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Sunday, April 10, 2011

श्रीगुरुवाणी-सच्चे भक्त का व्यवहार निराला होता है (bhakt ka vyavahar-shri guruwani)

‘भगता की चाल निराली।
चाला निराली भगताह केरी, विखम मारगि चलणा।
लबु लोभु अहंकारु तजि तृस्ना, बहुतु नाही बोलणा।।
हिन्दी में भावार्थ-
श्रीगुरुवाणी के अनुसार भगवान के भक्त की चाल निराली होती है। सद्गुरु के प्रति उसकी यह अनन्य भक्ति उसे ऐसे विषम मार्ग पर चलने में भी सहायता करती है जो आम इंसान के लिए असहज होते हैं। वह लोभ, अहंकार तथा कामनाओं का त्याग कर देता है। कभी अधिक नहीं बोलता।
‘जै को सिखु, गुरु सेती सनमुखु हौवे।
होवै त सनमुखु सिखु कोई, जीअहु रहै गुरु नालै।।
हिन्दी में भावार्थ-
श्रीगुरुवाणी के अनुसार जो सिख गुरु के समक्ष उपस्थित होता है और चाहता है कि उनके समक्ष कभी शर्मिंदा न होना पड़े तो तो उसके लिये यह आवश्यक है कि गुरु को हमेशा प्रणाम कर सत्कर्म करता रहे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वैसे तो सभी लोग भक्ति करते हैं पर जिनके मन में ईश्वर के प्रति अगाध निष्ठा है उनकी चाल आम इंसानों से अलग हो जाती है। वह दुःख सुख और मान अपमान में सम रहते हैं। वह अपने जीवन में अनेक ऐसे कष्टों का सहजता से समाना कर लेते हैं जो सामान्य इंसान के लिये कठिन काम होता है। इसलिये कहा जाता है कि भक्ति में शक्ति होती है। जब तक यह देह है तब तक सांसरिक संकट तो आते ही रहेंगे। उसके साथ ही सुख के पल भी आते हैं पर सामान्य मनुष्य केवल उनको ही चाहता है। मगर संसार का नियम है। सूरज डूबता है तो अंधेरा होता है और वह फिर सुबह होती है। संसार का यह निमय मनुष्य की देह पर भी लागू होता है। यह सत्य भक्त जान लेते हैं। उनको पता होता है कि अगर अच्छा वक्त नहीं रहा तो यह खराब भी नहीं रहेगा। इसलिये वह सहज हो जाते हैं। इसके विपरीत जो भक्ति और प्रार्थना से दूर रहते हैं वह अध्यात्मिक ज्ञान नहीं समझ पाते इसलिये थोड़े कष्ट या बीमारा में हाहाकार मचा देते हैं जो अंततः मानसिक रूप से तोड़ देता है। इसके विपरीत भक्त लोग हमेशा ही अपनी मस्ती में मस्त रहते हैं।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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Thursday, April 7, 2011

बुरी आदतें कष्टदायक होती हैं-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (buri aadat kashta ka karan-hindu dharmik lekh)

मनुष्य अगर योगसाधना, अध्यात्मिक अध्ययन तथा दान आदि करे तो उसके व्यक्तित्व में चार चांद लग जाते हैं पर इसके लिये आवश्यक है कि वह सहज भाव के मार्ग का अनुसरण करे। सहज भाव मार्ग दिखने में बड़ा कठिन तथा अनाकर्षक है क्योंकि इसके लिये अच्छी आदतों का होना जरूरी है जो अपने अंदर डालने में कठिनाई आती है। सहज मार्ग में त्याग के भाव की प्रधानता है जबकि मनुष्य कुछ पाकर सुख चाहता है। त्याग के भाव के विपरीत यह मनुष्य का स्वभाव है कि वह व्यसनों की तरफ आकर्षित होता है क्योंकि वह त्वरित रूप से सुख देते हैं। शराब, तंबाकु, जुआ तथा मनोरंजक दृश्य देखकर मनुष्य बहुत जल्दी सुख पा लेता है यह अलग बात है कि कालांतर में वह तकलीफदेह होने के साथ ही उकताने वाले भी होते हैं, मगर तब तक मनुष्य अपनी शारीरिक तथा मानसिक शक्ति गंवा चुका होता है और तब अध्यात्मिक मार्ग अपनाना उसके लिये कठिन होता है।
व्यसनों के विषय पर महाराज कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में कहा है कि
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यस्माद्धि व्यसति श्रेयस्तस्माद्धयसमुच्यते।
व्यसन्योऽयो व्रजति तस्मात्तपरिवर्जयेत्।।
‘‘जिसका नाम व्यसन है उससे सारे कल्याण दूर हो जाते हैं। व्यसन से पुरुष का पतन होता है इस कारण उसे त्याग दे।’’
आजकल तंबाकु के पाउचों का सेवन जिस तरह हो रहा है उसे देखकर यह कहना कठिन है कि युवाओं में कितने युवा हैं। विभिन्न विषैले रसायनों से बने यह पाउच युवावस्था में ही फेफड़ों, दिल तथा शरीर के अंगों में विकृतियां लाते हैं। यह सब चिकित्सकों का कहना है न कि कोई अनुमान! शराब तो अब सांस्कृतिक कार्यक्रमों का एक भाग हो गयी है। उससे भी बड़ी बात यह कि अब तो मंदिर आदि के निर्माण के लिये पैसा जुटाने के लिये नृत्य और गीत के कार्यक्रम आयोेजित किये जाते हैं। इस तरह पूरा समाज ही व्यसनों में जाल में फंसा है। ऐसे में यह आशा करना कि धर्म का राज्य होगा एक तरह से मूर्खता है।
ऐसे में सात्विक पुरुषों को चाहिए कि वह अपनी योगसाधना, ध्यान तथा पूजा पाठ एकांत में करके ही इस बात पर संतोष करें कि वह अपना धर्म निर्वाह कर रहे हैं। इसके लिये संगत मिलने की अपेक्षा तो कतई न करें।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Saturday, April 2, 2011

झगड़े की बजाय संधि करना भी एक तरह से आसन-हिन्दू धार्मिक लेख (sandhi karna bhee aasan-hindu dharmik lekh)

यदावगच्छेदायत्वयामाधिक्यं ध्रृवमात्मनः।
तदा त्वेचाल्पिकां पीर्डा तदा सन्धि समाश्चयेत्।।
"
भविष्य में अच्छी संभावना हो तो वर्तमान में विरोधियों और शत्रुओं से भी संधि कर लेना चाहिए। "
क्षीणस्य चैव क्रमशो दैवात् पूर्वकृतेन वा।
मित्रस्य चानुरोधेन द्विविधं स्मृतमासनम्।।
"
जब शक्ति क्षीण हो जाने पर या अपनी गलतियों के कारण चुप बैठना तथा मित्रों की बात का सम्मान करते हुए उनसे विवाद न करना यह दो प्रकार के शांत आसन हैं।"
यदावगच्छेदायत्वयामाधिक्यं ध्रृवमात्मनः।
तदा त्वेचाल्पिकां पीर्डा तदा सन्धि समाश्चयेत्।।
"
भविष्य में अच्छी संभावना हो तो वर्तमान में विरोधियों और शत्रुओं से भी संधि कर लेना चाहिए।"

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी भी मनुष्य के जीवन में दुःख, सुख, आशा और निराशा के दौर आते हैं। आवेश और आल्हाद के चरम भाव पर पहुंचने के बाद किसी भी मनुष्य का अपने पर से नियंत्रण समाप्त हो जाता है। भावावेश में आदमी कुछ नहीं सोच पाता। मनु महाराज के अनुसार मनुष्य को अपने विवेक पर सदैव नियंत्रण करना चाहिये। जब शक्ति क्षीण हो या अपने से कोई गलती हो जाये तब मन शांत होने लगता है और ऐसा करना श्रेयस्कर भी है। अनेक बार मित्रों से वाद विवाद हो जाने पर उनके गलत होने पर भी शांत बैठना एक तरह से आसन है। यह आसन विवेकपूर्ण मनुष्य स्वयं ही अपनाता है जबकि अज्ञानी आदमी मज़बूरीवश ऐसा करता है। जिनके पास ज्ञान है वह घटना से पहले ही अपने मन में शांति धारण करते हैं जिससे उनको सुख मिलता है जबकि अविवेकी मनुष्य बाध्यता वश ऐसा करते हुए दुःख पाते हैं।
जीवन में ऐसे अनेक तनावपूर्ण क्षण आते हैं जब आक्रामक होने का मन करता है पर उस समय अपनी स्थिति पर विचार करना  चाहिए। अगर ऐसा लगता है कि भविष्य में अच्छी आशा है तब बेहतर है कि शत्रु और विरोधी से संधि कर लें क्योंकि समय के साथ यहां सब बदलता है इसलिये अपने भाव में सकारात्मक भाव रखते स्थितियों में बदलाव की आशा रखना चाहिए। कहने का अभिप्राय यह है कि हमेशा ही शांत होकर अपना काम करना चाहिए। शांत रहना भी एक तरह से आसन है। यही  कारण  है  कि महान लोग सहजता के जीवन व्यतीत करने का सन्देश देते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ''भारतदीप', ग्वालियर 
writer and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Saturday, March 26, 2011

समाधि से मनुष्य अपना स्वामी बन जाता है-हिन्दू धार्मिक विचार (samadhi se swami-hindu dharmik thought)

पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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सत्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभाधिष्ठास्तृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च।
हिन्दी में भावार्थ-
बुद्धि और पुरुष (आत्मा) के अंतर का आभास जिसे समझ में आ जाता है ऐसा समाधिस्थ योगी सभी प्रकार के भावों पर स्वामित्व प्राप्त कर लेता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हम क्या हैं? बुद्धि कहती हैं कि मै हूं और मन इस अहंकार के बोध में बेलगाम विचरण करता है। दैहिक क्रियाओं में कर्तापन की अनुभूति आदमी को ज्ञान से परे कर देती है। आदमी यानि अध्यात्म! पुरुष हो या स्त्री वास्तव में परमात्मा का अंश आत्मा है! वह इस देह को धारण किये है इसलिये उसे अध्यात्म भी कहा जाता है। वह कर्ता नहीं दृष्टा है मगर योग साधना से विरत मनुष्य की बुद्धि इस ज्ञान को ग्रहण नहीं करने देती और मन इधर से उधर उसे दौड़ाता है।
हम आत्मा है! न वह खाता है न वह पीता है न वह सोचता है न बोलता है। यह सारे कार्य तो उस देह के अंग स्वतः कर रहे हैं जिसको आत्मा यानि हमने धारण किया है। देह की आवश्यकतायें असीमित पर अध्यात्म की भूख सीमित है। वह केवल ज्ञान के साथ जीना चाहता है। वह दृष्टा तभी बन सकता है जब हम योग के द्वारा अपनी इंद्रियों के गुणों से उसे सुसज्जित करें। इसके लिये जरूरी है कि ध्यान करते हुए समाधि के माध्यम से उन पर नियंत्रित कर उनका स्वामी बनने का प्रयास किया जाये। नाक है तो सुगंध ग्रहण करेगी, आंख है तो देखेगी और कान है तो सुनेंगे। बुद्धि का काम है विचार करना और मन का काम है इधर उधर विचरण करना। ऐसे में हम अध्यात्मिक ज्ञान को तभी प्राप्त कर सकते हैं कि जब संकल्प धारण करें। सदैव बहिर्मुखी रहने की बजाय अंतर्मुखी होने का प्रयास भी करें। जब हम अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर अपने अध्यात्म से संपर्क कर लेंगे तो वह दृष्टा भाव को प्राप्त होगा तब निराशा, प्रसन्न्ता, शोक तथा हर्ष के भाव पर स्वामित्व प्राप्त हो जायेगा। जिस तरह स्वामी अपने अनुचरों के कर्म से विचलित नहीं होता और मानता है कि यह काम तो उनको करना ही है उसी तरह हम भी यह देखने लगेंगे कि शरीर के अंग हमारे सेवक है और उनको काम करना है तब ऐसा आनंद प्राप्त होगा जो विरलों को ही प्राप्त होता है। कहने का अभिप्राय यह है कि समाधि से मनुष्य अपनी आत्मा को पहचान कर सच्चा स्वामी बन जाता है ।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, March 20, 2011

‘बढ़िया’ बोलकर जिंदगी के मजे लेते रहो-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन

खुश रहना भी एक कला है जो हमारे अंतर्मन में विराजमान रहती है। हम अक्सर आपनी आखों से दूसरों के दोष देखने, कानों से दूसरे का अहित सुनने और वाणी से दूसरे के लिए निंदात्मक वाक्य कहने के आदी हो जाते हैं। यह आदत भले ही हमें अच्छी लगती है पर कालांतर में यह हमारे लिये मानसिक तनाव का ऐसा कारण बनर जाती है कि हमें कोई अच्छी चीज दिखाई नहीं देती। यहां तक सुखद वस्तुओं से स्वतः घृणा होने लगती है। हमारा स्वभाव नकारात्मक हो जाता है और इससे हम स्वयं ही नकारा हो जाते हैं। इससे हमारे अन्दर  तमाम तरह की कुंठाएं पैदा होती हैं।
आपने देखा होगा कि कुछ लोग हमेशा ही दूसरों से विनम्रता से पेश आते हैं और हमेशा ही अन्य लोगों को ‘बहुत अच्छा’ या ‘बहुत बढ़िया’ उनको प्रेरित करते हैं। भले ही लोग उनको चाटुकार या झूठा कहें पर सच यह है कि ऐसे लोग सकारात्मक विचाराधारा के होते हैं और अपनी जिंदगी आनंद से जीते हैं।
इस विषय पर मनु महाराज कहते हैं कि
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भद्र भद्रमिति ब्रूयाद् भ्रदमित्येव वा वदेत्।
शुष्कवैरं विवादं च न कुर्यात्केनचित्साह।।
‘‘सभ्य आदमी को हमेशा दूसरे के काम पर ‘बहुत बढ़िया‘ ‘बढ़िया’ ‘बहुत अच्छा’ या अच्छा जरूर बोलना चाहिये। किसी से व्यर्थ विवाद और शत्रुता नहीं करना चाहिये। न ही रूखा व्यवहार कर दूसरे को हतोत्तासहित करना चाहिये।’’
इस संसार में सभी लोग लोकप्रिय नहीं होते। कुछ तो अपने दुष्कृत्यों  की वजह से निंदा का पात्र बनते हैं। अपने स्वार्थ में मस्त रहने वाले लोगों को कौन सम्मान देता है? समाज में वही मनुष्य लोकप्रिय होता है जो दूसरों को भी अच्छे काम के लिये प्रेरित करता है। इसलिये हमेशा ही हर पल दूसरे के काम पर उसकी प्रशंसा में बहुत अच्छा या अच्छा जरूर बोलना चाहिये। कहीं लिखकर किसी के कार्य की प्रशंसा करनी हो तो उसके लिये बहुत बढ़िया या बढ़िया शब्दों के उपयोग  की आदत डालना चाहिये। इससे न हमारा स्वभाव सकारात्मक होगा बल्कि दूसरों के बीच लोकप्रियता भी मिलेगी।
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Thursday, March 17, 2011

योगासन और प्राणायाम से विचार शुद्ध होते हैं-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (yogasan aur pranayam aur vichar-hindu religion thought)

पतंजलि योग सूत्र एक प्रमाणिक कला और विज्ञान है। आज जब हम अपने देश में अस्वस्थ और मनोरोगों के शिकार लोगों की संख्या को देखते हैं तो इसको अपनाने की आवश्यकता अधिक अनुभव होती है। पतंजलि योग एक बृहद साहित्य है और इसमें केवल आसनों से शरीर को स्वस्थ ही नहीं रखा जा सकता बल्कि प्राणायाम तथा वैचारिक योग से मन को भी प्रसन्न रखा जा सकता है। यह अंतिम सत्य है कि दवाईयां मनुष्य की बीमारियां दूर सकती हैं पर योग तो कभी बीमार ही नहीं पड़ने देता।
पतंजलि योग शास्त्र में कहा गया है कि
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प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य।
"प्राणवायु को बाहर निकालने और अंदर रोकने के निरंतर अभ्यास चित्त निर्मल होता है।"

विषयवती वा प्रवृत्तिरुपन्न मनसः स्थितिनिबन्धनी।।
"विषयवाली प्रवृत्ति उत्पन्न होने पर भी मन पर नियंत्रण रहता है।"
विशोका वा ज्योतिवस्ती।
"इसके अलावा शोकरहित प्रवृत्ति से मन नियंत्रण में रहता है।"
वीतरागविषयं वा चित्तम्।
"वीतराग विषय आने पर भी मन नियंत्रण में रहता है"
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भारतीय योग दर्शन में प्राणायाम का बहुत महत्व है। योगासनों से जहां देह के विकार निकलते हैं वहीं प्राणायाम से मन तथा विचारों में शुद्धता आती है। जैसा कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते आ रहे हैं कि इस विश्व में मनोरोगियों का इतना अधिक प्रतिशत है कि उसका सही आंकलन करना संभव नहीं है। अनेक लोगों को तो यह भी पता नहीं कि वह मनोविकारों का शिकार है। इसका कारण यह है कि आधुनिक विकास में भौतिक सुविधाओं की अधिकता उपलब्धि और उपयेाग के कारण सामान्य मनुष्य का शरीर विकारों का शिकार हो रहा है वहीं मनोरंजन के नाम पर उसके सामने जो दृश्य प्रस्तुत किये जा रहे है वह मनोविकार पैदा करने वाले हैं।
ऐसी अनेक घटनायें आती हैं जिसमें किसी फिल्म या टीवी चैनल को देखकर उनके पात्रों जैसा अभिनय कुछ लोग अपनी जिंदगी में करना चाहते हैं। कई लोग तो अपनी जान गंवा देते हैं। यह तो वह उदाहरण सामने आते हैं पर इसके अलावा जिनकी मनस्थिति खराब होती है और उसका दुष्प्रभाव मनुष्य के सामान्य व्यवहार पर पड़ता है उसकी अनुभूति सहजता से नहीं हो जाता।
प्राणायाम से मन और विचारों में जो दृढ़ता आती है उसकी कल्पना ही की जा सकती है मगर जो लोग प्राणायाम करते और कराते हैं वह जानते हैं कि आज के समय में प्राणायाम ऐसा ब्रह्मास्त्र है जिससे समाजको बहुत लाभ हो सकता है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Friday, March 4, 2011

चित्त में शून्यता का आभास होना समाधि की स्थिति-हिन्दी लेख (chitta mein zero ka abhasas hai samadhi-hindi lekh)

पतंजलि योग साहित्य के अनुसार 
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तदेवार्थमात्रनिर्भसं स्वरूपशून्यमिव समाधिः।।
"
जब केवल अपना ही लक्ष्य दिखता है और चित्त में जब शून्य जैसा अनुभव होता वही समाधि हो जाता है।"
त्रयमेकत्र संयम्।।
"
किसी एक विषय पर ध्यान केंद्रित हो जाने तीनों का होना संयम् है"
तज्जयात्प्रज्ञालोकः।।
"
उस विषय में जीत होने से बुद्धि का प्रकाश होता है।"
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ध्यान मनुष्य के लिये एक श्रेष्ठ स्थिति है। चंचल मन तो मनुष्य को हर भल चलाता है इसलिये किसी लक्ष्य में संलिप्त होते ही उसका ध्यान उससे इतर विषयों पर चला जाता है। अनेक लोग एक लक्ष्य के साथ अनेक लक्ष्य निर्धारित करते हैं। इससे मस्तिष्क असंयमित हो जाता है और मनुष्य न इधर का रहता है न उधर का।
जब कोई मनुष्य एकाग्र होकर किसी एक विषय में रम जाता है तब वह ध्यान का वह चरम प्राप्त कर लेता है जिसकी कल्पना केवल सहज योगी ही कर पाते हैं। मूलत यह स्थिति मस्तिष्क से खेले जाने वाले खेलों शतरंज, ताश और शतरंज में देखी जा सकती है जब खेलने वाले किसी अन्य काम का स्मरण तक नहीं कर पाते। हालांकि शारीरिक खेलों-बैटमिंटन, क्रिकेट, हॉकी तथा फुटबाल में इसकी अनुभूति देखी जा सकती है पर अन्य अंग चलायमान रहने से केवल खेलने वाले को ही इसका आभास हो सकता देखने वाले को नहीं। हम अक्सर खेलों के परिणामों का विश्लेषण करते हैं पर इस बात पर दृष्टिपात नहीं कर पाते कि जिसका अपने खेल में ध्यान अच्छा है वही जीतता है। हम केवल खिलाड़ी के हाथों के पराक्रम, पांवों की चंचलता तथा शारीरिक शक्ति पर विचार करते हैं पर जिस ध्यान की वजह से खिलाड़ी जीतते हैं उसे नहीं देख पाते। यहां तक कि अभ्यास से अपने खेल में पारंगत खिलाड़ी भी इस बात की अनुभूति नहंी कर पाते कि उनका ध्यान ही उनकी शक्ति होता है जिससे उनको विजय मिलती है। जो पतंजलि येाग शास्त्र का अध्ययन करते हैं उनको ही इस बात की अनुभूति होती है कि यह सब ध्यान का परिणाम है। यही कारण है कि जिन लोगों का स्वाभाविक रूप से ध्यान नहीं लगता उनको इसका अभ्यास करने के लिये कहा जाता है।
इसका अभ्यास करने पर बुद्धि तीक्ष्ण होती है और अपने विषय में उपलब्धि होने पर मनुष्य के अंदर एक ऐसा प्रकाश फैलता है जिसके सुख की अनुभूति केवल वही कर सकता है।
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