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Thursday, January 23, 2014

संत चरणदास के दोहे-बेपरवाह मनुष्य ही संसार में सुखी रह सकता है(sant charandas ke dohe-beparvah manushya hi sansar mein sukhi rah sakta hai)



      इस संसार की माया की महिमा भी विचित्र है। जिसके पास धन कम है वह उसे पाने के लिये भटकता हुआ तकलीफ उठाता है तो जो धनवान है भी अधिक धन के लिये जूझता दिखता है।  माया के इस खेल में मनुष्य यह तय नहीं कर पाता कि उसे चाहिए क्या?  इस संसार में सबसे सरल काम है धन कमाने में लगे रहना।  अनेक लोग शासकीय सेवा से निवृत होने के बाद भी दूसरी जगह जाकर कमाना चाहते हैं भले ही उनका काम पेंशन से चल सकता है।  सच बात तो यह है कि अध्यात्मिक संस्कार और ज्ञान बचपन से नहीं मिले तो बड़ी आयु में सत्संग या भगवान भजन की प्रवृत्ति जाग ही नहीं सकती।  यही कारण है कि बड़ी आयु में भी मनुष्य सांसरिक विषयों में लिप्त रहकर समय काटना चाहता है।  यह अलग बात है कि प्रकृति तथा सामाजिक नियमों में चलते सांसरिक विषय उसे स्वतः छोड़ने लगते हैं तब अध्यात्मिक ज्ञान तथा संस्कारों से रहित मनुष्य चिढ़चिढ़ा हो जाता है।

संत चरणदास कहते हैं कि
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काहू से नहि राखिये, काहू विधि की चाह।
परम संतोषी हूजिये, रहिये बेपरवाह।।
        सामान्य हिन्दी में भावार्थ-किसी भी अन्य मनुष्य से किसी प्रकार की चाहत नहीं करना ही चाहिए।  अपने अंदर संतोष का भाव पालकर बेपरवाह मनुष्य ही इस संसार में सुखी रह सकता है।
चाह जगत की दास है, हरि अपना न करै।
चरनदासयों कहत हैं, व्याधा नाहि टरै।।
      सामान्य हिन्दी मे भावार्थ-मनुष्य के अंदर विचर रही इच्छायें उसे संसार का दास बना देती हैं और वह परमात्मा से दूर हो जाता है। इच्छायें पालने वाला मनुष्य हमेशा ही संकट में घिरा रहता है।

      हमारे यहां स्वतंत्रता का मतलब केवल भौतिक क्रियाओं में अपनायी  जाने वाली स्वैच्छिक प्रवृत्ति से है। कभी कोई नया रचनात्मक विचार करने की बजाय दूसरे के निर्मित पथ पर आगे बढ़ना सहज लगता है पर इससे मस्तिष्क में व्याप्त दासता के भाव का ही बोध होता है। जो जग कर रहा है वही हम कर रहे हैं तो फिर हमारे काम में नयापन क्या है? यह विचार करना ही मनुष्य को डरा देता है।  माया और विषयों का दास मनुष्य संपत्ति संग्रह के बाद भी प्रसन्न नहीं रह पाता।
      अतः जिन लोगों को प्रसन्नता चाहिये उन्हें अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति से अधिक संचय करने की प्रवृत्ति से बचना चाहिये। जीवन में सुख प्राप्त करने का सबसे अच्छा उपाय यही है कि माया के अधिक प्रभाव से बचते हुए लापरवाह हुआ जाये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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