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Friday, November 11, 2016

हमें माया के दम पर उछलने वाले चूहों की अब ताकत देखनी है-कालेधन पर स्ट्राइक पर हिन्दी संपादकीय (Men money And mouse-HindiEditorial)

                           अब बात समझ में आ गयी।  नयी आर्थिक क्रांति की पीड़ा उन लोगों को जरूर होगी जिनके सिंहासन हिलने वाले हैं।  हम तो पहले ही कह रहे थे कि जिस कालेधन पर सर्जीकल स्ट्राइक की बात हुई हैं राष्ट्रवादी भक्त भूलें नहीं। भूलेंगे तो हम उन्हें याद दिलाते रहेंगे।  कोई भी क्रांति एक दिन में परिणाम नहीं देती।  उसके लिये चलाया गया अभियान रूप बदलता है तो उसके प्रवाहक भी कार्यशैली बदलते हैं।कालेधन पर यह सर्जीकल स्ट्राइक है जिसके परिणाम अभी तो दिखने शुरु हुए हैं।
कुछ लोग गरीबों, बीमारों और बेबसों की परेशानियों की चर्चा कर इसका विरोध कर रहे हैं। इधर भक्तगण भी सफाईयां देते फिर रहे हैं।  एक निष्पक्ष चिंतक के रूप में हमारा सीधे मानना है कि कालेधन का सबसे ज्यादा दुष्परिणाम समाज पर वह भी युवा वर्ग के लोगों पर हुआ है।  चंद समाज सेवक येनकेन प्रकरेण धन जमा कर राजपदों पर पहुंच जाते हैं। कुछ काले व्यापार के सहारे आर्थिक रूप से इतने ताकतवर होते हैं कि उन्हें राजपद के बिना ही भारी शक्ति मिल जाती है। फिर या तो उनका माथा फिरता है या उनकी औलादें मद में चूर होकर पूरे समाज को अपना चाकर समझती हैं। चंद बेरोजगार लोगों के अपने इर्दगिर्द एकत्रित कर अपनी सेना बना लेते हैं। गरीब युवाओं को तो ऐसे मानते हैं जैसे कि वह कोई आवारा पशु हो। अपनी कार से टकराने या मार्ग न देने वाले को मारते हैं-कभी जान भी लेते हैं। किसी युवती ने प्रणय निवेदन स्वीकार नहीं किया तो उस पर तेजाब डाल देते हैं।  रास्ते पर अपने वाहन इस तरह दौड़ाते हैं जैसे कि उनके बाप ने बनवाई हो-कोई मर जाये तो मर जाये परवाह नहीं।  ऐसे बिगड़ैल रईसजादों के बारे में ढेर सारे समाचार आते रहते हैं। जिन युवाओं के अभिभावकों के पास इतना धन नहीं है वह कुंठित होते हैं।  युवा मन का मरना हमारी नज़र में हमारी नज़र में बीमार के बिना इलाज मरने से ज्यादा खतरनाक है। कहने का अभिप्राय यह है कि अगर कालेधन के मद से जो समाज में वैमनस्य और अहंकार फैला है और युवा मन मरता है तो वह हमें ज्यादा दर्दनाक है।  हमारी नज़र में तो यह फैसला एक एतिहासिक है और इसके परिणाम अभी समाज पर देखा जाना बाकी है।  हम पर्द पर लोगों की परेशानियों से हमदर्दी नहीं रखते क्योंकि स्वयं भी झेल रहे हैं।  हम तो वर्तमान पीढ़ी मेें आत्मविश्वास देखना चाहते हैं जिसे धन के असमान वितरण की समस्या के कारण गिरे मनोबल के कारण जीवन बिताते हैं।
अपनी बात समाप्त खत्म करने से पहले यह पुरानी कथा सुनाते हैं जो हमने बचपन में पढ़ी थी और कालांतर में हमारे लिये अध्यात्मिक स्मरण शक्ति का आधार बनी। एक संत ने एक गृहस्थ के घर भोजन किया। भोजन के समय गृहस्थ अपने हाथ में एक लकड़ी पकड़े बैठा रहा।
संत ने पूछा-‘तुम लकड़ी क्यों पकड़े बैठे हो।’
गृहस्थ ने उनके ठीक ऊपर टाण पर रखी एक हांडी की तरफ इशार करते हुए कहा-‘कुछ नहीं महाराज! एक चूहा इधर आता है और उस हांडी तक पहुंच जाता है। वह इधर नहीं आये इसलिये उसे भगाने के लिये यह लकड़ी पकड़े बैठा हूं।’
संत ने पूछा-‘उसमें क्या धन रखा है?’
गृहस्थ की आंखें फटी रह गयीं और वह बोला-‘महाराज आप तो वाकई सिद्ध हैं। उसमें मेरी अशर्फियां रखी हैं।’
संत ने कहा-‘इसमेें सिद्ध जैसी कोई बात नहीं है।  वहां रखी सोने की अशर्फियां उसमें इतनी ताकत पैदा कर रही हैं। तुम वह निकालकर अपने पास रख लो। थोड़ी दूर जाकर बैठते हैं फिर देखो चूहा चढ़ पाता है या नहीं।
गृहस्थ ने उसमें से अशर्फियां निकाली और हाथ में पकड़ कर संत के साथ दूर बैठ गया।  वहां चूहा आया और दीवार पर चढ़ने का प्रयास करने लगा पर तत्काल गिर जाता था।
आश्चर्यचकित होकर गृहस्थ ने संत के पांव छू लिये तो उन्होंने कहा-‘मनुष्य और पशु पक्षियों में बुद्धि को लेकर कोई अंतर नहीं है।  वह सोने की अशर्फियां चूहे को अंदर वहां तक पहुंचने की प्रेरणा पैदा कर रही हैं। यही मनुष्य का हाल है माया की प्रेरणा से वह भी इसी तरह उछलता है।
इस कहानी का यथार्थ हमने देश में बढ़ते काले धन के प्रभाव के रूप में देखा है।  जिन लोगों के पास धन है वह भगवान का दर्जा चाहते हैं।  वह अपनी निरंकुशता में मनोरंजन चाहते हैं।  हम देखना चाहते हैं कि आखिर इन मनुष्य रूपी चूहों में कितना बल रहा जाता है।
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Wednesday, July 7, 2010

पहरेदार और कातिल-हास्य कविताएँ (paharedar aur qatil-hasya kavitaen)

खज़ाने की सलामती का जिम्मा हैं जिन पर
वही उसे लुटा रहे हैं,
लुटेरों की महफिल में भी
अपने लोगों को जुटा रहे हैं।
दलालों के ठगने से दर्द नहीं होता
यहां तो पहरेदार ही
कातिलों के लिये मजबूरों को उठा रहे हैं।
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जिंदा लोगों की जिंदगी के
जज़्बातों से खेलना व्यापार के लिये जरूरी है,
इसलिये मरने वालों पर आंसु बहाना
सौदागरों की मजबूरी है।
ज़माने का यही रिवाज है
जिंदा प्यासे इंसान को पानी कोई पिलाता नहीं
जन्नत में बैठे पुरखों के लिये
लुटाते लोग समंदर
कोई नहीं जानता जिसके बारे में
धरती से उसकी कितनी दूरी है।
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कवि लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com
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