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Sunday, May 3, 2015

कंपनियों के खेल में मुक्केबाजी की कला -हिन्दी चिंत्तन लेख(kampaniyon ke khel mein mukkebazi, boxing and conmpany-hindi thought article)


आज के युग में आधुनिक सामानों के लिये व्यापार में प्रचार माध्यमों से  विज्ञापन आवश्यक हो गया है। विज्ञापन की वस्तु का उपयोग करते हुए किसी महानायक का दिखना जरूरी है और इसके  लिये खेल, कला, फिल्म तथा टीवी क्षेत्र में काम करने वाले पात्र का अभिनय करने वालों की आवश्यकता होती है क्योंकि वह किसी न किसी तरह सामान्य मनुष्यों के मस्तिष्क में निवास करते हैं। वह आम इंसान का अपनी प्रचारित वस्तुओं के उपभोग के लिये प्रेरित करते हैं। जिस तरह खेलों पर वस्तुओं की उत्पादक कंपनियो का नियंत्रण हो गया है और विभिन्न मुकाबलों ंके निर्णय पूर्व में ही तय लगते हैं उससे यह संदेह होता ही है कि  अब किसी की जीत हार में अस्वाभाविक तत्व भी शामिल होते हैं। वस्तुओं की उत्पादक कंपनियों के संचालक अब टीवी, टेलीफोन तथा फिल्म कंपनियां भी चला रहे हैं। मतलब यह कि कंपनी दैत्यों के पास न केवल मनुष्य की नयी वस्तु का उपभोग करने की इच्छा की संपति है वहीं उसकी आंखें, कान और मन को अपनी तरफ खींचने के साधन भी हैं।  एक तरह से कंपनियां अब अदृश्य देव या दानव कही जा सकती हैं जो संसार के संचालन में अपनी भूमिका निभाती है पर दृष्टिगोचर नहीं होती। विश्व के जनवादी विचारक तो यह मानते हैें कि समाज पर नियंत्रण करने वाली जितनी भी संस्थायें हैं उन पर पूंजीपतियों का कब्जा रहता है और वह अपने अनुसार ही राज्य की नीतियां बनवाते और बिगड़वाते हैं। जब तक भारत में कपंनियों का प्रभाव सीमित था तब तक उनके विचार अप्रासंगिक लगते थे पर आर्थिक उदारीकरण का युग आने के बाद जिस तरह कंपनियों की शक्ति प्रकट हो रही है, यह लगने लगा है कि उनकी सोच सही थी।
          अभी हाल में ही अमेरिका के लास वेगास शहर के एक केसीनों में मुक्केबाजी का मुकाबला अमेरिका के फ्लॉयड मेवेदर और मैनी पैकियओ के बीच हुआ।  इसके होने से पहले इसका भरपूर प्रचार हुआ।  प्रचार में यह बात बराकर दोहराई जाती रही कि दोनों ही गरीब परिवारों से आये और मुक्केबाजी करते हुए अमीर बन गये। मैनी पैकियओं के बारे मे तो यह भी प्रचार हअुा कि वह अपने देश फिलीपींस में एक बहुत बड़े दानदाता भी हैं।  प्रचार में दोनों खिलाड़ियों की  मुक्केबाजी की कला जितना ही उनके पवित्र व्यक्तित्व का प्रचार हुआ।  दोनों के बार मेूं हमें ज्यादा पता नहीं पर इतना जरूर कह सकते हैं कि व्यापारिक स्वामियों तथा प्रचार प्रबंधकों के संयुक्त उपक्रमों की इन पर कहीं न कहीं मेहरबानी अवश्य रही है। दोनों के बीच कैसीनों में मुकाबला हुआ जो जुआ की वजह से जाना जाता है।  मुकाबले से पहले ही प्रचार माध्यमों ने यह बताया कि सट्टेबाजों का प्रिय नायक फ्लॉयड मेवेदर है। यह सही साबित भी हुआ।  दोनों ने आपस में मुकाबले का अच्छा अभिनय भी किया। समाप्ति पर पैकियओ रैफरियों के पास अपने विजेता की आस लेकर गया क्योंकि उसे लगा कि उसने अच्छा अभिनय किया है उन्होंने उसे नकार कर मेवेदर का को विजेता घोषित किया।
मेवेदर और पैकियओ इस समय के विश्व के सबसे श्रेष्ठ मुक्केबाज हैं यह प्रमाणिकता से नहीं कहा जा सकता क्योकि यह 67 किलो वर्ग का मुकाबला खेल रहे थे।  इसका मतलब यह कि इस समय भी दुनियां में उनसे अच्छे मुक्केबाज हो सकते हैं पर सभी पर व्यापारिक स्वामियों और प्रचार प्रबंधकों की कृपादृष्टि नहीं जाती इसलिये। मुक्केबाज ही नहीं वरन् हर खेल में दो तरह के खिलाड़ी सक्रिय हैं एक तो जो वास्तव में खेलते हैं पर उनको किसी के इशारे पर खेलने का अभिनय नहीं करना आता या अवसर नहीं मिलता, दूसरे वह हैं जो खेलने की तकनीकी में इतने माहिर होते हैं कि वह दूसरे के इशारे पर उसके अनुसार खेलने का अभिनय भी करते हैं।  यकीनन दूसरे प्रकार के खिलाड़ियों को अधिक प्रचार तथा पैसा मिलता है। एक कैसिनो में खेला गया सामान्य मुक्केबाजी मुकाबला-जिसका पूर्व में परिणाम तय होने की आशंका हो-जब महान होने का प्रचार पाता है तब ऐसी अनेक बातें दिमाग में आती हैं जिनका संबंध खेल से सोच से ज्यादा होता है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Friday, May 1, 2015

श्रम करने से जीवन के प्रति आत्म विश्वास बढ़ता है-1 मई मजदूर दिवस पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख(self comfidence and labour work-A Hindi article on 1 may day mazdoor diwas)


आज पूरे विश्व में 1 मई को मजदूर दिवस मनाया जाता है। आधुनिक विश्व में कार्ल मार्क्स को मजदूरों का मसीहा कहर जाता है।  जबकि हमारे यहां भगवान विश्वकर्मा को श्रम का प्रमाणिक देवता माना जाता है पर अंग्रेजी पद्धति की शिक्षा से साक्षर हुए हमारे अनेक विद्वानों को पाश्चात्य संस्कृति, संस्कार और समाज बहुत भाता है इसलिये ही वहां के अनेक महापुरुषों  को भी समाज से कुछ अलग दिखने के इरादे वह याद करते है। आमतौर से यह भ्रामक प्रचार किया जाता है कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से मनुष्य को पलायनवादी बनाया जाता है जबकि सच यह है कि हमारे वेदों, पुराणों तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में परिश्रम को अत्यंत महत्व दिया गया है।  श्रीमद्भागवत गीता में तो अकुशल श्रम को हेय मानना ही अनुचित बताया गया है। देखा जाये तो श्रीमद्भागवत गीता में सामाजिक समरसता बनाये रखने के जो सिद्धांत है मगर उसे सन्यासियों के लिये ही उपयोगी प्रचारित किया जाता है।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
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शतहस्त समाहार सहस्त्रहस्त सं किर।
कृतस्य कार्यस्य चहे स्फार्ति समावह।।
          हिन्दी में भावार्थ-हे मनुष्य तू सौ हाथाों वाला होकर धनार्जन कर और हजार हाथो वाला बनकर दान करते हुए अपने कर्तव्य से उन्नति की तरफ बढ़।

व्यार्त्या पवमानो वि शक्रः पाप हत्यया।।
हिन्दी में भावार्थ-शुद्धता बरतने वाला मनुष्य सदा पीड़ा से दूर रहता है और पुरुषार्थी पुरुष कभी पाप कर्म नहीं करता।
          हमारे अध्यात्मिक दर्शन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि पुरुषार्थी पुरुष ही श्रेष्ठ है।  इतना ही नहीं जो कर्म के आधार पर मनुष्य में भेद नहीं रखता वही ज्ञानी और सुखी है। यह सच है कि भारतीय समाज में सामान्य लोग परिश्रमी को गरीब समझते हैं पर इसका यह तात्पर्य नहीं कि सभी अज्ञानी है। दूसरी बात यह कि आज के  हम जिन कथित विकासवादी बुद्धिजीवियों को देखते हैं तो वह अकुशल श्रमिकों, मजदूरों और गरीबों का हित चिंत्तक होने का पाखंड करते हैं। इतना ही नहीं वह महिलाओं का उद्धार घरेलू कार्य से निकलकर बाहर नौकरी करने में देखते हैं। उनको लगता है कि घर के काम करना अकुशल श्रम का द्योतक है। एक अमेरिकी संस्था ने एक शोध कर यह निष्कर्ष प्रस्तृत किया कि भारत में सामान्य महिलायें अपने घरेलू कार्यों का अगर मूल्यांकन किया जाये तो वह अपने पुरुषों से ज्यादा कमाती हैं। इसका आशय यह है कि कोई पुरुष अपनी घरेलू महिला के कार्यों के लिये किसी दूसरे को भुगतान करे तो वह उसकी आय से कहीं अधिक होगा। हैरानी की बात यह कि कार्ल मार्क्स के शिष्य ही घरेलू महिलाओं के प्रति ऐसा रवैया दिखाते हैं जैसे कि उनका गृहस्थ कर्म कोई अनुत्पादक कार्य हो।
बहरहाल हमारे भारतीय समाज में श्रम के प्रति शिक्षित तथा सभ्रांत वर्ग में रुचि कम होती जा रही है। इसी कारण उसमें बेरोजगारी, बीमारी तथा बेचारगी की स्थिति बढ़ती दिख रही है। कहा जाता है कि यह शरीर तब तक चलेगा जब तक इसे चलाओगे। इसका आशय यही है कि जितना श्रम करोगे उतनी ही सांस चलेगी। हमने देखा है कि जो लोग श्रम कम करते हैं उनकी सांसें भी अशुद्ध और विषाक्त होने लगती हैं। सबसे बड़ी बात यह कि श्रम करने से जीवन के प्रति आत्मविश्वास बढ़ता है। सत्यमेव जयते, श्रममेव जयते।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Wednesday, April 29, 2015

नेपाल के भूकंप नहीं वरन् अधिक जनहानि कथित विकास का नतीजा-हिन्दी चिंत्तन लेख(artha quacke in nepal:A Hindi article)

नेपाल में 25 अप्रैल 2015 को आये भूकंप पर अनेक विद्वान कह रहे हैं कि यह मनुष्य का प्रकृत्ति से छेड़छाड़ का नतीजा है। अगर यह मान लिया जाये तो नेपाल में ही 1934 में आये भूकंप के बारे में क्या कहेंगे जिसकी तीव्रता 2015 से अधिक रही थी-उसमें इतनी जनहानि की बात नहीं कही जाती जबकि उस समय कथित विकास का वर्तमान जैसा रूप नहीं था। वैसे भी अनेक विशेषज्ञ यह कहते हैं कि भूकंप से नहीं वरन् उसके आने पर मानव निर्मित इमारतों के ढहने से अधिक हानि होती है।  इसलिये प्रकृत्ति से मनुष्य के छेड़छाड़ से भूकंप आने का तर्क बेकार है वरन् हम यह कह सकते हैं विकास के प्रति अंधविश्वास की वजह से अब अधिक हानि हो रही है।
2015 में अधिक जनहानि देखकर हम यह कह सकते हैं कि भौतिक विकास के प्रति लोगों का नजरिया अब सतही हो गया है। पैसा आ गया तो उपभोग की तरफ तेजी से जाना है-मकान बनाना, विलासिता से रहना, अपाच्य भोजन करना तथा अधिक दैहिक निष्क्रियता सुख का पर्याय मानना ही हमारे संकट का कारण है।  प्रतिवर्ष हजार भूकंप झेलने का आदी हो चुका जापानी समाज अत्यंत विकसित है पर जनहानि के समाचार वहां से नहीं आते। स्पष्टतः वहां भौतिक विकास के साथ अध्यात्मिक चेतना भी बनी हुई है। लोग भूकंप निरोधी ढांचे बनाते है। हमारे यहां पूर्व काल के अनेक ढांचे इसी तरह बने हैं कि वह अनेक भूकंपों के बाद भी अपनी जगह खड़े है-केदारनाथ तथा पशुपतिनाथ का मंदिर इसका प्रमाण है।
अनेक कथित धार्मिक विद्वान कह रहे हैं कि भगवान ने अपने स्थान की रक्षा कर सामर्थ्य दिखाया है। यह एक तरह से न अंधविश्वास का प्रमाण है वरन् इन्हें बनाने में लगे उन महान श्रमिकों, अभियंताओं तथा निर्माताओं का अपमान है जो वास्तव में मनुष्य थे पर उनकी अध्यात्मिक चेतना इतनी व्यापक थी कि उन्होंने अपने आत्मप्रचार के लिये कोई स्तंभ नहीं लगाया। सब भगवान ही करते हैं और मनुष्य चेतनाविहीन है और उसमें कोई सामर्थ्य नहीं है-यह प्रचार धार्मिक प्रचारकों के लिये आस्तिकतावादियों में अंधश्रद्धा उत्पन्न करने में सहायक होता है जो अंततः  भेंट आदि देकर उनकी रोजीरोटी चलाते हैं। श्रीमद्भागवत में इस सृष्टि के निर्माण की घटना का अध्ययन किया जाये तो यह साफ हो जाता है कि परमात्मा हर जीव में प्राणवायु संयत्र का प्रारंभिक संचालन तक ही सीमित रहता है और शेष कार्य जीव को स्वयं ही करना होता है। जैसी साधना  और साध्य है वैसे  ही साधक हो जाता है-उसी तरह की सिद्धि वह पाता है। यह सिद्धि अपनी अच्छाई और बुराई के अनुसार उसे परिणाम भी देती है।
हमारे यहां अनेक धार्मिक प्रचारक हैं पर वह सत्य की बजाय भ्रम फैलाते हैं। अपनी बातों से कथित शिष्यों का मनोरंजन कर उन्हें प्रसन्न करते हैं। भगवान सर्वशक्तिमान है वही सृष्टि बनाता और चलाता है और जीव की भूमिक अपने जीवन में शून्य है यह सोचकर किसी को निष्क्रिय बनाना अपने आप में अपराध जैसा है।  अध्यात्मिक ज्ञान  कर्म और परिणाम के सिद्धांत के अभाव में लोग केवल कर्म सिद्धांत पर ही चल रहे हैं। एक नारा दिया जाता है कि भगवान ने कहा है कि कर्म ही मेरी पूजा है’, पर किस तरह का कर्म उचित या अनुचित है इसकी पहचान कोई नहीं बताता। नतीजा यह है कि लोग धन संग्रह तथा उपभोग की तरफ भाग रहे हैं-तर्क यह कि धन से ही धर्म की रक्षा होती है। यह कारण है कि एक तरफ वैज्ञानिक इमारतों की सुरक्षा के लिये जिस तरह की आवश्यकतायें अनिवार्य बताते हैं उसके अनुकूल न तो निर्माता बनाता है न ही उपभोक्ता में इतनी चेतना बची है कि वह इस तरफ गौर करे।
प्रकृति का सत्य यह है कि करोड़ों वर्ष से यह धरती बनी और बिगड़ी है।  कितनी सभ्यतायें बनी और बिगड़ीं। संभव है हम से अधिक विकसित सभ्यतायें बनी हों पर हम यह अंतिम सत्य मानते हैं कि हमारी सभ्यता सबसे श्रेष्ठ हैं।  हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि जब जब प्रथ्वी पर बोझ बढ़ता है वह भगवान की शरण जाती है। वही उसका बोझ हल्का करने के लिये कोर्इ्र उपाय करते हुए अपनी मूल रचनाकार प्रवृति  से निवृत  होकर संहारक बनने के लिये प्रवृत्त होते हैं। इसके बावजूद इस धरती पर जीवन कभी संपूर्णता से नष्ट नहीं करते यह उन्हीं की कृपा कही जा सकती है पर उसके बाद मनुष्य न केवल स्वयं वरन् अन्य जीवों के विकास के लिये फिर जुटता है यह उसकी शक्ति और भक्ति है।  ऐसे में जो अपनी शक्ति और भक्ति का जो मनुष्य अधिक उपयोग करते हैं उन्हें देवपुरुष कहा ही जाना चाहिये। उनमें भी जो आत्मप्रचार से पर रहते हैं तो उन्हें भगवत्रूप ही कहा जाता है। इसलिये भूकंप को लेकर सर्वशक्तिमान के प्रति अंधविश्वास तथा अविश्वास दोनों ही नहीं रखना चाहिये। के प्रति अंधविश्वास तथा अविश्वास दोनों ही नहीं रखना चाहिये।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Saturday, April 25, 2015

भ्रष्टाचार और पक्षपात धार्मिक सिद्धांतों के विरुद्ध-हिन्दी चिंत्तन लेख(bhrashtachar aur pakshpat dharmik siddhanton ke viruddh-hindi thought article)


         एक टीवी चैनल पर उत्तर प्रदेश में ओलावृष्टि से प्रभावित किसान सहायता राशि न मिलने तथा ऋण प्राप्त करने पर रिश्वत देने जैसी शिकायतें कर रहे  थे। आमतौर से हिन्दू धर्म के कथित प्रचारकों की अधिक संख्या उत्तर प्रदेश में ही निवास करती  हैं।  जब वहां का समाज भयानक संकट में तब यह प्रचारक कोई ऐसी घोषणा क्यों नहीं करते कि किसानों को राहत मिले। वह कोई सहायता या कर्ज न दिलवा सकें तो कम से कम इस कार्य में लगे लोगों को हिन्दू धर्म का वास्ता देकर उन्हें ईमानदारी, निष्पक्षता तथा उदारता काम करने के लियें क्यों नहीं कहते? वह यह घोषणा क्यों नहीं करते कि ऋण के लिये रिश्वत लेना या सहायता में  पक्षपात करना धर्म विरोधी है।
          हम अनेक बार लिख चुके हैं कि किसी भी धार्मिक समूह की रक्षा आदर्श राज्य व्यवस्था, दृढ़ धार्मिक संगठन तथा नैतिकवान लोगों के संघर्ष से ही हो सकती है। हिन्दू धर्म के प्रचारक बहुत सारी बातें करते हैं पर कभी भ्रष्टाचार, बेईमानी तथा न्याय में पक्षपात जैसे कार्यों को धर्म विरोधी करार क्यों नहीं देते? चाणक्य नीति के अनुसार अर्थ से ही धर्म की रक्षा होती है। इसलिये जिन लोगों को यह लगता है कि धर्म की रक्षा होना जरूरी  उन्हें इस बात पर भी ध्यान रखना चाहिये कि समाज के सामान्य लोगों के व्यक्तिगत, आर्थिक, तथा भावनात्मक अर्थ सिद्धि होने पर ही वह धर्म के प्रति आकृष्ट होते हैं। उनके आकृष्ट होने पर ही धर्म की रक्षा संभव है। हमारे देश में विदेशी सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक विचाराधाराओं का प्रचार ही इसलिये हुआ क्योंकि हमारे देश की राजशाही की व्यवस्था प्रजाहित के अनुकूल नहीं रही जिसका विेदेशी विचारधारा के प्रचारकों ने लाभ उठाया।  इतना ही नहीं भारतीय संस्कृति के विरुद्ध प्रचार पर अनेक जगह धन भी खर्च कर लोगों की मानसिकता ही नहीं संस्कृति भी बदली गयी।
हैरानी इस बात की है कि जब भारतीय समाज भयानक आर्थिक संकट में है तब भारतीय धर्म के प्रचारक खामोशी से सब देख रहे हैं। कम से कम भ्रष्टाचार जैसे विषय पर किसी प्रचारक को बोलते नहीं देखा गया।  न ही किसी ने कभी भ्रष्टाचारियों को दुत्कारने या सामाजिक बहिष्कार करने की बात कही है। हमारी भारतीय धर्म के प्रचारकों से यही कहना है कि इस समय अगर वह अपने समाज के लिये कोई कार्य न कर सके तो उनकी विश्वसनीयता कम होगी। याद रहे यह मामला केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं वरन् पूरे देश से जुड़ा है। 
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, April 19, 2015

धर्मपथ और योगपथ-हिन्दी लघुकथा(dhamapatha aur yogpath-hindi short story or laghukathaa)


एक योग साधक ने एक भक्त मित्र ने कहा-‘‘आज दोपहर मेरे साथ एक धर्म में मेले में चलो।’’
साधक ने कहा-‘‘मेरी दृष्टि से तो धर्म का समय प्रातःकाल ही निश्चित है। इसलिये मै दोपहर धर्म मेले में नहीं चल सकता।’’
भक्त ने कहा-‘‘तुम नास्तिक हो इसलिये कभी भी किसी धार्मिक कार्यक्रम मे नहीं जाते हों। मैं जब भी कहता हूं तुम यही कहते हो।’’
          योग साधक ने कहा-‘‘मै सुबह योग साधना कर लेता हूं क्या वह भगवान के प्रति आस्था का प्रमाण नहीं है जबकि श्रीमद्भागवत गीता में श्रीकृष्ण जी ने योग का महत्व प्रतिपादित किया है।’’
          भक्त ने कहा‘‘उंह! यह हाथ पैर हिलाना और सांसें जोर से लेना और छोड़ना क्या योग साधना है?’’
साधक ने कहा-‘‘मेरी दृष्टि से यही है। मूल प्रश्न यह है कि मैं तुमसे कभी नहीं कहता कि प्रातःकाल योग साधना करो फिर मुझे तुम क्यों धार्मिक कार्यक्रमों में चलने का आग्रह क्यों करते हो? मै प्रातः जल्दी उठता हूं और तुम सूर्योदय के बाद बिस्तर छोड़ते हो। कभी मैंने तुम्हें ताना दिया है? तुम मेरी राह नहीं चलते पर मैं कभी आक्षेप नहीं करता जबकि अपना सहयात्री न होने से तुम रुष्ट हो जाते हों। योग साधना भी एक अनुष्ठान है जो मैं करता हूं। मैं कभी नहीं कहता कि तुम धार्मिक मेलों में अनुष्ठान न करो पर तुम्हारे अंदर अपनी भक्ति का अहंकार है वह मेरे न चलने पर ध्वस्त हो जाता है और तुम क्रोध में भरकर टिप्पणियां करते हों। तुम्हारे साथ धार्मिक मेले में चलना तो दूर धर्म पर कोई भी चर्चा मुझे व्यर्थ नज़र आती है।’’
भक्त निरुतर हो गया। तब साधक ने कहा-‘‘तुमने अगर धार्मिक मेले में जाने का तय किया है तो मेरे साथ के अभाव की वजह से रुक नहीं जाना। कम से कम मेरा ज्ञान यही कहता कि दूसरे को उसे धर्म पथ से विचलित नहीं करना चाहिये।’’
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Sunday, April 5, 2015

भारतीय योग विधा पर अभी भी विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता-हिन्दी लेख(India yoga education and america-hindi article)

अमेरिका की एक अदालत ने भारतीय योग को किसी धर्म विशेष से जुड़ा मानने से इंकार करते हुए उसे वहां जारी रखने की अनुमति प्रदान कर दी है। जिस तरह विश्व में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की इस योग विद्या का प्रचार हुआ है उसे देखते हुए पश्चिमी देशों में इसे किसी धर्म से जोड़ने की संभावना वैसे भी नहीं लगती। खासतौर से ईसाई बाहुल्य देशों के जनमानस में इसके प्रति कोई दुर्भाव नहीं दिखाता। इस पर अधिक प्रसन्न होकर गर्व करने जैसी भी कोई बात नहीं है क्योंकि अभी हमें अपने देश में इसके व्यापक प्रसार की संभावना अभी भी जीवंत लगती हैं।  योग साधना की प्रशंसा सभी करते हैं पर इसके साथ नियमित रूप से जुड़े लोगों की संख्या अभी भी कम है।  इतना ही नहीं चिकित्सकों के घर जाने का जिन रोगियों का अनुभव व्यापक हो गया है वह भी अर्द्धचिकित्सक बनकर योग के महत्वहीन होने का प्रचार यह कहते हुए करते हैं कि योग से कोई बीमारी ठीक नहीं होंती उसके लिये दवाईयां लेना जरूरी है।
वैसे हम भी यह मानते हैं कि योग साधना के नियमित अभ्यास से कोई बीमारी दूर नहीं होती वरन् आसन, प्राणायाम तथा ध्यान से हमारी देह के अंदर स्थित देह, मन और विचारों के विकार दूर होते हैं और हमारा जीवन स्वस्थ मार्ग पर स्वाभाविक रूप से अग्रसर हो जाता है। उस मार्ग पर  बीमारियों का कोई स्थान नहीं होता। यह वैसा ही जैसा हम कष्टकर  राह से सुगम  पर जाते हैं। जैसे हम किसी ऐसी राह से गुजरे जहां कांटे और खाईंयां हों तब परेशान होकर हम अपनी राह बदल लें और वहां कोई संकट न हो तब यह तो नहीं कह सकते कि मार्ग से कांटेे और खाईयां दूर हो गयी हैं-क्योंकि हम जानते हैं कि हमने राह बदली है न कि कांटे और खाईयां हटाये हैं।
          वैसे अभी तक हम प्रचार के पर्दे पर आसन और प्राणायाम के लाभों की चर्चा देख रहे हैं जबकि इसके आठ भाग हैं-यम, नियम, प्रत्याहार, आसन, प्राणायाम, ध्यान, धारणा और समाधि। इन सभी विषयों पर व्यापक चर्चा की आवश्यकता है। प्राणायाम के  बाद  ध्यान का विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है जिसके अप्रत्यक्ष लाभों के जीवन पर होने वाले प्रत्यक्ष प्रभाव का अध्ययन किया जाना जरूरी है। कहने का अभिप्राय यह है कि हमें अभी भी योग विषयों पर विस्तृत अध्ययन और उसके परिणामों की मीमांसा करने की आवश्यकता है। विश्व भर में हो रहे प्रचार पर यह सोचकर चुप नहीं बैठ जाना चाहिये कि हमारा लक्ष्य पूरा हो गया।
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Wednesday, April 1, 2015

नर की अपेक्षा नारी का महत्व कम दिखाने वाले संत पाखंडी-हिन्दी चिंत्तन(nar ki apeskha nari ka mahatva dikhane kam wale sant pakhandi-hindi thought article)


उस दिन टीवी पर एक संत का प्रवचन सुना। वह अपनी एक कथा का महत्व बताते हुए श्रोताओं को समझाा रहे थे कि उसके श्रवण से उनके यहां पुत्र होगा, फिर उनके पुत्र को पुत्र होगा फिर उनके पुत्र के पुत्र को पुत्र होगा। इस तरह उन्होंने अपने कथा के श्रवण का पुण्य पुत्र रूप में प्राप्त होना बताया। हिन्दू धर्म में ऐसे कथित गुरुओं को व्यवसायिक प्रचार माध्यम खूब चमकाते हैं।  वह अकेले ऐसे संत नहीं है वरन् हमने अनेक संतों के मुख से पुत्र पुण्य के रूप में प्राप्त होने की बात सुनी है।
एक संत ने तो यह तक कह दिया कि चार पुत्र पैदा करो। एक संत तथा एक राष्ट्र को प्रदान करने के बाद दो अपने पास रखो। एक तरफ ऐसे संत हिन्दू धर्म की रक्षा का दावा करते हैं तो लगता है कि वह केवल पुत्रों से ही होगी। हम जैसे योग साधकों के लिये यह विचार हास्यासन के लिये बहुत उपयुक्त है। बिना स्त्री के धर्म रक्षा! यह इन कथित संतों के श्रीमुख से सुनकर हंसी तो जरूर आयेगी। श्रीमद्भागवत गीता से उस सन्यास को अत्यंत कठिन बताया गया है जिसमें बसने का यह दावा करते हैं।  श्रीगीता में कर्म योग को ही श्रेष्ठ तथा व्यापक बताया गया है। यह कर्मयोग गृहस्थ जीवन का ही रूप है।  यह संत गृहस्थी न बसाने का दावा भले ही करें पर सभी आश्रम बनाते हैं और उसमें युवतियों को अपनी शिष्याओं के रूप में नियुक्त करते हैं।  ऐसे सभी संत हमेशा ही हिन्दू धर्म पर आक्रमण का भय दिखाते हैं पर हमारे हिसाब से सबसे ज्यादा हानि यही करते हैं।
पुरुष महिमा का बखान कर एक तरह से स्त्रियों का महत्व कम दिखाते हैं। हमें हैरानी इस बात की है कि देश में भ्रष्टाचार, अपराध तथा व्यसनों के बढ़ते प्रकोप को रोकने के लिये कभी प्रवचन नहीं करते। कभी किसी संत को अपने संतों से यह कहते हुए नहीं सुना कि उनके पास रिश्वत की कमाई का पैसा न लाया करो।  अपने अपराधी पुत्रों का त्याग करो या व्यसनियों का सामाजिक बहिष्कार करो। आधुनिक समय में ऐसी ही बुराईयों से लड़ने का जिम्मा इन संतों को लेना चाहिये पर यह अपने पुराने ढर्रे पर कथायें सुनाकर बोरियत पैदा करने के साथ ही  अप्रासगिक भी होते जा रहे हैं।  खासतौर से नारियों को महत्वहीन साबित करने के कारण आज का बौद्धिक वर्ग इनका विरोधी है-यह अलग बात है कि इसमें सबसे अधिक जनवादी और प्रगतिशील खेमे के सदस्य  हैं।  भारतीय अध्यात्मवादी बुद्धिजीवी इनकी आलोचना तो नहीं करते पर मन ही मन चिढ़ते जरूर हैं।  हालांकि हमारे समाज में अनेक पेशेवर संतों की बहंुतायत है पर फिर भी कुछ ऐसे हैं जो वास्तव में समाज के लिये सोचते हैं। उन्हें आधुनिक संदर्भों में प्राचीन कथाओं की व्याख्यान करना चाहिये ताकि धर्म के नये संकटों का सामना किया जा सके।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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