समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
-------------------------


Showing posts with label hindu dharma massage. Show all posts
Showing posts with label hindu dharma massage. Show all posts

Saturday, January 14, 2012

मलूकदास के दोहे-सुंदर और असुंदर देह को अंतत: काल खा जाता है (malukdas ke dohe-sundar aur asundar deh ko kaal khaa jaata hai)

           सभी मनुष्यों  की देह भले ही पंचतत्वों से बनी है पर रंग और अंगों के दृश्य में भिन्नता होती है। यही भिन्नता असुंदर और सुंदर की पहचान निर्धारित करती है। सभी मनुष्यों की इंद्रियाँ सांसरिक पदार्थों को ग्रहण और त्याग करती हैं। जब ग्रहण करती हैं तब वह सुंदर होता है और जिसे त्याग करती हैं वह असुंदर होता है। इसकी बावजूद अज्ञानी लोग असुंदर और सुंदर रूप के बोध करने में लगे होते हैं।  हमारे अध्यात्मिक ज्ञान के अनुसार इस संसार में समस्त दृश्यव्य वस्तुऐं नश्वर हैं। बाकी की बात क्या करें यह प्रथ्वी, सूर्य, चंद्रमा और अन्य ग्रह भी नश्वर माने गये हैं। आधुनिक विज्ञान भी यह मानता है कि प्रथ्वी और इस पर विचरण करने वाले समस्त जीवों के साथ ही अन्य ग्रहों का भी एक जीवन है जो अंततः नष्ट होता है। अमेरिकन वैज्ञानिकों ने तो एक ब्लैकहोल का पता भी लगाया है जो प्रतिदिन सैंकड़ों तारों को लील जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि यहां कुछ भी स्थिर नहीं है।
            इस संसार में विचरण करने वाले समस्त प्राणियों की देह भले ही बाहर से आकर्षण लगती है पर अगर उसे आधुनिक सूक्ष्म यंत्रों से देखा जाये तो अंदर का ढांचा अत्यंत गंदगी भरा रहता है। वहां हड्डियां, रक्त, कीचड, और मांस के टुकड़ों के साथ कीड़े मकौड़े रैंगते दिखाई देते हैं। कम से कम अंदर का दृश्य दर्शनीय नहीं होता। इतना ही नहीं समय के अनुसार सभी की देह पतन की तरफ बढ़ती जाती है। इसके बावजूद अनेक लोग सुंदर देह के अनेक दीवाने हैं। कुछ मनुष्यों को अपनी सुंदर देह पर अत्यंत अहंकार भी रहता है। हमारे अध्यात्मिक महर्षि सदैव इस तरफ ध्यान दिलाते रहे हैं कि यह मनुष्य देह जहां नश्वर है वहीं आत्मा अमर है अतः मनुष्य को योग ध्यान तथा जाप से स्वयं पर नियंत्रण करना चाहिए।
मलूकदास कहते हैं कि
----------------------
सुंदर देही देखि कै, उपजत है अनुराग।
मढ़ी न होती चाम की, तो जीवन खाते काम।।
          ‘‘मनुष्य का स्वभाव है कि वह किसी भी सुंदर शरीर को देखकर उससे प्रीति करने को लालाचित होने लगता है जबकि इसमें मांस, खून और हड्डी भरे हुए हैं। अगर इस कचड़े के ऊपर यह देह न हों तो कौऐ इसे जीते जी खाने लगें।
सुंदर देही पाइ कै, मत कोइ करै गुमान।
काल दरेरा खायगा, क्या बूढ़ा क्या जवान।।
            ‘‘सुंदर शरीर पाकर किसी को इतरना नहीं चाहिए। आदमी बूढ़ा हो या जवान काल किसी को भी खा सकता है।’’
         हम देख रहे हैं कि हमारे देश में आधुनिक शिक्षा तथा मनोरंजन के साधनों की वजह से पूरा समाज अपने अध्यात्मिक ज्ञान को भूलकर माया तथा सौंदर्य के पीछे भाग रहा है। ऐसा लगता है कि लोगों ने अक्ल के द्वारा बंद कर दिये हैं। ऐसे में भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान पर दृष्टिपात करते है तो लगता है कि अज्ञानियों का झुंड चहुं ओर फैला है। स्थिति यह है कि स्त्रियों के नग्न चित्रों को देखने के लिये लोग मरे जा रहे हैं। जिन लोगों को तत्वज्ञान है वह ऐसी स्थिति में हंसते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, October 8, 2011

वसिष्ठ स्मृति से-इच्छाऐं कभी बूढ़ी नहीं होतीं (vasishth smriti se sandes in hindi)

          आधुनिक युग में भौतिकतावाद की चलते अधिकतर अध्यात्म से विरक्त हो गये है। सांसरिक विषयों में प्रवीणता और विशेषज्ञता प्राप्त करने वाले अनेक लोग मिल जायेंगे पर अध्यात्मिक ज्ञान में दक्ष लोगों की संख्या अत्यंत नगण्य है। यह अलग बात है कि हर मनुष्य एक आत्मा है जो देह में विराजमान मन को कचोटता है कि वह अध्यात्मिक रूप से कोई कार्य करे। चूंकि अध्यात्मिक ज्ञान का रूप नहीं समझा इसलिये अनेक लोग उन कथित गुरुओं के शिष्य बन जाते हैं जिन्होंने भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों का सतही अध्ययन केवल इसलिये किया होता है ताकि वह उनको सुनाकर अपना व्यवसाय कर सकें। ऐसे गुरु स्वयं ही तृष्णाओं के दास होते हैं।
        मनुष्य मन का यह स्वभाव है कि वह हमेशा ही तृष्णाओं के जाल में फंसा रहता है। उनसे ऊबता है पर फिर भी ऐसा कोई दूसरा मार्ग नहीं जानता जिस पर चलकर वह मुक्त भाव से जीवन व्यतीत कर सके। तत्वज्ञानी यह बात जानते हैं कि तृष्णाओं से कभी मुक्ति संभव नहीं है पर उनका दासत्व स्वीकार करने की बजाय वह उस पर शासन करते हैं। सांसरिक विषयों में उतना ही लिप्त रहते हैं जितना देह के लिये आवश्यक है।
वसिष्ठ स्मृति में कहा गया है कि
--------------------------
जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः।
जीवनाशा धनाशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यति।।
       ‘‘मनुष्य जब बूढ़ा हो जाता है तब उसके केश, दांत और अन्य अंग में बूढ़े हो चुके होते हैं पर उसकी तृष्णाऐं बूढ़ी नहीं होती। तरूण पिशाचिनी की तरह यह तृृष्णाऐं नुष्य का खून चूसकर उसे पथभ्रष्ट करती हैं।’’
या दुस्त्य दुर्मतिभियां न जीर्यति जीर्यतः।
योऽसौ प्राणान्ति रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्।।
           ‘‘दुषित बुद्धिवाले इस तृष्णा से चिढ़ते है किन्तु चाहकर भी उसे छोड़ नहीं पाते। मनुष्य कितना भी बूढ़ा हो जाये पर उसकी तृष्णा हमेशा ही युवा बनी रहती है। यह तृष्णा वह रोग है जो प्राण लेकर ही छोड़ती है।
      आधुनिक पश्चिमी शिक्षा पद्धति के कारण हमारे देश में लोेग अपने प्राचीन अध्यात्मिक ज्ञान से विरक्त हो गये हैं। फिर आजकल मायाजाल की विकटता के चलते उनकी व्यसततायें इतनी बढ़ गयी हैं कि अपनी नियमितता से परे हटकर नवीन आनंद की की दृष्टि से वह उन गुरुओं के शरण में चले जाते हैं जिनको यह नहीं पता कि तत्वज्ञान क्या है? उनकी वाणी में शब्द रटे हुए हैं, मन में अर्थ भी है पर हृदय में भाव नहीं है। शब्द तभी ज्ञान बनते हैं जब भाव हो। ऐसा न होने पर सारी सत्संग चर्चा व्यर्थ है। अतः जब किसी को अध्यात्मिक ज्ञान के लिये गुरु बनाना है तो पहले यह देखना चाहिए कि वह तृष्णा रूपी सुंदरी के जाल में फंसा हुआ तो नहीं है। इसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि अपने गुरु के जीवन और आचरण पर दृष्टि डालना चाहिए। यह नहीं देखना चाहिए कि उसने अध्यात्मिक ज्ञान के चलते पाया क्या? बल्कि इस तथ्य पर दृष्टिपात करना चाहिए कि उसने त्यागा क्या है? अगर वह भी अन्य सांसरिक मनुष्यों की तरह तृष्णाओं रूप मायाजाल में फंसा है तो उससे दूर रहना ही बेहतर है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

अध्यात्मिक पत्रिकाएं