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Saturday, January 18, 2014

पतंजलि योग साहित्य-दुःख की आशंकाओं को मन में स्थान न दें(patanjali yog sahitya-dukh ki aashankaon ko man mein sthan n den)



      मनुष्य का मन ही उसका वास्तविक स्वामी है। कभी वह प्रफुल्लित होता है कभी आत्मग्लानि को बोध से ग्रस्त होकर शांत बैठ जाता है। कभी आर्थिक, सामाजिक या रचना के क्षेत्र में अपनी भारी सफलता का सपने देखता है।  यही मन मनुष्य को भौतिक संपदा के संचय में इसलिये भी फंसाये रहता है कि कभी विपत्ति आ जाये तो उसका सामना माया की शक्ति से किया जाये।  हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि खाने धन जरूरी है पर खाने के लिये बस दो रोटी चाहिये।  मनुष्य का मन भूख, बीमारी तथा दूसरे के आक्रमण को लेकर हमेशा चिंतित रहता है।  उसे लगता है कि पता नहीं कब कहां से दुःख आ जाये। इस तरह मन की यात्रा चलती है पर सामान्य मनुष्य इसे समझ नहीं पाता। संसार में सुख और दुःख आता जाता है पर मनुष्य का मानस हमेशा ही उसे संभावित आशंकाओं भयभीत रखता है।

महर्षि पतंजलि के योगशास्त्र में कहा गया है कि

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हेयं दुःखमनागतम्।।

हिन्दी में भावार्थ-जो दुःख आया नहीं है, वह हेय है।

      योग साधक और अध्यात्मिक ज्ञान के छात्र इस मन पर नियंत्रण करने की कला जानते हैं।  योग तथा ज्ञान साधक हमेशा ही सामने आने पर ही समस्या का निवारण करने के लिये तैयार रहते हैं। देह, मन तथा विचारों पर उनका नियंत्रण रहता है इसलिये वह संभावित दुःखों से दूर होकर अपनी जीवन यात्रा करते हैं।  देखा जाये तो अनेक लोग तो भविष्य की चिंताओं में अपनी देह, विचार तथा मन में बुढ़ापा लाते हैं।  एक बात तो यह है कि लोग अपने  अध्यात्मिक दर्शन का यह संदेश अपने मस्तिष्क में धारण नहीं करते कि समय कभी एक जैसा नहीं रहता।  दूसरी बात यह कि भगवान उठाता जरूर भूखा  है पर सुलाता नहीं है।  इसके बावजूद लोग यह भावना अपने मन में धारण किये रहते हैं कि कभी उनके सामने रोटी का संकट न आये इसलिये जमकर धन का संचय किया जाये।
      योग दर्शन की दृष्टि से जो दुःख आया नहीं है उसकी परवाह नहीं करना चाहिये।  धन या अन्न का संग्रह उतना ही करना जितना आवश्यक हो पर उसे देखकर मन में यह भाव भी नहीं लाना चाहिये कि वह भविष्य के किसी संकट के निवारण का साथी है। हमारे पास भंडार है यह सोच जहां आत्मविश्वास बढ़ाती है वहीं भविष्य की आशंका उससे अधिक तो देह का खून जलाती है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, January 12, 2014

आजकल समाज सेवा पेशे के रूप में की जाती है-हिन्दी अध्यात्मिक चिंत्तन (aajkal samaj seva peshe ke roop mein ki jaati hai-hindi ahdyatmik chinttan)



      हमारे देश में समाज सेवा एक पेशा हो गयी है।  अनेक कथित स्वयंसेवी संगठन इस देश में बन गये हैं जिनके कर्ताधर्ता प्रचार तो यह करते हैं कि सेवा भाव से इस क्षेत्र में आये हैं पर दरअसल वह दूसरों से चंदा लेकर अपना काम चलाते है। इतना ही नहीं वह चंदा तो लेते हैं समाज सेवा के नाम पर अपनी यात्राओं तथा रहने के लिये भी उसमें से पैसा लेते हैं।  अनेक संगठन अपनी ईमानदारी दिखाने के लिये खाते सार्वजनिक करते हैं और उसमें इसका उल्लेख भी रहता है कि उन्होंने सेवा करते हुए अपने निजी जीवन पर  भी खर्च किया। यह कर्ताधर्ता सेवा के लिये कहीं जाने पर अपने किये गये खर्च को भी सेवा कार्य का  हिस्सा मानते हैं।  इससे यह तो स्पष्ट होता है कि वह सेवा के नाम पर घूमने फिरने की नीयत रखते हैं। इतना ही नहीं अनेक बार प्रचार माध्यम अनेक सामाजिक संगठनों का प्रचार भी इस तरह करते हैं कि वह वास्तव में निस्वार्थ से ओतप्रोत लोगों का समूह है।
संत कबीर दास जी कहते हैं कि
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निज स्वारथ के कारनै, सेव करै संसार।
बिन स्वारथ भक्ति करै, सो भावे करतार।।
                        सामान्य हिन्दी में भावार्थ-संसार में स्वार्थ की वजह से सेवा की जाती है। बिना स्वार्थ तो भक्ति होती है जो परमात्मा की हो सकती है।
      आजकल इन कथित स्वयंसेवी संगठनों की बाढ़ आयी है और मजे की बात यह है कि इसके कर्ताधर्ता प्रचार कर स्वयं को महान साबित करने का प्रयास करते हैं, इसके विपरीत जो परंपरागत स्वयंसेवी संगठन या लोग हैं वह कभी भी इस तरह के प्रचार का काम नहीं करते।  वह अपने ही धन से लोगों को दान तथा सहायता देते हैं।  देखा जाये तो हमारा देश चल ही उन लोगों की वजह से जो निष्प्रयोजन दया करते हैं।  सेवा का मूल तत्व भी यही है। जब दूसरे से पैसा लेकर कोई काम करता है तो इसका सीधा आशय यही है कि वह व्यक्तिगत स्वार्थ से समाज सेवा करने वाला व्यक्ति है।  निष्काम समाज सेवी कभी अपने प्रयासों का प्रचार न करते हैं न उसका लाभ किसी पर प्रभाव डालते हैं।  इसके विपरीत पेशेवर समाज सेवी एक तरह से अपनी छवि का राजनीतिकरण भी करते हैं। चह चाहते हैं कि राजनीति क्षेत्र में वह एक समाज सेवी की तरह प्रशंसित हों।  ऐसे लोगों  का पहला लक्ष्य अपनी छवि चमकाना तथा धन संचय करना होता है।  इसलिये जिन लोगों को समाज सेवा करना चाहते हों उन्हें पहले अपने अध्यात्मिक दर्शन का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Tuesday, January 7, 2014

भर्तृहरि नीति शतक-मनस्वी पुरुष ही समाज का भला का सकते हैं(manaswi purush hi samaj ka bhala ka sakte hain)



      इस संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं-एक भोगी तथा दूसरे योगी। भोगी लोग जीवन में विषयों में लिप्तता को ही सर्वोपरि मानते हैं। भोगी  लोगउपभोग के सामानों का संग्रह ही अपना लक्ष्य मानते हुए अपना जीवन उन्हीं को समर्पित कर देते हैं जबकि योगी लोग भौतिक सामानों का जीवन में आनंद उठाने का साधन मानकर समाज के लिये आदर्श स्थितियों का निर्माण करने में लगे रहते हैं। ज्ञानियों की दृष्टि में बिना सामानों के भी जीवन में उठाया जा सकता है। उल्टे अधिक सामानों का संग्रह चिंता तथा तनाव का कारण होता है। कुछ लोग स्वादिष्ट भोजन के चक्कर में अनेक प्रकार स्वांग रचते हैं जबकि योगी तथा ज्ञानी भोजन को देह पालने की दृष्टि से दवा के रूप में ग्रहण करते हैं।  

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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क्वचित् पृथ्वीशय्यः क्वचिदपि च पर्वङ्कशयनः क्वच्छिाकाहारः क्वचिदपि च शाल्योदनरुचिः।
क्वचित्कन्धाधारी क्वचिदपि च दिव्याभवरधरोः मनस्वी कार्यार्थी न गपयति दुःखः न च सुखम्।।
     हिन्दी में भावार्थ-कभी प्रथ्वी पर सोना पड़े कभी पलंग पर मखमली बिछोने पर शयन का सौभाग्य मिले, कभी बढ़िया तो कभी सादा खाना मिले, जिनकी रुचि अपने लक्ष्य में रहती है वह कभी इन बातों की परवाह नहीं करते।  मनस्वी पुरुष दुःख सुख की चिंता में न पड़कर कभी सामान्य तो कभी दिव्य वस्त्र पहनकर  अपने जीवन मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक बढ़ते हुए दूसरों के सामने अपना आदर्श प्रस्तुत करते हैं।

      सच बात तो यह है कि उपभोग की प्रवृत्ति मनुष्य को कायर बना देती है। वह किसी बड़े सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक अथवा सांस्कृतिक अभियान में लंबे समय तक सक्रिय नहीं रह पाता। इतना ही अधिक उपभोग मानसिक, वैचारिक तथा अध्यात्मिक से कमजोर भी बनाता है। हम इसे अपने देश में अनेक सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक तथा साहित्यक अभियानों का नेतृत्व करने वाले कथित  शीर्ष पुरुषों की क्षीण वैचारिक, मानसिक तथा अध्यात्मिक स्थिति को देखकर समझ सकते है। यह सभी कथित शीर्ष पुरुष बातें बड़ी बड़ी करते हैं पर किसी का अभियान लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता।  इसका कारण यह है कि जिनका जीवन सुविधाओं के साथ व्यतीत होता है वह अपने कथित अभियानों की वजह से लोकप्रियता भले ही प्राप्त कर लें पर उनमें इतनी क्षमता नहीं होती कि वह अपने सिद्धांतों या वादों को धरातल पर उतार सकें।  इसके लिये जिस त्याग भाव की आवश्यकता होती है वह केवल उन्हीं लोगों में हो सकता है जो सुविधायें मिलने की परवाह न करते हुए मनस्वी हो जाते हैं। 

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, January 4, 2014

राजसी कर्म करने की कामना फल के मोह में ही की जाती हैं-हिन्दी चिंत्तन लेख rajsi kara karne ki kamna fal ke moh mein hi ki jaati hai-hindi chinttan lekh)



            हमारे देश में लोकतांत्रिक राज्य प्रणाली है जिसमें आमजनों के मत से चुने गये प्रतिनिधि राज्य कर्म पर नियंत्रण करते हैं।  इन्हें राजा या बादशाह अवश्य नहीं कहा जाता पर उनका काम उसी तरह का होता है। पदों के नाम अलग अलग होते हैं पर उन्हें राज्य कर्म में लगी व्यवस्था पर नियंत्रण का अधिकार प्राप्त होता है। पहले राजा की जिम्मेदारी होती थी कि वह प्रजा का पालन करे और वह इस जिम्मेदारी का अपनी योग्यता के अनुसार निभाते भी थे। उनमें कुछ योग्य थे तो कुछ आयोग्य। बहरहाल कम से कम उन पर प्रजा हित की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी होती थी।
            लोकतांत्रिक प्रणाली में जनप्रतिनिधि के पास कोई प्रत्यक्ष काम करने का दायित्व नहीं होता वरन् संविधान के अनुसार राज्य व्यवस्था के लिये संस्थायें होती हैं जिनकी वह केवल देखभाल करता है। एक तो उस पर प्रजा हित का प्रत्यक्ष दायित्व नहीं होता दूसरे उनके पद पर कार्य करने की अवधि निश्चित होती है। उसके पूर्ण होने पर उनको फिर प्रजा के समक्ष जाना होता है।  जिन लोगों को राज्य कर्म में उच्च पद पर प्रतिष्ठित होना है उन्हें लोकतंत्र में जनमानस में अपनी छवि बनाये रखने के लिये तमाम तरह के स्वांग करने ही होते हैं। इससे प्रचार माध्यम उन्हें अपनी यहां स्थान देकर अपना व्यवसाय चलाने के लिये विज्ञापन भी जुटाते हैं। जनमानस में छवि बनाये रखने के प्रयास और जल कल्याण के लिये प्रत्यक्ष कार्य न करने की सुविधा का जो अच्छी तरह लाभ उठाये वही सर्वाधिक लोकप्रिय होता है। इस लोकतांत्रिक प्रणाली में  अगर जनहित का काम न हो या भ्रष्टाचार का प्रकरण हो तो दूसरे पर दोष डालना और अगर अच्छा हो जाये तो अपनी वाहवाही करना राज्य कर्म में उच्च पदों पर कार्यरत लोगों को सुविधाजनक लगता है।
            राज्य कर्म में लगे लोगों की प्रवृत्ति राजसी होती है।  जिसमें लोभ, क्रोध,  और अहंकार के साथ ही पद बचाये रखने का मोह और कामना गुण स्वयमेव उत्पन्न होते हैं।  हमारे यहां लोकतंत्र में आस्था रखने वाले राज्यकर्म में लोगों से सात्विक व्यवहार की आशा व्यर्थ ही करते हैं।  जिनके पास कोई राज्य कर्म करने के लिये नहीं है वह सात्विकता से यह काम करने का दावा करते है। जिनके पास है वह भी स्वयं को सात्विक प्रवृत्ति का साबित करने में लगे रहने हैं। इस तरह स्वांग लोकतंत्र में करना ही पड़ता है।  यह नहीं है कि राज्यकर्म में सात्विक लोग आते नहीं है पर वह ज्यादा समय तक अपना वास्तविक भाव नहीं बनाये रख पाते या फिर हट जाते हैं।

विदुर नीति में कहा गया है कि
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ऐश्वमदयापिष्ठा सदाः पानामदादयः।
ऐश्वर्यमदत्तो हि नापतित्वा विबुध्यते।।
            हिन्दी में भावार्थ-वैसे तो मादक पदार्थ के सेवन में नशा होता है पर उससे ज्यादा बुरा नशा वैभव का होता है। पद, पैसे तथा प्रतिष्ठा प्राप्त व्यक्ति भ्रष्ट हुए बिना नहीं रहता।
            अभी हाल ही में एक राज्य की विधानसभा के चुनावों में आम इंसानों को राजकीय कर्म में भागीदारी दिलाने का एक उच्च स्तरीय नाटक खेला गया। इस तरह के नाटक लोकतंत्र में जनमानस में अपनी छवि बनाने के लिये अत्यंत आवश्यक होते हैं इसलिये इन्हें गलत मानना भी नहीं चाहिये।  एक दल के लोगों को आमजन का प्रतीक माना गया। इस दल के लोगों ने चुनाव प्रचार के दौरान सत्ता में आने पर राजकीय भवन तथा वाहन न लेने की घोषणा की। दल अल्पमत में था और विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना था।  उससे पूर्व तक इसके लोगों ने परिवहन के लिये आमजनों की सार्वजनिक सुविधाओं का उपयोग किया।  ऐसा प्रचार हुआ कि यह लोग आमजन के वास्तविक हितैषी है।  यह प्रचार  दूसरे दलों पर समर्थन देने के लिये दबाव बनाने के रूप में किया गया।  बहुमत मिला तो अगले दिन ही सभी का रूप बदल गया।  जिन प्रचार माध्यमों ने इनकी धवल छवि का प्रचार किया वही अब नाखुश दिख रहे हैं।
            हो सकता है कि इससे कुछ आम बुद्धिजीवी निराश हों पर ज्ञान साधकों के लिये इसमें कुछ नया नहीं है। राजसी कर्म की यही प्रवृत्ति है।  सच बात तो यह है कि जो राजसी कर्म श्रेष्ठता से संपन्न  करता है उसे उसका फल भी मिलता है। दूसरी बात यह कि राजसी कर्म हमेशा ही फल की कामना से किये भी जाते हैं। सात्विक प्रकृत्ति के लोग कभी भी राज्य कर्म करने का प्रयास नहीं करते इसका मतलब यह नही है कि वह राजसी कर्म करते ही नहीं है। राजसी प्रकृत्ति का राज्य कर्म एक हिस्सा भर है।  व्यापार, कला या साहित्य में भौतिक फल की कामना करना भी राजसी प्रकृत्ति का ही है।  सात्विक प्रकृत्ति के लोग अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति की सीमा तक इनमें लिप्त रहते भी हैं पर वह कभी इस तरह का दावा नहीं करते कि निस्वार्थ भाव से व्यापार कर रहे हैं।
            कहने का अभिप्राय यह है कि प्रचार माध्यमों में लोकतंत्र के चलते अनेक प्रकार के नाटकीय दृश्य देखने को मिलते हैं।  एक तरह से यह दृश्य जीवंत फिल्मों की तरह होते हैं जिनमें अभिनय करने वाले स्वयं को सात्विक प्रकृत्ति का दिखाने का प्रयास करते हैं। ज्ञान साधकों को उनके अभिनय का अनुमान होता है पर आमजन अपना हृदय इन दृश्यों और पात्रों में लगा बैठते हैं जो कि बाद में उन्हें निराश करते हैं।  भारतीय अध्यात्म दर्शन के राजसी कर्म में लोगों का इस तरह कार्य करना और फल लेना कोई आश्चर्य की बात नही होती। राजसी कर्म करने वाले बुरे नहीं होते पर उनके सात्विक दावों पर कभी यकीन नहीं करना चाहिए।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Wednesday, December 25, 2013

व्यावसायिक कथाकारों का ज्ञान श्रोताओं के भीतर प्रवेश नहीं करता-हिंदी चिंत्तन लेख(vyasayik kathakaron ka gyan shrotaon ke bheetar pravesh nahin karta-hindi chinntan lekh or hindu thought aricle)



            हमारे देश में प्रचलित अध्यात्मिक धारा के अनुसार  जिस तरह साकार और निराकार दोनों ही प्रकार की पूजा पद्धतियों को सहज मान्यता प्राप्त है वह विश्व में किसी अन्यत्र विचाराधारा में नहीं है। इसका लाभ यह होता है कि समाज में कभी पूजा पद्धति को लेकर आपस वैमनस्य नहीं फैलता पर इससे हानि यह हुई कि साकार और सकाम भक्ति की आड़ में हमारे यह व्यवसायिक धार्मिक गुरुओं का प्रभाव इस तरह कायम हो गया कि तत्वज्ञान एक अगेय विषय बन गया। इसकी चर्चा सभी करते हैं पर ग्रहण करने का सामार्थ्य बहुत कम लोगों में होता है। 
            सामान्य मनुष्य बहिर्मुखी होता है और इंद्रियों का भी यह स्वभाव होता है कि वह बाहर के विषयों की तरफ आकर्षित होती हैं।  यही कारण है कि आकर्षक आश्रम, मनोरंजन की दृष्टि से कथायें कहने वाले गुरु तथा सांसरिक फल जल्दी दिलाने के लिये प्रसिद्ध धार्मिक स्थान समाज में सदैव लोकप्रिय रहे हैं।  यह कोई आजकल की बात नहीं वरन् कबीर के समय से ही इस तरह का प्रचलन  रहा है इसलिये उन्होंने  व्यास पीठ पर बैठकर कथा करने वालों की तरफ स्पष्ट ऐसा संकेत दिया जिनसे मन में मनोरंजन का भाव तो आ सकता है पर तत्वज्ञान धारण करना कठिन होता है।  यह सभी को पता है कि कथा के सार्वजनिक प्रदर्शन में लगे लोग धन लेते हैं। उनका कथा करना तथा पैसे लेना कोई बुरा काम नहीं  पर उसका अध्यात्मिक ज्ञान की दृष्टि से कितना महत्व है यह भी समझा जाना चाहिये।
संत कबीर दास कहते हैं कि
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कबीर व्यास कथा कहैं, भीतर भेदे नाहिं।
औरों कूं परमोधर्ता, गये मुहर का माहिं।।
            सामान्य हिन्दी में भावार्थ-व्यास पीठ  पर बैठकर कुछ विद्वान कथा करते हैं पर उनकी बातें श्रोताओं का हृदय भेदकर अंदर नहीं जातीं। ऐसे विद्वान दूसरों का उद्धार क्या करेंगे स्वयं ही पैसे की लालच में आकर यह कथा का व्यवसाय अपनाते हैं।
कबीर कहहिं पीर को, समझावै सब कोय।
संसय पड़ेगा आपकूं, और कहें का होय।।
            सामान्य हिन्दी में भावार्थ-दूसरों की पीड़ा को देखकर उनके हरण का उपाय अनेक समझाते हैं पर स्वयं अपनी समस्याओं के हल को लेकर वह स्वयं ही सशंकित रहते हैं।  जिन्होंने ज्ञान का रटा लगाया है पर धारण नहीं किया वही दूसरों को ज्ञान बांटते हैं।
            इस देश में अनेक लोगों ने धार्मिक प्रवचन करते करते इतना धन कमा लिया है कि अनेक उद्योगपति तथा व्यवसायी भी उन जैसी समृद्धि प्राप्त नहीं कर पाते हैं।  देखा जाये तो भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के नाम पर जितना व्यवसाय होता है उतना शायद ही किसी अन्य विषय या वस्तु का होता हो।  कुछ विद्वान कहते हैं कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से संबंधित ग्रंथों में  कि भारतीय वेदों में अस्सी फीसदी सकाम तथा बीस फीसदी वाक्य निष्काम भक्ति से सबंधित है। दूसरी बात यह भी त्यागी को बड़ा माना गया है भोगी को नहीं।  मजे की बात यह है कि जो लोग सकाम भक्ति के मंच पर होते हैं वही निष्काम रहने का उपदेश देते हैं।  निराकार की बात करते करते साकार भक्ति की बात करने लगते हैं।  इतना ही नहीं भोग की सामग्री का संचय करने वाले ही अपने शिष्यों को त्याग कर धर्म निर्वाह करने का संदेश देते हैं।  दान के नाम अपनी कथाओं का दाम लेकर अपने शिष्यों को  धन्य करते हैं।
            इन व्यवसायिक कथाकारों पर किसी प्रकार की दोषदृष्टि रखना व्यर्थ है क्योंकि अपनी समस्याओं से परेशान लोगों के मन को को यह कुछ समय तक उसे संसारिक विषयों से परे रख थोड़ी राहत अवश्य देते हैं। हमारे कहने का अभिप्राय तो यह है कि मन में स्थाई रूप से शांति रहे उसके लिये योग तथा ज्ञान की साधना करते रहना चाहिये।



दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Sunday, December 22, 2013

कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर चिंत्तन लेख-पराक्रमी के पास भोग के साधन स्वतः उपलब्ध होते है(hindi thought article on kautilya ka arthshastra-prakrami ka paas bhog ke sadhan swat$ uplabdh hote hain)



            अनेक कथित धार्मिक गुरु यह तो कहते हैं कि मोह, माया, अहंकार तथा क्रोध का त्याग करें पर न तो वह स्वयं उनके प्रभाव से मुक्त हैं न वह अपने शिष्यों को कोई विधि बता पाते हैं। सत्य और माया के बीच केवल अध्यात्मिक ज्ञानी और साधक ही समन्वय बना पाते हैं। एक बात तय है कि सत्य के ज्ञान का विस्तार नहीं है पर माया का ज्ञान अत्यंत विस्तृत है।  कोई ऐसा बुरा काम नहीं करना चाहिये दूसरे को पीड़ा यह सत्य का ज्ञान है यह सभी जानते हैं पर माया के पीछे जाते हुए अनेक ऐसे काम करने पड़ते हैं जिनके उचित या अनुचित होने ज्ञान सभी को नहीं होता।  माया के अनेक रूप हैं सत्य का कोई रूप नहीं है। अनेक रूप होने के कारण धन, संपदा तथा उच्च के पद की प्राप्ति के लिये अनेक प्रकार के मार्ग हैं।  हर मार्ग का ज्ञान अलग है। स्थिति यह है कि लोग धन और संपत्ति प्राप्त करने के मार्ग बताने वालों को ही धार्मिक गुरु मान लेते हैं। मजे की बात तो यह है कि ऐसे गुरु श्रीमद्भागवत गीता से निष्काम कर्म तथा निष्प्रयोजन का संदेश नारे के रूप में देते देते ही मायावी संसार का ज्ञान देने लगते हैं।  इस संसार में माया की संगत जरूरी है पर सत्य का ज्ञान हो तो माया दासी होकर सेवा करते हैं वरना स्वामिनी होकर नचाने लगती है।
कौटिल्य महाराज ने अपने अर्थशास्त्र में कहा है कि
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वे शूरा येऽपि विद्वांतो ये च सेवाविपिश्चितः।
तेषा मेव विकाशिन्यों भोग्या नृपतिसम्भवः।।
            हिन्दी में भावार्थ-जिस मनुष्य में वीरता, विद्वता और सेवा करने का गुण है वही भोग के लिये  सम्पत्ति प्राप्त करता है।
कुलं वृत्तञ् शौर्य्यञ्च सर्वमेतन्ना गभ्यते।
दुवृतेऽश्न्यकुलीनेऽप जनो दातरि रज्यते।।
            हिन्दी में भावार्थ-कुल, चरित्र और वीरता को भी कोई ऐसे नहीं सराहता। दुष्ट तथा अकुलीन भी अगर दातार हो तो सामान्य जन उसमें अनुराग रखते हैं।
            अध्यात्मिक ज्ञानी मानते हैं कि मनुष्य अगर अपने अंदर ज्ञान साधना कर सत्य समझ ले तो उसमें वीरता और पराक्रम के गुण स्वतः आ जाते हैं और तब वह इस संसार में माया का स्वामी बनता है पर उसे अपनी स्वामिनी बनकर नचाने का अवसर नहीं देता।  दूसरी बात यह है कि ज्ञानी आदमी धन का व्यय इस तरह करता है कि उसके आसपास के लोग भी प्रसन्न रहें। वह दान और सहायता के रूप में ऐसे लोगों को धन या वस्तुऐं देता है जो उसके लिये सुपात्र हों। जिन लोगों के पास अध्यात्म ज्ञान नहीं है वह पैसा, पद और प्रतिष्ठा के मद में दूसरों को छोटा समझकर उनकी उपेक्षा कर देते हैं जिससे उनके प्रति समाज में विद्रोह का भाव निर्माण होता है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Friday, December 6, 2013

धार्मिक विचाराधाराओं के बीच द्वंद्व स्वाभाविक-हिन्दी चिंत्तन लेख (Dharmik vichardharaon ke beech dwandwa swabhavik-hindi thought article)



                        शायर इकबाल ने लिखा था कि मजहब नहीं सिखाता बैर करना। आमतौर से कुछ कट्टरपंथी भारतीय धार्मिक बौद्धिक विद्वान  कहते हैं कि उसका आशय केवल अपने ही धर्म से था जो मजहब कहलाता है। इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि इकबाल उर्दू शायर थे और उनकी विचाराधारा को ही मजहब कहा जाता है। इतना ही नहीं उनकी लेखन की  भाषा को भी मजहब से ही जोड़ा जाता है हालांकि यह तार्किक है। याद रहे हिन्दू को धर्म और ईसाई को रिलीजन कहा जाता है। इकबाल ने  विरोधियों को आलोचना का  अवसर उन्होंने स्वयं ही दिया क्योंकि विभाजन के बाद वह नवनिर्मित पाकिस्तान चले गये।  हम यहां मान लेते हैं कि इकबाल के मजहब का आशय व्यापक था और उन्होंने हिन्दू तथा ईसाई शब्द को भी मजहब ही माना होगा।  हम उनकी बात से सहमत है कि मजहब नहीं सिखाता बैर करना पर हमारा सवाल यह है कि मजहब का मतलब वह क्या समझते थे?
            अगर उनके मजहब का मतलब दुनियां के हर प्रकार के धर्म या रिलीजन से था तो हम मानते हैं कि वह केवल एक नारा देकर वाहवाही लूटते रहे थे।  दरअसल हमारा मानना है कि जहां भी धर्म के साथ कोई नाम जुड़ा है वह राजसी बुद्धि से बनी योजना का हिस्सा है ताकि उसकी आड़ में विशेष प्रकार के लोगों का वर्चस्व बना रहे। श्रीमद्भागवत में धर्म का आशय व्यापक है पर उसका पूरा संबंध मनुष्य के आचरण, कर्म तथा विचार से ही है।  बेहतर आचरण ही धर्म है पर जब हम वर्तमान में उसके साथ तमाम नाम जुड़े देखते हैं तो पाते हैं कि एक तरह से वर्चस्व की लड़ाई चल रही है।  सभी धर्मों के प्रचारक अपने धर्म तथा उसकी पूजा पद्धति को श्रेष्ठ बताते हैं। यही कारण है कि अनेक देशों के रणनीतिकार  कथित रूप से धर्म निरपेक्ष या सर्वधर्म समभाव के सिद्धांत का पालन करने का दावा करते हैं।  सर्व धर्म समभाव अपने आप में विवादास्पद है।  धर्म का आशय अगर आचरण से है तो अनेक प्रकार के धर्मों की स्वीकार्यता का क्या अर्थ हो सकता है? जहां तक धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न है तो वह केवल उन लोगों का सिद्धांत है जो अपने स्वार्थ तक ही सीमित हैं।  उन्हें आचरण या व्यवहार से कोई अर्थ नहीं रहता।  धर्म के प्रति निरपेक्ष रहने का अर्थ यह है कि अपने तथा दूसरों के व्यवहार, आचरण तथा विचारों के प्रति उदासीन होकर केवल अपना स्वार्थ पूरा करना।  अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिये धर्म के सिद्धांतों का भी उल्लंघन करना ही धर्म निरपेक्षता का प्रमाण है।  एक विचाराशील, परिश्रमी तथा सात्विक मनुष्य कभी भी धर्म से निरपेक्ष नहीं रह सकता। धर्म से निरपेक्ष रहने का आशय यही है कि अपने तथा दूसरों के अच्छे या बुरे व्यवहार, कर्म तथा विचार के  प्रति उदासीन रहना। हालांकि धर्म के प्रति यह उदासीनता सकाम भाव को इंगित करती है। मतलब यह कि हमारा काम सिद्ध होना चाहिये और उसकी वजह से किसी को कष्ट हो तो हो।
                        अगर इकबाल का आशय सभी प्रचलित धर्मो से था तो भी हम मानते हैं कि वह कोई बड़े ज्ञानी नहीं थे और अगर यह मान ले कि उनका श्रीगीता में वर्णित आचरण रूप धर्म से था इसका प्रमाण नहीं मिलता कि उसका उनको कोई ज्ञान था।  हम यहां मानकर चलते हैं कि उनके मजहब शब्द से आशय सभी धर्मों से था तो वह गलत थे।  आचरण से धर्म का संबंध है पर पर देखा जा रहा है कि जिन धर्मों का कोई नाम है वह योजनापूर्वक बनाये गये हैं।  सभी धर्मों में राजसी पुरुषों के साथ कुछ धार्मिक चेहरे रहे हैं जो उनके लिये धर्म का उपयोग राज्य विस्तार के लिये करते हैं।  वह लोगों के मौजूद अध्यात्मिक भूख को धर्म की आड़ में शांत कर अपने राजसी पुरुषों के नियंत्रण में लाते हैं।  देखा जाये तो प्रत्यक्ष धर्मों के ठेकेदार अपनी धवल छवि बनाकर सभ्य समाज पर बौद्धिक नियंत्रण करते हैं पर उन पर राजसी पुरुषों का ही वरद हस्त रहता है।  भारत के बाहर तो धर्म के नाम पर अनेक युद्ध भी हुए हैं। जब हम श्रीमद्भागवत गीता में वणित धर्म रूपी आचरण की बात करें तो वह वाकई बैर करना नहीं सिखाता पर उसके इतर हम नामधारी कथित धर्मो की बात करें तो वह राजसी पुरुषों की विस्तारवादी नीतियों को ही प्रश्रय देते हैं। तय बात है कि इन प्रयासों को विभिन्न विचारधाराओं को मानने वालों के बीच विरोध होता है।  ऐसे में इकबाल साहब की बात बेदम हो जाती है। खासतौर से जब उन्होंने मजहब के आधार पर बने पाकिस्तान में जाना श्रेयस्कर समझा हो। अगर उनके मजहब शब्द  आशय धर्म या रिलीजन से होता तो वह कभी भी पाकिस्तान नहीं जाते।  कहीं न कहंी उनके मन में यह बात रही होगी कि भारत में जब हिन्दी का बोलबाला होने वाला है जिसकी वजह से भारतीय अध्यात्म ज्ञान भी विस्तार पायेगा तब उनकी शायरी बौनी हो जायेगी।
            हमारे कहने का अभिप्राय यह है कि अगर हम भारतीय अध्यात्म दर्शन की बात करें तो उसमें धर्म वाकई बैर करना नहीं सिखाता पर जब हम उसके इतर नाम धारी धर्मों की बात करें तो उनके सिद्धांत बड़े ही आकर्षक हों पर उनसे जुड़े शिखर पुरुष अपने अपने समाजों पर नियंत्रण करने के लिये  दूसरे समाजों का भय पैदा कर नियंत्रण करते हैं जिससे अनेक देशों में वैमनस्य फैलता है।  ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि इकबाल का यह तर्क कैसे माना जाये कि धर्म, मजहब या रिलीजन बैर करना नहीं सिखाता।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


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