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Saturday, February 22, 2014

संत कबीर दर्शन-वार्तालाप में गालियों के उपयोग से बचें(vartalap mein gaaliyon se bachen-sang kabir darshan)



      हमारे देश में समाज ने  शिक्षा, रहन सहन, तथा चल चलन में पाश्चात्य शैली अपनायी है पर वार्तालाप की शैली वही पुरानी रही है। उस दिन हमने देखा चार शिक्षित युवा कुछ अंग्रेजी और कुछ हिन्दी में बात कर रहे थे।  बीच बीच में अनावश्यक रूप से गालियां भी उपयोग कर वह यह साबित करने का प्रयास भी कर रहे थे कि उनकी बात दमदार है। हमने  देखे और सुने के आधार पर यही  समझा कि वहां वार्तालाप में अनुपस्थित किसी अन्य मित्र के लिये वह गालियां देकर उसकी निंदा कर रहे हैं।  उनके हाथ में मोबाइल भी थे जिस पर बातचीत करते हुए  वह गालियों का धड़ल्ले से उपयोग कर रहे थे। कभी कभी तो वह अपना वार्तालाप पूरी तरह अंग्रेजी में करते थे पर उसमें भी वही हिन्दी में गालियां देते जा रहे थे।  हमें यह जानकर हैरानी हुई कि अंग्रेजी और हिन्दी से मिश्रित बनी इस तोतली भाषा में गालियां इस तरह उपयोग हो रही थी जैसे कि यह सब वार्तालाप शैली का कोई नया रूप हो।

संत  कबीर कहते हैं कि
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गारी ही से ऊपजे कष्ट और मीच।
हारि चले सो सन्त है, लागि मरै सो नीच।।
      सामान्य हिन्दी में भावार्थ-गाली से कलह, कष्ट और झंगडे होते हैं। गाली देने पर जो उत्तेजित न हो वही संत है और जो पलट कर प्रहार करता है वह नीच ही कहा जा सकता है।
आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक।
कहें कबीर नहि उलटियो, वही एक की एक।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जब कोई गाली देता है तो वह एक ही रहती है पर जब उसे जवाब में गाली दी जाये तो वह अनेक हो जाती हैं। इसलिये गाली देने पर किसी का उत्तर न दें यही अच्छा है।

      कई बार हमने यह भी देखा है कि युवाओं के बीच केवल इस तरह की गालियों के कारण ही भारी विवाद हो जाता है। अनेक जगह हिंसक वारदातें केवल इसलिये हो जाती हैं क्योंकि उनके बीच बातचीत के दौरान गालियों का उपयोग होता है। जहां आपसी विवादों का निपटारा सामान्य वार्तालाप से हो सकता है वह गालियों का संबोधन अनेक बार दर्दनाक दृश्य उपस्थित कर देता है।
      एक महत्वपूर्ण बात यह कि अनेक बार कुछ युवा वार्तालाप में गालियों का उपयोग अनावश्यक रूप से यह सोचकर करते हैं कि उनकी बात दमदार हो जायेगी।  यह उनका भ्रम है। बल्कि इसका विपरीत परिणाम यह होता है कि जब किसी का ध्यान गाली से ध्वस्त हो तब वह बाकी बात धारण नहीं कर पाता।  यह भी एक मनोवैज्ञानिक सत्य है वार्तालाप क्रम टूटने से बातचीत का विषय अपना महत्व खो देता है और गालियों के उपयोग से यही होता है। इसलिये जहां अपनी बात प्रभावशाली रूप से कहनी हो वहां शब्दिक सौंदर्य और उसके प्रभाव का अध्ययन कर बोलना चाहिये। अच्छे वक्ता हमेशा वही कहलाते हैं जो अपनी बात निर्बाध रूप से कहते हैं तो श्रोता भी उनकी सुनते हैं। गालियों का उपयोग वार्तालाप का ने केवल सौंदर्य समाप्त करता है वरन उसे निष्प्रभावी बना देता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, February 13, 2014

दुष्ट लोगों को प्रसिद्धि का अवसर देना गलत-विदुर नीति(dusht logon ko prasiddh ka awasar dena galat-vidur neeti)



      योग साधक तथा ज्ञानार्थी लोग  इस बात के विरुद्ध  होते  है कि कोई ज्ञानी अपने धर्म पर किसी दूसरे विचाराधारा के व्यक्ति की टिप्पणी पर उत्तेजित होकर अपना संयम गंवायें। साथ ही किसी ज्ञानी को दूसरे धार्मिक विचाराधारा पर टिप्पणी करने की बजाय अपनी मान्यता के श्रेष्ठ तत्वों का प्रचार करना चाहिये। जबकि देखा जा रहा है कि लोग एक दूसरे की धार्मिक विचाराधारा का मजाक उड़ाकर सामाजिक संघर्ष की स्थिति निर्मित करते हैं।
      अभी हाल ही में एक गैर हिन्दू विचाराधारा की लेखिका के भारतीय धर्म का मजाक उड़ाती हुए एक पुस्तक पर विवाद हुआ। यह पुस्तक छपे चार साल हो गये हैं और इसे भारत में पुरस्कृत भी किया गया।  किसी को यह खबर पता नहीं थी।  जब विवाद उठा तब पता चला कि ऐसी कोई पुस्तक छपी भी थी।  दरअसल इस पुस्तक की वापसी के लिये कहीं किसी अदालत में समझौता हुआ है।  तब जाकर प्रचार माध्यमों में इसकी चर्चा हुई। एक विद्वान ने इस पर चर्चा में कहा कि इस तरह उस लेखिका को प्रचार मिल रहा है। इतना ही नहीं अब तो वह लेखिका भी बेबाक बयान दे रही है। संभव है इस तरह उसकी पुस्तकों की बिक्री बढ़ गयी हो। ऐसे में सभव है कि कहीं उसी लेखिका या प्रकाशक ने उस पुस्तक की प्रसिद्धि तथा बिक्री बढ़ाने के लिये इस तरह का विवाद प्रायोजित किया हो।

विदुर नीति में कहा गया है कि
असन्तोऽभ्यर्थिताः सिद्भः क्वचित्कार्य कदाचन।
मन्यन्ते सन्तमात्मानमसन्तामपि विश्रुत्तम्।।
     हिन्दी में भावार्थ-यदि किसी दुष्ट मनुष्य सेे सज्जन किसी विषय पर प्रार्थना करते हैं तो वह दुष्ट प्रसिद्ध के भ्रम में स्वयं को भी सज्जन मानने लगता है।

      हमारा मानना है कि धर्म चर्चा का नहीं वरन् आचरण का विषय है। किसी भी धार्मिक विचाराधारा में चंद  ठेकेदार यह दावा करते हैं कि वह उसे पूरी तरह समझते हैं। चूंकि हमारे समाज ने भी यह मान रखा है कि ज्ञान का अर्जन तो केवल बौद्धिक रूप से संपन्न लोग ही कर सकते हैं इसलिये कोई अपने प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन नहीं करता जिससे  उसमें से रट्टा लगाकर ज्ञान बेचने वाले लोगों को अपनी श्रेष्ठ छवि बनाने का अवसर मिलता है। दूसरी बात यह भी है कि यह कथित रूप से प्रचार किया जाता है कि बिन गुरु के गति नहीं है।  जबकि हमारे महापुरुष कहते हैं कि अगर योग्य गुरु नहीं मिलता तो परमात्मा को ही सत्गुरु मानकर हृदय में धारण करें। इससे ज्ञान स्वतः ही  मस्तिष्क में स्थापित हो जाता है।  दूसरी बात यह कि धर्म की रक्षा विवाद से नहीं वरन् ज्ञान के आचरण से ही हो सकती है।  दूसरी बात यह कि कुछ लोगों को अपनी प्रसिद्धि पाने की इच्छा पथभ्रष्ट कर देती है और तब वह जनमानस को उत्तेजित करने का प्रयास करते हैं। जब सज्जन लोग उनसे शांति की याचना करते हैं तो उन्हेें लगता है कि वह समाज के श्रेष्ठ तथा अति सज्जन आदमी है। इसलिये अपनी आस्था तथा इष्ट पर की गयी प्रतिकूल टिप्पणियों पर अपना मन खराब नहीं करना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, February 6, 2014

संत कबीर दर्शन-पानी छानकर पीना गुरु जानकर बनाना(sant kabir darshan-pani chhankar peena guru jaankar banana)



हमारे देश में धर्म प्रचार और अध्यात्मिक ज्ञान के लिये अनेक कथित गुरु बन गये हैं।  अनेक गुरु बहुत प्रसिद्ध हैं यह तो तब पता चलता है जब उनको किसी भी अच्छे या बुरे कारण से प्रचार माध्यमों में सुर्खियां मिलती है। हजारों करोड़ों की संपत्ति करोड़ों शिष्य के होने की बात तब सामने आती है जब किसी गुरु की चर्चा विशेष कारण से होती है। आज तक एक बात समझ में नहीं आयी कि एक गुरु एक से अधिक आश्रम क्यों बनाता है? आश्रम से आशय किसी गुरु के उस रहने के स्थान से है जिसका उपयोग वह  निवास करने के साथ ही अपने शिष्यों को शिक्षा देने के लिये करता है।  आमतौर से प्राचीन समय में गुरु एक ही स्थान पर रहते थे। कुछ गुरु मौसम की वजह से दो या तीन आश्रम बनाते थे पर उनका आशय केवल समाज से निरंतर संपर्क बनाये रखना होता था।  हमारे यहां अनेक गुरुओं ने तीन सौ से चार सौ आश्रम तक बना डाले हैं। जहां भी एक बार प्रवचन करने गये वहां आश्रम बना डाला।  अनेक गुरुओं के पास तो अपने महंगे विमान और चौपड़ हैं।  ऐसे गुरु वस्त्र धार्मिक प्रतीकों वाले रंगों के पहनते हैं और प्राचीन ग्रंथों के तत्वज्ञान का प्रवचन भी करते हैं पर उनकी प्रतिष्ठा आत्म विज्ञापन के लिये खर्च किये धन के कारण होती है। लोग भी इन्हीं विज्ञापन से प्रभावित होकर नको अपना गुरु बनाते हैं।

संत कबीरदास कहते हैं कि
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गुरु भया नहिं शिष भया, हिरदे कपट न जाव।
आलो पालो दुःख सहै, चढ़ि पत्थर की नाव।।
      सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जब तक हृदय में कपट है तब तक गुरु कभी सद्गुरु और शिष्य कभी श्रेष्ठ मनुष्य नहीं बन सकता। कपट के रहते इस भव सांगर को पार करने की सोचना ऐसे ही जैसे पत्थर की नाव से नदी पार करना।

गुरु कीजै जानि के, पानी पीजै छानि।
बिना बिचारे गुरु करे, परै चौरासी खानि।।
      सामान्य हिन्दी में भावार्थ-पानी छानकर पीना चाहिए तो किसी को गुरु जानकार मानना चाहिए। बिना विचार किये गुरु बनाने से विपरीत परिणाम प्राप्त होता है।

      देखा जाये तो हमारे देश में आजकल कथित रूप से धर्म के ढेर सारे प्रचारक और गुरु दिखाई देते हैं।  जैसे जैसे रुपये की कीमत गिर रही है गुरुओं की संख्या उतनी ही तेजी से बढ़ी है। हम कहते हैं कि देश में भ्रष्टाचार पहले से कहीं अधिक बढ़ा है तो यह भी दिखाई देता है कि धार्मिक गुरुओं के कार्यक्रम भी पहले से कहीं अधिक होते है। ऐसे में यह समझ में नहीं आता कि जब धर्म का प्रचार बढ़ रहा है तो फिर देश के सामान्य चरित्र में गिरावट क्यों आ रही है?  तय बात है कि सत्य से निकटता का दावा करने वाले यह कथित गुरु माया के पुजारी हैं।  सच बात तो यह है कि हम आज किसी ऐसे गुरु को नहीं देख सकते जो प्रसिद्ध तो हो पर लक्ष्मी की उस पर भारी कृपा नहीं दिखाई देती है।  अनेक गुरु तो ऐसे हैं जो अपने मंचों पर महिलाओं को इसलिये विराजमान करते हैं ताकि कुछ भक्त ज्ञान श्रवण की वजह से नहीं तो सौंदर्य की वजह से भीड़ में बैठे रहें।  हालांकि हम यह नहीं कह सकते कि वहां विराजमान सभी लोग उनके भक्त हों क्योंकि अनेक लोग तो समय पास करने के लिये इन धार्मिक कार्यक्रमों में जाते हैं। यह अलग बात है कि उनकी वजह से बढ़ी भीड़ का गुरु अपना प्रभाव बढ़ाने के लिये प्रचार करते हैं।
      कहने का अभिप्राय यह है कि आज हम जो देश के साथ ही पूर विश्व में नैतिक संकट देख रहे हैं उसके निवारण के लिये किसी भी धर्म के गुरु सक्षम नहीं है। जहां तक पाखंड का सवाल है तो दुनियां का कोई धर्म नहीं है जिसमें पाखंडियों ने ठेकेदारी न संभाली हो पर हैरानी इस बात की है कि सामान्य जन जाने अनजाने उनकी भीड़ बढ़ाकर उन्हें शक्तिशाली बनाते हैं। सच बात तो यह है कि अगर विश्व समाज में सुधार करना है तो लोगों अपने विवेक के आधार पर ही अपना जीवन बिताना चाहिये। ऐसा नहीं है कि सभी गुरु बुरे हैं पर जितने प्रसिद्ध हैं उन पर कभी कभी कोई दाग लगते देखा गया होगा।     

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, February 1, 2014

अपनी मूल प्रकृत्ति के साथ जीने वाले धन्य हैं-रहीम दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(apni mool prukriti ke saath jeene wale dhanya hain-rahim darshan par aadharit chinttan lekh)



      आधुनिक युग में मनुष्य की जीवन को न केवल अस्थिर किया है बल्कि उसकी मानसिकता को भी अन्मयस्क कर दिया है। लोग अपने खानपान, रहनसहन तथा विचारों को लेकर इतने अस्थिर तथा अन्मयस्क हो गये हैं कि उन्हें यह समझ में ही नहीं आता कि क्या रें या क्या न करें? इसलिये प्रकृत्ति से दूर हटकर जीवन जी रहे लोगों को दैहिक तथा मानसिक रोग घेर लेते हैं।
      अपने लिये उत्कृष्ट रोजगार की लालसा में शहर और प्रदेश ही नहीं लोग देश भी छोड़ने को तैयार है। हम अक्सर यह शिकायत करते हैं कि हमारे यहां से प्रतिभाशाली लोग पलायन कर विदेश चले जाते हैं।  हम यह भी देख रहे हैं कि अनेक लोगों ने विदेश में जाकर भारी सम्मान पाया है। वैसे भी कहा जाता है कि अपने व्यक्तिगत विकास के लिये मूल स्थान से बिछड़ना ही पड़ता है। हालांकि अपने मूल शहर, प्रदेश अथवा देश को छोड़कर गये लोगों के हृदय में कहीं न कहीं इस बात का अफसोस होता है कि उन्हें अपने जन्मस्थान से दूर जाना पड़ा। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि आप अपने मूल स्थान से जाकर कितना भी विकास करें आपको अपने कार्यस्थल पर बाहरी ही माना जाता है।  उसी तरह मूल स्थान में रहने वाले लोग भी पराया मानने लगते हैं। कहा जाता है कि जो चूल के निकट है वही दिल के भी निकट है।

कविवर रहीम कहते हैं कि
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धनि रहीमगति मीन की, जल बिछुरत जिय जाय।
जिअत कंज तलि अनत बसि, कहा भौंर को भाय।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-मछली का जीवन धन्य है जो जल से बिछड़ते ही जीवन त्याग देती है। कमल अगर कीचड़ से प्रथक कहीं दूसरे स्थान पर जीना चाहता है तो भौंरे को उसकी यह बात पसंद नहीं आती।

      एक बात निश्चित है कि मनुष्य अगर संतोषी भाव का हो तो वह  अपने मूल स्थान पर ही बना रहता है यह अलग बात है कि उसे तब वह शनैः शनैः ही विकास की धारा में शामिल हो पाता है। भौतिक विकास को धन्य मानने वाले अपने जीवन का अर्थ तथा प्रकृति को नहीं समझते।  मनुष्य में कमाने वाले को उसके निकटस्थ  लोगों का दिमागी रूप से सम्मान मिलता है पर त्याग करने वाले को पूरा समाज हार्दिक प्रेम करता है।  इस संसार में हर जीव अपना पेट भर लेता है और कोई मनुष्य अगर पेट से ज्यादा कमाकर धन जमा करता है तो कोई तीर नहीं मार  लेता।  मनुष्य की पहचान कमजोर पर परोपकार और बेबस पर दया करने से ही होती है। अगर मनुष्य इन गुणों से हटकर अगर स्वार्थी जीवन जाता है तो उसे यह समझ लेना चाहिये कि उसे हार्दिक सम्मान कभी नहीं मिल सकता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, January 26, 2014

राजमद मनुष्य को उन्मादी बना ही देता है-संत कबीर दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(rajwad manushya ko unmadi bana he deta hai-sant kabir darshan)



      हमारे अध्यात्मिक महापुरुषों की शिक्षा को भले ही प्राचीन मानकर भुला दिया गया हो पर वह उसके सूत्र आज भी प्रासंगिक है।  हम नये वातावरण में नये सूत्र ढूंढते हैं पर इस बात को भूल जाते हैं प्रकृत्ति तथा जीव का मूल जीवन जिन तत्वों पर आधारित है वह कभी बदल नहीं सकते। हमने सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक स्तर पर अनेक परिवर्तन देखे हैं और कहते हैं कि संसार बदल गया है।  अध्यात्मिक ज्ञान साधक ऐसा भ्रम कभी नहीं पालते। उन्हें पता होता है कि आजकल आधुनिकता के नाम पर पाखंड बढ़ गया है। स्थिति यह हो गयी है कि आर्थिक, राजनीतिक साहित्यक, धार्मिक, सामाजिक तथा कला संस्थाओं में ऐसे लोग शिखर पुरुष स्थापित हो गये हैं जो समाज के सामान्य मनुष्य को भेड़ों की तरह समझकर उनको अपना अहंकार दिखाते हैं।  ऐसे लोग बात तो समाज  के हित की करते हैं पर उनका मुख्य लक्ष्य अपने लिये पद, पैसा तथा प्रतिष्ठा जुटाना  होता है। स्थिति यह है कि मजदूर, गरीब तथा बेबस को भगवान मानकर उसकी सेवा का बीड़ा उठाते हैं और उनका यही पाखंड उन्हें शिखर पर भी पहुंचा देता है।  एक बार वहां पहुंचने के बाद ऐसे लोग अहंकारी हो जाते हैं। फिर तो वह अपने से छोटे लोगों से सम्मान करवाने के लिये कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।
संत कबीर कहते हैं कि
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जग में भक्त कहावई, चुकट चून नहिं देय।
सिष जोरू का ह्वै रहा, नाम गुरु का लेय।।
     सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-कुछ मनुष्य संसार में भला तो  दिखना चाहते हैं पर वह किसी थोड़ा चूना भी नहीं देसकते।  ऐसे लोगों के मस्तिष्क में तो परिवार के हित का ही भाव रहता पर अपने मुख से केवल परमात्मा का नाम लेते रहते हैं।
विद्यामद अरु गुनहूं मद, राजमद्द उनमद्द।
इतने मद कौ रद करै, लब पावे अनहद्द
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-विद्या के साथ  गुण का अहंकार तथा राजमद मनुष्य के अंदर उन्माद पैदा कर देता है।  इस तरह के मद से मुक्त होकर ही परमात्मा का मार्ग मिल सकता है।
      अनेक बुद्धिमान  यह देखकर दुःखी होते हैं कि पहले समाज का भले करने का वादा तथा दावा कर शिखर पर पहुंचने के बाद लोग उसे भूल जाते हैं। इतना ही नहीं समाज के सामान्य लोगों की दम पर पहुंचे ऐसे लोग विकट अहंकार भी दिखाते हैं।  ज्ञान साधकों के लिये यह दुःख विषय नहीं होता। पद, पैसे और प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंचा व्यक्ति उन्मादी हो ही जायगा यह वह जानते हैं। ऐसे विरले ही होते हैं जिनको यह अहंकार नहीं आता।  जिनको अर्थ, राजनीति, समाजसेवा, धर्म तथा कला के क्षेत्र में पहली बार शिखर मिलता है तो उनके भ्रम का तो कोई अंत नहीं होता। उन्हें लगता है कि उनका पद तो उनके जन्म के साथ ही जमीन पर आया था। उनमें यह विचार तक नहीं आता कि जिस पद पर वह आज आयें हैं उस पर पहले कोई दूसरा बैठा था।  ऐसे लोग समाज सेवा और भगवान भक्ति का जमकर पाखंड करते हैं पर उनका लक्ष्य केवल अपने लिये पद, पैसा और प्रतिष्ठा जुटाना ही होता है।
      सामान्य लोगों को यह बात समझ लेना चाहिये कि उनके लिये दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओजैसी नीति का पालन करने के  अलावा कोई अन्य मार्ग नहीं होता। उन्हें पाखंडियों पर अपनी दृष्टि रखने और उन पर चर्चा कर अपना समय बर्बाद करने से बचना चाहिये।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, January 23, 2014

संत चरणदास के दोहे-बेपरवाह मनुष्य ही संसार में सुखी रह सकता है(sant charandas ke dohe-beparvah manushya hi sansar mein sukhi rah sakta hai)



      इस संसार की माया की महिमा भी विचित्र है। जिसके पास धन कम है वह उसे पाने के लिये भटकता हुआ तकलीफ उठाता है तो जो धनवान है भी अधिक धन के लिये जूझता दिखता है।  माया के इस खेल में मनुष्य यह तय नहीं कर पाता कि उसे चाहिए क्या?  इस संसार में सबसे सरल काम है धन कमाने में लगे रहना।  अनेक लोग शासकीय सेवा से निवृत होने के बाद भी दूसरी जगह जाकर कमाना चाहते हैं भले ही उनका काम पेंशन से चल सकता है।  सच बात तो यह है कि अध्यात्मिक संस्कार और ज्ञान बचपन से नहीं मिले तो बड़ी आयु में सत्संग या भगवान भजन की प्रवृत्ति जाग ही नहीं सकती।  यही कारण है कि बड़ी आयु में भी मनुष्य सांसरिक विषयों में लिप्त रहकर समय काटना चाहता है।  यह अलग बात है कि प्रकृति तथा सामाजिक नियमों में चलते सांसरिक विषय उसे स्वतः छोड़ने लगते हैं तब अध्यात्मिक ज्ञान तथा संस्कारों से रहित मनुष्य चिढ़चिढ़ा हो जाता है।

संत चरणदास कहते हैं कि
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काहू से नहि राखिये, काहू विधि की चाह।
परम संतोषी हूजिये, रहिये बेपरवाह।।
        सामान्य हिन्दी में भावार्थ-किसी भी अन्य मनुष्य से किसी प्रकार की चाहत नहीं करना ही चाहिए।  अपने अंदर संतोष का भाव पालकर बेपरवाह मनुष्य ही इस संसार में सुखी रह सकता है।
चाह जगत की दास है, हरि अपना न करै।
चरनदासयों कहत हैं, व्याधा नाहि टरै।।
      सामान्य हिन्दी मे भावार्थ-मनुष्य के अंदर विचर रही इच्छायें उसे संसार का दास बना देती हैं और वह परमात्मा से दूर हो जाता है। इच्छायें पालने वाला मनुष्य हमेशा ही संकट में घिरा रहता है।

      हमारे यहां स्वतंत्रता का मतलब केवल भौतिक क्रियाओं में अपनायी  जाने वाली स्वैच्छिक प्रवृत्ति से है। कभी कोई नया रचनात्मक विचार करने की बजाय दूसरे के निर्मित पथ पर आगे बढ़ना सहज लगता है पर इससे मस्तिष्क में व्याप्त दासता के भाव का ही बोध होता है। जो जग कर रहा है वही हम कर रहे हैं तो फिर हमारे काम में नयापन क्या है? यह विचार करना ही मनुष्य को डरा देता है।  माया और विषयों का दास मनुष्य संपत्ति संग्रह के बाद भी प्रसन्न नहीं रह पाता।
      अतः जिन लोगों को प्रसन्नता चाहिये उन्हें अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति से अधिक संचय करने की प्रवृत्ति से बचना चाहिये। जीवन में सुख प्राप्त करने का सबसे अच्छा उपाय यही है कि माया के अधिक प्रभाव से बचते हुए लापरवाह हुआ जाये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, January 18, 2014

पतंजलि योग साहित्य-दुःख की आशंकाओं को मन में स्थान न दें(patanjali yog sahitya-dukh ki aashankaon ko man mein sthan n den)



      मनुष्य का मन ही उसका वास्तविक स्वामी है। कभी वह प्रफुल्लित होता है कभी आत्मग्लानि को बोध से ग्रस्त होकर शांत बैठ जाता है। कभी आर्थिक, सामाजिक या रचना के क्षेत्र में अपनी भारी सफलता का सपने देखता है।  यही मन मनुष्य को भौतिक संपदा के संचय में इसलिये भी फंसाये रहता है कि कभी विपत्ति आ जाये तो उसका सामना माया की शक्ति से किया जाये।  हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि खाने धन जरूरी है पर खाने के लिये बस दो रोटी चाहिये।  मनुष्य का मन भूख, बीमारी तथा दूसरे के आक्रमण को लेकर हमेशा चिंतित रहता है।  उसे लगता है कि पता नहीं कब कहां से दुःख आ जाये। इस तरह मन की यात्रा चलती है पर सामान्य मनुष्य इसे समझ नहीं पाता। संसार में सुख और दुःख आता जाता है पर मनुष्य का मानस हमेशा ही उसे संभावित आशंकाओं भयभीत रखता है।

महर्षि पतंजलि के योगशास्त्र में कहा गया है कि

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हेयं दुःखमनागतम्।।

हिन्दी में भावार्थ-जो दुःख आया नहीं है, वह हेय है।

      योग साधक और अध्यात्मिक ज्ञान के छात्र इस मन पर नियंत्रण करने की कला जानते हैं।  योग तथा ज्ञान साधक हमेशा ही सामने आने पर ही समस्या का निवारण करने के लिये तैयार रहते हैं। देह, मन तथा विचारों पर उनका नियंत्रण रहता है इसलिये वह संभावित दुःखों से दूर होकर अपनी जीवन यात्रा करते हैं।  देखा जाये तो अनेक लोग तो भविष्य की चिंताओं में अपनी देह, विचार तथा मन में बुढ़ापा लाते हैं।  एक बात तो यह है कि लोग अपने  अध्यात्मिक दर्शन का यह संदेश अपने मस्तिष्क में धारण नहीं करते कि समय कभी एक जैसा नहीं रहता।  दूसरी बात यह कि भगवान उठाता जरूर भूखा  है पर सुलाता नहीं है।  इसके बावजूद लोग यह भावना अपने मन में धारण किये रहते हैं कि कभी उनके सामने रोटी का संकट न आये इसलिये जमकर धन का संचय किया जाये।
      योग दर्शन की दृष्टि से जो दुःख आया नहीं है उसकी परवाह नहीं करना चाहिये।  धन या अन्न का संग्रह उतना ही करना जितना आवश्यक हो पर उसे देखकर मन में यह भाव भी नहीं लाना चाहिये कि वह भविष्य के किसी संकट के निवारण का साथी है। हमारे पास भंडार है यह सोच जहां आत्मविश्वास बढ़ाती है वहीं भविष्य की आशंका उससे अधिक तो देह का खून जलाती है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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