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Saturday, May 8, 2010

हिन्दू धर्म संदेश-धर्म रहित कार्य केवल मूर्ख आदमी ही करता है (moorkh aadmi karta hai dharma rahit karya-hindu dharma sandesh)

आधिव्याधिविपरीतयं अद्य श्वो वा विनाशिने।
कोहि नाम शरीराय धम्मपितं समाचरेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
तमाम तरह के दुःखों से भरे और कल नाश होने वाले इस शरीर के लिये धर्म रहित कार्य केवल कोई मूर्ख आदमी ही कर सकता है।

महावाताहृतभ्त्रान्ति मेघमालातिपेलवैः।
कष्टां नाम महात्मानो हियन्ते विषयारिभिः।।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस तरह बादलों का समूह वायु की तीव्र गति से डांवाडोल होता है उसी तरह महात्मा लोग भी विषयरूपी शत्रुओं के प्रहार से विचलित हो ही जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार के विषयों की भी अपनी महिमा है। मनुष्य देह में चाहे सामान्य व्यक्ति हो या योगी इन सांसरिक विषयों के चिंतन से बच नहीं सकते। जैसे ही उनका चिंतन शुरु हुआ नहीं कि आसक्ति घेर लेती है और तब सारा का सारा ज्ञान धरा रह जाता है। सामान्य मनुष्य हो या योगी विषयों से प्रवाहित तीव्र आसक्ति की वायु से उसी तरह डांवाडोल होते हैं जैसे संगठित बादलों का समूह तेज चलती हवा के झौंकों से विचलित हो जाते हैं।
किसी ज्ञान को रटने और धारण करने में अंतर है। यह शरीर नश्वर है तथा अनेक प्रकार के रोगाणु उसमें विराजमान हैं। ऐसे शरीर से अधर्म का काम करना मूर्खता है पर सबसे मुख्य बात यह है कि इस बात को समझते कितने लोग हैं? अनेक लोग धार्मिक संतों का प्रभाव देखकर उन जैसा बनने के लिये शब्द ज्ञान ग्रहण कर उसे दूसरों को सुनाने का अभ्यास करते हैं। जब वह अभ्यास करते हैं तो उनके अंदर यह एक व्यवसायिक गुण निर्मित हो ही जाता है कि वह दूसरे पर अपना प्रभाव कायम कर सकें, मगर ऐसे लोग केवल ज्ञान का बखान करने वाले होते हैं पर उस राह पर कभी चले नहीं होते। नतीजा यह होता है कि कभी न कभी उनको विषय घेर लेते हैं और तब वह इसी नश्वर देह के लिये अधर्म का काम करते हैं। यही कारण है कि अपने देश में बदनाम होने वाले संतों की भी कमी नहीं है।
यह जरूरी नहीं है कि सभी सन्यासी हमेशा ही ज्ञानी हों। उसी तरह यह भी कि सभी गृहस्थ अज्ञानी भी नहीं होते। जो तत्व ज्ञान को समझता है वह चाहे गृहस्थ ही क्यों न हो, योगियों और सन्यासियों की श्रेणियों में आता है। अपने सांसरिक कार्य करते हुए विषयों में आसक्ति न होना भी एक तरह से सन्यास है। दूसरी बात यह है कि सांसरिक विषयों की चर्चा करने वाले तथा संपत्ति संचय में कथित रूप से लोग सन्यासी नहीं हो सकते जैसा कि वह दावा करते हैं। सच बात तो यह है कि विषय उनको विचलित क्या करेंगे वह तो उनको हमेशा ही घेरे रहते हैं।
संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Tuesday, April 27, 2010

विदुर नीति-धर्म का दिखावा करना अहंकार का प्रमाण (dharma aur ahnakar-hindi sandesh)

इन्याध्ययनदानादि तपः सत्यं क्षमा घृणा।
अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः समृतः।।
हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर का कहना है कि यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, दया और अलोभ वह गुण है जो धर्म के मार्ग भी हैं। 


तत्र पूर्वचतुर्वर्गो दम्भार्थमपि सेव्यते।
उत्तरश्च चतुर्वर्गो नामहात्मसु तिष्ठति।।
हिन्दी में भावार्थ-
इनमें पहले चार का तो अहंकार वश भी पालन किया जाता है जबकि आखिरी चार के मार्ग पर केवल महात्मा लोग ही चल पाते हैं।  


वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ऐसा नहीं है कि किसी मनुष्य में कोई गुण नहीं होता और न ही कोई बिना भला काम किये रह जाता है।  अलबत्ता उसकी मूल प्रकृत्ति के अनुसार ही उसके पुण्य या भले काम का मूल्यांकन भी होता है।  देखा जाये तो दुनियां के अधिकतर लोग अपने  धर्म के अनुसार यज्ञ, अध्ययन, दान और परमात्मा की भक्ति सभी करते हैं पर इनमें कुछ लोग दिखावे के लिये अहंकार वश करते हैं।  उनके मन में कर्तापन का अहंकार इतना होता है कि उसे देखकर हंसी ही आती है।  हमारे देश के प्रसिद्ध संत रविदास जी ने कहा है कि ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ जिसका आशय यही है कि अगर हृदय पवित्र है तो वहीं भगवान का वास है।  लोग अपने घरों पर रहते हुए हृदय से परमात्मा का स्मरण नहीं कर पाते जिससे उनके मन में विकार एकत्रित होते हैं।  फिर वही लोग  दिल बहलाने के लिये पर्यटन की दृष्टि से धार्मिक यात्राओं पर जाते हैं यह दिखाने के लिये कि वह धार्मिक प्रवृत्ति के हैं।  फिर वहां से आकर सभी के सामने बधारते हैं कि ‘मैंने यह किया’, ‘मैंने वह किया’ या ‘मैंने दान किया’-यह उनकी अहंकार की प्रवृत्ति का परिचायक है। इससे यह भी पता चलता है कि उनके मन का विकार तो गया ही नहीं।
इतना ही नहीं कुछ लोग अक्सर यह भी कहते हैं कि ‘हमारे धर्म के अनुसार यह होता है’, या ‘हमारे धर्म के अनुसार ऐसा होना चाहिये’।  इससे भी आगे बढ़कर वह खान पान, रहन सहन तथा चाल चलन को लेकर अपने धार्मिक ग्रंथों के हवाले देते हैं।  उनका यह अध्ययन एक तरह से अहंकार के इर्दगिर्द आकर सिमट जाता है।  सत्संग चर्चा होना चाहिये पर उसमें अपने आपको भक्त या ज्ञानी साबित करना अहंकार का प्रतीक है।  कहने का तात्पर्य यही है कि यज्ञ, अध्ययन, तप और दान करना ही किसी मनुष्य की धार्मिक प्रवृत्ति होने का प्रमाण नहीं है जब तक उसके व्यवहार में वह अपने क्षमावान, दयालु, सत्यनिष्ठ, और लोभरहित नहीं दिखता।  यह चारों गुण ही आदमी के सात्विक होने का प्रतीक हैं। जिन लोगों के मन में सात्विकता का भाव है वह कभी दिखावा
नहीं करते और उनकी भक्ति का तेज उनके चेहरे पर वैसे ही दिखता है।
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Thursday, March 11, 2010

विदुर नीति-योग साधना से विद्या की रक्षा होती है (yog sadhna and education-hindi sandesh)

सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते।
मृजया रक्ष्यते रूपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
सत्य से धर्म, योग से विद्या, सफाई से सुंदरता और सदाचार से कुल की रक्षा होती है।
पर्जन्यनाथाः पशवो राजानो मन्त्रिबान्धवाः।।
पतयो बान्धवा स्त्रीणां ब्राह्मण वेदबान्धवा।।
हिन्दी में भावार्थ-
पशुओं के सहायक बादल, राजाओं के सहायक मंत्री, स्त्रियों के सहायक पति के साथ बंधु और विद्वानों का सहायक ज्ञान है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में ज्ञान का होना जरूरी है अन्यथा हम अपने पास मौजूद व्यक्तियों, वस्तुओं तथा उपलब्धियों का सही उपयोग नहीं कर सकते। एक बात याद रखना चाहिये कि हमारे साथ जो लोग होते हैं उनका महत्व होता है।  अंधेरे में तीर चलाने से कुछ नहीं होता, इसलिये जीवन के सत्य को समझ लेना चाहिये। राजाओं के सहायक मंत्री होते हैं। इसका आशय साफ है कि अपने मित्र और सलाहकार के चयन में हर आदमी को सतर्कता बरतना चाहिये।

स्त्रियों की स्वतंत्रता बुरी नहीं है पर उन्हें यह समझ लेना चाहिये कि उनकी रक्षा उसके परिवार के पुरुष सदस्य ही कर सकते हैं।  उनको बाहर के व्यक्तियों से यह अपेक्षा नहीं करना चाहिये कि वह उनकी रक्षा करेंगे भले ही चाहे वह कितना भी दावा करें।  हम अक्सर ऐसी वारदातें देखते हैं जिसमें स्त्रियों के साथ धोखा होता है और इनमें अधिकतर उनमें अपने ही  लोग होते हैं। इनमें भी अधिक संख्या उनकी होती है  जो परिवार के बाहर के होने के बावजूद उनसे निकटता प्राप्त करते हैं।  स्त्रियों के मामले में यह भी दिखाई देता है कि उनके साथ विश्वासघात अपने ही करते हैं पर इनमें अधिकतर संख्या  उन लोगों की होती है जो बाहर के होने के साथ  अपने बनने का नाटक हुए   उनको धर्म और चरित्र पथ से भ्रष्ट भी करते हैं।
हम लोगों का यह भ्रम होता है कि बादल हमारे लिये बरस रहे हैं।  जब बादल नहीं बरसते तब तमाम तरह के धार्मिक कर्मकांड किये जाते हैं। बरसते हैं तो धर्म के ठेकेदार अनेक प्रकार के दावे करते हैं जबकि सच्चाई यह है कि बादल धरती पर स्थित पेड़ पौद्यों तथा पशुओं के रक्षक हैं और इसलिये उनका तो बरसना ही है।
आजकल भारतीय योग साधना का प्रचार हो रहा है। दरअसल यह योग साधना न केवल स्वास्थ्य के लिये उपयुक्त है बल्कि उससे हमारी विद्या तथा ज्ञान की रक्षा भी होती है। इसलिये जो लोग चाहते हैं कि उनके बच्चे प्रतिभाशाली हों उन्हें चाहिये कि वह इसके लिये उनको प्रेरित करें।  आजकल कठिन प्रतियोगिता का समय है और ऐसे में योग साधना ही एक ऐसा उपाय दिखती है जिससे उनकी प्रतिभा को सोने जैसी चमक मिल सकती है। अब तो स्वास्थ्य और मनोरोग विशेषज्ञ भी यह मानने लगे है कि योगासन और प्राणयाम से मनुष्य के जीवन में निखार आता है। 

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Friday, February 12, 2010

पतंजलि योग दर्शन-धर्म मार्ग का विचार करे वही धर्मज्ञ (dharama marg ka vichar-patanjali yog darshan)

शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी।
हिन्दी में भावार्थ-
जो मनुष्य अतीत, वर्तमान और भविष्य का विचार करते हुए  धर्म में विद्यमान होता है वही धर्मज्ञ है।
क्रमान्यत्वं परिणामन्यत्वे हेतुः।
हिन्दी में भावार्थ-
परिणाम की भिन्नता में क्रम की भिन्नता कारण है।
परिणामत्रसंयमादतीतानागतज्ञानम्।
हिंदी में भावार्थ-
तीनों परिणामों-अतीत, वर्तमान और भविष्य के-संयम करने से तीनों कालों का आभास हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-इस हम वैचारिक योग भी कह सकते हैं।  जो भी घटनाक्रम हमारे साथ होता है वह पिछली किसी घटना के क्रम में है और आगे जो होगी वह उसी क्रम में ही होगी। लोग अपने भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं। भूतकाल में हुई अनेक घटनाओं से उनका भाव विचलित रहता है और अपने वर्तमान में वह चिंताओं का बोझ उठाये चलते हैं।  ऐसे में भविष्य का क्या होगा? अपने भविष्य के लिये ज्योतिष गणनाओं से जानने की बजाय अपने कर्म और संकल्पों को आधार बनाना चाहिये।
यह संसार मनुष्य के संकल्प के अनुसार ही चलता है।  जिसकी दृष्टि में दोष है उसे सब दोषमय दिखाई देगा।  जिसके विचार में कलुषिता है उसे कोई वस्तु सुंदर नहीं दिख सकती। कोई सुंदर वस्तु वह देखे भी तो उसके मस्तिष्क में सौंदर्य बोध के तत्व जाग्रत नहीं हो सकते जो कि उसे अनुभूति करा सकंे।  लोभ, लालच, क्रोध, मोह तथा अहंकार के वशीभूत होकर मनुष्य इस संसार का आनंद नहीं उठा सकता।  आनंद उठाने के लिये यह आवश्यक है कि मनुष्य के अंदर सहज भाव हो और तभी संभव है कि जब मनुष्य अपने अतीत, वर्तमान, तथा भविष्य का विचार करते हुए धर्म के मार्ग पर स्थित हो।   जब मन में धर्म के प्रति रुझान होता है तो हमारे कर्म भी ठीक उसी अनुरूप हो जाते हैं और फिर उनका फल भी वैसा ही होता है।  हाथ उठाकर आकाश में ताकने से अच्छा है कि हम अपना आत्मंथन करें।
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Friday, February 5, 2010

कौटिल्य दर्शन-ऋणहीन व्यक्ति को ही राजकीय कार्य सौंपें

जो यद्वस्तु विजानाति तं तत्र विनियोजयेत्।
अशेषविषयप्राप्तविन्द्रियार्थ इवेन्द्रियम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
राज्य प्रमुख को चाहिये कि जो व्यक्ति संबंधित विषय का ज्ञाता हो उससे संबंधित विभाग और कार्य में ही उसे नियुक्त करे। जिस तरह समस्त इंद्रियां अपने गुणों में ही बरतती हैं वैसे ही किसी विषय में अनुभवी व्यक्ति ही अपने कार्य का निर्वाह सहजता से कर सकता है।
अभ्यस्तकम्र्मणस्तज्ज्ञान् शुचीन् सुझानम्मतान्।
कुय्र्यादुद्योगसम्पन्नानध्याक्षान् सर्वकम्र्मसु।।
हिन्दी में भावार्थ-
राज्य प्रमुख को चाहिये कि वह राजकीय कार्य के अभ्यास करने वाले, संबंधित कार्य विशेष का ज्ञान रखने वाले पवित्र तथा ऐसे लोगों को अपने विभागों का प्रमुख नियुक्त करे जिन पर किसी का कर्जा न हो।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-हमारे देश के विश्व में पिछड़े होने का कारण कुप्रबंध है। यह आश्चर्य की बात है कि हम आधुनिक अर्थशास्त्र के नाम पर पश्चिम का ही अर्थशास्त्र पढ़ते हैं जबकि हमारा कौटिल्य का अर्थशास्त्र भी वही बातें कह रहा है जिनको पश्चिमी अर्थशास्त्र अब बता पा रहे हैं। वैसे आधुनिक अर्थशास्त्री कहते हैं कि आर्थिक विशेषज्ञ को सभी विषयों को पढ़ना चाहिये सिवाय धर्मग्रंथों को। हमारे कौटिल्य महाराज को भी हमारे अध्यात्मिक ज्ञान का भाग माना जाता है। चूंकि अध्यात्म को धर्म का हिस्सा मान लिया गया है इसलिये कौटिल्य का अर्थशास्त्र का अध्ययन अधिक लोग नहीं करते।
आज देश में बड़ी बड़ी प्रबंधकीय, औद्योगिक तथा व्यवसायिक संस्थाओं को देखें तो वह अनेक ज्ञानी उच्चाधिकारी लोग काम रहे हैं। शिक्षा विज्ञान में मिली पर लेखा का काम रहे हैं। अनेक लोगों ने विज्ञान में शिक्षा प्राप्त की पर वह प्रबंध के उच्च पदों पर पहुंच गये हैं। अब प्रश्न यह है कि जिनको प्रबंध और लेखा का ज्ञान कभी नहीं रहा वह अपना दायित्व उचित ढंग से कैसे निभा सकते हैं। यही कारण है कि देश की प्रबंधकीय तथा औद्योगिक संस्थाओं में बड़े पदों पर लोग तो पहुंच गये हैं और काम करते भी दिखते हैं पर फिर भी इस देश कह प्रबंधकीय कौशल को लेकर कोई अच्छी छबि विश्व पटल पर नहीं दिखाई देती। सच बात तो यह है कि कार्य और पद योग्यता के आधार पर देना चाहिये पर यहां ऐसी शिक्षा के आधार पर यह सब किया जाता है जिसका फिर कभी जीवन में उपयोग नहीं होता न वह कार्यालयीन और व्यवसायिक निर्देशन के योग्य रहती है। ऐसे में सभी जगह कामकाज के स्तर में गिरावट के साथ ही असहिष्णुता का वातावरण बन गया है। बड़े पद पर बैठा व्यक्ति काम के ज्ञान के अभाव में कुंठा का शिकार हो जाता है और वह अपने मातहत के साथ आक्रामक व्यवहार कर अपने अज्ञान का दोष स्वयं से छिपाता है। वह अपने को ही यह विश्वास दिलाता है कि ‘आखिर वह एक उच्चाधिकारी है, जिसे काम करना नहीं बल्कि करवाना है।’ एक मजे की बात यह है कि कौटिल्य महाराज कहते हैं कि राजकाज में उसी व्यक्ति को नियुक्त करें जिस पर कर्जा न हो पर हम देख रहे हैं कि कम से कम इस व्यवस्था को अब तो कोई नहीं मान रहा। बाकी देश की जो हालात हैं उसे सभी जानते हैं।
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Friday, July 31, 2009

चाणक्य नीति-तत्वज्ञानी के लिए देव हर स्थान में व्याप्त (chankya niti-dev har sthan men vyapt)

नीति विशारद चाणक्य के अनुसार
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अग्निर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि दैवतम्।
प्रतिभा स्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनाम्
हिंदी में भावार्थ
-द्विजातियां अपना देव अग्नि, मुनियों का देव उनके हृदय और अल्प बुद्धिमानों के लिये देव मूर्ति में होता है किन्तु जो समदर्शी तत्वज्ञानी हैं उनका देव हर स्थान में व्याप्त है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सकाम भक्ति करने वाले हवन, यज्ञ तथा भोजन दान करते हैं। उनके लिये देवता अग्नि है। जो सात्विक भक्ति करता हैं उनके लिये सभी के दिल में भगवान है। जो लोग एकदम अज्ञानी है वह केवल मूर्तियों में ही भगवान मानकर उनकी पूजा करते है। उनको किसी अन्य प्रकार के काम से कोई मतलब नही होता-न वह किसी का परोपकार करते हैं न ही सत्संग के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा उनके मन में आती है। सच्चा ज्ञानी और योगी वही है जो हर जगह उस ईश्वर का वास देखता है।
इस विश्व में अज्ञानी और स्वार्थी लोगों की भरमार है। लोगों ने धर्म से ही भाषा, ज्ञान, विचार, और व्यापार को जोड़ दिया है। आपने देखा होगा कि कुछ लोग धर्म परिवर्तन करते हैं तो अपना नाम भी बदल देते हैं। वह लोग अपने इष्ट के स्वरूप में बदलाव कर उसे पूजने लगते हैं। कहने को भले ही उनका धर्म निरंकार का उपासक हो पर कर्म के आधार पर मूर्तिमान को भजते दिखते हैं-उनका देव भले ही निरंकार हो पर धर्म एक तरह से मूर्तिमान होता है। कहने को सभी धर्माचार्य यही कहते हैं कि इस विश्व में एक ही परमात्मा है पर इसके पीछे उनकी चालाकी यह होती है कि वह केवल अपने वाले ही स्वरूप को इकलौता सत्य बताते हुए प्रचार करते हैं-कभी किसी दूसरे धर्म के स्वरूप पर बोलते कोई धर्माचार्य दिखाई नहीं देता। अलबत्ता भारत धर्मों से जुड़े के कुछ तत्वज्ञानी संत कभी अपने अंदर ऐसे पूर्वाग्रह के साथ सत्संग नहीं करते। वैसे भी भारतीय धर्म की यह खूबी है कि वह इस संसार में व्यापक दृष्टिकोण रखते हैं और केवल मनुष्य की बजाय सभी जीवों-यथा पशु पक्षी, जलचर, नभचर और थलचर-के कल्याण जोर दिया जाता है।
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