है उससे देखकर तो यही आभास होता है कि मान और बड़ाई दुःख का कारण है। सतगुरु की शरण लेकर उनकी कृपा से जो गरीब असहाय की सहायता करता है, वही सुखी है।

मान बड़ाई देखि कर, भक्ति करै संसार।
जब देखैं कछु हीनता, अवगुन धरै गंवार।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों की देखादेखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं पर जब वह नहीं मिलता वह मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में ऐसे अनेक लोग हैं जो अपनी धार्मिक छबि बनाये रखने के लिये भक्ति का दिखावा करते हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो गुरु बनकर अपने लिये शिष्य समुदाय का निर्माण कर अपनी रोजी रोटी चलाते हैं। ऐसे दिखावे की भक्ति करने वाले अनेक लोग हैं। इसके विपरीत जो भगवान की वास्तव में भक्ति करते हैं वह उसका प्रयार नहीं करते न ही अपना ज्ञान बघारते हैं।
भक्त और ज्ञानी की पहचान यह है कि वह कभी अपनी भक्ति और ज्ञान शक्ति का बखान नहीं करते बल्कि निर्लिप्त भाव से समाज सेवा करते हुए अपना जीवन यापन करते हैं। अपनी सच्ची भक्ति और ज्ञान के कारण कुछ लोग महापुरुषों की श्रेणी में आ जाते हैं उनको देखकर अन्य लोग भी यही प्रयास करते हैं कि उनकी पूजा हो। यह केवल अज्ञान का प्रमाण है अलबत्ता अपने देश में धार्मिक प्रवचन एक व्यवसाय के रूप में चलता रहा है। इस कारण तोते की तरह किताबों को रटकर लोगों को सुनाते हुए खूब कमाते हैं। उनको देखकर कुछ लोग यह सोचते हुए भक्ति का दिखावा करते हैं कि शायद उनको भी ऐसा ही स्वरूप प्राप्त हो। अनेक लोग संतों की सेवा में इसलिये जाते हैं कि हो सकता है कि इससे उनको किसी दिन उनकी गद्दी प्राप्त हो जाये। ऐसे में भक्ति और ज्ञान तो एक अलग विषय हो जाता है और वह मठाधीशी के चक्कर में राजनीति करने लगते हैं। किताबों को रटने की वजह से उनको शब्द ज्ञान याद तो रहता है ऐसे में वह थोड़ा बहुत प्रवचन भी कर लेते हैं पर उनकी भक्ति और ज्ञान प्रमाणिक नहीं है। वैसे भी अपने पौराणिक ग्रंथों का अध्ययन हर आदमी इतना तो कर ही लेता है कि उसे सारी कथायें याद रहती हैं। नहीं भी अध्ययन करे तो इधर उधर सुनकर उसे बहुत सारी कथायें याद आ ही जाती हैं। । किसी आदमी ने वह भी नहीं किया हो तो अपने अध्यात्मिक दर्शन के कुछ सूक्ष्म सत्य-निष्काम कर्म करो, परोपकार करो, दया करो और माता पिता की सेवा करे जैसे जुमले- सुनाते हुए श्रोताओं और दर्शकों की कल्पित कहानियों से मनोरंजन करता है। उनको सम्मानित होते देख अन्य लोग भक्ति में जुट जाते हैं यह अलग बात है कि कामना सहित यह भक्ति किसी को भौतिक फल दिलाती है किसी को नहीं।
फिर भक्ति हो या ज्ञानार्जन अगर कामना सहित किया जाये और सफलता न मिले तो आदमी संसार में दोष ढूंढने लगता है। यह केवल भक्ति या ज्ञान के विषय में नहीं है बल्कि साहित्य और कला के विषयों में भी यही होता है। आदमी आत्ममुग्ध होकर अपना काम शुरु करता है पर जब उसे सफलता नहीं मिलती तो वह निराश हो जाता है। निष्कर्ष यह है कि सम्मान पाने का मोह आदमी के लिये दुःख का कारण बनता है। एक बात याद रखें सम्मान पाने की चाह पूरी नहीं हुई तो दुःख तो होगा और अगर पूरी भी हो गयी तो अपमान भी हो सकता है। जहां सुख है वहां दुःख भी है। जहां आशा है वहां निराशा भी है। जहां सम्मान है वहां अपमान भी है। अगर सम्मान मिल गया तो चार लोग आपके दोष निकालकर अपमान भी कर सकते हैं।
इसलिये अच्छा यही है कि अपने कर्म निष्काम भाव से करें। इस संसार में निर्विवाद सम्मान पाने का बस एक ही तरीका है कि आप गरीब को धन और अशिक्षित को शिक्षा प्रदान करें। प्रयोजन रहित दया करें। ऐसे काम बहुत कम लोग करते हैं। जो सभी कर रहे हैं उसे आप भी करें तो कैसा सम्मान होगा? सम्मान तो उसी  कार्य करने पर  ही संभव मिलना संभव   है जो दूसरे लोग न करते हों।  अपना और अपने परिवार का भरण पोषण तो सभी करते हैं पर परमार्थ करने वालों को ही सम्मान मिलता है यह बात याद रखें।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर मध्यप्रदेश
editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep[,Gwalior Madhya Pradesh
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Friday, October 1, 2010

अयोध्या में राम मंदिर प्रचार माध्यमों ने खूब भुनाया-हिन्दी लेख (ram mandir in ayodhya and hindi media-hindi article)

कभी कभी तो ऐसा लगता है कि आम लोगों का ध्यान अन्य विषयों से हटाकर राष्ट्र या समाज की तरफ लगाने के लिये ज्वलंत मुद्दे फिक्स होते हैं। नयी दुनियां में आधुनिक लोकतंत्र में समाज सेवकों, सौदागरों तथा प्रचार प्रबंधकों का संगठित समूह लोगों को बहलाये रखने के लिये अपने साथ किराये के बुद्धिजीवी भी रखने भी लगा है जो अपने से संबंधित विषय का कोई ज्वलंत मुद्दा सामने आने पर संगठित प्रचार माध्यमों में अपनी बात कहने के लिये सजधजकर आते है। जिस तरह राजनीति, व्यवसाय, फिल्मों के साथ ही कला साहित्य के क्षेत्र में में व्यक्तिवाद तथा वंशवाद का बोलबाला प्रारंभ हो गया है। वंशवाद और व्यक्तिवाद अब बौद्धिक क्षेत्र में भी स्थापित किया जा रहा है।
प्रसंग रामजन्म भूमि के संबंध में अदालती फैसले का है। जिस पर भारतीय प्रचार माध्यम पुराने चेहरों को सामने लाकर उनकी प्रतिक्रिया जानने का प्रयास करते रहे। इतना ही नहीं एक चैनल में एक प्रतिष्ठित वकील के पुत्र वकील को ही न्यायिक समीक्षा के लिये बुलवा लिया। उन महाशय ने अपने विचार रखे भी पर तब ऐसा लग लगा कि अपने वकील पिता की वजह से वह उस समय कैमरे के सामने हैं। वरना दूसरे विद्वान वकीलों की कमी है क्या?
कुछ मुद्दों को ज्वलंत बनाये रखने के लिये प्रचार माध्यम सक्रिय रहते हैं। अयोध्या के राम मंदिर पर अदालत के फैसला एक महत्वपूर्ण घटना थी पर कई बरसों तक चले इस प्रसंग में अदालत के बाहर कुछ लोगों ने इससे लोगों की भगवान राम से जुड़ी भावनाओं को उबारे रखा ताकि उनकी लोकप्रियता बनी रहे। आधुनिक लोकतंत्र में यह सब होता है पर सवाल यह है कि अपने देश के समाज सेवा, व्यापार, प्रचार तथा कला समूहों के शिखर पुरुष अपनी बढ़ती उम्र के साथ रूढ़ता का शिकार हो रहे हैं। वह नयी उम्र के युवाओं को अवसर देने की बात तो करते हैं पर उसका दायर अपने परिवार और रिश्तेदारों से आगे नहीं जाता। रामजन्मभूमि के विषय में प्रचार चैनलों में बूढ़े, थके और निरंतर उबाने वाले चेहरों की उपस्थिति इस बात को दर्शाती है कि अदालत में चलने और वही निर्णायक स्थिति में पहुंचने वाले इस मुद्दे पर अनावश्यक रूप से सार्वजनिक बहसें और विवाद हुए। जिसमें आम इंसानों का समय बर्बाद हुआ तो प्रचार माध्यमों ने विज्ञापनों से खूब कमाया।
प्रचार चैनलों के लोग बार बार नयी पीढ़ी की दुहाई देते रहे। उनका कहना था कि 1992 के बाद यह देश बदल गया है। आज की नई पीढ़ी इस तरह के विवाद नहीं चाहती। वह आधुनिक भारत चाहती है। कई चैनल संयमित समाचार देने का दावा कर देश में बनी शांति का श्रेय भी खुद लेते रहे। देश में शांति रही इसका पूरा श्रेय अदालत तथा जजों को जाता है जिन्होंने इतना संतुलित फैसला दिया न कि किसी अन्य व्यक्ति या सस्था को। नयी पीढ़ी को राम जन्मभूमि में दिलचस्पी नहीं है यह सोचना भी गलत है। नयी पीढ़ी राम से दूर हो रही है यह सोचने वाले अंधेरे दिखाकर रौशनी बेचने वाले हैं। पश्चिमी विकास में रची बसी नयी पीढ़ी अध्यात्मिक विषय में दिलचस्पी नहीं लेती ऐसे लोग मंदिरों में नहीं जाते और जाते हैं तो आंखें बंद किये रहते हैं। वहां युवक युवतियों का उतना ही प्रतिशत आता है जितना जनसंख्या में है। देश में कोई धार्मिक उन्माद नहीं था तो इसलिये कि हर उम्र के लोग अब अनेक ऐसे सच इन्हीं प्रचार माध्यमों से जान गये हैं जो पहले छिपाये जाते थे। देश में अब उन्माद नहीं फैलाया जा सकता क्योंकि आम आदमी-इसे आयु वर्ग में बांटना गलत है-इसके पक्ष में नहीं था। जब उन्माद फैला था तब आम आदमी के पास संचार माध्यम इतनी मात्रा में उपलब्ध नहीं थे। कहने का मतलब यह है कि यह दावा कि नयी पीढ़ी के लोग अध्यात्म ज्ञान या धर्म में रुचि नहीं रखते यह वजह शांति की वजह नहीं है बल्कि वह सब जानने लगे हैं कि किस तरह आजकल सभी जगह फिक्सिंग होने लगी है। आखिर अदालत में चलने वाले एक मामले की लंबे समय तक हुई सार्वजनिक बहस किस बात को दर्शाती है? कैसे लोग बातचीत के माध्यम से विवादित मुद्दों पर फैसला करने की बात कहकर अपने विचार व्यक्त करते हैं और अदालत की उपस्थिति छिपाने का प्रयास करते हैं यह समझने की अब जरूरत नहीं है। विज्ञापन के बीच में समय पास करने के लिये कोई विषय प्रचार माध्यमों को चाहिऐ और इसके लिये उन्होंने तोते के रूप में बुद्धिजीवी पाल रखे हैं जो रटी रटाई बात करते हैं।
एक चैनल में बाबा रामदेव आये। बहुत सुखद लगा। यकीनन वह प्रायोजित तोते नहीं है यह बात साफ लगी। उनके आने से पहले दो धर्मों के ठेकेदार वहां बहस कर रहे थे। वही पुरानी बातें। बाबा रामदेव ने कहा कि ‘बाबर एक आक्रमणकारी था और देश को एक भी आदमी उसके नाम के साथ खड़ा नहीं देखा जा सकता। और तो और ओरंगजेब ने भी इतने बरस राज्य किया पर उसकी कौम के लोग उसके नाम के साथ अब खड़े होने की बात नहीं करते। जहां तक राम की बात है तो वह सभी धर्मो के लोगों के घट घट के वासी है और कोई उनके नाम का विरोध कर ही नहीं सकता।’
उनकी बात का किसी ने जवाब नहीं दिया। उस बहस में ऐसा लगा कि जैसे बाज़ार के तयशुदा तोतों के बीच कोई बाहरी आदमी आ गया है तब लगने लगा कि योग की वजह से प्रतिष्ठत  हो चुके बाबा रामदेव को बुलाना एक मजबूरी थी क्योंकि चैनल वालों को भी पता है कि उनके तोता बुद्धिजीवियों के सहारे कार्यक्रम अधिक नहीं चल सकते।
कुछ प्रचार प्रबंधकों को अफसोस है कि कहीं इस मुद्दे का पटाक्षेप होने से उनका घाटा न हो जाये क्योंकि इससे उनका अनेक बार अच्छा समय पास हो जाता था। सच बात तो यह है कि अब इस मद्दे की हवा ही निकल गयी है। हालांकि अभी उच्च न्यायालय का फैसला है और सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा अभी बाकी है पर माननीय ज़जों ने अपने परिश्रम, विवेक और सदाशयता उपयोग कर जो निर्णय दिया है उससे देश के आम नागरिकों ने चैन की सांस ली है।
आखिरी बात यह है कि प्रचार माध्यम कल सहमे हुए लग रहे थे। बार बार यह कहना कि यह अंतिम फैसला नहीं है बल्कि आगे यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में भी जा सकता है, उनके डरपोक होने का प्रमाण है। साथ ही यह भी दर्शाता है कि बड़े शहरों के बाहर वह आम जनता को नहीं जानते। कभी राम जन्म भूमि पर घर घर चर्चा होती थी क्योंकि सीमित प्रचार माध्यम सच से हटकर उकसाने की बात करते थे। दूसरा यह भी कि समाज में चेतना का अभाव था। अब अनेक प्रकार के संचार माध्यमों उनके पास है। सबसे बड़ी बात यह कि इंटरनेट और अनेक टीवी चैनलों ने समाज में लोगों की रुचियों के अनुसार उसेे विभक्त कर दिया है और किसी एक विषय को लेकर उसे संगठित करना अब समाज के ठेकेदारों के लिए दुरुह कार्य हो गया है। ऐसे में राममंदिर या बाबरी मस्जिद के नाम पर समुदायों को संगठित करने का प्रयास यूं भी जोखिम भरा हो सकता था कि कहीं वह निष्फल न हो जाये। इससे अनेक शिखर पुरुषों की पोल खुल जाती। राम मंदिर पर आगे क्या होगा? हम जैसा आम ब्लाग लेखक भविष्यवाणी नहीं कर सकता पर अब इसकी हवा निकल गयी है और अदालत के फैसले का पालन कर ही शिखर पुरुष अपनी प्रतिष्ठा बचा सकते हैं। प्रचार माध्यमों ने भी इस विषय पर संयमित खबरें इसलिये दी क्योंकि उनको मिलने वाले विज्ञापनों के उत्पाद बाज़ार में बिकते हैं। उनके विज्ञापनदाता इधर कॉमलवेल्थ और उधर आस्ट्रेलिया भारत क्रिकेट टेस्ट से भी जुड़े हैं। देश में तनाव होगा तो हानि उनके राजस्व की होगी।
जय श्री राम जय श्री कृष्ण
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
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Saturday, September 25, 2010

संत कबीर दास-हाथी पर चढ़कर चंवर डुलवाने वाले नरक में जाते हैं (hathi par chadhne wale-sant kabir das ke dohe)

हाथी चढि के जो फिरै, ऊपर चंवर ढुराय
लोग कहैं सुख भोगवे, सीधे दोजख जाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि तो हाथी पर चढ़कर अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं और लोग समझते हैं कि वह सुख भोग रहे तो यह उनका भ्रम है वह तो अपने अभिमान के कारण सीधे नरक में जाते हैं।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जोरे बड़ मति नांहि
जैसे फूल उजाड़ को, मिथ्या हो झड़ जांहि
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि आदमी धन, पद और सम्मान पाकर बड़ा हुआ तो भी क्या अगर उसके पास अपनी मति नहीं है। वह ऐसे ही है जैसे बियावन उजड़े जंगल में फूल खिल कर बिना किसी के काम आये मुरझा जाता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-समय ने ऐसी करवट ली है कि इस समय धर्म और जनकल्याण के नाम पर भी व्यवसाय हो गया है। इस मायावी दुनियां में यह पता ही नहीं लगता कि सत्य और माया है क्या? जिसे देखो भौतिकता की तरफ भाग रहा है। क्या साधु और क्या भक्त सब दिखावे की भक्ति में लगे हैं। राजा तो क्या संत भी अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं। उनको देखकर लोग वाह-वाह करते हैं। सोचते हैं हां, राजा और संत को इस तरह रहना चाहिये। सत्य तो यह है कि इस तरह तो वह भी लोग भी भ्रम में हो जाते हैं और उनमें अहंकार आ जाता है और दिखावे के लिये सभी धर्म करते हैं और फिर अपनी मायावी दुनियां में अपना रंग भी दिखाते हैं। ऐसे लोग पुण्य नहीं पाप में लिप्त है और उन्हें भगवान भक्ति से मिलने वाला सुख नहीं मिलता और वह अपने किये का दंड भोगते हैं।
यह शाश्वत सत्य है कि भक्ति का आनंद त्याग में है और मोह अनेक पापों को जन्म देता है। सच्ची भक्ति तो एकांत में होती है न कि ढोल नगाड़े बजाकर उसका प्रचार किया जाता है। हम जिन्हें बड़ा व्यक्ति या भक्त कहते हैं उनके पास अपना ज्ञान और बुद्धि कैसी है यह नहीं देखते। बड़ा आदमी वही है जो अपनी संपत्ति से वास्तव में छोटे लोगों का भला करता है न कि उसका दिखावा। आपने देखा होगा कि कई बड़े लोग अनेक कार्यक्रम गरीबों की भलाई के लिये करते हैं और फिर उसकी आय किन्हीं कल्याण संस्थाओं को देते हैं। यह सिर्फ नाटकबाजी है। वह लोग अपने को बड़ा आदमी सबित करने के लिये ही ऐसा करते हैं उनका और कोई इसके पीछे जनकल्याण करने का भाव नहीं होता।
कभी कभी तो लगता है कि जनकल्याण का नारा देने वाले लोग बड़े पद पर प्रतिष्ठत हो गये हैं पर लगता नहीं कि उनके पास अपनी मति है क्योंकि वह दूसरों की राय लेकर काम करने आदी हो गये हैं। ऐसे लोगों के लिये कल्याण तो बस दिखावा है वह तो उसके नाम पर सुख तथा एश्वर्य प्राप्त करने में ही अपने को धन्य समझते हैं। ऐसे कथित धर्म के सौदागर बहुत दिखाई देते हैं जिनका न तो स्वयं का ज्ञान प्रमाणिक होता है और न ही वह ही वह लोभ और लालच की प्रवृत्ति से परे रहते हैं। उनकी शरण लेने से मनुष्य का न तो उद्धार होता है और न मन का संताप दूर होता है। इसलिए न केवल धन संपदा के मोह से बल्कि उनको प्राप्त करने वाले बड़े लोगों को लेकर कोइ भ्रम अपने अन्दर नहीं रखना चाहिये।
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Wednesday, September 22, 2010

हिन्दू धर्म संदेश-अभक्ष्य पदार्थों को ग्रहण करना ही अनुचित

शब्दश्चातोऽकामकारे।।
हिन्दी में भावार्थ-
इच्छानुसार अभक्ष्य भोजन करना निषेध ही है।

सर्वानन्नुमतिश्च प्राणात्ययेतद्दर्शनात्।।
हिन्दी में भावार्थ-
अन्न बिना प्राण न रहने की आशंका होने पर ही सब प्रकार के अन्न भक्षण करने की अनुमति है।
आबधाच्च
हिन्दी में भावार्थ-
वैसे आपातकाल में भी आचार का त्याग नहीं करना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल फास्ट फूड के सेवन की प्रवृत्ति बढ़ रही है जिसे स्वास्थ्य विशेषज्ञ अच्छा नहीं मानते। इसके अलावा तंबाकू की रसायन युक्त पुड़िया की आज की युवा पीढ़ी भक्त हो गयी है जो कि हर दृष्टि से खतरनाक है। समस्या यह है कि यह सब लोग अपनी इच्छानुसार कर रहे हैं। देश का उच्च तथा उच्च मध्यम वर्ग घर में खाने की बजाय बाहर के भोजन करने को उत्सुक रहता है। परिणाम यह है कि देश के अंदर अस्वस्थ लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही है। अब स्थिति यह है कि हर बड़े शहर में फाइव स्टार चिकित्सालय खुल गये हैं जिनमें अपने स्वस्थ जीवन की तलाश करने वाले लोगों की भारी भीड़ रहती है। शीतल पेयों को पीना फैशन हो गया है। गर्मी के अवसर पर लोग सादा पानी पीने की बजाय शीतल पेयों से प्यास बुझाते हैं जिससे अनेक प्रकार की बीमारियां होती हैं।
कहने का आशय यह है कि पूरे विश्व में अपने अध्यात्मिक ज्ञान की पहचान रखने वाला भारतीय समाज फैशन की वजह से अंधे रास्ते पर चल रहा है। जिन भक्ष्य पदार्थों तथा अशुद्ध पेयों के सेवन से परे रहना चाहिए उनको फैशन बना लिया है यह जाने बिना कि उनका उपयोग तभी करना चाहिये जब भक्ष्य पदार्थ तथा शुद्ध पेय उपलब्ध न हों। हमारे देश पर प्रकृति की विशेष कृपा है इसलिये ही यहां आज भी भूजल स्तर अन्य देशों से अधिक है। अनेक प्रकार के खनिज पदार्थ तथा प्रकृति संपदा उपलब्ध हैं। हम प्रकृति के आभारी होने की बजाय उससे दूर जा रहे हैं। जिसके कारण हम स्वर्ग में रहते हुए भी नरक के होने का आभास करते हैं। मनुष्य होकर भी पशु पक्षियों की तरह बाध्य होकर फैशन की मार झेल रहे हैं। अतः अपने खान पान को लेकर सजग होना चाहिये ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां स्वस्थ और सजग रहें। वैसे भी एक बात याद रखना चाहिए कि हम अपने खाने और पीने के दौरान जो पदार्थ लेते हैं उनमें दोष होने पर हमारे शरीर में भी दोष उत्पन्न होता है अर्थात हम बीमार पड़ते हैं।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक भारतदीप
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Saturday, September 11, 2010

हिन्दू धर्म संदेश-तप बल के अलावा उद्धार को कोई अन्य मार्ग नहीं (tapbal se uddhar-hindu dharma sandesh)

महाराज भर्तृहरि के अनुसार 
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दुराराध्याश्चामी तुरगचलचित्ताः क्षितिभुजो वयं तु स्थूलेच्छाः सुमहति फले बद्धमनसः।
जरा देहं मृत्युर्हरति दयितं जीवितमिदं सखे नान्यच्छ्रेयो जगति विदुषेऽन्यत्र तपसः।।
हिन्दी में भावार्थ-
राजाओं का चित तो घोड़े की गति से इधर उधर भागता इसलिये उनको भला कब तक प्रसन्न रखा जा सकता है। हमारे अंदर भी ऊंचे ऊंचे पद पाने की लालसा हैं। इधर शरीर को बुढ़ापा घेर रहा है। ऐसे में लगता है कि विवेकवान पुरुषों के लिये तप बल के अलावा अन्य कोई उद्धार का मार्ग नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- मनुष्य का यह मूल स्वभाव है कि वह हमेशा  ही अपने लिये मान पाना चाहता है और इसलिये ही धन संग्रह करने के साथ प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिये पूरा जीवना गुज़ार देता है।  उच्च पद पाने की उसमें महत्वाकांक्षा हमेशा बलवती रहती है और इसलिये ही अवने अपने से उच्च लोगों की चाटुकारित करने को हमेशा तैयार रहता है।
इस संसार में धनी, उच्च पदस्थ, तथा बाहुबली आदमी की कितनी भी सेवा कर लीजिये पर उनको प्रसन्न नहीं किया जा सकता क्योंकि उनका मन तो घोड़े की तरह दौड़ता है। उनकी सेवा में रत इंसान को लगता है कि स्वामी उनकी तरफ देख रहा है पर सच तो यह है कि राजसी लोगों के पास ढेर सारे सेवक होते हैं और उनमें किसी को वह विशिष्ट नहीं मानते। इतना ही नहीं अगर उनकी सेवा कोई ऐसा व्यक्ति करे जो उनके यहां कार्यरत न हो, उसको लेकर भी उनके मन में यह शंका उत्पन्न होती है कि वह भविष्य में हमारी सेवा पाने का प्रयास कर रहा है।
किसी आदमी को एक पद मिल गया तो फिर उससे बड़े पद की चाहत उसमें होने लगती है। वह भी मिल गया तो फिर उससे ऊंचे पद की आस करने लगता है। यह इच्छा अनंत है और इसका कहीं अंत नहीं है। आदमी अपने भौतिक लक्ष्यों की पूर्ति में लगा रहता कि उसे बुढ़ापा घेर लेता है। ऐसे में तो केवल एक ही बात उचित लगती है कि अपना समय सत्संग, भक्ति तथा अध्यात्मिक ज्ञान ग्रहण करने में भी बिताना चाहिये ताकि तत्व ज्ञान होने पर इस संसार में दुःख तथा मानसिक संताप से छुटाकारा पाया जा सके।
संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप', ग्वालियर 
editor and writter-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep
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Thursday, September 2, 2010

मान बड़ाई ऊरमी, ये जग का व्यवहार।
दीन गरीबी बन्दगी, सतगुरु का उपकार।।
मान बड़ाई देखि कर, भक्ति करै संसार।
जब देखैं कछु हीनता, अवगुन धरै गंवार।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों की देखादेखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं पर जब वह नहीं मिलता वह मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं।
संत शिरोमणि कबीरदास का कहना है कि जिस तरह दुनियां का व्यवहार है उससे देखकर तो यही आभास होता है कि मान और बड़ाई दुःख का कारण है। सतगुरु की शरण लेकर उनकी कृपा से जो गरीब असहाय की सहायता करता है, वही सुखी है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में ऐसे अनेक लोग हैं जो अपनी धार्मिक छबि बनाये रखने के लिये भक्ति का दिखावा करते हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो गुरु बनकर अपने लिये शिष्य समुदाय का निर्माण कर अपनी रोजी रोटी चलाते हैं। ऐसे दिखावे की भक्ति करने वाले अनेक लोग हैं। इसके विपरीत जो भगवान की वास्तव में भक्ति करते हैं वह उसका प्रयार नहीं करते न ही अपना ज्ञान बघारते हैं।
भक्त और ज्ञानी की पहचान यह है कि वह कभी अपनी भक्ति और ज्ञान शक्ति का बखान नहीं करते बल्कि निर्लिप्त भाव से समाज सेवा करते हुए अपना जीवन यापन करते हैं। अपनी सच्ची भक्ति और ज्ञान के कारण कुछ लोग महापुरुषों की श्रेणी में आ जाते हैं उनको देखकर अन्य लोग भी यही प्रयास करते हैं कि उनकी पूजा हो। यह केवल अज्ञान का प्रमाण है अलबत्ता अपने देश में धार्मिक प्रवचन एक व्यवसाय के रूप में चलता रहा है। इस कारण तोते की तरह किताबों को रटकर लोगों को सुनाते हुए खूब कमाते हैं। उनको देखकर कुछ लोग यह सोचते हुए भक्ति का दिखावा करते हैं कि शायद उनको भी ऐसा ही स्वरूप प्राप्त हो। अनेक लोग संतों की सेवा में इसलिये जाते हैं कि हो सकता है कि इससे उनको किसी दिन उनकी गद्दी प्राप्त हो जाये। ऐसे में भक्ति और ज्ञान तो एक अलग विषय हो जाता है और वह मठाधीशी के चक्कर में राजनीति करने लगते हैं। किताबों को रटने की वजह से उनको शब्द ज्ञान याद तो रहता है ऐसे में वह थोड़ा बहुत प्रवचन भी कर लेते हैं पर उनकी भक्ति और ज्ञान प्रमाणिक नहीं है। वैसे भी अपने पौराणिक ग्रंथों का अध्ययन हर आदमी इतना तो कर ही लेता है कि उसे सारी कथायें याद रहती हैं। नहीं भी अध्ययन करे तो इधर उधर सुनकर उसे बहुत सारी कथायें याद आ ही जाती हैं। । किसी आदमी ने वह भी नहीं किया हो तो अपने अध्यात्मिक दर्शन के कुछ सूक्ष्म सत्य-निष्काम कर्म करो, परोपकार करो, दया करो और माता पिता की सेवा करे जैसे जुमले- सुनाते हुए श्रोताओं और दर्शकों की कल्पित कहानियों से मनोरंजन करता है। उनको सम्मानित होते देख अन्य लोग भक्ति में जुट जाते हैं यह अलग बात है कि कामना सहित यह भक्ति किसी को भौतिक फल दिलाती है किसी को नहीं।
फिर भक्ति हो या ज्ञानार्जन अगर कामना सहित किया जाये और सफलता न मिले तो आदमी संसार में दोष ढूंढने लगता है। यह केवल भक्ति या ज्ञान के विषय में नहीं है बल्कि साहित्य और कला के विषयों में भी यही होता है। आदमी आत्ममुग्ध होकर अपना काम शुरु करता है पर जब उसे सफलता नहीं मिलती तो वह निराश हो जाता है। निष्कर्ष यह है कि सम्मान पाने का मोह आदमी के लिये दुःख का कारण बनता है। एक बात याद रखें सम्मान पाने की चाह पूरी नहीं हुई तो दुःख तो होगा और अगर पूरी भी हो गयी तो अपमान भी हो सकता है। जहां सुख है वहां दुःख भी है। जहां आशा है वहां निराशा भी है। जहां सम्मान है वहां अपमान भी है। अगर सम्मान मिल गया तो चार लोग आपके दोष निकालकर अपमान भी कर सकते हैं।
इसलिये अच्छा यही है कि अपने कर्म निष्काम भाव से करें। इस संसार में निर्विवाद सम्मान पाने का बस एक ही तरीका है कि आप गरीब को धन और अशिक्षित को शिक्षा प्रदान करें। प्रयोजन रहित दया करें। ऐसे काम बहुत कम लोग करते हैं। जो सभी कर रहे हैं उसे आप भी करें तो कैसा सम्मान होगा? सम्मान तो उसी में ही संभव है जो दूसरे लोग न करते हों।  वैसे भी अपने काम में निष्काम भाव से लगे रहने से उसमें सफलता मिलती है तो समाज स्वयं ही सम्मान करता है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप',Gwalior
editor-Deepak raj kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com

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Saturday, August 28, 2010

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-मन तो जल के समान चंचल है (man jal ke saman chanchal hai-hindu dharma sandesh)

जलान्तश्वन्द्रवशं जीवनं खलु देहिनाम्
तथा विद्यमति ज्ञात्वा शशवत्कल्याणमाचारेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
पानी के के भीतर लहलहाते हुए चंद्रमा के बिम्ब के समान चंचल स्वभाव ही समस्त जीवों का जीवन है। यह विचार ज्ञान लोग निरंतर सत्कर्म में लिप्त रहते हैं।
सतः शीलोपसम्पन्नानकस्मादेव दुज्र्जनः।
अन्तः प्रविश्य दहति शुष्कवृक्षानिवालः।।
हिन्दी में भावार्थ-
पर्वत के समान दृढ़ चरित्र वाले सत्पुरुषों के अंतःकरण में दुर्जन भाव प्रविष्ट होकर अग्नि के समान उनको जला कर नष्ट कर डालता है। यह भाव सज्जन व्यक्ति के लिये आत्मघाती होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समस्त जीवों की देह पंचतत्वों के संयोग से निर्मित होती है और मन उसकी एक ऐसी प्रकृत्ति है जो उसका संचालन करती है। पानी से भी पतले इस मन की चाल विरले ही ज्ञानी देख पाते हैं। अपने जीवन में कार्यरत रहते हुए हमारे मन में अनेक विचार आते हैं-वह अच्छे भी हो सकते हैं और बुरे भी। दरअसल हर जीव को उसका मन चलाता है पर वह यह भ्रम पालता है कि स्वयं चल रहा है। इस मन में काम, क्रोध, लोभ, लालच और घृणा के भाव स्वाभाविक रूप से विचरते रहते हैं। अगर वहां सत्विचारों की स्थापना करनी है तो उसके लिये यह आवश्यक है कि योगासन, ध्यान, मंत्रजाप और नाम स्मरण किया जाये। कहना आसान है पर करना कठिन है। मुख्य बात है कि संकल्प मनुष्य किस प्रकार का करता है। जो मनुष्य दृढ चरित्र के होते हैं वह मन में आये विचार का अवलोकन करते हैं और जिनको ज्ञान नहीं है वह उसी राह चलते हैं जहां मन प्रेरित करता है।
यह मन इतना चंचल होता है कि अनेक बार सज्जन आदमी को भी दुर्जन बना देता है। यह उन्हीं सज्जन लोगों के साथ होता है जो स्वाभाविक रूप से भले होते हैं पर उनके पास अध्यात्मिक ज्ञान नहीं रहता। जब उनके अंदर दुर्जन भाव का प्रवेश होता है तब वह अपराध कर बैठते हैं।
अतः योगाभ्यास तथा सत्संग में निरंतर लगे रहना चाहिये ताकि अपने अंदर ज्ञान का प्रादुर्भाव हो और सज्जन प्रकृत्ति होने के बावजूद कभी किसी भी स्थिति में मन में उत्पन्न कुविचार मार्ग से विचलित न कर सकें। यदि अपने मन पर नियंत्रण किया जाये तो सारे संसार पर नियंत्रण किया जा सकता है और अगर उससे हार गये तो किसी से भी जीतना संभव नहीं है।
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संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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