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Friday, October 1, 2010

अयोध्या में राम मंदिर प्रचार माध्यमों ने खूब भुनाया-हिन्दी लेख (ram mandir in ayodhya and hindi media-hindi article)

कभी कभी तो ऐसा लगता है कि आम लोगों का ध्यान अन्य विषयों से हटाकर राष्ट्र या समाज की तरफ लगाने के लिये ज्वलंत मुद्दे फिक्स होते हैं। नयी दुनियां में आधुनिक लोकतंत्र में समाज सेवकों, सौदागरों तथा प्रचार प्रबंधकों का संगठित समूह लोगों को बहलाये रखने के लिये अपने साथ किराये के बुद्धिजीवी भी रखने भी लगा है जो अपने से संबंधित विषय का कोई ज्वलंत मुद्दा सामने आने पर संगठित प्रचार माध्यमों में अपनी बात कहने के लिये सजधजकर आते है। जिस तरह राजनीति, व्यवसाय, फिल्मों के साथ ही कला साहित्य के क्षेत्र में में व्यक्तिवाद तथा वंशवाद का बोलबाला प्रारंभ हो गया है। वंशवाद और व्यक्तिवाद अब बौद्धिक क्षेत्र में भी स्थापित किया जा रहा है।
प्रसंग रामजन्म भूमि के संबंध में अदालती फैसले का है। जिस पर भारतीय प्रचार माध्यम पुराने चेहरों को सामने लाकर उनकी प्रतिक्रिया जानने का प्रयास करते रहे। इतना ही नहीं एक चैनल में एक प्रतिष्ठित वकील के पुत्र वकील को ही न्यायिक समीक्षा के लिये बुलवा लिया। उन महाशय ने अपने विचार रखे भी पर तब ऐसा लग लगा कि अपने वकील पिता की वजह से वह उस समय कैमरे के सामने हैं। वरना दूसरे विद्वान वकीलों की कमी है क्या?
कुछ मुद्दों को ज्वलंत बनाये रखने के लिये प्रचार माध्यम सक्रिय रहते हैं। अयोध्या के राम मंदिर पर अदालत के फैसला एक महत्वपूर्ण घटना थी पर कई बरसों तक चले इस प्रसंग में अदालत के बाहर कुछ लोगों ने इससे लोगों की भगवान राम से जुड़ी भावनाओं को उबारे रखा ताकि उनकी लोकप्रियता बनी रहे। आधुनिक लोकतंत्र में यह सब होता है पर सवाल यह है कि अपने देश के समाज सेवा, व्यापार, प्रचार तथा कला समूहों के शिखर पुरुष अपनी बढ़ती उम्र के साथ रूढ़ता का शिकार हो रहे हैं। वह नयी उम्र के युवाओं को अवसर देने की बात तो करते हैं पर उसका दायर अपने परिवार और रिश्तेदारों से आगे नहीं जाता। रामजन्मभूमि के विषय में प्रचार चैनलों में बूढ़े, थके और निरंतर उबाने वाले चेहरों की उपस्थिति इस बात को दर्शाती है कि अदालत में चलने और वही निर्णायक स्थिति में पहुंचने वाले इस मुद्दे पर अनावश्यक रूप से सार्वजनिक बहसें और विवाद हुए। जिसमें आम इंसानों का समय बर्बाद हुआ तो प्रचार माध्यमों ने विज्ञापनों से खूब कमाया।
प्रचार चैनलों के लोग बार बार नयी पीढ़ी की दुहाई देते रहे। उनका कहना था कि 1992 के बाद यह देश बदल गया है। आज की नई पीढ़ी इस तरह के विवाद नहीं चाहती। वह आधुनिक भारत चाहती है। कई चैनल संयमित समाचार देने का दावा कर देश में बनी शांति का श्रेय भी खुद लेते रहे। देश में शांति रही इसका पूरा श्रेय अदालत तथा जजों को जाता है जिन्होंने इतना संतुलित फैसला दिया न कि किसी अन्य व्यक्ति या सस्था को। नयी पीढ़ी को राम जन्मभूमि में दिलचस्पी नहीं है यह सोचना भी गलत है। नयी पीढ़ी राम से दूर हो रही है यह सोचने वाले अंधेरे दिखाकर रौशनी बेचने वाले हैं। पश्चिमी विकास में रची बसी नयी पीढ़ी अध्यात्मिक विषय में दिलचस्पी नहीं लेती ऐसे लोग मंदिरों में नहीं जाते और जाते हैं तो आंखें बंद किये रहते हैं। वहां युवक युवतियों का उतना ही प्रतिशत आता है जितना जनसंख्या में है। देश में कोई धार्मिक उन्माद नहीं था तो इसलिये कि हर उम्र के लोग अब अनेक ऐसे सच इन्हीं प्रचार माध्यमों से जान गये हैं जो पहले छिपाये जाते थे। देश में अब उन्माद नहीं फैलाया जा सकता क्योंकि आम आदमी-इसे आयु वर्ग में बांटना गलत है-इसके पक्ष में नहीं था। जब उन्माद फैला था तब आम आदमी के पास संचार माध्यम इतनी मात्रा में उपलब्ध नहीं थे। कहने का मतलब यह है कि यह दावा कि नयी पीढ़ी के लोग अध्यात्म ज्ञान या धर्म में रुचि नहीं रखते यह वजह शांति की वजह नहीं है बल्कि वह सब जानने लगे हैं कि किस तरह आजकल सभी जगह फिक्सिंग होने लगी है। आखिर अदालत में चलने वाले एक मामले की लंबे समय तक हुई सार्वजनिक बहस किस बात को दर्शाती है? कैसे लोग बातचीत के माध्यम से विवादित मुद्दों पर फैसला करने की बात कहकर अपने विचार व्यक्त करते हैं और अदालत की उपस्थिति छिपाने का प्रयास करते हैं यह समझने की अब जरूरत नहीं है। विज्ञापन के बीच में समय पास करने के लिये कोई विषय प्रचार माध्यमों को चाहिऐ और इसके लिये उन्होंने तोते के रूप में बुद्धिजीवी पाल रखे हैं जो रटी रटाई बात करते हैं।
एक चैनल में बाबा रामदेव आये। बहुत सुखद लगा। यकीनन वह प्रायोजित तोते नहीं है यह बात साफ लगी। उनके आने से पहले दो धर्मों के ठेकेदार वहां बहस कर रहे थे। वही पुरानी बातें। बाबा रामदेव ने कहा कि ‘बाबर एक आक्रमणकारी था और देश को एक भी आदमी उसके नाम के साथ खड़ा नहीं देखा जा सकता। और तो और ओरंगजेब ने भी इतने बरस राज्य किया पर उसकी कौम के लोग उसके नाम के साथ अब खड़े होने की बात नहीं करते। जहां तक राम की बात है तो वह सभी धर्मो के लोगों के घट घट के वासी है और कोई उनके नाम का विरोध कर ही नहीं सकता।’
उनकी बात का किसी ने जवाब नहीं दिया। उस बहस में ऐसा लगा कि जैसे बाज़ार के तयशुदा तोतों के बीच कोई बाहरी आदमी आ गया है तब लगने लगा कि योग की वजह से प्रतिष्ठत  हो चुके बाबा रामदेव को बुलाना एक मजबूरी थी क्योंकि चैनल वालों को भी पता है कि उनके तोता बुद्धिजीवियों के सहारे कार्यक्रम अधिक नहीं चल सकते।
कुछ प्रचार प्रबंधकों को अफसोस है कि कहीं इस मुद्दे का पटाक्षेप होने से उनका घाटा न हो जाये क्योंकि इससे उनका अनेक बार अच्छा समय पास हो जाता था। सच बात तो यह है कि अब इस मद्दे की हवा ही निकल गयी है। हालांकि अभी उच्च न्यायालय का फैसला है और सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा अभी बाकी है पर माननीय ज़जों ने अपने परिश्रम, विवेक और सदाशयता उपयोग कर जो निर्णय दिया है उससे देश के आम नागरिकों ने चैन की सांस ली है।
आखिरी बात यह है कि प्रचार माध्यम कल सहमे हुए लग रहे थे। बार बार यह कहना कि यह अंतिम फैसला नहीं है बल्कि आगे यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में भी जा सकता है, उनके डरपोक होने का प्रमाण है। साथ ही यह भी दर्शाता है कि बड़े शहरों के बाहर वह आम जनता को नहीं जानते। कभी राम जन्म भूमि पर घर घर चर्चा होती थी क्योंकि सीमित प्रचार माध्यम सच से हटकर उकसाने की बात करते थे। दूसरा यह भी कि समाज में चेतना का अभाव था। अब अनेक प्रकार के संचार माध्यमों उनके पास है। सबसे बड़ी बात यह कि इंटरनेट और अनेक टीवी चैनलों ने समाज में लोगों की रुचियों के अनुसार उसेे विभक्त कर दिया है और किसी एक विषय को लेकर उसे संगठित करना अब समाज के ठेकेदारों के लिए दुरुह कार्य हो गया है। ऐसे में राममंदिर या बाबरी मस्जिद के नाम पर समुदायों को संगठित करने का प्रयास यूं भी जोखिम भरा हो सकता था कि कहीं वह निष्फल न हो जाये। इससे अनेक शिखर पुरुषों की पोल खुल जाती। राम मंदिर पर आगे क्या होगा? हम जैसा आम ब्लाग लेखक भविष्यवाणी नहीं कर सकता पर अब इसकी हवा निकल गयी है और अदालत के फैसले का पालन कर ही शिखर पुरुष अपनी प्रतिष्ठा बचा सकते हैं। प्रचार माध्यमों ने भी इस विषय पर संयमित खबरें इसलिये दी क्योंकि उनको मिलने वाले विज्ञापनों के उत्पाद बाज़ार में बिकते हैं। उनके विज्ञापनदाता इधर कॉमलवेल्थ और उधर आस्ट्रेलिया भारत क्रिकेट टेस्ट से भी जुड़े हैं। देश में तनाव होगा तो हानि उनके राजस्व की होगी।
जय श्री राम जय श्री कृष्ण
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
http://dpkraj.blogspot.com
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