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Sunday, May 17, 2015

बौद्ध तथा हिन्दू धार्मिक विचारधारा का संयुक्त रूप सुखद-हिन्दी चिंत्तन लेख(bauddh tathaa hindu dharmik vichardhara ka sanyukt roop sukhad-hindi thought article)


       प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन तथा मंगोलिया यात्रा में भगवान बुद्ध तथा उनके चरित्र की चर्चा का राजनीतिक रूप से कोई महत्व अभी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है लेकिन वैश्विक पटल के ऊपर इसके प्रभाव कालांतर में अप्रत्याशित रूप से दिखेंगे। चीन में सबसे अधिक बुद्ध धर्म मानने वाले हैं पर वैश्विक पर्दे पर वह वामपंथी विचाराधारा का प्रतीक बना रहा। अहिंसा के सबसे बड़े प्रवर्तक भगवान बौद्ध की विश्व में उस तरह चर्चा नहीं हुई जितनी पश्चिम धर्म प्रवर्तकों की दिखती रही। पश्चिम के दोनों धर्मो की चर्चा खूब हुई पर बुद्ध धार्मिक विचाराधारा का प्रवाह अपेक्षा के अनुकूल नहीं हुआ। चीन से अनेक लोग विदेश गये पर अपनी धार्मिक पहचान का महत्व साथ नहीं लाये। इससे तो हिन्दू धार्मिक लोग बेहतर रहे जिन्होंने विश्व में अपनी धार्मिक  पहचान कम नहीं होने दी।
        हमारा अनुमान है कि जिस तरह चीन की जो राजकीय विचाराधारा रही है उसमें धर्म अध्यात्म का कोई महत्व नहीं रहा और अभी तक वहां  के लोगों ने शायद ही कभी अपने राजपुरुषों की मंदिर में उपस्थिति की तस्वीर देखी हो पर श्रीनरेद्रमोदी की यात्रा ये यह अवसर उन्हें मिला। विश्व पटल पर चीन के राजपुरुषों की मंदिरों में श्रीमोदी के साथ उपास्थिति वहां के देश की अध्यात्मिक छवि भी बना सकती है। अंततः यह बौद्ध धर्म के प्रचार में सहायक होकर उसका विस्तार कर सकती है। सबसे बड़ी बात यह कि हिन्दू तथा बौद्ध की संयुक्त  छवि विश्व में प्रचारित पश्चिमी धर्मो के लिये चुनौती बन सकती है। अभी तक यह देखा गया है कि एक धर्म से दूसरे धर्म में जाने की पंरपरा अधिक रही है। बौद्ध तथा हिन्दू धर्म की संयुक्त छवि न होने से पश्चिम में लोगों के पूर्वी धर्म कभी आकर्षक विकल्प नहीं बने जो अब संभावना बन सकती है। मुख्य बात यह कि भारतीय अध्यात्म्कि दर्शन अधिक तेजी से वैश्विक पटल पर छा सकता है जो पश्चिम के दो धर्मों के आपसी संघर्ष के बीच तीसरी विचाराधारा के रूप पहले से ही मौजूद है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Friday, May 15, 2015

ओम के जाप से लाभ-हिन्दी कविता(om ke jaap se labh-hindi poem)


तन से टूटे
मन से रूठे
धन उनके पास नहीं है।

आंख और कान का संयोग
जब बुद्धि से टूटे
समझो जिंदगी में तरक्की की
कोई आस नहीं है।

कहें दीपक बापू असहज जिंदगी से
असमय ही पतन की
तरफ इंसान जाता है,
अपनाये जो योग साधना
वह तर जाता है,
ओम का जाप होता जहां
स्वर्ग का वास वहीं है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Tuesday, May 12, 2015

भक्ति और योग साधना से भय का भाव दूर करें-हिन्दी चिंत्तन लेख(bhaki aur yog sadhana se bhay ka bhav door karen-hindi thought article)

मनुष्य में भय की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से रहती है। न केवल उसे मुत्यु का वरन् भूखे लगने पर रोटी न होने तथा अपनी संपत्ति तथा वैभव खो  का भय रहता है। सामाजिक परंपराऐं निभाने के लिये वह इस भय से तत्पर रहता है कि कहीं उसकी प्रतिष्ठा पर आंच न आये। देखा जाये तो इंसान केवल भय में ही अपना जीवन गुजार देता है।
कहते हैं टपके से ज्यादा टपके का भय रहता है। जब टपक ही गया तो भय समाप्त होते ही व्यक्ति उससे जूझने के लिये प्रेरित होता है। अनेक लोग भविष्य की आशंकाओं और भय से इतना ग्र्रस्त रहते हैं कि उनकी दैहिक संघर्ष क्षमता क्षीण होती चली जाती है। अनेक तो ऐसे भय पाल लेते हैं जो कभी आते ही नहीं। कोई ऐसा जीव इस संसार में नहीं होता जिसके जीवन में उतार चढ़ाव नहीं आता। भगवान श्रीराम को भी प्रतिकूल स्थितियों का सामना करना पड़ा। भगवान श्री कृष्ण का तो बाल्यकाल ही प्रतिकूल स्थितियों से जूझते ही बीता। इन महानायकों ने न बल्कि अपने जीवन में दृढ़ता से  संघर्ष करने के साथ ही तत्कालीन समाज का भी उद्धार भी किया।  उनके गुुरुओं ने निष्काम भाव से शिक्षा प्रदान की जिसे प्राप्त करने के बाद उन्होंने न केवल युद्ध क्षेत्रों में वीरता दिखाई वरन् जीवन प्रबंध का भी संदेश दिया।
इसलिये अपने जीवन में सदैव उन्मुक्त भाव रखना चाहिये। प्रातःकाल योग साधना कर अपने अंदर दैहिक, मानसिक तथा चिंत्तन शक्ति का संचय करने के साथ ही उत्साह के साथ दिन बिताने के लिसे तत्पर होना चाहिये। हम देखते हैं दिन में ही अनेक उतार चढ़ाव आते हैं। प्रातःकाल शीतल हवा बहती है तो दोपहर काल में गर्मी विकट रूप से त्रास देती है फिर शाम अपने साथ शांत भाव लाती है।  यही स्थिति जीवन की भी है इसलिये आशंका, भय तथा संताप के भाव पर अधिक ऊर्जा व्यर्थ नहीं करना चाहिये।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Saturday, May 9, 2015

लोकतंत्र में भीड़तंत्र से बचना चाहिये-हिन्दी चिंत्तन लेख(loktantra mein bheedtantra se bachna hoga-hindi thoughta article)


विश्व के अधिकांश देशों की वर्तमान राजकीय प्रबंध संस्थाओं के संगठन का निर्माण लोकतांत्रिक पद्धति से होता है।  राष्ट्र के लोगों का बहुमत जिसकी तरफ जाता है वही राज्य प्रमुख बनता है। मूलतः यह प्रणानी सैद्धांतिक रूप से बहुत उपयुक्त है पर जिस तरह से चुनाव के दौरान मतदाताओं को लुभाने के प्रयास में धन का व्यय होता है उससे राजनीति के प्रति शौकिया रुचि रखने वालों के लिये जनप्रतिनिधि बनना सहज नहीं हो पाता। प्रचार तथा जनसंपर्क के लिये अब हार्दिक भाव से काम करने वाले कार्यकर्ता नहीं मिलते इसलिये चयन के प्रत्याशी धन के बल पर ही मैदान में उतरते हैं।  भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली अमेरिका तथा ब्रिटेन का समन्वित रूप है। अंतर इतना है कि इन देशों में अनेक प्रकार ेा आर्थिक व्यवहार राजीनीतिक शिष्टाचार होता है और भारत में उसे नैतिक भ्रष्टाचार माना जाता है।  प्रचार माध्यमों में जिस तरह हम देख रहे हैं उससे तो यही लगता है कि इन देशों में  कंपनियां-आधुनिक धनपतियों का वह छद्म रूप जिसे उनके स्वामी की बजाय सेवक होने का आभास भर होता है-चुनाव में अपनी पसंद की सरकार बनवा ही लेती हैं। न ही बनती हैं तो भी सरकार की पसंद स्वयं ही बन जाती हैं। मतलब कंपनियों के -जिनको वामपंथी पूंजीपति तो कभी नया दैत्यावतार भी भी कहते हैं-दोनों हाथों में लड़डू रहते हैं।  अभी ब्रिटेन में हुए चुनाव में जिस दल ने विजय पायी वह लाभ के सिद्धांत पर सरकार चलाता है और जो हारा वह सार्वजनिक क्षेत्र का महत्व बढ़ाने के सिद्धांत पर चलता है।
हम देखते हैं कि राजकीय पदों के नाम और स्वरूप का आम जनमानस पर प्रभाव पड़ता ही है।  पहले हमारे यहां आम बोलचाल में महाराज शब्द सम्मान से एक दूसरे को कहा जाता था अब नेताजी कहा जाता है।  अनेक साधु संत पहले अपने नाम से महाराज या राजा शब्द लगाते थे पर अब सरकार लिखते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि राजकीय व्यवस्था कहीं न कहीं आम जनमानस को प्रभावित करती ही है। यही कारण है कि हर क्षेत्र में बहुमत की बात की जाती है। इस बहुमत की भावना ने भीड़तंत्र को बढ़ावा दिया है।  कोई व्यक्ति इसलिये ही पूज्यनीय मान लिया जाता है क्योंकि उसके पास भीड़ होती है। लोकतंत्र ने समाज सेवकों, प्रचार माध्यमों तथा पूंजीपतियों का ऐसा गठजोड़ बना लिया है जिसमें अध्यात्मिक ज्ञान अथवा प्राकृतिक सिद्धांतों की मान्यता पर चलने का महत्व कम कर दिया है। उससे बुरी बात यह कि किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत आचरण के दोष को पैसे, पद और प्रतिष्ठा की आड़ में छिपने का अवसर मिल जाता है।  जिसके पास भीड़ है वही श्रेष्ठ है इस नये सिद्धांत ने समाज की सोच को खोखला कर दिया है।  इतना ही नहीं जिसे अपने अपराध या दोष छिपाना है वह किराये की भीड़ एकत्रित कर अपनी छवि नायक की बना लेता है। उसी के सहारे न केवल वह समाज परे दिखता है वरन् उसके संचालन सिद्धांतों को रौंदता चलता है।
कोई माने या न माने अभी हाल ही के एक घटना से यह संदेश तो पूरे देश में चला ही गया है कि पैसे, पद और प्रतिष्ठा के दम पर कोई भी व्यक्ति कहीं भी विजेता की तरह प्रस्तुत किया जा सकता है।  भारतीय प्रचार माध्यमों ने पिछले दो दिनों में अपनी प्रतिष्ठा जिस तरह गंवाई है उसे पाने में उनको समय लगेगा। फिल्म क्रिकेट या अन्य प्रतिष्ठत व्यक्ति कें आभामंडल के आसपास भारतीय समाचार जगत केंद्रित करना इस बात का द्योतक है कि पत्रकारिता से कमाई चाहे जितना भी कोई कर ले पर उसके पास व्यवसायिक कौशल तथा प्रतिबद्धता भी है यह प्रमाणित नहीं होता।  समाचार प्रकाशन जगत को टीवी चैनलों का अनुसरण करने की बजाय  अपना कार्य जनोन्मुख करना चाहिये ताकि लोग प्रातः टीवी चैनल से बासी हो चुकी खबरें पढ़ने को बाध्य न हों।
हमारा मानना है कि लोकतंत्र एक राजकीय प्रबंध के संगठन की स्थापना के लिये एक बेहतर प्रणाली है पर उसके आधार पर सामाजिक संदर्भों में उसे भीड़तंत्र क्रे अनुसार देखना एक खतरनाक प्रयास भी है। इससे लोगों में उस लोकतांत्रिक प्रणाली के प्रति अविश्वास पैदा होने लगता है जिसका आधार ही उनके मत पर टिका है। विश्व भर के लोकतांत्रिक नायकों को इस बात पर विचार करना चाहिये।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Thursday, May 7, 2015

कर्म में अकर्म तथा निष्कर्म में सुख की खोज-हिन्दी चिंत्तन लेख(karma mein akram tathaa nishkram mein sukh ki khoj-hindi thought article)


                   हर मनुष्य में यह भाव रहता है कि अन्य मनुष्य उसका सम्मान करें। वह जो काम करे उसकी कोई प्रशंसा करे। यह पूज्यता का भाव है। इसका गुण यह है कि हर मनुष्य सक्रिय रहता है ताकि उस पर परिवार, समाज तथा निजी मित्रों की दृष्टि बने रहे। इस भाव का दुर्गुण यह है कि चालाक लोग झूठी प्रशंसा या आग्रह कर सज्जन लोगों से भी अपना काम निकाल लेते हैं। अनेक ऐसे लोग हैं जो बहुत चालाक हैं और दूसरे की झूठी प्रशंसा कर अपना काम निकाल लेते है और फिर राह चलते हुए अभिवादन तक करने से बचते हैं-उनका प्रयास यही रहता है कि जिससे काम निकल गया उसे अब दृष्टि भी न मिले तो अच्छा है।
            पूज्यता का यह भाव राजसी प्रवृत्ति के लोगों में अधिक होता है। जो लोग श्रेष्ठ राजसी कर्म करते हैं उनसे लधु कर्म में लगे लोग दबते हैं।  लघु राजसी कर्म करने वालों का जीवन हमेशा ही उच्च राजसी पद पर सक्रिय मनुष्य की कृपा से चलतर है।  इसलिये वह उनकी चाटुकारिता करते हैं। आवश्यकता हो तो सर्वशक्तिमान की बजाय उनकी आरती भी उतारते हैं। श्रेष्ठ राजसी पुरुषों के पास धन की मात्रा अधिक, उच्च पद और प्रतिष्ठा व्यापक होती है इसलिये उनके इर्दगिर्द लघु राजसी पुरुषों का एक घेरा बना जाता है। इन लघु मनुष्यों की चाटुकारिता तथा आरती भाव श्रेष्ठ पुरुषों को अहंकार के साथ ही मोह में डाल देता है जिससे उनके अंदर अपनी उपेक्षा करने वालों के प्रति क्रोध का भाव पैदा होता है। धीरे धीरे वही श्रेष्ठ पुरुष पतन की तरफ जाते हैं।  इतिहास ऐसे श्रेष्ठ राजसी पुरुषों के पतन का गवाह है जो भले चंगे थे पर अंततः पतन की गर्त में समा गये।
                 ज्ञानी पुरुष वह है जो राजसी कर्म में अपनी आवश्यकता तक ही सक्रिय रहता है। वह प्रकृत्ति के तत्व को पहचानता है-जिसका मूल स्वभाव ही परिवर्तनशीलता है। जो कल था वह आज नहीं है, जो आज है वह कल नहीं होगा, इसलिये किसी एक व्यक्ति, विषय या वस्तु का मोह पालना ठीक नहीं है।  हमें अपना कर्म करना है कोई प्रशंसा करे या निंदा इस पर विचार नहीं करना है। यही निष्कर्म का सिद्धांत भी है। जहां किसी ने अन्य मनुष्यों से प्रतिफल या प्रशंसा पाने में मोह में कर्म करना प्रारंभ किया वहीं उसके सामने भविष्य में निराशा का भय भी पैदा होता है। जहां कोई आशा न हो वहां वह कर्म ही नहीं करता इससे वह निष्क्रिय भाव में स्थित हो जाता है जो कि तामसी प्रवृत्ति का परिचायक है। राजसी पुरुष ही कई बार तामसी हो जाते हैं। सात्विक मनुष्य यह जानते हैं  इसलिये हमेशा ही कर्म में अकर्म तथा निष्कर्म में सुख की संभावना के साथ जीवन यात्रा करते हैं।
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Sunday, May 3, 2015

कंपनियों के खेल में मुक्केबाजी की कला -हिन्दी चिंत्तन लेख(kampaniyon ke khel mein mukkebazi, boxing and conmpany-hindi thought article)


आज के युग में आधुनिक सामानों के लिये व्यापार में प्रचार माध्यमों से  विज्ञापन आवश्यक हो गया है। विज्ञापन की वस्तु का उपयोग करते हुए किसी महानायक का दिखना जरूरी है और इसके  लिये खेल, कला, फिल्म तथा टीवी क्षेत्र में काम करने वाले पात्र का अभिनय करने वालों की आवश्यकता होती है क्योंकि वह किसी न किसी तरह सामान्य मनुष्यों के मस्तिष्क में निवास करते हैं। वह आम इंसान का अपनी प्रचारित वस्तुओं के उपभोग के लिये प्रेरित करते हैं। जिस तरह खेलों पर वस्तुओं की उत्पादक कंपनियो का नियंत्रण हो गया है और विभिन्न मुकाबलों ंके निर्णय पूर्व में ही तय लगते हैं उससे यह संदेह होता ही है कि  अब किसी की जीत हार में अस्वाभाविक तत्व भी शामिल होते हैं। वस्तुओं की उत्पादक कंपनियों के संचालक अब टीवी, टेलीफोन तथा फिल्म कंपनियां भी चला रहे हैं। मतलब यह कि कंपनी दैत्यों के पास न केवल मनुष्य की नयी वस्तु का उपभोग करने की इच्छा की संपति है वहीं उसकी आंखें, कान और मन को अपनी तरफ खींचने के साधन भी हैं।  एक तरह से कंपनियां अब अदृश्य देव या दानव कही जा सकती हैं जो संसार के संचालन में अपनी भूमिका निभाती है पर दृष्टिगोचर नहीं होती। विश्व के जनवादी विचारक तो यह मानते हैें कि समाज पर नियंत्रण करने वाली जितनी भी संस्थायें हैं उन पर पूंजीपतियों का कब्जा रहता है और वह अपने अनुसार ही राज्य की नीतियां बनवाते और बिगड़वाते हैं। जब तक भारत में कपंनियों का प्रभाव सीमित था तब तक उनके विचार अप्रासंगिक लगते थे पर आर्थिक उदारीकरण का युग आने के बाद जिस तरह कंपनियों की शक्ति प्रकट हो रही है, यह लगने लगा है कि उनकी सोच सही थी।
          अभी हाल में ही अमेरिका के लास वेगास शहर के एक केसीनों में मुक्केबाजी का मुकाबला अमेरिका के फ्लॉयड मेवेदर और मैनी पैकियओ के बीच हुआ।  इसके होने से पहले इसका भरपूर प्रचार हुआ।  प्रचार में यह बात बराकर दोहराई जाती रही कि दोनों ही गरीब परिवारों से आये और मुक्केबाजी करते हुए अमीर बन गये। मैनी पैकियओं के बारे मे तो यह भी प्रचार हअुा कि वह अपने देश फिलीपींस में एक बहुत बड़े दानदाता भी हैं।  प्रचार में दोनों खिलाड़ियों की  मुक्केबाजी की कला जितना ही उनके पवित्र व्यक्तित्व का प्रचार हुआ।  दोनों के बार मेूं हमें ज्यादा पता नहीं पर इतना जरूर कह सकते हैं कि व्यापारिक स्वामियों तथा प्रचार प्रबंधकों के संयुक्त उपक्रमों की इन पर कहीं न कहीं मेहरबानी अवश्य रही है। दोनों के बीच कैसीनों में मुकाबला हुआ जो जुआ की वजह से जाना जाता है।  मुकाबले से पहले ही प्रचार माध्यमों ने यह बताया कि सट्टेबाजों का प्रिय नायक फ्लॉयड मेवेदर है। यह सही साबित भी हुआ।  दोनों ने आपस में मुकाबले का अच्छा अभिनय भी किया। समाप्ति पर पैकियओ रैफरियों के पास अपने विजेता की आस लेकर गया क्योंकि उसे लगा कि उसने अच्छा अभिनय किया है उन्होंने उसे नकार कर मेवेदर का को विजेता घोषित किया।
मेवेदर और पैकियओ इस समय के विश्व के सबसे श्रेष्ठ मुक्केबाज हैं यह प्रमाणिकता से नहीं कहा जा सकता क्योकि यह 67 किलो वर्ग का मुकाबला खेल रहे थे।  इसका मतलब यह कि इस समय भी दुनियां में उनसे अच्छे मुक्केबाज हो सकते हैं पर सभी पर व्यापारिक स्वामियों और प्रचार प्रबंधकों की कृपादृष्टि नहीं जाती इसलिये। मुक्केबाज ही नहीं वरन् हर खेल में दो तरह के खिलाड़ी सक्रिय हैं एक तो जो वास्तव में खेलते हैं पर उनको किसी के इशारे पर खेलने का अभिनय नहीं करना आता या अवसर नहीं मिलता, दूसरे वह हैं जो खेलने की तकनीकी में इतने माहिर होते हैं कि वह दूसरे के इशारे पर उसके अनुसार खेलने का अभिनय भी करते हैं।  यकीनन दूसरे प्रकार के खिलाड़ियों को अधिक प्रचार तथा पैसा मिलता है। एक कैसिनो में खेला गया सामान्य मुक्केबाजी मुकाबला-जिसका पूर्व में परिणाम तय होने की आशंका हो-जब महान होने का प्रचार पाता है तब ऐसी अनेक बातें दिमाग में आती हैं जिनका संबंध खेल से सोच से ज्यादा होता है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Friday, May 1, 2015

श्रम करने से जीवन के प्रति आत्म विश्वास बढ़ता है-1 मई मजदूर दिवस पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख(self comfidence and labour work-A Hindi article on 1 may day mazdoor diwas)


आज पूरे विश्व में 1 मई को मजदूर दिवस मनाया जाता है। आधुनिक विश्व में कार्ल मार्क्स को मजदूरों का मसीहा कहर जाता है।  जबकि हमारे यहां भगवान विश्वकर्मा को श्रम का प्रमाणिक देवता माना जाता है पर अंग्रेजी पद्धति की शिक्षा से साक्षर हुए हमारे अनेक विद्वानों को पाश्चात्य संस्कृति, संस्कार और समाज बहुत भाता है इसलिये ही वहां के अनेक महापुरुषों  को भी समाज से कुछ अलग दिखने के इरादे वह याद करते है। आमतौर से यह भ्रामक प्रचार किया जाता है कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से मनुष्य को पलायनवादी बनाया जाता है जबकि सच यह है कि हमारे वेदों, पुराणों तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में परिश्रम को अत्यंत महत्व दिया गया है।  श्रीमद्भागवत गीता में तो अकुशल श्रम को हेय मानना ही अनुचित बताया गया है। देखा जाये तो श्रीमद्भागवत गीता में सामाजिक समरसता बनाये रखने के जो सिद्धांत है मगर उसे सन्यासियों के लिये ही उपयोगी प्रचारित किया जाता है।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
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शतहस्त समाहार सहस्त्रहस्त सं किर।
कृतस्य कार्यस्य चहे स्फार्ति समावह।।
          हिन्दी में भावार्थ-हे मनुष्य तू सौ हाथाों वाला होकर धनार्जन कर और हजार हाथो वाला बनकर दान करते हुए अपने कर्तव्य से उन्नति की तरफ बढ़।

व्यार्त्या पवमानो वि शक्रः पाप हत्यया।।
हिन्दी में भावार्थ-शुद्धता बरतने वाला मनुष्य सदा पीड़ा से दूर रहता है और पुरुषार्थी पुरुष कभी पाप कर्म नहीं करता।
          हमारे अध्यात्मिक दर्शन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि पुरुषार्थी पुरुष ही श्रेष्ठ है।  इतना ही नहीं जो कर्म के आधार पर मनुष्य में भेद नहीं रखता वही ज्ञानी और सुखी है। यह सच है कि भारतीय समाज में सामान्य लोग परिश्रमी को गरीब समझते हैं पर इसका यह तात्पर्य नहीं कि सभी अज्ञानी है। दूसरी बात यह कि आज के  हम जिन कथित विकासवादी बुद्धिजीवियों को देखते हैं तो वह अकुशल श्रमिकों, मजदूरों और गरीबों का हित चिंत्तक होने का पाखंड करते हैं। इतना ही नहीं वह महिलाओं का उद्धार घरेलू कार्य से निकलकर बाहर नौकरी करने में देखते हैं। उनको लगता है कि घर के काम करना अकुशल श्रम का द्योतक है। एक अमेरिकी संस्था ने एक शोध कर यह निष्कर्ष प्रस्तृत किया कि भारत में सामान्य महिलायें अपने घरेलू कार्यों का अगर मूल्यांकन किया जाये तो वह अपने पुरुषों से ज्यादा कमाती हैं। इसका आशय यह है कि कोई पुरुष अपनी घरेलू महिला के कार्यों के लिये किसी दूसरे को भुगतान करे तो वह उसकी आय से कहीं अधिक होगा। हैरानी की बात यह कि कार्ल मार्क्स के शिष्य ही घरेलू महिलाओं के प्रति ऐसा रवैया दिखाते हैं जैसे कि उनका गृहस्थ कर्म कोई अनुत्पादक कार्य हो।
बहरहाल हमारे भारतीय समाज में श्रम के प्रति शिक्षित तथा सभ्रांत वर्ग में रुचि कम होती जा रही है। इसी कारण उसमें बेरोजगारी, बीमारी तथा बेचारगी की स्थिति बढ़ती दिख रही है। कहा जाता है कि यह शरीर तब तक चलेगा जब तक इसे चलाओगे। इसका आशय यही है कि जितना श्रम करोगे उतनी ही सांस चलेगी। हमने देखा है कि जो लोग श्रम कम करते हैं उनकी सांसें भी अशुद्ध और विषाक्त होने लगती हैं। सबसे बड़ी बात यह कि श्रम करने से जीवन के प्रति आत्मविश्वास बढ़ता है। सत्यमेव जयते, श्रममेव जयते।
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