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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Saturday, January 21, 2017

ट्रम्प से भारत तथा हिन्दूओं को अधिक अपेक्षा नहीं करना चाहिये-हिन्दी लेख (India And Hindu Must very Much Exept from Trump Government-Hindi Article)


                                          ट्रम्प को लेकर भक्तों का एक वर्ग बहुत प्रसन्न है कि उन्होंने एक धर्म का नाम लेकर उससे आतंकवाद जोड़कर उससे लड़ने की बात कही। उनको लगता है कि उन्हें अपने देश में व्याप्त आतंकवाद से छुटकारा मिल जायेगा।  हमें लगता है कि इन कुछ भक्तों को भ्रम है।  भक्त इधर फेसबुक पर तो खूब दहाड़ते हैं पर उनके प्रवक्ता टीवी चैनलों पर यह कहते हुए अपनी जान बचाते हैं कि आतंकवाद को किस्ी धर्म से नहीं जोड़ना चाहिये। अगर भक्त उछल रहे हैं तो पहले अपना आधिकारिक विचार बदल लें। ट्रम्प ने उस धर्म से जुड़े आतंकवाद को पूरी दुनियां से मिटाने की बात कही है पर भक्तों की आधिकारिक संस्थायें तथा प्रवक्ता तो यह मानते ही नहीं। यहां तक कि पाकिस्तान पर शाब्दिक  आक्रमण करते हुए भी उसके साथ वहां के कथित राजकीय धर्म का नाम नहीं लेते जिसकी आड़ लेकर खुलकर भारत को अपना दुश्मन कहता है। वह साफ कहता है कि हम हिन्दू धर्म के कारण भारत विरोधी हैं पर भक्तों के आधिकारिक प्रवक्ता वहां भी धर्मनिरपेक्षता का नाम लेकर बच निकलते हैं।
                 ट्रम्प सीधे आतंकवाद के धार्मिक रूप पर आक्रमण करेगा तब भारत क्या उसके साथ खड़ा रह पायेगा? बिल्कुल नहीं! अप्रत्यक्ष और सांकेतिक रूप से भारत भले ही अमेरिका का साथ दे प्रत्यक्ष़्ा रूप से जूझने के लिये जिस इच्छाशक्ति और मानसिक दृढ़ता की आवश्यकता है वह हमारे यहां नहीं दिखती। हालांकि अमेरिका के लिये भी कठिनाई आने वाली है। भारत कभी भी औपचारिक रूप से कश्मीर तथा अन्य स्थानों पर धार्मिक आतंकवाद की बात नहीं मानेगा।  जबकि ट्रंप के सलाहकार ऐसी अपेक्षा करेंगे।  इतना ही नहीं  यह भी हो सकता है कि अमेरिका अनेक ऐसे कदम उठाये जो कथित रूप से धार्मिक आतंकवाद के विरुद्ध हो तो भारत उनका खुलकर तो नहीं पर दबी आवाज में उसका विरोध करे। 
                          अमेरिका का  सबसे बड़ा आर्थिक मित्र सऊदीअरब सीधे अपने यहां स्थित धार्मिक स्थानों का लाभ उठाते हुए एक वैचारिक साम्राज्य पूरे विश्व में बनाये बैठा है। अमेरिका भी साम्राज्यवादी है पर वह केवल अब दिखावे का रह गया है-जैसा कि ट्रम्प ने भी माना है कि अमेरिका दूसरे देशों की रक्षा करता रहा पर अपने नागरिकों के रोजगार नहीं बचा सका। सऊदी अरब को अमेरिका पर इतना जबरदस्त आर्थिक प्रभाव है कि वह वहां के रणनीतिकारों को भी धमकाने लगा था जबकि वहां की सेना अब भी उसका सहारा है। अगर ट्रम्प अपने कथानुसान धार्मिक आतंकवाद के विरुद्ध मोर्चा खोलते हैं तो सऊदीअरब तथा पाकिस्तान उसके सामने खड़े होंगे। भारतीय रणनीतिकार भले ही पाकिस्तान के विरुद्ध जहर उगलें पर सीधे उसकी धार्मिक क्रूरता पर सवाल नहीं उठाते। अनाधिकारिक रूप से भले ही पाकिस्तान में कम होती हिन्दूओं की जनसंख्या पर सवाल उठते हों पर आधिकारिक बयानों में उससे बचा जाता है-ट्रम्प के रणनीतिकार चाहेंगे कि भारत खुलकर वैसे ही धार्मिक आतंकवाद का मामला उठाये जैसे वह उठा रहे हैं। तब लगता नहीं है कि भक्तों के शिखर पुरुष इसके लिये राजी हो। यही पैंच फंसेगा। 
                              हालांकि उसका रास्ता भक्तों के एक शिखर पुरुष ने निकाला था पर लगता है कि उसे तवज्जो नहीं दी गयी। वह रास्ता था पंथनिरपेक्षता का। इसमें व्यापक चर्चा की संभावनायें थीं। हमने इस पर लिखा था पर उसे किसी ने प्रचारित नहीं किया। अब जैसे जैसे 2019 आ रहा है भक्तों के पास से वह समय निकल गया है कि वह देश की नीतियों में कोई बड़ा बदलाव कर सकें। ऐसे में ट्रम्प से पाकिस्तान के प्रति अपनी नीति में बदलाव की आशा करना भी बेकार है जब आप उसके शाब्दिक आक्रमण के समय अपनी कथित धर्मनिरपेक्षता के बोझ तले दबे जाते हों-पंथनिरपेक्षता को लेकर आपके पास इतने तर्क भी नहीं है कि आप यहां बहस चला सकें। जो तर्क दे सकते हैं वह इतने मामूली लोग है कि भक्त उन्हें अपने बौद्धिक शिखर पुरुषों के तुल्य कुछ समझते ही नहीं। मूल बात यह है कि ट्रम्प एकदम नये हैं और उन्हें पाकिस्तान के प्रति भड़काने के लिये धर्म का नाम लेना जरूरी होगा पर यह भारत करेगा नहीं। ऐसे में यह आशा करना कि ट्रम्प पाकिस्तान की हालात खराब करेंगे। बस वह इतना ही कर पायेंगे कि उसे अपने यहां कोई गतिविधि न कर करने दें। अतः भारत को अब की बार ट्रम्प सरकार से ज्यादा अपेक्षा नहीं करना चाहिये। आम भक्त यकीनन यही चाहते हैं कि भारत खुलकर आगे आये पर उनकी संस्थायें और प्रवक्ता कभी खुलकर वह नहीं कर पायेंगे जैसा कि ट्रम्प सरकार अपेक्षा करेगी।
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Sunday, October 23, 2016

कश्मीर पर चुभती बात अब मासूम चेहरे वाले विद्वान कहेंगे-हिन्दी संपादकीय (Now Lul Face would Saying criticle Word In Kashmir-Hindi Editorial

                                       कुछ लोगों को हम वाकई सरल प्रकृति का समझते हैं पर जब चालाकी से अपनी बात दूसरे को दुखाने के लिये कहते हैं तब उनकी पोल खुल ही जाती है। हम टीवी पर बहसों में आने वाले एक निष्पक्ष लेखक को बड़ा सीदा और सज्जन समझते थे। आज उनका कश्मीर के संबंध में एक पाठ देखा तो हैरानी हुई।  उसमें उन्होंने लिखा कि कश्मीर की धरती पर हमारे पास हैं पर लोग हमारे साथ नहीं हैं। पहली बात तो हम यह बतायें कि हम बचपन से देखते आ रहे हैं कि कश्मीर में सब कुछ सामान्य रहा तब वहां कोई आंदोलन वगैरह या प्रथकतावाद का कोई सवाल नहीं आया।  1971 के बाद पाकिस्तान ने अमेरिका और ब्रिटेन की शहर पर वहां आतंकवाद शुरु किया तब से यह मामला चला। 
                कुछ चुभने वाली ऐसी बातें मासूम दिखने वाले लोग कहते हैं तो लगता है कि उन्हें खरीदकर लिखवाया गया है। हमारे देश के कुछ अखबार भी बिना सोचे समझे छाप देते हैं-या सरकार को बदनाम करने की उनकी ऐसी योजना रहती है यह पता नहीं। हमारा तो एक ही सवाल है कि ‘अगर लोग साथ नहीं है तो लोकसभा और विधानसभा चुनावों में 67 प्रतिशत मतदान भूतप्रेत करने आते हैं।
                 जनाब! सामान्य लोगों की अगर सरकार नहीं सुनती तो अपराधी भी नहीं सुनते।  अपराधी का लट्ठ चलता है तो लोग उससे डरे सहमे रहते हैं पर एक बार वह पुलिस के हत्थे चढ़ जाये उससे किनारा कर लेती है।  कश्मीर में अभी तक अलगावादियों का लट्ठ चल रहा है इसलिये लोग खामोश हैं। जिस दिन सरकार उन्हें लपेट लेगी उस दिन जनता उसके साथ हो जायेगी। सरकार जीती तो जनता उसके साथ हो जायेगी। 
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        हमने सुना था कि पाकिस्तान भारतीय बुद्धिजीवियों को खरीदने के लिये पैसा खर्च कर रहा है। हमें लग रहा है कि संभवतः अब वह ऐसे बुद्धिजीवियों को भी सामने लायेगा जो मासूम चेहरे वाले होंगे और उसकी बात इस तरह कहें जैसे कि वह निष्पक्ष विश्लेक्षक की हो। 
           भारतीय प्रचार माध्यम इस समय जनमानस को उत्तर प्रदेश के ‘परिवार विवाद’ और क्रिकेट में व्यस्त रखे हुए हैं। इस बीच खबर है कि अमेरिका ने पाकिस्तान को चेतावनी दी है कि अगर उसने आतंकवाद पर नियंत्रण नहीं किया तो वह उसके अंदर घुसकर मारेगा।  यह गंभीर चेतावनी है। इधर पाकिस्तान अपनी झैंप मिटाने के लिये सीमा पर गोलीबारी कर रहा है। उसके पालतू  एक तरह से कश्मीर में अंतिम युद्ध लड़ रहे हैं। ऐसा लगता है कि आगामी कुछ माह में पाकिस्तान का निपटारा इस तरह होगा कि कोई उसकी अभी कल्पना भी नहीं कर रहा है।

Thursday, October 20, 2016

राष्ट्रप्रमुख मित्र हैं, जनता एक दूसरे को जानती नहीं फिर लड़ाई क्यों होती है-हिन्दी संपादकीय (National Chief0 are Good Freind, Public Not Nowledgeble, than Why does Fight Between Two Coutry-Hindi Editorial)

                                         भारत पाकिस्तान और चीन तीनों के बीच साठ बरस से द्वंद्व चलता रहा है। बचपन से लेकर इन तीनों के बीच विवादों की चर्चा सुनते आ रहे हैं। एक प्रश्न हमारे दिमाग में आता है कि प्रारंभ से तीनों देशों के राजप्रमुख आपस में बड़े आराम से मिलते रहे हैं।  तीनों देशों के जनमानस का आपस में कोई सीधा संबंध रहता नहीं है। तब सवाल आता है कि देशभक्ति के नाम पर इन तीनों देशों की जनता एक दूसरे के प्रति संशंकित क्यों रहती है? राजप्रमुखों के आपस में मधुर संबंध और जनता एक दूसरे को जानती नहीं। फिर वह मध्य में कौन लोग हैं जो इस तरह की दुश्मनी निभाते हैं।
                     हम अगर अब भी देखें तो भारतीय प्रधानमंत्री तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की नातिन की शादी में पहुंच गये। चीन के राष्ट्रपति जब भारतीय प्रधानमंत्री के साथ फोटो में ऐसे खड़े होते हैं जैसे शैक्षणिक काल के मित्र हों। चीन से नाराजगी के बाद भारत में उसकी सामग्री की मांग मेें 20 से 60 प्रतिशत गिरावट की बात कही गयी है-हम आधा ग्लास खाली की बजाय आधा भरा कहने के सिद्धांत पर चलें तो यह तय है कि फिर भी उसकी सामग्री बिक रही है। मांग में गिरावट का कारण नाराजगी या क्रय क्षमता में कमी है-इस पर अलग से बहस करने की आवश्यकता है। 
                   हमने अपने एक पाठ में हिन्दी चार ‘प’-पंूजीपति, प्रचार स्वामी, प्रबंधन तथा पकड़बाजों ( अंग्रेजी में चार ‘एम’-मनीमेकर, मीडिया, मैनेजमेंट तथा माफिया)- के संयुक्त उद्यम के सक्रिय होने की बात कही थी। यही समूह समाज के आम जनमानस पर नियंत्रण करने की योजना बनाकर उन पर अमल करता है। प्रबंधन और जनमानस के बची बाकी तीनों अपना काम करते हैं। पूंजीपति, प्रचार स्वामी  तथा पकड़बाजों के आपसी संपर्कों का सहजता से पता लगाना संभव नहीं पर प्रत्यक्ष यह लगता है कि सभी आपस में जुड़े हुए हैं-प्रचार समूह अपने लाभ के अनुसार ही समाचार और बहसें चलाते प्रतीत होते हैं।  जब प्रचार माध्यमों में देशभक्ति पर बहस होती है तो ऐसा लगता है कि यह विषय भी विक्रय योग्य हो गया है।  दो महीने पहले चीन और पाकिस्तान के प्रति कोई ऐसी घृणा नहीं थी पर प्रचार माध्यमों से ऐसा जादू चलाया कि सभी लोग देशभक्ति का राग सुनकर हैरान हैं। पाकिस्तानी कलाकारों को यहां लाया कौन? वही लोग जो अब देशभक्ति के नाम पर उनको भगा रहे हैं।
सामान्य जनमानस हमेशा ही प्रचार माध्यमों के प्रभाव में बना रहता है पर हम जैसे चिंत्तक कभी कभी इस बात पर विचार करते हैं कि जिस तरह आज भौतिकतावादी युग में अर्थ की प्रधानता है उसमें देश की कला, राजनीति, अर्थ, साहित्य, पत्रकारिता के क्षेत्र में सौ फीसदी शुचिता तो छोड़िये पचास की राह पर चले यह संभव नहीं है।  जब से हमने क्रिकेट में फिक्सिंग का भूत देखा है हमारी स्थिति यह है कि सभी जगह वही दिखाई देता है। हमारे पास सूचना के ज्यादा साधन नहीं है पर अतर्जाल पर इतने मित्र हैं कि उनके पाठों से कई ऐसी बातें मिलती हैं जिनको पढ़कर यही कहते हैं कि ‘यहां सब चलता है’ तथा ‘बिकने की कला आ जाये तो अपना चेहरा दिखाने के लिये कई आकर्षक स्थान मिल जाते हैं। बस, अपना चेहरा आईने और चरित्र ज्ञान से दूर रखना चाहिये।
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