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Saturday, November 29, 2014

कांच का महत्व न समझे उसे हीरा दिखाना व्यर्थ-हिन्दी चिंत्तन लेख(kanch ka mahatva n samjhje use heera dikhana vyarth-hindi chinntan article)



            यह आश्चर्य की बात है कि संसार के जितने भी कथित धर्म हैं उनसे जुड़े प्राचीन ग्रंथों के प्रचारक लोगों के बीच ज्ञान इस तरह बेचते हैं जैसे कि धर्म का ज्ञान कोई बाज़ार में बेचने का विषय या वस्तु हो।  हम अगर भारतीय अध्यात्म दर्शन की बात करें तो उसमें ज्ञानी से आशय केवल अच्छे शब्द समूह या वाक्यों से संबद्ध व्यक्ति होना नहीं है।  ज्ञानी वह माना जाता है जिसकी क्रियाओं से यह पता चलता है कि वह ज्ञान पर आधारित हैं।  व्यवहार, विचार, वक्तव्य तथा विचार से यह अपने आप पता चल जाता है कि कोई व्यक्ति ज्ञानी है या नहीं।  इतना ही नहीं ज्ञान भी उस व्यक्ति को दिया जाता है जिसमें गेय करने का सामर्थ्य हो। इसके साथ ही जो इच्छुक हो उसे ज्ञान दिया जाता है।
            भारतीय अध्यात्मिक परंपरा में गुरुकुल और सत्संग परंपरा ज्ञानार्जन का साधन मानी जाती है जिसमें साधक स्वयं उपस्थित होता है।  अब पाश्चात्य पंरपरा अपनाने के चलते हमारे देश में भी अनेक ज्ञान के व्यवसायी सार्वजनिक सभायें करनें लगे हैं।  अपने प्रवचनों में मनोंरजन की भाषा बोलते हैं।  भारत में विदेश से आयातित विचाराधारायें समस्त मनुष्यों को देवता बनाने का ऐसा सपना लेकर आती हैं जो असंभव है। इसमें ज्ञान का विषय व्यक्ति की गेय करने की क्षमता तथा उसकी इच्छा का आंकलन कतई नहीं किया जाता।  इतना ही नहीं अनेक विचाराधाराओं के प्रवर्तक तो व्यक्ति को अपना समूह त्याग कर नये समूह में आने की प्रेरणा यह कहकर देते हैं कि उन्हें सर्वशक्तिमान का सदियों से आकाश या परलोक में  स्थापित   श्रेष्ठ स्थान मिल जायेगा।
संत कबीर दास ने कहा है कि
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जो जैसा उनमान का, तैसा तासों बोल।
पोता को गाहक नहीं, हीरा गांठि न खोल।।
            हिन्दी में भावार्थ-अपने संपर्क में आने वाले मनुष्य की प्रवृत्ति देखकर व्यवहार करना  चाहिये। जिसे कांच की पहचान न हो उसके सामने अपने हीरे का प्रदर्शन करना व्यर्थ है।
एक ही बार परिखए, न वा बारम्बार।
बालू तौहु किरकिरी, जो छानै सौ बार।।
            हिन्दी में भावार्थ-किसी व्यक्ति या विषय की परख एक बार ही करना ठीक है। बार बार किसी को अवसर देना ठीक नहीं है।  रेत को सौ बार छाने पर वह हमेशा किरकिरी ही रहेगी।
            हम देख रहे हैं कि पश्चिम से कोई भी भाषा, संस्कृति, संस्कार तथा सामाजिक विचाराधारा ऐसी नहीं आयी जो दोषमुक्त हो।  यह अलग बात है कि आधुनिक दिखने की चाहत में हमारा सभ्रांत वर्ग उसके पीछे भाग रहा है।  हम देख रहे हैं कि हमारा समाज इसी कारण विरोधाभासी संस्कृति के जाल में फंस गया है। यही कारण है कि हमारे यहां जितना ज्ञान का प्रचार हो रहा है उतना समाज निर्माण होता दिख नहीं रहा।  जिस तरह का धर्ममय वातावरण सतह पर दिख रहा है उस दृष्टि से तो भ्रष्टाचार, अनाचार और व्याभिचार के घटनायें होना ही नहीं चाहिये पर वह तो बढ़ती जा रही हैं।  तय बात है कि हमारे पेशेवर धार्मिक ठेकेदार ऐसे लोगों के सामने ज्ञानं बांच रहे हैं जिनके लिये शब्द केवल क्षणिक मनोंरजन के लिये होते हैं न कि जीवन सुधारने के लिये उपयोग किया जाता है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Sunday, November 23, 2014

इतिहास बदलता है, अध्यात्मिक ज्ञान के सिद्धांत नहीं-संतों के हिसंक होने पर चिंत्तन लेख(ithas badalta hai,adhnatmik darshan nahin-hindi thoght article)



            विषयों में निर्लिप्त भाव अपनाने से आशय क्या है? हमने आज तक अनेक कथित विद्वानों को सुना पर लगता नहीं है कि वह इसे समझे जो दूसरे को समझा पायें। हमने श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन कर यह समझा है कि किसी व्यक्ति, विषय वस्तु के संपर्क में आना बुरा नहीं है वरन् निरंतर उसका स्मरण करना ही लिप्तता है। श्रीमद्भागवत गीता में गृहस्थ धर्म का पालन करने हुए भी योग प्राप्ति संभव बताई गयी है।  ऐसे में यह संभव नहीं है कि विषयों से संपर्क न रखना ही निर्लिप्त भाव माना जाये। हमारे अनुसार तो लिप्तता का आश लिपटने से है। अपने दैहिक आवश्कता की पूर्ति के बाद संबंधित विषय से विमुख होना ही निर्लिप्पता है।  मुख्य बात यह है कि हम अपनी इंद्रियों का सांसरिक विषयों से संपर्क तो  रोक नहीं सकते  पर हम अपने मस्तिष्क में निरंतर भौतिक संसार के चिंत्तन से परे रहकर निर्लिप्त रह सकते हैं।
            हमने पशु पक्षियों का जीवन देखा होगा।  पेट भरने के बाद बचे भोजन का पशु पक्षी  त्याग कर देते हैं, पर मनुष्य उसे बचाकर रख देता है-यह लिप्तता का भाव है। सिंह एक बार किसी मृग कर शिकार कर लेता है तो उसके पास चाहे कितने भी अन्य मृग विचरण करें वह उनसे मुंह फेर लेता है।  गाय को एक बार रोटी दे दी जाये तो वह उस दरवाजे का त्याग कर चली जाती है।  चिड़िया जमीन पर रखे दानों का सेवन करती है पर पेट भर जाने पर वह उसे छोड़ जाती है।  कोई भी पशु पक्षी संग्रह नहीं करता यही उसका निर्लिप्त भाव है। अनेक पशु पक्षी अपने बच्चे के युवा होने पर उसका त्याग कर देते हैं। कभी कभी तो यह लगता है कि वह बच्चे उनकी स्मृति से ही बाहर हो गये हैं।  मनुष्य ही नहीं वरन् सृष्टि के समस्त जीवों में अपनी संतान के प्रति लगाव देखा जाता है मगर अन्य जीव अधिक समय तक न संतान साथ रखते हैं न वह रहती है।  पशु पक्षियों का यही उन्मुक्त भाव निर्लिप्त भाव है।
            सांसरिक विषयों से देह के भरण पोषण से अधिक संपर्क रखना तो ठीक पर उनका निंरतर चिंत्तन करने से उपभोग के प्रति अनेक प्रकार  की अनेक नयी  कामनायें मन में पैदा होती हैं। इनमें से कई पूर्ण होती है तो कई में नाकामी हाथ आती है।  नाकामी से क्रोध और क्रोध से मूढ़ भाव पैदा होता है। मूढ़ भाव से ज्ञान शक्ति का हृास होता है और उसके बाद मनुष्य अपनी स्थिति से गिर जाता है।
            हम अक्सर यह कहते हैं कि ज्ञानी कभी पतन को प्राप्त नहीं होता पर सच यह है कि भौतिकता या माया का जाल इतना विकट है कि बड़े से बड़ा ज्ञानी भी उसमें फंस सकता है। ज्ञान किसके पास कितना है यह प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह देखना चाहिये कि उसमें धारणा शक्ति कितनी है।  जब मनुष्य सांसरिक विषयों में अत्यंत रुचि के साथ जुड़ता है तब उसके पास तत्व ज्ञान कितना भी हो धारणा शक्ति के हृास के साथ वह पतन की तरफ जाता ही है।
            अभी हाल ही में एक कथित संत ऐसे ही मायावी जाल में फंस गया।  हमने उसके प्रवचन सुने। सच बात तो यह कि उसमें ज्ञान की कोई कमी नहीं थी।  उसने अनेक प्रकार के उपाय कर बड़ा आश्रम बनाया। उस आश्रम में उसने अपने भक्तों के रहने, खाने और सत्संग के लिये बढ़िया सुविधा बनायी। ज्ञान में कमी नहीं थी पर अपनी या दूसरे की देह का चिंत्तन अंततः एक सांसरिक विषय है।  आश्रम के लिये तमाम चिंत्तायें उन संत के मन में रही होंगी। इतना ही नहीं जब भक्तों के सुविधा के लिये चिंता करेंगे तो अपने लिये भी क्या कम रखते होंगे? न्यायालय के एक प्रकरण में निंरतर उपस्थित नहीं रहे तो उनके विरुद्ध अवमानना का नया विषय उपस्थित हो गया। इधर सांसरिक विषयों में भारी उपलब्धि का अहंकार उनके मन में आने से न्यायालय की शक्ति का ज्ञान लुप्त हो गया होगा।  परिणाम यह हुआ कि न्यायालयीन आदेश पर पुलिस ने आश्रम घेरा।  उनके कथित शिष्यों ने प्रहरियों पर हमला कर दिया।  आपाधापी में छह अन्य लोग भी मर गये। अब उन कथित संत को  पुराने प्रकरण से अधिक तो नये प्रकरण भारी पड़ने वाले हैं। हमारे प्रचार माध्यम संतों के ज्ञान और कार्यों पर प्रश्न उठा रहे हैं।  यह कैसे हुआ? संत ने ही इसका जवाब भी दिया किमेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी थी?’’
            वास्तव में यह एक ऐसे ज्ञानी की स्वीक्रोक्ति है जिससे लोभ और लालच ने अपराध के मार्ग पर पहुुंचा दिया।  हमारा तो पहले से ही निष्कर्ष था कि उनके पास ज्ञान हमेशा ही रहा है पर लगता है कि सांसरिक विषयों ने उनकी धारण शक्ति को क्षीण कर दिया। इसी घटना के परिप्रेक्ष्य में हमारा यह भी निष्कर्ष है कि प्रथ्वी के भूगोल और जीव की प्रकृत्ति में कोई बदलाव नहीं होता। इतिहास बदल जाता है हम उससे भ्रमित हो जाते है।  रामायण में श्रीसीता ने श्रीराम जी को एक कथा सुनाई थी जो इससे मिलती जुलती है। सतयुग में  एक महान तपस्वी थे।  उनके तप से इंद्र व्यथित हो उठे। उनको लगा कि यह तो उनका सिंहासन ही हर लेगा।  एक दिन वह एक योगी का रूप धर कर उस तपस्वी के पास आये और उन्हें अपना फरसा हाथ में देकर बोले-हम तपस्या करने जा रहे हैं जब तक लौटकर आयें आप इसकी रक्षा करें।’’
            परोपकार में तत्पर रहने वाला वह तपस्वी प्रसन्न हो गया और इंद्र चले गये। अब तपस्वी का मन तो उस फरसे में ही रहने लगा।  स्थिति यह कि ध्यान में भी वह फरसा बसने लगा।  एक दिन जिज्ञासावश उन्होंने अपने हाथ में उठाकर देखा तो उन्हें लगा कि अपनी रक्षा के लिये यह अत्यंत उपयुक्त है। बस फिर क्या तो इस तरह के चिंत्तन में ऐसा फंसे कि  धीमे धीमे हिंसा में ही लीन हो गये और अंततः उनको उसका दंड भोगना ही पड़ा।
            हमने इन कथित संत और रामायणकालीन उस तपस्वी के जीवन में समानता देखी और यह माना कि अध्यात्मिक दर्शन की दृष्टि से प्रथ्वी का भूगोल और जीव की स्वाभाविक प्रकृत्तियां नहीं बदलती यह अलग बात है कि एतिहासिक घटनायें पात्र का नाम बदलकर प्रस्तुत होती हैं।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, November 16, 2014

पेशेवर संतों का धर्म से अधिक संबंध नहीं दिखता-विशेष हिन्दी रविवारीय लेख(peshewar santon ka dharm se adhik sambandh nahin dikhta-special hindi ravivariya article or hindi lekh)




           
            भारतीय अध्यात्मिक दर्शन तथा धर्म को  आमजन की निष्क्रियता से अधिक कथित साधु, संतों और योगियों की अति सक्रियता ने किया है। श्रीमद्भागवत गीता के दर्शन से काम, क्रोध , लोभ, मोह तथा अहंकार छोड़ने का उपदेश देने वाले इन पेशेवर अध्यात्मिक ने जितना संसास के विषयों का उपभोग किया है उतना तो आमजन भी नहीं करते।  एक बात यह हम आपको बता दें कि श्रीमद्भागवत गीता में कोई भी चीज छोड़ने या पकड़ने को नहीं कहा गया है।  त्रिगुणमयी माया में बंधी देह के साथ मन, बुद्धि और अहंकार की प्रकृत्तियों का चक्र बताया गया है।  कर्म के भेद बताये गये हैं।  इन कर्मों की प्रकृत्तियां क्या हैं यह तो बताया गया है पर साथ ही यह स्पष्ट कर दिया है कि उनके बिना अपनी इस संसार में कोई गति नहीं है।  दूसरी बात यह कि काम, क्रोध, मोह, लोभ तथा अहंकार जैसे दोष इस देह के रहते छूट ही नहीं सकते। अलबत्ता तत्वज्ञान से उनके जाल में फंसकर संकट से बचने का उपाय किया जा सकता है।  भारत के कथित संत समाज, अर्थ, प्रकृत्ति तथा विज्ञान से भरे श्रीगीता के वचनों को रटते हैं पर स्वयं समझ नहीं पाते। हम अहंकार की बात बता दें। किसी व्यापारी ने दुकान खोली। वह तत्वज्ञानी है पर अपने यहां रखे सामान के स्वामी होने का बोध उसे रखना ही पड़ेगा ताकि उसके लिये वह ग्राहकों से मूल्य ले सके।  स्वामी होने का यह बोध अहं की ऐसी सीमा है जहां तक उसे जाना ही होगा।  ग्राहक से पैसा लेना और उसे वस्तु देना एक सहज सांसरिक प्रक्रिया है। जहां व्यापारी इस प्रक्र्रिया को स्वयं प्रेरणा से संपन्न समझेगा वहां से अहंकार की वह सीमा प्रारंभ होती है जो दोष पैदा करती है।    उसी तरह काम, क्रोध, लोभ तथा मोह भी त्याज्य नहीं वरन् नियंत्रण योग्य हैं।  आप पूरी गीता पढ़ लें वहां कुछ छोड़ने या पकड़ने के लिये नहीं कहा गया।  आप किस कर्म से क्या बनते हैं-इसकी पहचान श्रीगीता के अध्ययन करने पर ही हो सकती है।
            हमारे देश में अनेक व्यवसायिक संत अपने सांसरिक अपराधों की वजह से जेल यात्रा पर जाते हैं तो उनके अनुयायी विलाप करते हैं। आजकल एक संत की चर्चा है।  सरकारी नौकरी से निकाले गये यह संत आजकल अपने तीना लाख भक्तों की वजह से भगवान बने फिर रहे हैं।  पीछे भारतीय संविधान के रक्षक लगे हैं। उनके कुछ ऐसे अपराध हैं जिसकी वजह से उन्हें जेल भेजा जा सकता है। उनके हमने प्रवचन सुने।  मोह, माया, क्रोध, लोभ तथा अहंकार के जाल में आमजन की अपेक्षा अधिक बुरी तरह यह संत फंसे दिखते हैं।  उनके शिष्य अपने भगवान की रक्षा के लिये बंदूकें ताने खड़े हैं। टीवी पर पूरा दृश्य देखकर कहीं से भी भारतीय धर्म और अध्यात्म का संबंध इससे  नहीं दिखाई देता।  टीवी चैनल पर चल रही बहस में अनेक विद्वान इन संत के कृत्यों का भारतीय धर्म तथा अध्यात्म के संदर्भ में इसलिये अध्ययन कर रहे हैं क्योंकि वह प्राचीन ग्रंथों की बात करते हैं।  इस तरह के प्रवचन तो हमारे देश में कदम कदम पर करने वाले मिल जायेंगे।  अनेक लोग तो इन्हीं प्रवचनों से अपनी रोजी रोटी चलाते हैं-कुछ ज्यादा हिट हुए तो महलनुमा आश्रम बनाने के साथ ही अधिकारीनुमा शिष्य उनके संचालन में नियुक्त करते हैं।
            ऐसा सदियों से चल रहा है। अनेक लोग तो केवल इसलिये धर्म व्यवसाय में आ जाते हैं क्योंकि उन्होंने अपने समय में इसके सहारे समाज में चमक कायम करने वाले लोगों की छवि देखकर वैसा बनने का मन बनाया होता है।  धर्म का अर्थ समझने से अधिक उसे विक्रय की वस्तु बनाने की उनकी ही इच्छा होती है।  सभी सफल नहीं होते जो सफल होते हैं वह राजसी ठाठबाट से रहते हैं।  असफल लोग भी अधिक नहीं तो रोज की रोटी का इंतजाम कर ही लेते हैं। मध्यम रूप से सफल लोग सुविधायुक्त आश्रम आदि बनाकर जीवन बिता देते हैं।
            दरअसल हम यहां श्रीमद्भागवत गीता तथा गुरुग्रंथ साहिब दोनों की चर्चा करना चाहेंगें। श्रीकृष्णजी ने अपने अगले जन्म की बात कहीं नहीं कही बल्कि यह कहा कि जो इस ग्रंथ का अध्ययन करेगा वह इस संसार में सहजता से विचरण करेगा। उन्होंने गुरू सेवा की बात कहीं मगर उसके लिये जो अध्यात्मिक ज्ञान दे। वह न मिले तो श्रीगीता का अध्ययन कर भी जीवन संवारा जा सकता है।  उसी तरह सिख पंथ के  दसवें गुरू श्री गोविंद सिंह जी ने भी गुरूग्रंथ साहिब को ही  गुरु मानने की प्रेरणा दी। उन्होंने एक तरह से गुरू की दैहिक पंरपरा का समापन किया।  गुरूग्रंथ साहिब भी श्रीगीता की तरह एक दैवीय ग्रंथ है-यह भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान साधक मानते हैं।  इधर जब हम अपने देश विशेषतः पंजाब तथा हरियाणा के क्षेत्र की अध्यात्मिक तथा धार्मिक स्थिति की तरफ देखते हैं वहां दैहिक गुरु की पंरपरा बनी हुई है।  अनेक  ऐसे पंथ इसी क्षेत्र से निकलकर आये हैं जो मूलतः सिख धर्म से प्रभावित दिखते हैं पर उनके अनुयायी पवित्र ग्रंथों को गुरु मानकर चलने में असहज अनुभव करते हैं।  उन्हें लगता है कोई दैहिक गुरू उन्हें कर्ण प्रिय शब्द कहकर बहलाये।  ऐसे स्थान बनाये जिसका पर्यटन की तरह इस्तेमाल किया जा सके। सच बात तो यह है कि यह अनुयायी धर्म से अधिक उससे मन बहलाने में अधिक रुचि रखते हैं।  इसी भाव का लाभ पेशेवर संत उठाते हैं।
            इन पेशेवरों से आदर्श स्थापित करने की आशा करना उसी तरह ही व्यर्थ  जैसे किसी दुकानदार से अपनी वस्तु बिना लाभ के मिलने की करते हैं। जो लोग ऐसे गुरुओं के अनुयायी नहीं है वह धर्म के नाम पर तमाशे से दुःखी होते हैं उन्हें ऐसी घटनाओं पर अधिक नहीं सोचना चाहिये।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Saturday, November 8, 2014

संसार में सभी लोगों की बुद्धि एक समान होती है-श्रीगुरू ग्रंथ साहिब के आधार पर चिंत्तन लेख(sansar mein sabhi logon ki buddhi ek saman hotee hai-A religion thought article based on shri guru granth sahib)



            इस संसार में सभी व्यक्ति एक ही प्रकार के होते हैं। संसार के सभी जीवों की आदते अपनी देह के अनुसार बन ही जाती हैं।  इसका कारण यह है कि हमारी पंचेन्द्रियां रूप, रस, स्पर्श, सुगंध तथा तथा स्वर के साथ समान रूप से संपर्क में आती हैं। यह अलग बात है कि अपने कर्म तथा भक्ति के अनुसार ही मनुष्य सात्विक, राजसी तथा तामसी प्रवृत्तियों का हो जाता है। आमतौर से तामसी प्रवृत्ति से निष्क्रियता और सात्विक प्रकृत्ति से सीमित सक्रियता  का भाव आता है जबकि राजसी प्रकृत्ति के लोग अधिक सक्रिय दिखते हैं।  कि कोई  व्यक्ति सात्विक प्रकृत्ति का है इसका प्रमाण केवल एक ही बात हो सकती है कि उसके आचरण में अधिक उपभोग का अभाव दिखता हैं।  ऐसे लोग संख्या में अत्यंत कम होते हैं।
            वरना तो अधिकतर लोगों मे काम, का्रेध, लोभ, मोह तथा अहंकार का भाव अधिक रहता है।  विद्वान अक्सर कहते हैं कि इन दोषों का त्याग किया जाना चाहिये पर सत्य यह भी है कि जब तक यह पांचों क्रियायें देह से जुड़ी हैं  इनके साथ सीमित संपर्क रखा जाये तो ये ही गुण  अधिक  सक्रियत से दोष बन जाते हैं।

श्रीगुरुग्रंथ साहिब में कहा गया है कि
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एक सुरति जेते है जीअ।
सुरति विहूणा कोइ न कीअ।
जेहि सुरति तेहा तिन राहु
लेखा इको आवहु जाहु।।
काहे जीअ करहि चतुराई।
लेवैं देवैं न ढिल न पाई।।
तेरे जीअ जीआ का तोहि।
कित कउ साहिब आवहि रोहि।
जे तू साहिब आवहि रोहि।
तू ओना का तेरे ओहि।।

            हिन्दी में भावार्थ-संसार के सभी जीव एक ही तरह सूझ के साथ जीते हैं। कोई बिना सूझ के नहीं बना है।  जिस तरह की जैसी सूझ है वैसे ही कर्म करता है। सभी जीव लेनदेन में चतुंराई दिखाते हैं। एक पैसा लेने में ढील नहीं दिखाते। ऐसे में हे परमात्मा आप उन पर उन पर क्यों क्रोध करोगे? आप तो उनके भी स्वामी हो।

            अनेंक लोग यह कहते हैं कि इस संसार में कामी, का्रेधी, लालची, मोह तथा अहंकारी समाज के शिखर पर पहुंुच जाते हैं तो सरल भाव का आदमी हमेशा ही पिछड़ा रहता है।  अनेक लोग तो परमात्मा पर आक्षेप करते हुए भ्रष्टाचार, अपराध और आचरणहीन व्यापार करते हुए धनवान हो जाते जबकि सज्जन आदमी हमेशा ही संषर्घ करता रहता है।  यह उनका अज्ञान है।  इस ंसंसार के सभी लोग परमात्मा की कृपा से मनुष्य योनि में हैं।  देव और दैत्य उसी के बनाये हैं।  अपने कर्मों के अनुसार ही सभी सुख दुःख भी भोगते हैं।   
              धनी कहें निर्धन सुखी और निर्धन कहे धनी सुखी है पर सच यह है कि जिसने जीवन में परमात्मा के नाम का स्मरण करना सीख लिया वह हर स्थिति में प्रसन्न चित रहता है।  सभी लोग एक दूसरे के बाह्य रूप देखकर अपनी राय बनाते हैं पर अंतर्मन की हलचल किसी को दिखाई नहीं देती। आचरणहीनता से धन कमाने वालों के महल भी नरक तो ईमानदारी से कमाने वाले की कुटिया भी स्वर्ग जैसी बन जाती है। यही ईमानदारी सात्विकता की पहचान है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Friday, October 31, 2014

सम्मान का महत्व समझने वाले व्यक्ति का ही अभिवादन करें-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(samman ka mahatva samajhne wale vyakti ka hi abhivadn karen-A Hindi hindu religion thought based on manu smriti)



            आमतौर से यह माना जाता है कि लघु श्रेणी के मनुष्य को श्रेष्ठ का हाथ जोड़कर या सिर झुकाकर अभिवादन करना चाहिये।  यह भी माना जाता है कि जहां हाथ मिलाने का अवसर हो वहां विशिष्ट व्यक्ति को पहले हाथ बढ़ाना चाहिये।  कंधे पर हाथ रखकर आपसी मिलने की परंपरा में भी विशिष्ट व्यक्ति लघु श्रेणी के व्यक्ति को अपनी पहल से सम्मान देता है।  गले मिलने की प्रक्रिया में भी यही बात है। दो व्यक्तियों की पारस्परिक भेंट में हमेशा ही अभिवादन  की प्रक्रिया से ही यह संकेत मिल जाता है कि दोनों के आपसी संबंध मधुर या कटु हैं। जहां संबंध मधुर होते हैं वहां अभिवादन के समय मिलने वालों की आंखों में सद्भाव का रस बहता दिखता है।  जहां कटु हों वहां चेहरे के हावभाव प्रमाणित कर देते हैं।

मनु स्मृति मिएँ कहा गया है कि

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यो न वेत्यभिवादस्य विप्रः प्रत्यभिवादनम्।
नाभिवाद्य स विदुषा यथा शूर्दस्तथैव सः।।


           
हिन्दी में भावार्थ-जो अभिवादन का उत्तर देना नहीं जानता उसे प्रणाम नहीं करना क्योंकि वह इस सम्मान के अयोग्य होता है।

अवाच्यो तु या स्त्री स्वादसम्बद्धा य योनितः।
भोभवत्पूर्वकं त्वनेमभिभाषेत धर्मवित्।।


           
हिन्दी में भावार्थ-धर्म का ज्ञान रखने वाले को चाहिए कि वह दूसरे ज्ञानी को कभी भी नाम से संबोधित न करे भले ही वह उससे छोटी आयु का क्यों न हो। उसको हमेशा सम्मान से संबोधित करना चाहिए।
            हमेशा मीठी वाणी में बोलकर दूसरों को प्रसन्न करना चाहिए। अपने से बड़ों का सम्मान करना हमारा धर्म है। निसंदेह इस संसार में विनम्र व्यवहार से मनुष्य विजय प्राप्त करता है। मगर इस संसार में ही लोग भी दो प्रकार के होते हैं-एक आसुरी संपदा तो दूसरे दैवीय संपदा लेकर उत्पन्न होते हैं, यह बात भी ध्यान रखने योग्य हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो विनम्र व्यवहार को कायरता और उदारता को कमजोरी समझकर दुर्व्यवहार करने पर आमादा हो जाते हैं। ऐसे लोगों को दंडित करना भी हमारा धर्म है।
      इसलिये जो लोग अभिवादन का उत्तर न देते हों या अहंकारवश मजाक उड़ाते हों उनका कभी स्वयं अभिवादन नहीं करना चाहिए। जहां तक हो सके उनके सामने आने से बचना चाहिए। इस संसार में आसुरी संपदा लेकर उत्पन्न हुए कुछ लोग ऐसे हैं जिनका अभिवादन करने पर सिवाय अपमान के कुछ नहीं मिलता। उनका अभिवादन करना तो दूर उनके चेहरे की तरफ दृष्टि नहीं डालना चाहिए।
      उसी तरह दैवीय संपदा लेकर उत्पन्न सहृदयजनों का सम्मान करना भी आवश्यक है भले ही आयु में वह छोटे क्यों न हों? सच बात तो यह है कि योग्यता, प्रतिभा तथा सज्जनता के गुणों होने के लिये आयु का छोटा या बड़ा होना जिम्मेदार नहीं है। अनेक लोग बड़ी आयु होने पर भी अपना विवेक नहीं खोते। अतः अपने से कम आयु के व्यक्ति की योग्यता देखकर उसका सम्मान करना चाहिए। सामने आने पर उसे पहले अभिवादन करना भी अच्छी बात है। उस समय पहले अभिवादन करने में संकुचित मानसिकता नहीं दिखाना चाहिए।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Thursday, October 23, 2014

सांई बाबा की भक्ति के विरुद्ध अभियान का औचित्य नहीं-हिन्दी चिंत्तन लेख(sai baba ki bhakti ke viruddh abhiyan ka auchitya nahin-hindi thought article on sai baba of shirdi)



            एक हिन्दू धार्मिक गुरु ने शिर्डी के सांई बाबा की भक्ति के विरुद्ध अभियान चलाया हुआ है। इसमें एक तर्क यह दिया जा रहा है कि उनकी पूजा करने पर लक्ष्मी नाराज हो जाती है।  हमें हैरानी इस बात की है कि स्वयं को ब्रह्मज्ञानी कहलाने वाले लोग श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों का आशय नहीं समझते इसी कारण उसमें वर्णित  मनोविज्ञान से वह अनभिज्ञ हैं। श्रीमद्भागवगीता में चार प्रकार के भक्तों के-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी का-वर्णन किया गया है। इन चारों का अस्तित्व रहना ही है इसलिये ज्ञानी को सहअस्तित्व का भाव रखना चाहिये। श्रीमद्भागवत गीता में  यह भी बता दिया है कि ज्ञानी भक्त जो भगवान को प्रिय हैं उनकी संख्या नगण्य ही रहेगी। इसलिये सारे संसार को ज्ञानी बना देने का सपना देखना महान अज्ञानता का लक्षण है।
            हम यहां सांईं बाबा की भक्ति  के समर्थक नहीं है पर विरोध भी नहीं करते।  जिन धार्मिक गुरु ने सांई बाबा की भक्ति का विरोध किया उन्होंने ही दलित वर्ग के मंदिर प्रवेश को भी निषिद्ध बताया है।  ऐसा लगता है कि हमारे देश में कुछ धर्माचार्य समाज में विघटन कर अपना काम सिद्ध करना चाहते हैं। कहा जाता है कि दो हजार वर्ष यह देश गुलाम रहा पर यह सत्य कोई नहीं स्वीकार कर रहा कि इसके लिये हमारा सामाजिक वैमनस्य रहा है। इस तरह का वैमनस्य फैलाना भारतीय धर्म के विरोधियों को अपने ऊपर प्रहार करने का अवसर देने जैसा होगा।
            वैसे तो समस्त मंदिरों में आमजन का प्रवेश सहजता से होता है  पर जिनमें निजी प्रभाव अधिक होता है वहां आम श्रद्धालू अपनी सुविधा से जाता है।  इसके अलावा हमारे जहां मूर्तिपूजा अधिक होती है इसलिये चारों प्रकार के भक्त मंदिरों जाते जरूर हैं पर आर्ती और अर्थार्थी तो अपने काम की सिद्धि के लिये इधर उधर चक्कर भी मारते हैं।  उनकी पीड़ाओं का निवारण तथा कार्यसिद्ध समय के अनुसार स्वतः होता ही है पर किसी का यकीन प्राचीन देवता से हटकर किसी सांसरिक मनुष्य पर जम जाये तो उसे समझाना कठिन है। सांसरिक मनुष्य पर यकीन करने वाले मनुष्य को रोकना या धमकाना जोखिम भरा भी हो सकता है यह बात धर्म को समूह में बनाये रखने वाले कथित धार्मिक विद्वानों को समझना चाहिये।
            अगर मान लीजिये किन्हीं सांईं बाबा के भक्तों के पास भले ही  भाग्य से धन आया हो पर वह उनकी कृपा मानता है तो वह ऐसे धर्माचार्यों पर गुस्सा होंगे। आज आप उनको हिन्दू कहकर दुत्कार रहे हो कल वह धर्म परिवर्तन करने लगे तो क्या करेंगे? हालांकि इस तरह की आशंका  इसलिये नहं है क्योंकि सांईबाबा के अधिकतर भक्त हिन्दू ही हैं और अन्य देवी देवताओं के प्रति उनमें हृदय में आस्था कम नहीं है।  यही कारण है कि सांई बाबा के मंदिरों में अन्य देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित की जाती हैं। वहां रामनवमी, कृष्णजन्माष्टमी, गणेश चतुर्थीं और दीपावली जैसे पर्व मनाये ही जाते हैं।
            मुख्य बात यह है कि एक योग साधक और गीता पाठक होने के नाते हम दूसरे की भक्ति पर आक्षेप करना अनुचित मानते हैं। वैसे ही हमारे देश में आर्थिक, सामाजिक तथा शारीरिक तनाव अधिक हैं ऐसे में कोई सांई बाबा की भक्ति से प्रसन्नता प्राप्त कर रहा है तो एक ज्ञानी की नज़र में बुरा नहीं है।  अब इस तरह के अभियान को अधिक हवा देना ठीक नहीं है।  जहां तक इस तरह के अभियान से संतोषी माता की भक्ति समाप्त करने का दावा किया जाता है पर यह उनका भ्रम है।  आज भी अनेक लोग संतोषी माता का व्रत रखते हैं। इसलिये सांईबाबा के विरुद्ध अभियान चलाने वाले इस तरह के दावे कर अपने को सिद्ध नहीं प्रमाणित कर सकते।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Saturday, October 18, 2014

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर यात्रा से हुई अध्यात्मिक स्वर्णिम अनुभूति-हिन्द लेख(amrisar ke swarn mandir ya harmindar sahib ki yatra se mili swarnim anubhuti, A Golden expirence of A Golden temple in amritsar)



            हमने  11 अक्टुबर से 13 अक्टुबर 2014 शनिवार से मंगलवार तक अमृतसर के स्वर्ण मंदिर-जिसे हरमिंदर साहब भी कहा जाता है-पर जो समय बिताया वह वास्तव में स्वर्णिम स्मृति की तरह हमारे मन मस्तिष्क में जीवन भर रहेगा। वहां रहने के लिये गुरुद्वारा प्रबंध समिति के कार्यकर्ता ने हमें श्री बाबा दीपसिंह बाबा निवास प्रदान किया।  वह हरमिंदर साहिब से करीब एक किलोमीटर दूर होगा। उसे ढूंढने में हमें परेशान हुई। ऐसा लगा कि हमें असहयोग के मार्ग पर धकेला गया पर वहां कमरे में तीन दिन रहे तब लगा कि जिन महानुभाव ने हमें वहां भेजा उनकी हृदय में हमारे लिये सामान्य पर पवित्र भाव ही था।

            जिस तरह की सफाई, पेयजल तथा अन्य व्यवस्थायें वहां देखने को मिलीं वह रोमांचित करने वाली थी।  उस निवास के सामने ही श्रीबाबादीपसिंह गुरुद्वारा था जहां हमने हरमिंदर साहिब के बाद सबसे अधिक भीड़ देखी।  वहां लंगर और चाय की व्यवस्था भी थी।  हरमिंदर साहिब में तो लंगर की व्यवस्था इस तरह चल रही थी जैसे कि कारखाना या कोई उद्योग चलता हो।  बर्तनों के आपस में टकराने से निकले स्वर ऐसे आभास दे रहे थे कहीं कोई मशील चल रही हो।  हरमिंदर साहिब के सामने ही रामदास सराय में पर्यटकों के लिये अपनी देह स्वच्छ करने की व्यवस्था थी। वहां सेवादार इस तरह सक्रिय थे जैसे कि किसी कारखाने में कार्यरत हों। उसकी निरंतर सफाई इस तरह जारी थी जैसे कि वहां व्यवसायिक स्थान हो। 

            सभी स्थानों पर लंगरों  नियमित सेवादार तो नियुक्त थे पर ऐसे लोग भी कार्य कर रहे थे जिनके हृदय में गुरुभक्ति कूट कूट कर भरी रहती है। लंगर में अनेक आम तीर्थप्रेमी भी बर्तन आदि साफ करने का काम कर अपने हृदय के सेवा भाव का परिचय दे रहे थे।  सिख गुरुओं ने परोपकार तथा श्रम को अत्यंत महत्व दिया है।  हमारा मानना तो यह है कि आज के युग में श्रीमद्भागवत गीता तथा गुरुग्रंथ साहिब के संदेशों में जिस तरह अकुशल शारीरिक श्रम को सम्मान योग्य माना गया है उस हृदय में धारण करना ही चाहिये।
गुरु ग्रंथ साहिब में कहा गया है कि
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जो रतु पीवहि माणसा तिन किउ निरमलु चीतु।
            हिन्दी में भावार्थ-जिस व्यक्ति में दूसरे मनुष्य का रक्त पीने की आदत है उसका मन कभी निर्मल हो ही नहीं सकता।
आप गवाए सेवा करे ता किछ पाए मान
            हिन्दी में भावार्थ-अपना अहंकार त्याग कर सेवा करें तभी कुछ सम्मान मिल सकता है।
            कहा जाता है कि सिख धर्म का प्रादुर्भाव ही हिन्दू संस्कृति या धर्म की रक्षा के लिये हुआ।  यह अलग बात है कि आधुनिक  राजनीतिक द्वंद्वों के चलते  हिन्दू और सिख धर्म को प्रथक प्रथक बताने का प्रयास हो रहा है।  हरमिंदर साहिब में जाने पर यह पता चलता है कि वहां हर धर्म, वर्ण और समाज का धर्म प्रेमी अत्यंत श्रद्धभाव  हृदय में स्थापित कर आता है।  भारत ही नहीं वरन् पूरे विश्व में सिख धर्म गुरुओं के प्रति सकारात्मक रुचि है।  आज जब भौतिक विलासिता के प्रभाव में शारीरिक श्रम के अभाव हो गया है तब हम मनुष्यों में बढ़ते मानसिक रोगों का दुष्प्रभाव भी देख सकते हैं।  इतना ही नहीं धन, पद और प्रतिष्ठा का संग्रह कर चुके लोगों में जो अहंकार भाव दिखता है उसकी वजह से समाज में वैमनस्य भी बढ़ा है।  हालांकि लोगों का धर्म के प्रति झुकाव भी बढ़ा दिखता है पर सच यह है कि धार्मिक स्थानों पर पर्यटन की दृष्टि से मन बहलाने में ही उनकी रुचि अधिक दिखती है।  गुरुओं के संदेशों पर अमल करने वाले कितने हैं यह अलग से चर्चा का विषय है पर एक बात निश्चित है कि गुरु सेवा में निरंतर निष्काम भाव से लगे लोगों गुरुग्रंथ साहिब के संदेशों के प्रचार में सक्रियता प्रशंसनीय है।  इसके अलावा जो परोपकार में लगे हैं तो उन्हें ज्ञानी ही कहा जाना चाहिये।
            एक योग साधक तथा ज्ञान प्रिय होने के नाते अमृतसर की यह यात्रा हमारे लिये अत्यंत रुचिकर रही। हमने जो देखा उस पर लगातार लिखते ही रहेंगे। हम जैसे लोगों के लिये भौतिक स्वर्ण से अधिक ज्ञान का स्वर्ण महत्वपूर्ण रहता है जो  ऐसे स्थानों पर जाने पर स्वाभाविक रूप से प्राप्त होता है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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