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Wednesday, April 1, 2015

नर की अपेक्षा नारी का महत्व कम दिखाने वाले संत पाखंडी-हिन्दी चिंत्तन(nar ki apeskha nari ka mahatva dikhane kam wale sant pakhandi-hindi thought article)


उस दिन टीवी पर एक संत का प्रवचन सुना। वह अपनी एक कथा का महत्व बताते हुए श्रोताओं को समझाा रहे थे कि उसके श्रवण से उनके यहां पुत्र होगा, फिर उनके पुत्र को पुत्र होगा फिर उनके पुत्र के पुत्र को पुत्र होगा। इस तरह उन्होंने अपने कथा के श्रवण का पुण्य पुत्र रूप में प्राप्त होना बताया। हिन्दू धर्म में ऐसे कथित गुरुओं को व्यवसायिक प्रचार माध्यम खूब चमकाते हैं।  वह अकेले ऐसे संत नहीं है वरन् हमने अनेक संतों के मुख से पुत्र पुण्य के रूप में प्राप्त होने की बात सुनी है।
एक संत ने तो यह तक कह दिया कि चार पुत्र पैदा करो। एक संत तथा एक राष्ट्र को प्रदान करने के बाद दो अपने पास रखो। एक तरफ ऐसे संत हिन्दू धर्म की रक्षा का दावा करते हैं तो लगता है कि वह केवल पुत्रों से ही होगी। हम जैसे योग साधकों के लिये यह विचार हास्यासन के लिये बहुत उपयुक्त है। बिना स्त्री के धर्म रक्षा! यह इन कथित संतों के श्रीमुख से सुनकर हंसी तो जरूर आयेगी। श्रीमद्भागवत गीता से उस सन्यास को अत्यंत कठिन बताया गया है जिसमें बसने का यह दावा करते हैं।  श्रीगीता में कर्म योग को ही श्रेष्ठ तथा व्यापक बताया गया है। यह कर्मयोग गृहस्थ जीवन का ही रूप है।  यह संत गृहस्थी न बसाने का दावा भले ही करें पर सभी आश्रम बनाते हैं और उसमें युवतियों को अपनी शिष्याओं के रूप में नियुक्त करते हैं।  ऐसे सभी संत हमेशा ही हिन्दू धर्म पर आक्रमण का भय दिखाते हैं पर हमारे हिसाब से सबसे ज्यादा हानि यही करते हैं।
पुरुष महिमा का बखान कर एक तरह से स्त्रियों का महत्व कम दिखाते हैं। हमें हैरानी इस बात की है कि देश में भ्रष्टाचार, अपराध तथा व्यसनों के बढ़ते प्रकोप को रोकने के लिये कभी प्रवचन नहीं करते। कभी किसी संत को अपने संतों से यह कहते हुए नहीं सुना कि उनके पास रिश्वत की कमाई का पैसा न लाया करो।  अपने अपराधी पुत्रों का त्याग करो या व्यसनियों का सामाजिक बहिष्कार करो। आधुनिक समय में ऐसी ही बुराईयों से लड़ने का जिम्मा इन संतों को लेना चाहिये पर यह अपने पुराने ढर्रे पर कथायें सुनाकर बोरियत पैदा करने के साथ ही  अप्रासगिक भी होते जा रहे हैं।  खासतौर से नारियों को महत्वहीन साबित करने के कारण आज का बौद्धिक वर्ग इनका विरोधी है-यह अलग बात है कि इसमें सबसे अधिक जनवादी और प्रगतिशील खेमे के सदस्य  हैं।  भारतीय अध्यात्मवादी बुद्धिजीवी इनकी आलोचना तो नहीं करते पर मन ही मन चिढ़ते जरूर हैं।  हालांकि हमारे समाज में अनेक पेशेवर संतों की बहंुतायत है पर फिर भी कुछ ऐसे हैं जो वास्तव में समाज के लिये सोचते हैं। उन्हें आधुनिक संदर्भों में प्राचीन कथाओं की व्याख्यान करना चाहिये ताकि धर्म के नये संकटों का सामना किया जा सके।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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