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Saturday, January 29, 2011

योग साधना से देह और आत्मा का अंतर समझा जा सकता है-हिन्दी चिंतन लेख (deh aur aatma-hindi chintan lekh)

कुछ लोग योग साधना  को केवल दैहिक स्वास्थ्य के लिये उपयोग  मानते हैं पर इससे होने वाले मानसिक तथा वैचारिक लाभों की चर्चा नहीं करते।  दरअसल आसन और प्राणायाम तो योग साधना का एक हिस्सा भर हैं जबकि ध्यान तथा धारण की क्रियायें आदमी को एक ऐसा सिद्ध पुरुष बनाती हैं जो सदैव आत्म सुख में लीन रहता है।  वह पाखंड या चाल फरेब से दूर रहकर अपनी साधना में लीन रहता है। इसके यह जरूरी है कि योग साधना के समस्त विषयों का अध्ययन किया जाये।

हम क्या हैं? बुद्धि कहती हैं कि मै हूं और मन इस अहंकार के बोध में बेलगाम विचरण करता है कि वही इस देह का रथी है जो इसे चाहे जहाँ हाँक ले जाए । दैहिक क्रियाओं में कर्तापन की अनुभूति आदमी को ज्ञान से परे कर देती है। आदमी यानि अध्यात्म! पुरुष हो या स्त्री वास्तव में परमात्मा का अंश आत्मा है! वह इस देह को धारण किये है इसलिये उसे अध्यात्म भी कहा जाता है। वह कर्ता नहीं दृष्टा है मगर योग साधना से विरत मनुष्य की बुद्धि इस ज्ञान को ग्रहण नहीं करने देती और मन इधर से उधर उसे दौड़ाता है।
पतंजलि योग साहित्य के अनुसार
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सत्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभाधिष्ठास्तृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च।
"बुद्धि और पुरुष (आत्मा) के अंतर का आभास जिसे समझ में आ जाता है ऐसा समाधिस्थ योगी सभी प्रकार के भावों पर स्वामित्व प्राप्त कर लेता है।"

हम आत्मा है! न वह खाता है न वह पीता है न वह सोचता है न बोलता है। यह सारे कार्य तो उस देह के अंग स्वतः कर रहे हैं जिसको आत्मा यानि हमने धारण किया है। देह की आवश्यकतायें असीमित पर अध्यात्म की भूख सीमित है। वह केवल ज्ञान के साथ जीना चाहता है। वह दृष्टा तभी बन सकता है जब हम योग के द्वारा अपनी इंद्रियों के गुणों से उसे सुसज्जित करें। इसके लिये जरूरी है कि ध्यान करते हुए समाधि के माध्यम से उन पर नियंत्रित कर उनका स्वामी बनने का प्रयास किया जाये। नाक है तो सुगंध ग्रहण करेगी, आंख है तो देखेगी और कान है तो सुनेंगे। बुद्धि का काम है विचार करना और मन का काम है इधर उधर विचरण करना। ऐसे में हम अध्यात्मिक ज्ञान को तभी प्राप्त कर सकते हैं कि जब संकल्प धारण करें। सदैव बहिर्मुखी रहने की बजाय अंतर्मुखी होने का प्रयास भी करें। जब हम अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर अपने अध्यात्म से संपर्क कर लेंगे तो वह दृष्टा भाव को प्राप्त होगा तब निराशा, प्रसन्न्ता, शोक तथा हर्ष के भाव पर स्वामित्व प्राप्त हो जायेगा। जिस तरह स्वामी अपने अनुचरों के कर्म से विचलित नहीं होता और मानता है कि यह काम तो उनको करना ही है उसी तरह हम भी यह देखने लगेंगे कि शरीर के अंग हमारे सेवक है और उनको काम करना है तब ऐसा आनंद प्राप्त होगा जो विरलों को ही प्राप्त होता है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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Saturday, January 22, 2011

भ्रष्टाचार और चोरी राष्ट्र के लिये बहुत बड़ी समस्या-हिन्दी अध्यात्मिक लेख (bhrashtachar aur chori-hindi adhyatmik lekh)

आज हमारे देश की जो स्थिति है वह अत्यंत चिंताजनक है। राजनीति के जिन सिद्धांतों के हमारे प्राचीन विद्वानों ने स्थापित किया उनकी जगह पाश्चात्य सिद्धांतों को अपनाया गया है। जिनसे देश हालत खराब हो गयी है। राजा और राज्य प्रमुख के कर्तव्यों का मनुस्मृति में व्यापक रूप से वर्णन किया गया है। राजा या राज्य प्रमुख के दायित्वों का निर्वहन एक धर्म के पालन की तरह होता है। जब कोई मनुष्य राजा या राज्य प्रमुख के पद पर प्रतिष्ठित होता है तब उसे राज्य धर्म का पालन करते हुए अपने प्रजाजनों की चोरों, अपराधियों तथा बेईमानों से रक्षा करना चाहिए। मज़ेदार बात यह है कि मनृस्मृति के जाति तथा स्त्री संबंधी अनेक संदेशों को समझ के अभाव में बुद्धिमान लोग अनर्थ के रूप में लेते हैं। आज के अनेक पश्चिमी शिक्षा से अभिप्रेरित विद्वान तथा वहीं की विचाराधारा के अनुगामी बुद्धिजीवी इन्हीं संदेशों के कारण पूरी मनृस्मुति को ही अपठनीय मानते हैं। निश्चित रूप से ऐसे बुद्धिजीवी सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक शिखर पुरुषों से प्रायोजित और संरक्षित हैं। आज के हमारे शिखर पुरुष कैसें हैं यह सभी जानते हैं। 
मनु महाराज कहते हैं कि
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परमं यत्नमतिष्ठेत्सतेनानां निग्रहे नृपः
सोनानां निग्रहाददस्ययशो राष्ट्रं च वर्धते।
"चोरों को पकड़ने के लिये राजा या राज्यप्रमुख को पूरी तरह से कोशिश करना चाहिए। अगर वह ऐसा करता है तो राष्ट्र विकास करता है और प्रजा प्रसन्न होती है।"
भारतीय अध्यात्म तथा दर्शन में वर्णित पाप पुण्य को अंधविश्वास इसलिये नहीं कहा जाता है कि हमारे बुद्धिजीवी कोई प्रशिक्षित ज्ञानी हैं बल्कि वह मनुस्मृति के अध्ययन से विरक्त होकर शुतुरमुर्ग की तरह अपने मन में मौजूद अपराध भावना से स्वयं छिपकर ऐसी ही सुविधा अपने आकाओं को भी देते हैं। जो राजा या राज्य प्रमुख अपनी प्रजा की चोरों, अपरािधयों तथा बेईमानों से रक्षा नहीं करता वह पाप का भागी बनता है, मगर मनु महाराज ने कभी यह सोचा भी नहीं था कि इस भारतवर्ष जैसी देवभूमि पर ही राज्य से संबंधित कुछ लोग असामाजिक, अपराधी तथा भ्रष्ट तत्वों से अपनी जनता की रक्षा बजाय उनको ही संरक्षण देकर महापाप करेंगे। जब कोई मनुस्मृति के संदेशों का विरोध करता है तो वह यकीनन ऐसे राज्य का समर्थन कर रहा है जो प्रजा की रक्षा ऐसे दुष्ट तत्वों से बचाने में नाकाम रहता है। स्पष्टतः आज के अनेक प्रसिद्ध बुद्धिजीवी इसलिये ही संदेह के दायरे में आते हैं क्योंकि वह किसी न किसी ऐसे व्यक्ति का समर्थन करते हैं जो राज्य धर्म का पालन नहीं करता।
मनु महाराज कहते हैं कि 
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सर्वतो धर्मः षड्भागो राज्ञो भवति रक्षतः।
अधर्मादपि षड्भागो भवत्यस्य हयऽरक्षतः।।
"जो राजा या राज्य प्रमुख चोरों से अपनी प्रजा की रक्षा करता उसे समग्र प्रजा के पुण्य का उठा भाग प्राप्त होता है और जो ऐसा नहीं करता उसे प्रजा के पापों का छठा भाग दंड के रूप में प्राप्त होता है"
ऐसा लगता है कि असामाजिक, अराजक, चोरी कर्म तथा अन्य अपराध के कार्यों और उनको संरक्षण देने में लगे लोग पाप पुण्य की स्थापित विचारधारा की चर्चा से अपने को दूर रखना चाहते हैं इसलिये ही वह भारतीय अध्यात्म की चर्चा सार्वजनिक होने से घबड़ाते हैं ताकि कहीं उनका मन सुविचारों की गिरफ्त में न आ जाये। वह अपने ही कुविचारों में सत्य पक्ष ढूंढते हैं। उनका नारा है कि ‘आजकल की दुनियां में चालाकी के बिना काम नहीं चलता।’ अपने पाप को चालाकी कहने से उनका मन संतुष्ट होता है और सामने सत्य कहने वाला कोई होता नहीं है और लिख तो कोई नहीं सकता क्योंकि प्रचार कर्म से जुड़े लोग उनके धन से प्रायोजित है। यही कारण है कि राम राज्य की बात करने वाले बहुत हैं पर वह आता इसलिये नहीं क्योंकि वह एक नारा भर है न कि एक दर्शन।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, January 8, 2011

बुद्धि और आत्मा का रहस्य समझना जरूरी-हिन्दी चिंतन आलेख (buddhi aur atma ka rahsya-hindi chitan alekh)

हम क्या हैं? बुद्धि कहती हैं कि मै हूं और मन इस अहंकार के बोध में बेलगाम विचरण करता है। दैहिक क्रियाओं में कर्तापन की अनुभूति आदमी को ज्ञान से परे कर देती है। आदमी यानि अध्यात्म! पुरुष हो या स्त्री वास्तव में परमात्मा का अंश आत्मा है! वह इस देह को धारण किये है इसलिये उसे अध्यात्म भी कहा जाता है। वह कर्ता नहीं दृष्टा है मगर योग साधना से विरत मनुष्य की बुद्धि इस ज्ञान को ग्रहण नहीं करने देती और मन इधर से उधर उसे दौड़ाता है। मन के विषय में पतंजलि योग विज्ञान बहुत कुछ कहता है। जरूरत है उसे समझने की। उसमें कहा गया है कि
सत्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभाधिष्ठास्तृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च।
"बुद्धि और पुरुष (आत्मा) के अंतर का आभास जिसे समझ में आ जाता है ऐसा समाधिस्थ योगी सभी प्रकार के भावों पर स्वामित्व प्राप्त कर लेता है।"
हम आत्मा है! न वह खाता है न वह पीता है न वह सोचता है न बोलता है। यह सारे कार्य तो उस देह के अंग स्वतः कर रहे हैं जिसको आत्मा यानि हमने धारण किया है। देह की आवश्यकतायें असीमित पर अध्यात्म की भूख सीमित है। वह केवल ज्ञान के साथ जीना चाहता है। वह दृष्टा तभी बन सकता है जब हम योग के द्वारा अपनी इंद्रियों के गुणों से उसे सुसज्जित करें। इसके लिये जरूरी है कि ध्यान करते हुए समाधि के माध्यम से उन पर नियंत्रित कर उनका स्वामी बनने का प्रयास किया जाये। नाक है तो सुगंध ग्रहण करेगी, आंख है तो देखेगी और कान है तो सुनेंगे। बुद्धि का काम है विचार करना और मन का काम है इधर उधर विचरण करना। ऐसे में हम अध्यात्मिक ज्ञान को तभी प्राप्त कर सकते हैं कि जब संकल्प धारण करें। सदैव बहिर्मुखी रहने की बजाय अंतर्मुखी होने का प्रयास भी करें। जब हम अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर अपने अध्यात्म से संपर्क कर लेंगे तो वह दृष्टा भाव को प्राप्त होगा तब निराशा, प्रसन्न्ता, शोक तथा हर्ष के भाव पर स्वामित्व प्राप्त हो जायेगा। जिस तरह स्वामी अपने अनुचरों के कर्म से विचलित नहीं होता और मानता है कि यह काम तो उनको करना ही है उसी तरह हम भी यह देखने लगेंगे कि शरीर के अंग हमारे सेवक है और उनको काम करना है तब ऐसा आनंद प्राप्त होगा जो विरलों को ही प्राप्त होता है। ऐसे ही विरले लोग ही सहज योगी कहलाते हैं ।
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Thursday, December 9, 2010

कानून की छत के नीचे-हिन्दी कविता (kanoon ki chhat ke neeche-hindi poem)

कानून की छत के नीचे
कुछ इंसानों का झुंड शांति से खड़ा है,
ऊपर हैं कुछ लोग जिनका कद बड़ा है।
सीढ़ियों पर लगी है एक तख्ती
यहां आम इंसान का प्रवेश वर्जित है,
कैसे ऊपर जाने की पात्रता पायें
सोच रहा है हर कोई
जो कानून की छत के नीचे
आम इंसानों की भीड़ में खड़ा है।
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भीड़ में चमकने की ख्वाहिश
इंसान को अंधा बना देती है,
अपना अक्स नहीं देख पाते कुछ लोग
पर दूसरों को अपना रुतवा दिखाने की चाहत
उनको खूंखार बना देती है।
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Saturday, December 4, 2010

श्री गुरू ग्रन्थ साहिब से-लोभवश परमात्मा की भक्ति करने का लाभ नहीं

फरीदा जा लबहु त नेहु किआ लबु त कूढ़ा नेहु।
किचरु झति लघाइअै छप्पर लुटै मेहु।
हिन्दी में भावार्थ-
संत फरीद के अनुसार अगर परमात्मा की भक्ति लालच या लोभवश की जाती है तो वह सच्ची नहीं है। एक तरह से बहुत बड़ा झूठ है। ठीक वैसे ही जैसे टूटे हुए छप्पर से पानी बह जाता है वैसा ही हश्र कामना सहित भक्ति का होता है।

दिनु रैणि सभ सुहावणे पिआरे जितु जपीअै हरि नाउ।’
हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुवाणी में संत फरीद की इस रचना के अनुसार जब मनुष्य ईश्वर के नाम का स्मरण हृदय से करता है तो उसके लिए सभी दिन और रातें सुहावनी हो जाती हैं।
माइआ कारनि बिदिआ बेयहु जनमु अबिरथा जाइ।
हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार पैसे के लिए विद्या बेचने वालों जन्म व्यर्थ जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-श्रीगुरुग्रंथ साहिब के अनेक संत कवियों की रचनायें शामिल हैं जिसमें संत फरीद का नाम भी आता है। इन सभी संत कवियों ने निष्काम भक्ति के लाभ बताये हैं। दरअसल मनुष्य कामनाओं के साथ हमेशा जीता है और इस कारण पैदा होनी वाली एकरसता अंततः मन में भारी ऊब तथा खीज पैदा करती है। कई लोग मूड बदलने के लिये कहीं पर्यटन तथा पिकनिक के लिये जाते हैं पर फिर लौटते हैं तो वही असंतोष जीवन को घेर लेता है जिसके साथ जी रहे हैं।
अपने मन का मार्ग बदलने के लिये निष्काम होना जरूरी है इसके लिये परमात्मा का नाम स्मरण करना एक श्रेष्ठ मार्ग हैं। मुश्किल यह है कि अज्ञानी मनुष्य भक्ति में कामना रखकर ही चल पड़ता है और इससे उसको कोई लाभ नहीं मिलता। इतना ही नहंी अनेक लोग तो ज्ञान प्राप्त कर उसे बेचकर अपने मन को संतोष देने का प्रयास करते हैं। ऐसे ढोंगी भले ही समाज में पुजते हैं पर मन तो उनका भी संताप से भरा रहता है। निष्काम भक्ति तभी संभव है जब अपने मन को केवल नाम स्मरण में यह सोचकर लगाया जाये कि उससे कोई भौतिक लाभ हो या नहीं पर शांति मिलनी चाहिए।
सच तो यह है कि नाम लेने से भगवान भले न मिलते हों पर मन को संतोष तो मिल ही जाता है जो कि भगवान प्राप्ति की अनुभूति वाला भी भाव है।
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Sunday, November 21, 2010

श्रीगुरुनानक देव के जन्म दिन प्रकाश पर्व का महत्व-हिन्दी लेख (shri gurunanak birth day or janama din and prakash parva-hindi lekh)

आज सारे देश में गुंरुनानकजी का जन्म दिन प्रकाश पर्व के रूप में मनाया जा रहा है। जहां तक उनके जीवन चरित्र पर चर्चा का प्रश्न है तो उसके बारे में सभी जानते हैं। उनके नाम पर सिख धर्म की स्थापना हुई और सच बात तो यह है कि अनेक समाज विशेषज्ञ पूरी सिख कौम को एक विशेष कौम मानते हुए उसके सभी सदस्यों को सम्मान तथा विश्वास से देखते हैं। कहा जाता है कि सिख धर्म की स्थापना ही हिन्दू संस्कृति की स्थापना के लिए हुई थी। कालांतर में सब बदल गया और राजनीतिक छपकपट के चलते अब सिख और हिन्दू धर्म को अलग अलग माना जाता है।
इसके बावजूद यह सच है कि गुरुनानक इस देश के ऐसे आदर्श पुरुष माने जाते हैं जिन्होंने पूरे भारतीय समाज को एक ऐसा मार्ग दिखाया जिसका यह लाभ हुआ कि लोगों के अंधविश्वासों तथा रूढ़िवादिता के विरुद्ध एक जागरुक समाज खड़ा हुआ। श्रीगुरुनानक देव ने भारतीय समाज में व्याप्त बलि, दहेज तथा अन्य कुप्रथाओं का खुलकर विरोध किया गया। देखा जाये तो भारतीय समाज में सुधार लाने वाले वह ऐसे आधुनिक महापुरुष थे जिनका हर संदेश प्रमाणिक है। वह एक मस्तमौला तथा अध्यात्मिक प्रवृत्ति के महापुरुष थे। उनके व्यक्तित्व की कल्पना ही मन में रोमांच प्रदान करती है। ऐसे महापुरुष को कोटि कोटि प्रणाम।
इस अवसर पर अपने सारे ब्लाग लेखक मित्रों तथा पाठकों हार्दिक बधाई।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज  कुकरेजा " भारतदीप",ग्वालियर 
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Friday, November 5, 2010

धार्मिक विचार-अपने ऊपर निर्भर काम ही शुरू करें

मनुष्य स्वभाव से ही अहंकारी होता है ऐसे में जब उसे कहीं अपने व्यक्तित्व के कमजोर होने की अनुभूति पर वह हताश होता है। आजकल लोगों ने अपनी जरूरतें इतनी बढ़ा ली हैं कि उसके लिये उनको दूसरों की सहायता लेनी पड़ती है जो कालांतर में उनके स्वाभिमान पर आघात पहुंचाती है। जब कोई मनुष्य अपना काम दूसरे पर छोड़ता है तब उसे इस बात का ज्ञान नहीं होता कि उसका बदला भी उसे चुकाना है। ऐसे में जब उसे प्रत्युत्तर में काम करना या दाम देना होता है तब उसका दम फूलने लगता है। शायद इसलिये कहा गया है कि अपना हाथ जगन्नाथ। इसलिये जहां तक हो सके दूसरों पर निर्भर होने वाला काम शुरु ही नहीं करना चाहिए। मनु स्मृति में अनेक ऐसी बातें कही गयी हैं जो आज भी प्रेरणा देती हैं
सर्वे परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो कार्य दूसरे के अधीन है वह दुःखदायी होता है। जिस काम पर अपना पूरी तरह से नियंत्रण हो उसी से ही सुख मिलता है। यही सुख और दुःख का लक्षण है।
यत्कर्मकुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्मनः।
तत्प्रयतनेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस काम को करने से मन और अंतरात्मा को शांति मिलती हो वही करना चाहिए। जिससे इसके विपरीत स्थिति हो तो उस काम को त्याग देना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब भी हमारे सामने कोई कार्य उपस्थित होता है तो उसके परिणामों, प्रकृति तथा स्वरूप पर अवश्य विचार करना चाहिए। कभी कोई कार्य दबाव या परप्रेरणा से नहीं करना चाहिऐ। इसके अलावा जो कार्य पूरे या आंशिक रूप से दूसरे पर निर्भर हो उसे अपने हाथ में न लें तो ही अच्छा। क्योंकि तब लक्ष्य की प्राप्ति दूसरे की गतिविधि पर निर्भर हो जाती है। अनेक बार ऐसा भी होता है कि दूसरा आदमी अगर अंदर ही अंदर द्वेष रखता है तो वह जानबूझकर उस काम का अपना पूरा या आंशिक दायित्व नहीं निभाता तब अपना लक्ष्य या अभियान संकट में पड़ जाता है।
इसके अलावा किसी भी कार्य को करते हुए इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि उससे अपने मन और अंतरात्मा को संतोष मिलेगा या नहीं। जिस काम को करने से मन और अंतरात्मा में क्लेश होता हो उससे करने का विचार ही छोड़ दें तो ही अच्छा होगा। कहने का अभिप्राय यह है कि अपने हाथ से किये जाने वाले कार्यों पर विचार करना चाहिए ताकि उनके परिणामों को लेकर बाद में पछताना न पड़े। बुद्धिमान व्यक्ति किसी भी काम को करने से पहले उसके हर पहलू पर विचार कर लेते हैं।
अनेक बार हम दूसरों के कहने पर या किसी कि कामयाबी को देखकर वैसा ही काम करने लग जाते हैं। यह देखने का प्रयास ही नहीं करती कि उसने यह सब किया कैसे? ऐसे बिना सोचे काम करने का परिणाम कभी ठीक नहीं होता।
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