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Wednesday, June 17, 2015

योग साधक वातावरण विषाक्त नहीं करते-21 जून विश्व योग दिवस पर विशेष हिन्दी लेख(yog sadhak vatavaran vishakt nahin karte-A Hindu hindu thought article on world yoga day,hindi editorial on vishwa yoga diwas)

                               संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने योग के बारे में सकारात्मक टिप्पणी कर पूरे विश्व को भारतीय योग विद्या के बारे जो जाग्रति पैदा की है, वह प्रशंसनीय है। जहां पूरे विश्व में योग साधना के बारे में प्रचार हो रहा है वहीँ  भारत में ही इसके विरोध का भी ऐसा रूप सामने आ रहा है जो भावनात्मक कम पेशवर ज्यादा लगता है। विरोध के लिए ही इसका विरोध हो रहा है और प्रचा माध्यम अपने व्यावसायिक हितों के लिए निष्पक्षता के नाम पर  इसे प्रश्रय दे रहे हैं   जैसे जैसे येाग 21 जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का समय पास आ रहा है वैसे भारत में इस पर विवादास्पद बयान देकर सनसनी पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रचार माध्यम भी ऐसे बयानों को खूब चटखारे लेकर सुना रहे हैं।  योग का विरोध करने वालों पर हमें कुछ नहीं कहना है पर योग समर्थक भी विरोधियों के वक्तव्यों को चुनौती देने के लिये जिस तरह हल्के वक्तव्य दे रहे हैं उससे तो यह नहीं लगता कि वह कोई योग साधना करते हों।
                              एक योग साधक जानता है कि अभद्र एक शब्द का दूसरा अभद्र शब्द विकल्प नहीं हो सकता। योग के विरोध में हो या समर्थन में अभद्र शब्द वातावरण को प्रदूषित करता है। जिनके चेहरे भावहीन, चरित्र छिद्रमय और चाल में घबड़ाहट है वह योग का विरोध करते ही हैं-अपने विलासी जीवन से आये आलस्य के भाव के बंधन में पड़े ऐसे लोग सक्रिय योगियों से उनकी सक्रियता के कारण चिढ़ते भी हैं।  उनके अभद्र शब्दों की परवाह योग साधक नहीं करते पर उनके प्रत्युत्पर में योग साधना के वह समर्थक जो प्रचार में केवल नाम पाना चाहते हैं जब उत्तर में अभद्र शब्द प्रयोग करते हैं तब उन पर भी संदेह होता है कि वह शायद ही योग साधना करते हों।  योग साधकों के मुख से निकले शालीन शब्द भी जब विरोधी की तरफ तीर की तरह जाते हैं तो वह जवाब देने की स्थिति में नहीं रहता।  अन्य सुनने वालों को भी ऐसे शब्द कर्णप्रिय लगते हैं।  योग साधना में निरतंर अभ्यास से व्यक्ति की वाणी, व्यक्तित्व तथा विचार इतना तेजस्वी हो जाता है कि उसका हर शब्द आलोचक के के लिए शूल या तीर का काम करता है।
                              योग साधक का वाणी पर संयम स्वाभाविक रूप से रहता है।  संयम का अर्थ यह कदापि नहीं है कि प्रतिकूल व्यक्ति, विचार या वाणी का विरोध न किया जाये वरन् योग साधना से बिना वातावरण को विषाक्त किये उनको  अनुकूल बनाने की कला योग साधक में होती है।  इसलिये जो वास्तव में योग साधना के समर्थक हैं उन्हें इसका निंरतर अभ्यास भी करना चाहिये तभी वह वातावरण को विषाक्त बनाने के दोष से मुक्त हो पायेंगे।  योग साधना के प्रचार प्रसार में इस बात का ध्याना रखना चाहिये कि अन्य समुदायों के लोग इसे बाध्य होकर नहीं वरन् प्रेरित होकर अपनायें।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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