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Sunday, October 23, 2016

कश्मीर पर चुभती बात अब मासूम चेहरे वाले विद्वान कहेंगे-हिन्दी संपादकीय (Now Lul Face would Saying criticle Word In Kashmir-Hindi Editorial

                                       कुछ लोगों को हम वाकई सरल प्रकृति का समझते हैं पर जब चालाकी से अपनी बात दूसरे को दुखाने के लिये कहते हैं तब उनकी पोल खुल ही जाती है। हम टीवी पर बहसों में आने वाले एक निष्पक्ष लेखक को बड़ा सीदा और सज्जन समझते थे। आज उनका कश्मीर के संबंध में एक पाठ देखा तो हैरानी हुई।  उसमें उन्होंने लिखा कि कश्मीर की धरती पर हमारे पास हैं पर लोग हमारे साथ नहीं हैं। पहली बात तो हम यह बतायें कि हम बचपन से देखते आ रहे हैं कि कश्मीर में सब कुछ सामान्य रहा तब वहां कोई आंदोलन वगैरह या प्रथकतावाद का कोई सवाल नहीं आया।  1971 के बाद पाकिस्तान ने अमेरिका और ब्रिटेन की शहर पर वहां आतंकवाद शुरु किया तब से यह मामला चला। 
                कुछ चुभने वाली ऐसी बातें मासूम दिखने वाले लोग कहते हैं तो लगता है कि उन्हें खरीदकर लिखवाया गया है। हमारे देश के कुछ अखबार भी बिना सोचे समझे छाप देते हैं-या सरकार को बदनाम करने की उनकी ऐसी योजना रहती है यह पता नहीं। हमारा तो एक ही सवाल है कि ‘अगर लोग साथ नहीं है तो लोकसभा और विधानसभा चुनावों में 67 प्रतिशत मतदान भूतप्रेत करने आते हैं।
                 जनाब! सामान्य लोगों की अगर सरकार नहीं सुनती तो अपराधी भी नहीं सुनते।  अपराधी का लट्ठ चलता है तो लोग उससे डरे सहमे रहते हैं पर एक बार वह पुलिस के हत्थे चढ़ जाये उससे किनारा कर लेती है।  कश्मीर में अभी तक अलगावादियों का लट्ठ चल रहा है इसलिये लोग खामोश हैं। जिस दिन सरकार उन्हें लपेट लेगी उस दिन जनता उसके साथ हो जायेगी। सरकार जीती तो जनता उसके साथ हो जायेगी। 
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        हमने सुना था कि पाकिस्तान भारतीय बुद्धिजीवियों को खरीदने के लिये पैसा खर्च कर रहा है। हमें लग रहा है कि संभवतः अब वह ऐसे बुद्धिजीवियों को भी सामने लायेगा जो मासूम चेहरे वाले होंगे और उसकी बात इस तरह कहें जैसे कि वह निष्पक्ष विश्लेक्षक की हो। 
           भारतीय प्रचार माध्यम इस समय जनमानस को उत्तर प्रदेश के ‘परिवार विवाद’ और क्रिकेट में व्यस्त रखे हुए हैं। इस बीच खबर है कि अमेरिका ने पाकिस्तान को चेतावनी दी है कि अगर उसने आतंकवाद पर नियंत्रण नहीं किया तो वह उसके अंदर घुसकर मारेगा।  यह गंभीर चेतावनी है। इधर पाकिस्तान अपनी झैंप मिटाने के लिये सीमा पर गोलीबारी कर रहा है। उसके पालतू  एक तरह से कश्मीर में अंतिम युद्ध लड़ रहे हैं। ऐसा लगता है कि आगामी कुछ माह में पाकिस्तान का निपटारा इस तरह होगा कि कोई उसकी अभी कल्पना भी नहीं कर रहा है।

Thursday, October 20, 2016

राष्ट्रप्रमुख मित्र हैं, जनता एक दूसरे को जानती नहीं फिर लड़ाई क्यों होती है-हिन्दी संपादकीय (National Chief0 are Good Freind, Public Not Nowledgeble, than Why does Fight Between Two Coutry-Hindi Editorial)

                                         भारत पाकिस्तान और चीन तीनों के बीच साठ बरस से द्वंद्व चलता रहा है। बचपन से लेकर इन तीनों के बीच विवादों की चर्चा सुनते आ रहे हैं। एक प्रश्न हमारे दिमाग में आता है कि प्रारंभ से तीनों देशों के राजप्रमुख आपस में बड़े आराम से मिलते रहे हैं।  तीनों देशों के जनमानस का आपस में कोई सीधा संबंध रहता नहीं है। तब सवाल आता है कि देशभक्ति के नाम पर इन तीनों देशों की जनता एक दूसरे के प्रति संशंकित क्यों रहती है? राजप्रमुखों के आपस में मधुर संबंध और जनता एक दूसरे को जानती नहीं। फिर वह मध्य में कौन लोग हैं जो इस तरह की दुश्मनी निभाते हैं।
                     हम अगर अब भी देखें तो भारतीय प्रधानमंत्री तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की नातिन की शादी में पहुंच गये। चीन के राष्ट्रपति जब भारतीय प्रधानमंत्री के साथ फोटो में ऐसे खड़े होते हैं जैसे शैक्षणिक काल के मित्र हों। चीन से नाराजगी के बाद भारत में उसकी सामग्री की मांग मेें 20 से 60 प्रतिशत गिरावट की बात कही गयी है-हम आधा ग्लास खाली की बजाय आधा भरा कहने के सिद्धांत पर चलें तो यह तय है कि फिर भी उसकी सामग्री बिक रही है। मांग में गिरावट का कारण नाराजगी या क्रय क्षमता में कमी है-इस पर अलग से बहस करने की आवश्यकता है। 
                   हमने अपने एक पाठ में हिन्दी चार ‘प’-पंूजीपति, प्रचार स्वामी, प्रबंधन तथा पकड़बाजों ( अंग्रेजी में चार ‘एम’-मनीमेकर, मीडिया, मैनेजमेंट तथा माफिया)- के संयुक्त उद्यम के सक्रिय होने की बात कही थी। यही समूह समाज के आम जनमानस पर नियंत्रण करने की योजना बनाकर उन पर अमल करता है। प्रबंधन और जनमानस के बची बाकी तीनों अपना काम करते हैं। पूंजीपति, प्रचार स्वामी  तथा पकड़बाजों के आपसी संपर्कों का सहजता से पता लगाना संभव नहीं पर प्रत्यक्ष यह लगता है कि सभी आपस में जुड़े हुए हैं-प्रचार समूह अपने लाभ के अनुसार ही समाचार और बहसें चलाते प्रतीत होते हैं।  जब प्रचार माध्यमों में देशभक्ति पर बहस होती है तो ऐसा लगता है कि यह विषय भी विक्रय योग्य हो गया है।  दो महीने पहले चीन और पाकिस्तान के प्रति कोई ऐसी घृणा नहीं थी पर प्रचार माध्यमों से ऐसा जादू चलाया कि सभी लोग देशभक्ति का राग सुनकर हैरान हैं। पाकिस्तानी कलाकारों को यहां लाया कौन? वही लोग जो अब देशभक्ति के नाम पर उनको भगा रहे हैं।
सामान्य जनमानस हमेशा ही प्रचार माध्यमों के प्रभाव में बना रहता है पर हम जैसे चिंत्तक कभी कभी इस बात पर विचार करते हैं कि जिस तरह आज भौतिकतावादी युग में अर्थ की प्रधानता है उसमें देश की कला, राजनीति, अर्थ, साहित्य, पत्रकारिता के क्षेत्र में सौ फीसदी शुचिता तो छोड़िये पचास की राह पर चले यह संभव नहीं है।  जब से हमने क्रिकेट में फिक्सिंग का भूत देखा है हमारी स्थिति यह है कि सभी जगह वही दिखाई देता है। हमारे पास सूचना के ज्यादा साधन नहीं है पर अतर्जाल पर इतने मित्र हैं कि उनके पाठों से कई ऐसी बातें मिलती हैं जिनको पढ़कर यही कहते हैं कि ‘यहां सब चलता है’ तथा ‘बिकने की कला आ जाये तो अपना चेहरा दिखाने के लिये कई आकर्षक स्थान मिल जाते हैं। बस, अपना चेहरा आईने और चरित्र ज्ञान से दूर रखना चाहिये।
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Sunday, November 22, 2015

वैचारिक बहस से आतंकवाद पर नियंत्रण संभव नहीं संकट-हिन्दी लेख (World Terratish Not Control by Theorical Disscisopm-Hindi Article or Hindi lekh)

                           कथित रूप से अगर किसी धर्म का नाम लेकर उसके सिद्धांतों पर राज्यप्रबंध चलाने की बात कही जायेगी तो तय है कि उसके विद्रोही भी अपना संगठन चलाने की बात कहा सकते हैं। तब निष्पक्ष व्यक्ति यह तर्क स्वीकार कैसे कर सकता है कि  राज्यप्रबंध का धर्म से संबंध है पर आतंकवाद का नहीं।
                           आतंकवाद विश्व में एक व्यवसाय की तरह चल रहा है। आतंकी संगठन भी धर्म का उपयोग उसी तरह कर रहे हैं जैसे कि सफेदपोश व्यवसायी करते हैं। इस विषय पर धर्म के नाम पर बहस करने वालों में वैचारिक खोखलापन साफ दिखता है। दरअसल धर्म को लोगों ने पूजा पद्धति, खानपान, रहनसहन और चाल चलने के नियमों का समूह मान लिया है। विदेशी विचाराधाराओं पर यह नियम लागू हो पर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन पर लागू नहीं होता। इसके अनुसार सांसरिक तथा अध्यात्मिक विषय प्रथक प्रथक हैं। हमें ऐसा लगता है कि भारत के बाहर पनपी  विचाराधाराओं में अध्यात्मिक ज्ञान का नितांत अभाव है शायद यही कारण है कि उसके कुछ अनुयायियों में अपने ही मत को लेकर भ्रम की स्थिति है जिससे आतंकवाद का वैश्विक संकट खड़ा हुआ है।
इस  समय विश्व में चल रहे आतंकवाद के इतिहास पर नज़र डालें तो यह साफ दिखेगा कि यह पैंतीस से अधिक वर्ष से चल रहा है। यह अलग बात है कि समय के साथ आतंक के शीर्ष और उनके संगठनों के नाम बदलते रहे हैं।  हथियारों के नये रूप तथा प्रचार माध्यमों की नयी तकनीकी के साथ आतंकवादी संगठनों का कार्यशैली बदल जाती है। हमने पिछले दस वर्षों से स्वयं देखा है कि पहले वेबसाईटें, ब्लॉग तथा अन्य साधनों के साथ पहले आतंकवादी बनाते हैं तो अब फेसबुक और ट्विटर भी का भी उन्होंने पहले अपने ढंग से पूरा उपयोग किया। जहां तक आतंकवाद का युद्ध से सामना करने का सवाल है वह एक अलग विषय है पर समस्या यह है कि कुछ लोग इस पर वैचारिक बहस कर अपनी धार्मिक चर्चायों करने लगते हैं और इससे समाज में भ्रम फैलता है। यही कारण है कि कम से कम इस संकट का हल वैचारिक प्रहार से होता नहीं दिखता। जब तक भारतीय दर्शन के आधार पर अध्यात्मिक तथा सांसरिक विषयों को प्रथक नहीं देखा जायेगा तब तक आतंकवाद का कम से कम वैचारिक रूप से मुकाबला करना बेमानी है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Saturday, October 10, 2015

रूस का आईएसआईएस के विरुद्ध अभियान का मतलब-हिन्दी लेख (meaning of russian Action against ISIS-Hindi Article) ---------------------------


                                   अब यह सवाल तो उठेगा कि अमेरिका बरसों से आतंकवाद से लड़ रहा है पर फिर भी समस्या बढ़ क्यों रही है?  तय बात है कि अच्छे और बुरे आतंकवाद का वह फर्क करता है।  रूस ने अरब के आतंकवादियों पर हमला कर उनकी कमर तोड़ने का अभियान शुरु किया है उसकी कार्यवाही का  अमेरिका इस आधार पर विरोध कर रहा है कि इससे सीरिया की वर्तमान सरकार के विरोधियों का नाश होगा जो उससे हथियार और दूसरी मदद पाते हैं। प्रश्न यह है कि अगर सीरिया की जनता वहां के लोगों से नाराज है तो वह स्वयं निपट लेगी। विद्रोहियों को हथियार बेचकर अमेरिका वहां बदलाव क्यों लाना चाहता है? पिछले अनेक दिनों से वहां आईएसआईएस ने आतंक फैला रखा है जिसकी लपटें पूरे विश्व में फैल रही हैं। अमेरिका और उसके सहयोगी राष्ट्रों के हमले के बाद भी आईएसआईएस का वैश्विक प्रचार बना हुआ रहा है।
                                   अब रूस की कार्यवाही के बाद लग रहा है कि वहां वाकई में आईएसआईएस की तबाही हो रही है। हालांकि रूस का इस कार्यवाही के पीछे लक्ष्य भी अमेरिका जैसा ही हथियारों का प्रदर्शन कर उनके लिये बाज़ार बनाना तथा तेल भंडारों पर स्वामित्व स्थापित करना है पर हम भारत की दृष्टि से यूं बेहतर मानते हैं कि आईएसआईएस के पतन की संभावनाओं ने यहां एक सकारात्मक वातावरण बना है। अगर रूस के हमले से भले ही अरब देशों में आतंक का पूरी तरह नाश न हो पर आईएसआईएस को मिल रहे मुफ्त प्रचार पर रोक अवश्य लगेगी। इससे विश्व खास तौर से पश्चिमी देशों में जो उसका आकर्षण फैल रहा था वह समाप्त हो जायेगा।  इतना ही नहीं हमने देखा है कि जब पश्चिम और मध्य ऐशिया में कोई धार्मिक उन्मादी संगठन आक्रामक रूप से प्रचारित  होता है तो उसके सहविचारक अन्य देशों में भी आक्रामक हो जाते हैं। पहले अलकायदा के दौर में और अब आईएसआईएस के मामले में यही होता रहा है।  आईएसआईएस का पतन उनकी इस आक्रामकता को समाप्त कर देगा।  बहरहाल हमारी दृष्टि से रूस ने एक साहसिक कदम उठाया है और उसकी पूर्ण या आशिंक सफलता आतंकवाद के एक दौर को खत्म करेगी। यह फिलहाल तय लग रहा है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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