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Saturday, February 1, 2014

अपनी मूल प्रकृत्ति के साथ जीने वाले धन्य हैं-रहीम दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(apni mool prukriti ke saath jeene wale dhanya hain-rahim darshan par aadharit chinttan lekh)



      आधुनिक युग में मनुष्य की जीवन को न केवल अस्थिर किया है बल्कि उसकी मानसिकता को भी अन्मयस्क कर दिया है। लोग अपने खानपान, रहनसहन तथा विचारों को लेकर इतने अस्थिर तथा अन्मयस्क हो गये हैं कि उन्हें यह समझ में ही नहीं आता कि क्या रें या क्या न करें? इसलिये प्रकृत्ति से दूर हटकर जीवन जी रहे लोगों को दैहिक तथा मानसिक रोग घेर लेते हैं।
      अपने लिये उत्कृष्ट रोजगार की लालसा में शहर और प्रदेश ही नहीं लोग देश भी छोड़ने को तैयार है। हम अक्सर यह शिकायत करते हैं कि हमारे यहां से प्रतिभाशाली लोग पलायन कर विदेश चले जाते हैं।  हम यह भी देख रहे हैं कि अनेक लोगों ने विदेश में जाकर भारी सम्मान पाया है। वैसे भी कहा जाता है कि अपने व्यक्तिगत विकास के लिये मूल स्थान से बिछड़ना ही पड़ता है। हालांकि अपने मूल शहर, प्रदेश अथवा देश को छोड़कर गये लोगों के हृदय में कहीं न कहीं इस बात का अफसोस होता है कि उन्हें अपने जन्मस्थान से दूर जाना पड़ा। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि आप अपने मूल स्थान से जाकर कितना भी विकास करें आपको अपने कार्यस्थल पर बाहरी ही माना जाता है।  उसी तरह मूल स्थान में रहने वाले लोग भी पराया मानने लगते हैं। कहा जाता है कि जो चूल के निकट है वही दिल के भी निकट है।

कविवर रहीम कहते हैं कि
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धनि रहीमगति मीन की, जल बिछुरत जिय जाय।
जिअत कंज तलि अनत बसि, कहा भौंर को भाय।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-मछली का जीवन धन्य है जो जल से बिछड़ते ही जीवन त्याग देती है। कमल अगर कीचड़ से प्रथक कहीं दूसरे स्थान पर जीना चाहता है तो भौंरे को उसकी यह बात पसंद नहीं आती।

      एक बात निश्चित है कि मनुष्य अगर संतोषी भाव का हो तो वह  अपने मूल स्थान पर ही बना रहता है यह अलग बात है कि उसे तब वह शनैः शनैः ही विकास की धारा में शामिल हो पाता है। भौतिक विकास को धन्य मानने वाले अपने जीवन का अर्थ तथा प्रकृति को नहीं समझते।  मनुष्य में कमाने वाले को उसके निकटस्थ  लोगों का दिमागी रूप से सम्मान मिलता है पर त्याग करने वाले को पूरा समाज हार्दिक प्रेम करता है।  इस संसार में हर जीव अपना पेट भर लेता है और कोई मनुष्य अगर पेट से ज्यादा कमाकर धन जमा करता है तो कोई तीर नहीं मार  लेता।  मनुष्य की पहचान कमजोर पर परोपकार और बेबस पर दया करने से ही होती है। अगर मनुष्य इन गुणों से हटकर अगर स्वार्थी जीवन जाता है तो उसे यह समझ लेना चाहिये कि उसे हार्दिक सम्मान कभी नहीं मिल सकता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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