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Friday, December 6, 2013

धार्मिक विचाराधाराओं के बीच द्वंद्व स्वाभाविक-हिन्दी चिंत्तन लेख (Dharmik vichardharaon ke beech dwandwa swabhavik-hindi thought article)



                        शायर इकबाल ने लिखा था कि मजहब नहीं सिखाता बैर करना। आमतौर से कुछ कट्टरपंथी भारतीय धार्मिक बौद्धिक विद्वान  कहते हैं कि उसका आशय केवल अपने ही धर्म से था जो मजहब कहलाता है। इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि इकबाल उर्दू शायर थे और उनकी विचाराधारा को ही मजहब कहा जाता है। इतना ही नहीं उनकी लेखन की  भाषा को भी मजहब से ही जोड़ा जाता है हालांकि यह तार्किक है। याद रहे हिन्दू को धर्म और ईसाई को रिलीजन कहा जाता है। इकबाल ने  विरोधियों को आलोचना का  अवसर उन्होंने स्वयं ही दिया क्योंकि विभाजन के बाद वह नवनिर्मित पाकिस्तान चले गये।  हम यहां मान लेते हैं कि इकबाल के मजहब का आशय व्यापक था और उन्होंने हिन्दू तथा ईसाई शब्द को भी मजहब ही माना होगा।  हम उनकी बात से सहमत है कि मजहब नहीं सिखाता बैर करना पर हमारा सवाल यह है कि मजहब का मतलब वह क्या समझते थे?
            अगर उनके मजहब का मतलब दुनियां के हर प्रकार के धर्म या रिलीजन से था तो हम मानते हैं कि वह केवल एक नारा देकर वाहवाही लूटते रहे थे।  दरअसल हमारा मानना है कि जहां भी धर्म के साथ कोई नाम जुड़ा है वह राजसी बुद्धि से बनी योजना का हिस्सा है ताकि उसकी आड़ में विशेष प्रकार के लोगों का वर्चस्व बना रहे। श्रीमद्भागवत में धर्म का आशय व्यापक है पर उसका पूरा संबंध मनुष्य के आचरण, कर्म तथा विचार से ही है।  बेहतर आचरण ही धर्म है पर जब हम वर्तमान में उसके साथ तमाम नाम जुड़े देखते हैं तो पाते हैं कि एक तरह से वर्चस्व की लड़ाई चल रही है।  सभी धर्मों के प्रचारक अपने धर्म तथा उसकी पूजा पद्धति को श्रेष्ठ बताते हैं। यही कारण है कि अनेक देशों के रणनीतिकार  कथित रूप से धर्म निरपेक्ष या सर्वधर्म समभाव के सिद्धांत का पालन करने का दावा करते हैं।  सर्व धर्म समभाव अपने आप में विवादास्पद है।  धर्म का आशय अगर आचरण से है तो अनेक प्रकार के धर्मों की स्वीकार्यता का क्या अर्थ हो सकता है? जहां तक धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न है तो वह केवल उन लोगों का सिद्धांत है जो अपने स्वार्थ तक ही सीमित हैं।  उन्हें आचरण या व्यवहार से कोई अर्थ नहीं रहता।  धर्म के प्रति निरपेक्ष रहने का अर्थ यह है कि अपने तथा दूसरों के व्यवहार, आचरण तथा विचारों के प्रति उदासीन होकर केवल अपना स्वार्थ पूरा करना।  अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिये धर्म के सिद्धांतों का भी उल्लंघन करना ही धर्म निरपेक्षता का प्रमाण है।  एक विचाराशील, परिश्रमी तथा सात्विक मनुष्य कभी भी धर्म से निरपेक्ष नहीं रह सकता। धर्म से निरपेक्ष रहने का आशय यही है कि अपने तथा दूसरों के अच्छे या बुरे व्यवहार, कर्म तथा विचार के  प्रति उदासीन रहना। हालांकि धर्म के प्रति यह उदासीनता सकाम भाव को इंगित करती है। मतलब यह कि हमारा काम सिद्ध होना चाहिये और उसकी वजह से किसी को कष्ट हो तो हो।
                        अगर इकबाल का आशय सभी प्रचलित धर्मो से था तो भी हम मानते हैं कि वह कोई बड़े ज्ञानी नहीं थे और अगर यह मान ले कि उनका श्रीगीता में वर्णित आचरण रूप धर्म से था इसका प्रमाण नहीं मिलता कि उसका उनको कोई ज्ञान था।  हम यहां मानकर चलते हैं कि उनके मजहब शब्द से आशय सभी धर्मों से था तो वह गलत थे।  आचरण से धर्म का संबंध है पर पर देखा जा रहा है कि जिन धर्मों का कोई नाम है वह योजनापूर्वक बनाये गये हैं।  सभी धर्मों में राजसी पुरुषों के साथ कुछ धार्मिक चेहरे रहे हैं जो उनके लिये धर्म का उपयोग राज्य विस्तार के लिये करते हैं।  वह लोगों के मौजूद अध्यात्मिक भूख को धर्म की आड़ में शांत कर अपने राजसी पुरुषों के नियंत्रण में लाते हैं।  देखा जाये तो प्रत्यक्ष धर्मों के ठेकेदार अपनी धवल छवि बनाकर सभ्य समाज पर बौद्धिक नियंत्रण करते हैं पर उन पर राजसी पुरुषों का ही वरद हस्त रहता है।  भारत के बाहर तो धर्म के नाम पर अनेक युद्ध भी हुए हैं। जब हम श्रीमद्भागवत गीता में वणित धर्म रूपी आचरण की बात करें तो वह वाकई बैर करना नहीं सिखाता पर उसके इतर हम नामधारी कथित धर्मो की बात करें तो वह राजसी पुरुषों की विस्तारवादी नीतियों को ही प्रश्रय देते हैं। तय बात है कि इन प्रयासों को विभिन्न विचारधाराओं को मानने वालों के बीच विरोध होता है।  ऐसे में इकबाल साहब की बात बेदम हो जाती है। खासतौर से जब उन्होंने मजहब के आधार पर बने पाकिस्तान में जाना श्रेयस्कर समझा हो। अगर उनके मजहब शब्द  आशय धर्म या रिलीजन से होता तो वह कभी भी पाकिस्तान नहीं जाते।  कहीं न कहंी उनके मन में यह बात रही होगी कि भारत में जब हिन्दी का बोलबाला होने वाला है जिसकी वजह से भारतीय अध्यात्म ज्ञान भी विस्तार पायेगा तब उनकी शायरी बौनी हो जायेगी।
            हमारे कहने का अभिप्राय यह है कि अगर हम भारतीय अध्यात्म दर्शन की बात करें तो उसमें धर्म वाकई बैर करना नहीं सिखाता पर जब हम उसके इतर नाम धारी धर्मों की बात करें तो उनके सिद्धांत बड़े ही आकर्षक हों पर उनसे जुड़े शिखर पुरुष अपने अपने समाजों पर नियंत्रण करने के लिये  दूसरे समाजों का भय पैदा कर नियंत्रण करते हैं जिससे अनेक देशों में वैमनस्य फैलता है।  ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि इकबाल का यह तर्क कैसे माना जाये कि धर्म, मजहब या रिलीजन बैर करना नहीं सिखाता।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


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