समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
-------------------------


Saturday, February 23, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-समय आने पर शत्रु पर हमला अवश्य करें (samay aane par shatru par hamla avshya karen-kautilya ka arthshastra)

         इस संसार में तमाम तरह के लोग हैं।  सभी अच्छे नहीं तो बुरे भी नहीं है पर इतना तय है कि जिन लोगों में दूसरों को परेशान करने  वाली तामसी वृत्ति है उनका सामना कभी भी करना पड़ सकता है।  ऐसे कुछ लोग हैं जो दूसरों पर दैहिक या मानसिक आक्रमण अवश्य करते है।  उनको दो प्रकार के होते हैं।  एक तो वह जिनके पास धन, पद या बाहुबल की शक्ति है वह अपने अहंकार में चाहे जब जिससे लड़ जाते हैं।  दूसरे वह भी है जिनमें कोई गुण नहीं होता जिससे उनकी प्रवृत्ति नकारात्मक हो जाती है। उनकी मानसिकता इतनी कुंठित होती है कि वह दूसरों को नीचा दिखाने या किसी की भी मजाक उड़ाने से बाज नहीं आते।
          जहां तक हो सके ऐसे लोगों की उपेक्षा ही करना चाहिये पर जब वह शत्रुता की सीमा तक आ जायें तो फिर उन्हे बिना दंडितं छोड़ना नहीं चाहिये।  अगर धन, पद और बाहुबल में ऐसे लोग अधिक हों तब उन पर लगातार दृष्टि रखना चाहिये। जब वह स्वयं किसी विपत्ति में हों तब बिना किसी झिझक के उन पर आक्रमण अपना बदला चुकाने में चूकना नहीं चाहिए।  यह सच है कि यह कृत्य सात्विक प्रवृत्ति का नहीं वरन्  राजस प्रवृत्ति का प्रमाण है पर इस दैहिक जीवन में अपनी रक्षा करना बुरा नहीं है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
-------------------------
यदा क्षमस्तु प्रसमं पराक्रमदूर्जितमायमित्रम्।
तदा हि यायादहितानि कुर्वन्यरस्य या कर्षणपीडनानि।
    हिन्दी में भावार्थ-जब अपना शत्रु पराक्रम में बढ़ा हुआ हो पर अपनी शक्ति से उसे जीतना संभव हो तब उसका अहित करने की दृष्टि से उस पर आक्रमण करें।
प्रायेण संतो व्यसने रिपूर्णा यातव्यमित्येव सामादिशान्ति।
तत्रेव पक्षी व्यसने हि नित्यं क्षमस्तुसन्नभ्युदितोऽभियायात्।
        हिन्दी में भावार्थ-महापुरुषों का मानना है कि जिस पुरुष में दूसरे पर आक्रमण करने की प्रवृत्ति है उस पर समय आने पर आक्रमण अवश्य करें।          
योगी और तत्वज्ञानी सात्विक, राजसी और तामसी तीनों प्रवृत्तियों को जानते हैं।  मूल रूप से उनका हृदय सात्विक रंग से रंगा होता है पर यह भी जानते हैं कि इस जीवन में व्यवहार के दौरान आने वाले लोगों से स्वयं जैसा होने की अपेक्षा करना उचित नहीं है।  अतः वह दूसरों की प्रवृत्ति के अनुसार अपने व्यवहार और व्यक्त्तिव का रूप तय करते हैं।  अक्सर लोग यह सोचते हैं कि अगला आदमी तो ज्ञान में सराबोर रहने वाला आदमी है इसलिये उसके साथ जैसा भी व्यवहार करो चुपचाप झेल जायेगा।  इसलिये अपने साथ भेदभाव, बदतमीजी या फिर तनाव पैदा करने वाले लोगो को कभी दंडित भी करना चाहिये।  यह नहीं भूलना चाहिये कि इस संसार में तामसी प्रवृत्तियों की प्रधानता वाले बहुत से लोग हैं जो दूसरे का अहित कर प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।  समय आने पर उन्हें दंडित करना आवश्यक है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Saturday, February 16, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-बैंत की तरह झुककर ही उपलब्धि प्राप्त करना संभव (bent kee tarah jhukkar hee uplabdhi prapt karna sambhav-economics of kautilya)

        जीवन में कोई भी काम सोच समझ कर करना ही मनुष्य के विवेकवान होने का प्रमाण हैं।  इस संसार में सात्विक, राजस और तामस तीन प्रकार की प्रवृत्तियों में स्वामी रहते हैं।  सात्विक व्यक्ति केवल प्रार्थना करने पर ही निष्काम भाव से काम करते हैं जबकि राजस व्यक्ति फल के प्रस्ताव मिलने पर ही किसी काम के लिये तैयार होते हैं। जिन लोगों में तामस वृत्ति है वह न तो स्वयं किसी का काम करते हैं न ही अपने काम के लिये तत्पर होते हैं।  उनसे किसी काम निकलने की अपेक्षा करना ही व्यर्थ है। इसलिये जब हम अपने जीवन में किसी विशेष अभियान में रत हों या प्रतिदिन के नित्यकर्म में, सदैव ही इस बात का ध्यान रखें कि जहां तक हो सके किसी पर शब्दिक या दैहिक प्रहार न करें।
          हर कर्म का फल अनिश्चित है।  जीवन की अपनी धारा है जिस पर वह चलता है पर मनुष्य मन का कोई भरोसा नहीं है। हम दूसरों की क्या कहें, पहले यह भी देख लें कि हमारा मन स्वयं के कितने नियंत्रण में है?  संसार के भौतिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिये हमेशा ही हम राजस प्रवृत्ति के लोगों के संपर्क में रहते हैं जिनके स्वभाव में ही फल की आकांक्षा के साथ ही अहंकार, मोह तथा काम वासना की प्रवत्तियां शासन करती हैं।  हम से अधिक धनवान, पदवान और बलवान लोग कभी भी अपने से लघु स्तर के व्यक्ति से अपमान या आक्रमण को सहजता से नही लेते और न ही उसे सम्मान देने का भाव उनके हृदय में रहता है।  ऐसे में उन पर हावी होने का प्रयास निरर्थक होता है।  उनके सामने झुक कर ही काम निकालना चाहिये।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में में कहा गया है कि
--------------------
समाक्रान्तो बलावता काङ्गवन्नाधार्शिनी वियम्।
आश्रयेद्वेतसी वृति वृति न भौजङ्गी कथञ्वन।।
          हिन्दी में भावार्थ-बलवान से आक्रात हुआ व्यक्ति अचल लक्ष्मी को प्राप्त करता है बस उसमें बैंत की तरह वायु के सामने झुकने जैसी वृत्ति चाहिये। सांप की तरह फन उठाकर फुफकारने की प्रवृत्ति का आश्रय कभी न लें।
आगत विग्रहं विद्वानुपायैः प्रशम्न्नयेत्।
विजयस्य ह्यनित्यत्वाद्रभासेन न सम्पतेत्।।
     हिन्दी में भावार्थ-विद्वान को उचित है कि प्राप्त हुए उपायों से विग्रह को शांत करें। किसी भी अभियान  में विजय प्राप्त होना निश्चित नहीं है इसलिये किसी पर अचानक प्रहार न करें।
        जहां तक हो सके हमें अपने सात्विक वृत्ति को ही धारण करे हुए अपने से लघु स्तर के व्यक्ति को सम्मान और प्यार देने के साथ ही उस पर दया करते हुए काम करना चाहिये।  देखा जाये तो बड़े अभियानों में धनवान, पदवान और कथित बलवान लोग कभी साथ नहीं निभाते जितना लघु स्तर के लोग कर सकते हैं।  नित्य कर्म में लघु स्तर के लोग काम कर जाते हैं और बृहद स्तर वाले मजबूरियां जताते हुए मुंह फेर लेते हैं। सबसे बड़ी बात है मनुष्य का अहंकार जिसे कभी धारण नही करना चाहिये।  संसार के सारे काम नम्रता से पूर्ण करना ही एक सहज उपाय है जिसे कभी छोड़ना नहीं चाहिये।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Monday, February 4, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-ज्ञानी जिस काम की तारीफ करें वही धर्म (gyani jis kaam kee tarif karen vahi dharma)

       प्रचार माध्यमों में-टीवी चैनल एवं समाचार पत्र पत्रिकाएँ-हमारे देश के प्रचलित  धर्मों के विषय पर लेकर अनेक प्रकार की बहस होती है। देश में कुछ बुद्धिमान इतने धर्मनिरपेक्ष हैं कि उनको भारतीय अध्यात्म में केवल जातिवाद और स्त्री शोषण के अलावा कुछ नज़र नहीं आता है।  यहां तक तो सब ठीक है पर धर्म को लेकर उनका नजरिया अजीब लगता है।  वह विश्व में अनेक धर्मो की उपस्थिति स्वीकार्य मानते हैं।  उनकी नजर में सभी धर्म समान हैं।  मतलब उनकी दृष्टि में धर्म केवल पूजा पद्धतियां ही हैं। यह अलग बात है की भारतीय धर्मों पर उनकी ड्रिसथी हमेशा वक्र ही रहती है।   जबकि  हमारा अध्यात्म दर्शन किसी विशेष पूजा पद्धति का न तो समर्थन करता है न विरोध।  वह तो नैतिक आचरण को ही धर्म मानता है।  मूल बात भी है कि हमारे प्राचीन धर्म तथा अध्यात्म ग्रंथों में धर्म को कोई नाम नहीं दिया गया है।  किसी व्यक्ति विशेष की सत्ता को स्वीकार न कर निरंकार कि उपासना को महत्व नहीं दिया गया है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
-------------------
यमाय्र्याः क्रियामाणं हिः शंसत्यागगमवेदिनः।
स धम्माय विगर्हन्ति तमधम्र्मं परिचक्षते।।

                  हिन्दी में भावार्थ-शास्त्र के ज्ञाता श्रेष्ठ पुरुष जिस कार्य की प्रशंसा करें वही धर्म है और जिसकी निंदा करें वही अधर्म हैं।
       हम जब विदेशी विचाराधाराओं को देखते हैं तो वह पूजा पद्धतियों को ही धर्म माना जाता हैं।  इतना ही नहीं मानवीय जीवन में उनका हस्तक्षेप इतना है कि खानपान, रहन सहन और भाषा को भी धर्म से जोड़ दिया जाता है जबकि उनका आधार प्रकृति के अनुसार तय होता है। इसका सीधा मतलब यह है कि पाश्चात्य विचाराधारायें मनुष्य के बाह्य रूप के आधार पर धर्म का स्वरूप तय करती हैं और इस देह को धारण करने वाला आत्मा जिसे हम अध्यात्म भी कह सकते हैं कोई अर्थ नहीं रखता।  हमारा अध्यात्मिक ज्ञान देह और आत्म दोनों के सत्य को धारण करता है। इतना ही नहीं विदेशी  विचारधाराओं में पूजापद्धति से  मेल न रखने वाले व्यक्तियों को निंदनीय माना जाता है।  यही कारण है कि पूरे विश्व में धर्म के आधार पर वैमनस्य बढ़ता जा रहा हैं इसके विपरीत भारतीय दर्शन अध्यात्म ज्ञान को संचित करता है।  इसमें यह माना जाता है कि मनुष्य अपनी देह और उसमें विराजमान मन, बुद्धि के साथ अहंकार की प्रवृत्ति पर नियंत्रण कर एक सुविधाजनक जीवन बिता सकता है। किसी विशेष प्रकार की पूजा पद्धति अपनाने या वस्त्र पहनने की बात उनमें नहीं है।  भारतीय अध्यात्म दर्शन  मनुष्य को आत्म निर्माण के लिये प्रेरित करता है।  इसके विपरीत विदेशी विचाराधारा समाज निर्माण की बात करती है जबकि व्यक्ति निर्माण के बिना ऐसा करना कठिन है।  यही कारण है कि भारतीय अध्यात्म दर्शन वैज्ञानिक है।  कथित रूप से सभी धर्मों की बात कहना अपने आप में इसलिये अजीब लगता है क्योंकि धर्म का कोई नाम नहीं होता।  नैतिक आचरण में पवित्रता रखना, विचारों में शुद्धता तथा परोपकार की भावना ही धर्म का प्रमाण है। भारतीय अध्यात्म विद्वान इसी आधार पर धर्म और अधर्म का रूप तय करते हैं कि उसके नाम से पहचानते हैं।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Friday, January 25, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-बुद्धिमान के लिये कोई लक्ष्य असाध्य नहीं (economic of kautilya-buddhiman ke liye koyee lakshya asadhya nahin)

       सामान्य और असाधारण और मनुष्य में अंतर केवल बुद्धि के उपयोग का ही होता है।  सामान्य मनुष्य थोड़े प्रयास में बहुत बड़ी उपलब्धि अतिशीध्र चाहता है। किसी विषय में ज्ञान अल्प हो तब भी वह स्वयं को  महाज्ञानी मानकर उसमें सक्रियता दिखाता है। सफल हो गया  तो वाह वाह नहीं तो फिर चुप बैठ जाता है।  इसके विपरीत असाधारण मनुष्य पूर्ण ज्ञान कर अपनी साधना करता है। उसके लिये कोई वस्तु असाध्य नहीं है।  वह लोहे को हाथ से नहीं तोड़ता बल्कि उसे गलाता है।  उसके प्रयासों में कर्मठता रहती है क्योंकि वह अपने विषय का पूर्ण ज्ञान कर अपने प्रयास आरंभ करता है।  सामान्य मनुष्य अपनी नाकामी के लिये दूसरों पर दोष लगाता है जबकि कर्मठ मनुष्य को कभी नाकामी का सामना करना ही नहीं पड़ता।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र कहता है कि
-------------------
   न किञ्वित्वचिदस्तीह वस्त्वसाध्यं विपश्चिाताम्।
   अयोऽमेषमुपायेन द्रवतामुपनीयते।।
   हिन्दी में भावार्थ-बुद्धिमानों के लिये कोई वस्तु प्राप्त करना न कठिन है न कोई लक्ष्य असाध्य है।  लोहा अभेद्य है पर प्रयास से उसे गलाया जा सकता है।

      वाह्यमानमयःखण्डं स्कन्धनैवापि कृन्तति।
       तदल्पमपि धारावद्भवतीप्सितिसिवद्धये।।
       हिन्दी में भावार्थ-लोहे का बोझ कंधे पर ढोने पर भी नहीं काटता पर धारवाला होने पर थोड़ा लगने से भी रक्त निकलने लगता है।
        अपने जीवन में बुद्धि की धार तीक्ष्ण करना चाहिये। इसके लिये सबसे अच्छा उपाय है कि प्रातः प्राणायाम और ध्यान किया जाये। आज के भौतिक युग में जब समाज में संवेदनायें कम हो गयीं है तब किसी से हृदय से सद्भाव की आशा करना व्यर्थ है-जबानी जमा खर्च करने वाले बहुत मिल जाते हैं पर उनके सद्भाव को हृदय स्वीकार नहीं करता। लोगों को अपने स्वार्थ पूरे करने से ही समय नहीं मिलता।  इसलिये अकेले होने का तनाव सभी के मस्तिष्क में रहता है जो अंततः अनेक मनोरोगों का उत्पति का कारक बनता है।  ऐसे में प्राणायाम और ध्यान ही ऐसे साधन है जो साधक की बुद्धि को तीक्ष्ण कर सकते हैं। इसके अलावा भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का समय समय पर अध्ययन करना चाहिये जिसमें जीवन के सांसरिक विषयों में सक्रियता के तरीके बताये जाते हैं।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Saturday, January 19, 2013

विदुर नीति-ईर्ष्या असाध्य रोग है (eershaya asadhya rog hai-vidur neeti)

                 विश्व  समाज में अधिकतर लोगों की सहनशीलता कम ही होती है। इसका कारण मनुष्य में व्याप्त अहंकार का भाव है जिससे वह कहीं अपने को कमतर रूप में नहीं देखना चाहता। अनेक लोग कोई बड़ा लक्ष्य अपने हाथ में लेते हैं पर उसमें समय अधिक लगता है।  इस दौरान उन्हें अन्य लोगों के मुख से निकलने वाले व्यंग्य बाणों का सामना करना पड़ता है।  दूसरी बात यह कि लक्ष्य मिलने तक मनुष्य की उज्जवल छवि नहीं बन पाती इस कारण लोग मजाक भी बनाते है।  तब कुछ हल्की प्रवृत्ति के लोग आत्मप्रवंचना कर अपना लक्ष्य, उसकी प्राप्ति के साधन तथा सहायकों के नाम दूसरों को बताकर यह आशा करते हैं कि उनका काम पूरा होने तक सभी चुप रहेंगे।  वह इस बात का अनुमान नहीं कर पाते कि अपनी योजना जब दूसरों को बता देंगे तो फिर कोई भी उनकी लक्ष्य प्राप्ति में संकट उत्पन्न कर सकता है।  होता यही है और अधिकतर लोग अपनी नाकामी झेलते हैं।
          दूसरी बात यह कि कुछ लोग अपने लक्ष्य तो ऊंचे बनाते हैं पर साथ ही दूसरों का धन, रूप, पराक्रम, सुख और कुल देखकर अपने अंदर ईर्ष्या का भाव पाल लेते हैं।  यह ईर्ष्या का भाव मनुष्य की पराक्रम क्षमता के साथ ही मस्तिष्क की एकाग्रता को नष्ट करता है।  जिससे मनुष्य अपने लक्ष्य के पास तक नहीं पहुंच पाता है।  ईर्ष्या और आत्मप्रवंचना दोनों तरह की स्थिति मनुष्य को पतन की तरफ ढकेलती है।
         विदुर नीति में कहा गया है कि
----------------------
   य ईर्षुः परवित्तेषु रूपे वीर्य कुलान्वये।
सुखभौभाग्यसतकरि तस्य व्याधिरन्नतकः।।
             हिन्दी में भावार्थ-जिस मनुष्य में दूसरे का धन, रूप, पराक्रम, सुख और कुल देखकर ईर्ष्या होती है उसका कोई इलाज नहीं हो सकता।

अकार्यकरणाद् भीतःकार्यालणां च विवर्जनात्।
अकाले मन्त्रभेदाच्च येन माद्येत ततफ पिवेत्।।
             हिन्दी में भावार्थ-न करने योग्य काम करना, करने योग्य काम में प्रमाद का प्रदर्शन और कार्य को सिद्ध करने से पहले ही उसका मंत्र दूसरों का बताने से डरना चाहिए।        हम जब समाज की स्थिति को देखते हैं तो हास्यास्पद दृश्य सामने आता है। लोग अपने दुःख से कम दूसरे के सुख से अधिक दुःखी लगते हैं।  अपने अंदर कोई गुण न होने की कुंठा उन्हें दूसरे की निंदा करने के लिये प्रेरित करती है।  इसका मुख्य कारण यह है कि लोग अपने ही अध्यात्मिक ज्ञान से परे हैं।  अशांत मन लेकर मस्तिष्क को सहज मार्ग पर चलाना कठिन है। असहज मार्ग पर चलते हुए मनुष्य के विचार नकारात्मक हो जाते हैं। ऐसे में धन, वैभव और प्रतिष्ठा  के अधिक होने का सुख भोगना भी असहज हों जाता है। बड़े पद पर बड़ी जिम्मेदारी निभाना तो दूर छोटे पद की छोटी जिम्मेदारी निभाना भी मुश्किल लगता है।  ईर्ष्या से प्रतिस्पर्घा और प्रतिस्पर्धा से वैमनस्य पैदा होता है।  यही वैमनस्य हमारे समाज के बिखराव का कारण है। इसका समाधान यही है कि हम अपने अंदर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के सिद्धांतों को समझें।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Saturday, January 12, 2013

विदुर नीति-चरित्रवान पुरुष ही समाज और धर्म की रक्षा करने में समर्थ (vidur neeti-charitrawan purush hi samaj aur dharm ki raksha mein samarth)

                आमतौर से हमारे समाज में यह भ्रम प्रचारित किया जाता है कि स्त्री को ही चरित्रवान होना चाहिए।  अपने चरित्र और मान की रक्षा करना उसकी ही स्वयं की जिम्मेदारी है।  कुछ लोग तो यह भी कहते है कि नारी का चरित्र और सम्मान  मिट्टी या कांच के बर्तन की तरह होता है, एक बार टूटा तो फिर नहीं बनता जबकि पुरुष का चरित्र और सम्मान पीतल के लोटे की तरह होता है एक बार खराब हुआ तो फिर मांजकर वैसी ही दशा में आ जाता है।  संभवतः यह कहावत राजसी मानसिकता के लोगों की देन है।  सात्विकत लोग इसे नहीं मानते।  ऐसा लगता है कि समाज की सच्चाईयों और मानसिकता को समझने का नजरिया अलग अलग है।  कुछ लोगों ने पुरुष की मनमानी को सहज माना है और औरत को सीमा में रहने की सलाह दी है। मगर कुछ कुछ विद्वान मानते हैं कि अंततः समस्त मनुष्य जाति के लिये ही उत्तम आचरण आवश्यक है। यही उत्तम आचरण ही वास्तविकता में धर्म है।
विदुर नीति में कहा गया है कि
-------------------
जिता सभा वस्त्रवता मिष्ठाशा गोमाता जिता।
अध्वा जितो यानवता सर्व शीलवता जितम्।।
   हिन्दी में भावार्थ-अच्छे कपड़े पहनने वाला सभा, गाय पालने वाला मीठे स्वाद की इच्छा और सवारी करने वाला मार्ग को जिस तरह जीतने वाला मार्ग को जीत लेता है उसी तरह शीलवान पुरुष समाज पर विजय पा लेता है।

शीलं प्रधानं पुरुषे तद् यस्येह प्रणश्यति।
न तस्य जीवितेनार्थो न धनेन न बन्धुभिः।।
   हिन्दी में भावार्थ-किसी पुरुष में शील ही प्रधान है। जिसका शील नष्ट हो जाता है इस संसार में उसका जीवन, धन और परिवार से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
        दरअसल जिन राजसी मानसिकता वाले लोगों ने पुरुष को श्रेष्ठ माना है उनको पता नहीं कि हम जिस धर्म की रक्षा की बात करते हैं उसमें पुरुष की शक्ति का सर्वाधिक उपयोग होता है।  वह शक्ति तभी अक्षुण्ण रह सकती है जब आचरण और विचारों में पवित्रता हो। पवित्र आचरण की प्रवृत्ति भी बाल्यकाल में माता पिता के प्रयासों से ही निर्मित हो सकती है।  जो पुरुष शीलवान नहीं है वह अंततः समाज के साथ ही अपने परिवार के लिये संकट का कारण बनता है।  समाज के लोग कलुषित आचरण वाले लोगों से दूरी बनाते है।  डर के मारे में वह सामने कुछ नहीं कहें पर अधर्म और अपवित्र आचरण वाले पुरुष की निंदा सभी करते हैं। अंतः यह भ्रम कभी नहीं पालना चाहिए कि पुरुष का आचरण कोई चर्चा का विषय नहीं है या उसकी प्रतिष्ठा अमरत्तव लिये हुए है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Saturday, January 5, 2013

सामवेद से संदेश-दोगलापन मनुष्य को नैतिक पतन की तरफ ले जाता है (samved se sandesh-doglapan manushya ko patan ki taraf le jaataa hai)

     आमतौर से सामान्य मनुष्य दोहरा चरित्र जीने को चतुराई समझते हैं। स्थिति यह हो गयी है कि अब उस मित्र या रिश्तेदार पर भी यह भरोसा करना संभव नहीं रहा जिनसे प्रतिदिन का संपर्क होता है।  सामने सभी प्रशंसा करते हैं पर पीठ पीछे निंदा करने के लिये  सभी तत्पर रहते हैं। अधिकतर लोग  अपनी वाणी से  किसी की प्रशंसा करना तो दूर निंदा करने में अपनी वाणी का गौरव समझते हैं।  इतना ही नहीं जिनसे हम अपने हित की कामना करते हैं वही पीठ पीछे प्रहार कर अपना दोगलापन दिखाते हैं।  हर किसी को अपने संपर्क क्षेत्र में महान बनने की कामना रहती है पर त्याग कोई नहीं करना चाहता।  अपनी आंखों से अपने ही मित्र, पड़ौसी और रिश्तेदार का अनिष्ट देखने, कानों से अप्रिय वचन सुनने और वाणी से निंदा करने की मन में इच्छा सभी की है पर सामने हितकर बाते कर हितचिंतक होने का दावा करते हैं।  टूटते भारतीय  समाज को विकसित देखने की इच्छा करने वाले बुद्धिमानों को चाहिए कि वह भारतीय अध्यात्म का मार्ग अपनायें।   अंग्रेजी और पाश्चात्य साहित्य से भारतीय जनमानस को सात्विक मार्ग पर रखना कठिन है।  जिस तरह ठंड की रजाई गर्मी में नहीं ओढ़ी जाती उसी तरह आयातित विचाराधाराओं से समाज को चलाकर उसमें चमक देखना मूर्खता है।  विदेशी नुस्खे भारत में नहीं चल सकते। चलाओगे तो समाज को टूटा ही पाओगे।
सामवेद में कहा गया है कि
-------------
म ते रसस्य मत्सत द्वयविनः।
              हिन्दी में भावार्थ-दोहरा आचरण करने वाले आनन्दित नहीं होते।
सुकत्या महान् अभ्यवर्धथाः।
              हिन्दी में भावार्थ-शुभ कर्म से ही तुम महान बन सकते हो।
विचर्षणिः विश्वाः मृधः अभ्यकमीत्।
                     हिन्दी में भावार्थ-विशेष ज्ञानी समस्त शत्रुओं का पराभव करता है।
          पाश्चात्य संस्कृति ने जिस उपभोग की प्रवृत्ति को बढ़ाया है वह मनुष्य को  केवल स्वार्थ की पूर्ति तक  सीमित कर देती है जबकि समाज में सम्मान पाने के लिये यह जरूरी है कि परोपकार किया जाये।  यह कोई करना नहीं चाहता इसलिये स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने के लिये लोग अपने हाथों से परोपकार करने के काल्पनिक  दावे करते हैं।  चंदा लेकर दान करते हैं और अपने मुख से समाजसेवक होने की उपाधि लगाते हैं।  समाज का पराभाव हो रहा है यह अलग बात है कि कुछ लोग उसके उत्कर्ष होने का प्रचार करते हैं।
     हमारे देश में अपनी संस्कृति और संस्कारों के महान होने की बातें होती हैं।  यह सब बातें स्वयं को धोखा देने के लिये हैं।  वर्तमान समाज कैसा है यह हम सभी जानते हैं।  फिर भी यह कहना गलत है कि सभी लोग अज्ञानी हैं।  अगर ऐसा होता तो हमारा अध्यात्मिक ज्ञान निरंतरता से विश्व में नहीं फैलता। अनेक ज्ञानी हैं जो बिना लोभ और लालच के भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की ज्योति को प्रकाशनमान बनाये रखते हैं।  इसलिये उपभोग संस्कृति के नायकों की बजाय ज्ञान और संस्कारों का प्रवाह बनाये रखने वाले विद्वानों का अनुकरण करना चाहिए।  तभी पतन की तरफ जा रहे भारतीय समाज को उत्कर्ष के मार्ग पर लाया जा सकता है। 
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

अध्यात्मिक पत्रिकाएं