समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
-------------------------


Showing posts with label hindi article. Show all posts
Showing posts with label hindi article. Show all posts

Monday, June 13, 2011

परिणाम का कर्म से संबंध जानना चाहिए-पतंजलि योग साहित्य

        पतंजलि योग शस्त्र में कहा गया है कि
          -------------------------

          क्रमान्यत्वं परिणामन्यत्वे हेतुः।
          ‘‘किसी कार्य करने के क्रम में भिन्नता से परिणाम भी भिन्न होता है।’’
         परिणामन्नयसंयमादतीतानागतज्ञानम्।।
        ‘‘अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का विचार करने से परिणाम का ज्ञान हो जाता है।’’
                   पतंजलि योग में न केवल भौतिक तथा दृश्यव्य संसार को जानने की विधा बताई गयी है बल्कि अभौतिक तथा अदृश्यव्य स्थितियों के आंकलन का भी ज्ञान दिया गया है। हमारे सामने जो भी दृश्य आता है वह तत्काल प्रकट नहीं होता बल्कि वह किसी के कार्य के परिणाम स्वरूप ही ऐसा होता है। कोई व्यक्ति हमारे घर आया तो इसका मतलब वह किसी राह से निकला होगा। वहां भी उसके संपर्क हुए होंगे। वह हमारे घर पर जो व्यवहार करता है वह उसके घर से निकलने से लेकर हमारे यहां पहुंचने तक आये संपर्क तत्वों से प्रभावित होता है। वह धूप में चलकर आया है तो दैहिक थकावट के साथ मानसिक तनाव से ग्रसित होकर व्यवहार करता है। कोई घर से लड़कर आया है तो उसका मन भी वहीं फंसा रह जाता है और भले ही वह उसे प्रकट न करे पर उसकी वाणी तथा व्यवहार अवश्य ही नकारात्मक रूप से परिलक्षित होती है।
               कहने का अभिप्राय यह है कि हम प्रतिदिन जो काम करते हैं या लोगों हमारे लिये काम करते हैं वह कहीं न कहीं अभौतिक तथा अदृश्यव्य क्रियाओं से प्रभावित होती हैं। इसलिये कोई दृश्य सामने आने पर त्वरित प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करना चाहिए। हमें यह विचार करना चाहिए कि उस दृश्य के पीछे कौन कौन से तत्व हैं। व्यक्ति, वस्तु या स्थितियों से प्रभावित होकर ही कोई धटना हमारे सामने घटित होती है। जब हमें यह ज्ञान हो जायेगा तब हमारे व्यवहार में दृढ़ता आयेगी और हम अनावश्यक परिश्रम से बच सकते हैं। इतना ही नहीं किसी दृश्य के सामने होने पर जब हम उसका अध्ययन करते हैं तो उसके अतीत का स्वरूप भी हमारे अंतर्मन में प्रकट होता है। जब उसका अध्ययन करते हैं तो भविष्य का भी ज्ञान हो जाता है।
               हम अपने साथ रहने वाले अनेक लोगों का व्यवहार देखते हैं पर उसका गहराई से अध्ययन नहीं करते। किसी व्यक्ति के मन में अगर पूर्वकाल में से दोष रहे हैं और वर्तमान में दिख रहे हैं तो मानना चाहिए कि भविष्य में भी उसकी मुक्ति नहीं है। ऐसे में उससे व्यवहार करते समय यह आशा कतई नहीं करना चाहिए कि वह आगे सुधर जायेगा। योग साधना और ध्यान से ऐसी सिद्धियां प्राप्त होती हैं जिनसे व्यक्ति स्वचालित ढंग से परिणाम तथा दृश्यों का अवलोकन करता है। अतः वह ऐसे लोगों से दूर हो जाता है जिनके भविष्य में सुधरने की आशा नहीं होती। जब हमारा  कोई कार्य सफल नहीं होता तब हम भाग्य को दोष देते हैं जबकि हमें उस समय अपने दोषों और त्रुटियों पर विचार करना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Sunday, May 1, 2011

मनोरंजन और घमंड मनुष्य को नष्ट कर देता है-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (manoranjan aur ghamand-hindu dharmik chittan)

प्रकृतिव्यसननि भूतिकामः समुपेक्षेत नहि प्रमाददर्पात्। प्रकृतिव्यवसनान्युपेक्षते यो चिरातं रिपवःपराभवन्ति।।
                   विभूति की कामना से उत्पन्न प्रमाद और अहंकार की प्रकृति से उत्पन्न व्यसन की उपेक्षा न करें। प्रकृत्ति की व्यसनों की उपेक्षा करने वाला शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
                        प्रकृति के पंच तत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहती है। जिनके पास भौतिक उपलब्धि है वह उसके आकर्षण में बंधकर मतमस्त हो जाते हैं। दूसरे को गरीब या अल्पधनी मानकर उसका मज़ाक उड़ाते हैं। मज़ाक न उड़ाये तो भी शाब्दिक दया दिखाकर अपने मन को शांति देने का प्रयास करते हैं। दरअसल यह सब दूसरों से ही नहीं बल्कि अपने साथ भी प्रमाद करना ही है। इस संसार में भगवान की तरह माया का खेल भी निराला है। किसी के पास कम है तो किसी के पास ज्यादा है, इसमें मनुष्य की कोई भूमिका नहीं है। यह अलग बात है कि अज्ञानवश वह अपने को कर्ता मान लेता है। इसी कारण वह कभी प्रमाद तो कभी अहंकार के भाव से ग्रसित होकर व्यवहार करता है।
                        आज हम देश के हालात देखें तो यह बात समझ में आ जायेगी कि जिन लोगों के पास धन, प्रतिष्ठा और पद की उपलब्धि है वह दूसरे को अपने से हेय समझते हैं। नतीजा यह है कि आम इंसानों में उनके प्रति विद्रोह के बीज पड़ गये हैं। शिखर पुरुषों को यह भ्रम है कि आम आदमी उनसे जाति, धर्म, भाषा तथा क्षेत्र के बंटवारे के कारण उनसे जुड़े हैं जो कि उनके किराये के बुद्धिजीवी बनाकर रखते हैं। मगर सच तो यह है कि शिखर पुरुषों से अब किसी की सहानुभूति नहीं है। भले ही प्रचार माध्यम कितने भी दावा करें कि जनता प्रसिद्धि लोगों को देखना और सुनना चाहती है। अब तो हर आदमी यह जान गया है कि शिखर पर अब बिना ढोंग, पाखंड या बेईमानी के कोई नहीं पहुंच सकता। अगर ऐसा न होता तो देश के अनेक शिखर पुरुष अपने घरों के बाहर सुरक्षा उपाय नहीं करते। इतना ही नहीं अनेक तो राह चलते हुए भी सुरक्षा लेकर चलते हैं। इसका मतलब सीधा है कि अपने ही कारनामों को उनके अंदर भय व्याप्त है। गरीबों से भरे देश में सुरक्षा एक मुद्दा बन गयी है।
फिर अब शिखर पर भी झगड़े होने लगे हैं। एक जाता है तो दूसरा आ जाता है। यह अस्थिरता इसलिये हैं क्योंकि प्रमाद और अहंकार में लगे शिखर पुरुष जल्दी जल्दी अपना आकर्षण खो देते हैं। शिखर बैठकर वह अपने वैभव का प्रदर्शन कर वह एक दूसरे को प्रभावित तो कर सकते हैं पर आम आदमी को नहीं।
-------------
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

Thursday, November 12, 2009

संत कबीरदास के दोहे- दूसरे की पीड़ा मूर्ख लोग नहीं समझते (kabir sandesh in hindi)

पीर सबन की एकसी, मूरख जाने नांहि
अपना गला कटाक्ष के , भिस्त बसै क्यौं नांहि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सभी जीवों की पीड़ा एक जैसी होती है पर मूर्ख लोग इसे नहीं समझते। ऐसे अज्ञानी और हिंसक लोग अपना गला कटाकर स्वर्ग में क्यों नहीं बस जाते।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस दोहे में अज्ञानता और हिंसा की प्रवृत्ति वाले लोगों के बारे में बताया गया है कि अगर किसी दूसरे को पीड़ा होती है तो अहसास नहीं होता और जब अपने को होती है तो फिर दूसरे भी वैसी ही संवेदनहीनता प्रदर्शित करते हैं। अनेक लोग अपने शौक और भोजन के लिये पशुओं पक्षियों की हिंसा करते हैं। उन अज्ञानियों को यह पता नहीं कि जैसा जीवात्मा हमारे अंदर वैसा ही उन पशु पक्षियों के अंदर होता है। जब वह शिकार होते हैं तो उनके प्रियजनों को भी वैसा ही दर्द होता है जैसा मनुष्यों के हृदय में होता है। बकरी हो या मुर्गा या शेर उनमें भी मनुष्य जैसा जीवात्मा है और उनको मारने पर वैसा ही पाप लगता है जैसा मनुष्य के मारने पर होता है। यह अलग बात है कि मनुष्य समुदाय के बनाये कानून में के उसकी हत्या पर ही कठोर कानून लागू होता है पर परमात्मा के दरबार में सभी हत्याओं के लिऐ एक बराबर सजा है यह बात केवल ज्ञानी ही मानते हैं और अज्ञानी तो कुतर्क देते हैं कि अगर इन जीवो की हत्या न की जाये तो वह मनुष्य से संख्या से अधिक हो जायेंगे।

आजकल मांसाहार की प्रवृत्तियां लोगों में बढ़ रही है और यही कारण है कि संवदेनहीनता भी बढ़ रही है। किसी को किसी के प्रति हमदर्दी नहीं हैं। लोग स्वयं ही पीड़ा झेल रहे हैं पर न तो कोई उनके साथ होता है न वह कभी किसी के साथ होते हैं। इस अज्ञानता के विरुद्ध विचार करना चाहिये । आजकल विश्व में अहिंसा का आशय केवल ; मनुष्यों के प्रति हिंसा निषिद्ध करने से लिया जाता है जबकि अहिंसा का वास्तविक आशय समस्त जीवों के प्रति हिंसा न करने से है। किसी को मानसिक पीड़ा देना भी हिंसा के श्रेणी में आता है।
------------------------------
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

Saturday, November 7, 2009

संत कबीर के दोहे-मन तो मुनियों को भी ठग लेता है (man to thag hai-sant kabir das


अपने अपने चोर को, सब कोय डारै मार
मेरा चोर मुझको मिलै, सरबस डारूं वार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि संसार के सब तो अपने अपने चोर को मार डालते हैं, परंतु मेरा चोर तो मन है। वह अगर मुझे मिल जाये तो मैं उस पर सर्वस्व न्यौछावर कर दूंगा।
सुर नर मुनि सबको ठगै, मनहिं लिया औतार
जो कोई याते बचै, तीन लोक ते न्यार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह मन तो एक महान ठग है जो देवता, मनुष्य और मुनि सभी को ठग लेता है। यह मन जीव को बार बार अवतार लेने के लिये बाध्य करता है। जो कोई इसके प्रभाव से बच जाये वह तीनों लोकों में न्यारा हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की पहचान तो मन है और वह उसे जैसा नचाता। आदमी उसके कारण स्थिर प्रज्ञ नहीं रह पाता। कभी वह किसी वस्तु का त्याग करने का निर्णय लेता है पर अगले पर ही वह उसे फिर ग्रहण करता है। अर्थात मन हमेशा ही व्यक्ति का अस्थिर किये रहता है। कई बार तो आदमी किसी विषय पर निर्णय एक लेता है पर करता दूसरा काम है। यह अस्थिरता मनुष्य को जीवन पर विचलित किये रहती है और वह इसे नहीं समझ सकता है। यह मन सामान्य मनुष्य क्या देवताओं और मुनियों तक को धोखा देता है। इस पर निंयत्रण जिसने कर लिया समझा लो तीनों को लोकों को जीत लिया। इस देह में जो मन रहता है हम उसे समझ नहीं पाते। वही हमें इधर उधर इस तरह दौड़ाता है कि हम सोचते हैं कि ही करतार हैं जबकि यह केवल एक भ्रम होता है। हम उसे समझा नहीं पाते क्योंकि उसकी अनुभूतियां इस तरह हमसे जुड़ी है कि पता ही नहीं चलता कि वह हमसे अलग है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwaliro
http://rajlekh.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

Tuesday, November 3, 2009

योगासन के साथ प्राणायाम अवश्य करें-आलेख (yagasan aur pranayam-hindi lekh)

अक्सर लोग योग साधना को केवल योगासन तक ही सीमित मानकर उसका विचार करते हैं। जबकि इसके आठ अंग हैं।
योगांगानुष्ठानादशुद्धिये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।
हिंदी में भावार्थ-
योग के आठ अंग-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
इसका आशय यही है कि योगसाधना एक व्यापक प्रक्रिया है न कि केवल सुबह किया जाने वाला व्यायाम भर। अनेक लोग योग पर लिखे गये पाठों पर यह अनुरोध करते हैं कि योगासन की प्रक्रिया विस्तार से लिखें। इस संबंध में यही सुझाव है कि इस संबंध में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं और उनसे पढ़कर सीखें। इन पुस्तकों में योगासन और प्राणायम की विधियां दी गयी हैं। योगासन और प्राणायम योगसाधना की बाह्य प्रक्रिया है इसलिये उनको लिखना कोई कठिन काम है पर जो आंतरिक क्रियायें धारणा, ध्यान, और समाधि वह केवल अभ्यास से ही आती हैं।
इस संबंध में भारतीय योग संस्थान की योग मंजरी पुस्तक बहुत सहायक होती है। इस लेखक ने उनके शिविर में ही योगसाधना का प्रशिक्षण लिया। अगर इसके अलावा भी कोई पुस्तक अच्छी लगे तो वह भी पढ़ सकते हैं। कुछ संत लोगों ने भी योगासन और प्राणायाम की पुस्तकें प्रकाशित की हैं जिनको खरीद कर पढ़ें तो कोई बुराई नहीं है।
चूंकि प्राणयाम और योगासन बाह्य प्रक्रियायें इसलिये उनका प्रचार बहुत सहजता से हो जाता है। मूलतः मनुष्य बाह्यमुखी रहता है इसलिये उसे योगासन और प्राणायाम की अन्य लोगों द्वारा हाथ पांव हिलाकर की जाने वाली क्रियायें बहुत प्रभावित करती हैं पर धारणा, ध्यान, तथा समाधि आंतरिक क्रियायें हैं इसलिये उसे समझना कठिन है। अंतर्मुखी लोग ही इसका महत्व जानते हैं। धारणा, ध्यान और समाधि शांत स्थान पर बैठकर की जाने वाली कियायें हैं जिनमें अपने चित की वृत्तियों पर नियंत्रण करने के लिये अपनी देह के साथ मस्तिष्क को भी ढीला छोड़ना जरूरी है।
इसके अलावा कुछ लोग तो केवल योगासन करते हैं या प्राणायम ही करके रह जाते हैं। इन दोनों ही स्थितियों में भी लाभ कम होता है। अगर कुछ आसन कर प्राणायम करें तो बहुत अच्छा रहेगा। प्राणायम से पहले अगर अपने शरीर को खोलने के लिये सूक्ष्म व्यायाम कर लें तो भी बहुत अच्छा है-जैसे अपने पांव की एड़ियां मिलाकर घड़ी की तरह घुमायें, अपने हाथ मिलाकर ऐसे आगे झुककर घुमायें जैसे चक्की चलाई जाती है। अपनी गर्दन को घड़ी की तरह दायें बायें आराम से घुमायें। अपने दोनों हाथों को कंधे पर दायें बायें ऊपर और नीचे घुमायें। अपने दायें पांव को बायें पांव के गुदा मूल पर रखकर ऊपर नीचे करने के बाद उसे अपने दोनों हाथ से पकड़ दायें बायें करें। उसके बाद यही क्रिया दूसरे पांव से करें। इन क्रियायों को आराम से करें। शरीर में कोई खिंचाव न देते सहज भाव से करें। सामान्य व्यायाम और योगासन में यही अंतर है। योगासनों में कभी भी उतावली में आकर शरीर को खींचना नहीं चाहिये। कुछ आसन पूर्ण नहीं हो पाते तो कोई बात नहीं, जितना हो सके उतना ही अच्छा। दूसरे शब्दों में कहें तो सहजता से शरीर और मन से विकार निकालने का सबसे अच्छा उपाय है योग साधना। शेष फिर कभी
लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://anant-shabd.blogspot.com
-----------------------------------

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

Thursday, October 29, 2009

चाणक्य नीति-भक्ति और दान में असंतुष्ट रहना ही अच्छा (chankya niti-bhakti aur dan)

संतोषस्त्रिशु कत्र्तव्यः स्वदारे भोजने धने।
त्रिषु चैव न कत्र्तव्योऽध्ययने तपदानयोः।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य को अपनी पत्नी, भोजन और धन से ही संतोष करना चाहिये पर ज्ञानार्जन, भक्ति और दान देने के मामले में हमेशा असंतोषी रहे यही उसके लिये अच्छा है।
संतोषाऽमृत-तुप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम्।
न च तद् धनलूब्धानामितश्चयेतश्च धावताम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जो मनुष्य संतोष रूप अमृत से तुप्त है उसका ही हृदय शांत रह सकता है। इसके विपरीत जो मनुष्य असंतोष को प्राप्त होता है उसे जीवन भर भटकना ही पड़ता है उसे कभी भी शांति नहीं मिल सकती।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-नीति विशारद चाणक्य के संदेशों के ठीक विपरीत हमारा देश चल रहा है। जिन लोगों के पास धन है उनके पास भी संतोष नहीं है और जिनके पास नहीं है उनसे तो आशा करना ही व्यर्थ है। अपनी पत्नी और घर के भोजन से धनी लोगों को संतोष नहीं है। जीभ का स्वाद बदलने के लिये ऐसी वस्तुओं का सेवन बढ़ता जा रहा है जो स्वास्थ्य के लिये हितकर नहीं है। कहा जाता है कि खाने पीने की वस्तुओं को स्वच्छता होना चाहिये पर होटलों और बाजार की वस्तुओं में कितनी स्वच्छता है यह हम देख सकते हैं। किसी रात एक साफ रुमाल घर में रख दीजिये और सुबह देखिये तो उस पर धूल जमा है तब बाजार में कई दिनों से रखी चीजों में स्वच्छता की अपेक्षा कैसे रखी जा सकती है। घर में गृहिणी सफाई से भोजन बनाती है पर क्या वैसी अपेक्षा होटलों के भोजन में की जा सकती है। ढेर सारे ट्रक, ट्रेक्टर,बसें, मोटर साइकिलें तथा अन्य वाहन सड़कों से गुजरते हुए तमाम तरह की धूल और धूंआ उड़ाते हुए जाते हैं उनसे सड़कों पर स्थित दुकानों,चायखानों और होटलों में रखी वस्तुओं के विषाक्त होने की आशंका हमेशा बनी रहती है। ऐसे में बाजारों में खाने वाले लोगों के साथ अस्पतालों में मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है तो आश्चर्य की बात क्या है?
इसके विपरीत लोगों की आध्यात्मिक ज्ञान और भक्ति के भाव के प्रति कमी भी आ रही है। लोगों को ऐसा लगता है कि यह तो पुरातनपंथी विचार है। असंतोष को बाजार उकसा रहा है क्योंकि वहां उसे अपने उत्पाद बेचने हैं। प्रचार के द्वारा बैचेनी और असंतोष फैलाने वाले तत्वों की पहचान करना जरूरी है और यह तभी संभव है कि जब अपने पास आध्यात्मिक ज्ञान हो। आध्यामिक ज्ञान से ही जीवन का अर्थ समझकर इस संसार के सभी कार्य अच्छी तरह किये जा सकते हैं।
----------------------
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anantraj.blogspot.com
-----------------------------

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

Saturday, October 24, 2009

विदुर नीति-मिथ्या कार्यों में मन लगाना ठीक नहीं (mithyy karya n karen-vidur niti)

तथैव योगविहितं यत्तु कर्म नि सिध्यति।
उपाययुक्तं मेधावी न तव्र गलपयेन्मनः।।
हिंदी में भावार्थ-
अच्छे और सात्विक प्रयास करने पर कोई सत्कर्म सिद्ध नहीं भी होता है तो भी बुद्धिमान पुरुष को अपने अंदर ग्लानि नहीं अनुभव करना चाहिए।

मिथ्यापेतानि कर्माण सिध्येवुर्यानि भारत।
अनुपायवुक्तानि मा स्म तेष मनः कृथाः।।
हिंदी में भावार्थ-
मिथ्या उपाय से कपट पूर्ण कार्य सिद्ध हो जाते हैं पर उनमें मन लगाना ठीक नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर आपने सुना होगा कि प्यार और जंग में सब जायज है-यह पश्चिम से आयातित विचार है। जीवन की तो यह वास्तविकता है कि जैसा कर्म करोगे वैसा परिणाम सामने आयेगा। जैसा मन में संकल्प होगा वैसे ही यह संसार हमारे साथ व्यवहार करेगा। अपने स्वार्थ को सिद्ध करने में मनुष्य इतना तल्लीन हो जाता है कि उसे अपने कर्म की शुद्धता और अशुद्धता का बोध नहीं रहता। इसी कारण वह ऐसे उपायों का भी सहारा लेता है जो अपवित्र और अनैतिक हैं। फिर उसको अपनी बात के प्रमाण रखने के लिये अनेक प्रकार के झूठ भी बोलने पड़ते हैं। इस तरह वह हमेशा पाप की दुनियां में घूमता है। मगर मन तो मन है वह उसकी तृप्ति के लिये भक्ति और साधना का ढोंग भी करता है। इससे प्रकार वह एक ऐसे मायाजाल में फंसा रहता है जिससे जीवन भर उसकी मुक्ति नहीं होती।
इसलिये अपने जीवन में अच्छे संकल्प धारण करने के साथ ही अपने कार्य की सिद्ध के लिये पवित्र और नैतिक उपायों की ही सहायता लेना चाहिए।

बाकी लोग किस रास्ते पर जा रहे हैं यह विचार करने की बजाय यह देखना चाहिए कि हमारे लिये उचित मार्ग कौनसा है। इसके अलावा यह भी एक अन्य बात यह भी है कि अगर हमारा कोई पवित्र और सात्विक कर्म अपने उचित उपाय से सिद्ध नहीं होता तो भी परवाह नहीं करना चाहिए। याद रखें कार्य सिद्ध होने का भी अपना एक समय होता है और जब आता है तो हमें यह भी पता नहीं लगता कि वह काम कैसे पूरा हुआ। इसलिए कोई भी शुभ काम मन लगाकर करना चाहिए। बहुत जल्दी सफलता के लिए ग़लत मार्ग नहीं पकड़ना चाहिए।
................................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Monday, October 5, 2009

चाणक्य नीति-आँख से देखकर ज़मीन पर पाँव रखें (chankya darshan-hindi sandesh)

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
-------------------------

धनहीनो न हीनश्च धनिकः स सुनिश्चयः।
विद्यारत्नेद यो हीनः स हीनः सर्ववस्तुष।।
हिंदी में भावार्थ-
धन से रहित व्यक्ति को
दीन हीन नहीं समझना चाहिये अगर वह विद्या ये युक्त है। जिस व्यक्ति के पास धन और अन्य वस्तुयें हैं पर अगर उसके पास विद्या नहीं है तो वह वास्तव में दीन हीन है।
दुष्टिपतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं पिबेजलम्।
शास्त्रपूतं वदेद् मनः पूतं समाचरेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
आंखों से देखकर जमीन पर पांव रखें। कपड़े से छान कर पानी पियो। शास्त्र से शुद्ध कर वाक्य बोलें और कोई भी पवित्र काम मन लगाकर संपन्न करें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समाज में निर्धन आदमी को अयोग्य मान लेने की प्रवृत्ति है और यही कारण है कि उसमें वैमनस्य फैल रहा है। एक तरफ धनी मानी लोग यह अपेक्षा करते हैं कि कोई उनकी रक्षा करे दूसरी तरफ अपनी रक्षा के लिये शारीरिक सामथ्र्य रखने वाले निर्धन व्यक्ति का सम्मान करना उनका अपने धन का अपमान लगता है। संस्कार, संस्कृति और धर्म बचाने के लिये आर्तनाद करने वाले धनी लोग अपने देश के निर्धन लोगों का सम्मान नहीं करते और न ही उनके साथ समान व्यवहार उनको पसंद आता है। धनीमानी और बाहूबली लोग देश पर शासन तो करते हैं पर उसे हर पल प्रमाणिक करने के उनके शौक ने उनको निर्धन समाज की दृष्टि में घृणित बना दिया है।
यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि युद्ध में कोई धनीमानी नहीं बल्कि गरीब परिवारों के बच्चे जाते हैं। अमीर तो उनकी बहादुरी और त्याग के वजह से सुरक्षित रहते हैं पर फिर भी उनके लिये गरीब और उसकी गरीबी समाज के लिये अभिशाप है। गरीब की गरीबी की बजाय उसे ही मिटा डालने के लिये उनकी प्रतिबद्धता ने निचले तबके का शत्रु बना दिया है। यह देश दो हजार वर्ष तक गुलाम रहा तो केवल इसलिये कि समाज के धनी और बाहूबली वर्ग ने अपना दायित्व नहीं निभाया।

आदमी को हमेशा ही सतर्क रहना चाहिये। कहीं भी जमीन पर पांव रखना हो तो उससे पहले अपनी आंखों की दृष्टि रखना चाहिये। आजकल जिस तरह सड़क पर हादसों की संख्या बढ़ रही है उससे तो यही लगता है कि लोग आंखों से कम अनुमान से अधिक चलते हैं। अधिकतर बीमारियां पानी के अशुद्ध होने से फैलती हैं और जितना स्वच्छ पानी का उपयोग किया जाये उतना ही बीमार पड़ने का खतरा कम हो जाता है। इसके अलावा निरर्थक चर्चाओं से अच्छा है आदमी धार्मिक ग्रंथों और सत्साहित्य की चर्चा करे ताकि मन में पवित्रता रहे। मन के पवित्र होने से अनेक काम स्वत: ही सिद्ध होते हैं।
...................................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Thursday, October 1, 2009

मनु स्मृति-झूठी गवाही देना पाप है (manu smruti in hindi)

यमो वैवस्वतो देवो यस्तवैध हृदिस्थितः।
तेन चेदविवादस्ते मां गंगा मा कृरून गमः।।
हिंदी में भावार्थ-
सभी के हृदय में भगवान विवस्वान यम साक्षी रूप में स्थित रहते हैं। यदि उनसे कोई विवाद नहीं करना है तथा पश्चाताप के लिये गंगा या कुरुक्षेत्र में नहीं जाना तो कभी झूठ का आश्रय न लें।

एकोऽहमस्मीत्यातमानं यत्तवं कल्याण मन्यसे।
नित्यं स्थितस्ते हृद्येष पुण्यपापेक्षिता मुनिः।।
हिंदी में भावार्थ-
यदि कोई आदमी यह सोचकर झूठी गवाही दे रहा है कि वह अकेला है और सच्चाई कोई नहीं जानता तो वह भूल करता है क्योंकि पाप पुण्य का हिसाब रखने वाला ईश्वर सभी के हृदय में रहता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने स्वार्थ के लिये झूठ बोलना अज्ञानी और पापी मनुष्य का लक्षण है। सभी का पेट भरने वाला परमात्मा है पर लालची, लोभी, कामी और दुष्ट प्रवृत्ति के लोग झूठ बोलकर अपना काम सिद्ध करना अपनी उपलब्धि मानते हैं। अनेक लोग झूठी गवाही देते हैं या फिर किसी के पक्ष में पैसा लेकर उसका झूठा प्रचार करते हैं। अनेक कथित ज्ञानी तो कहते हैं कि सच बोलने से आज किसी का काम नहीं चल सकता। यह केवल एक भ्रम है।
यह दुनियां वैसी ही होती है जैसी हमारी नीयत है। अगर हम यह मानकर चल रहे हैं कि झूठ बोलने से अब काम नहीं चलता तो यह अधर्म की तरफ बढ़ाया गया पहला कदम है। कई लोग ऐसे है जो अपनी झूठी बेबसी या समस्या बताकर दूसरे से दान और सहायता मांगते हैं और उनको मिल भी जाती है। अब यह सोच सकते हैं कि झूठ बोलने से कमाई कर ली पर उनको यह विचार भी करना चाहिये कि दान या सहायता देने वाले ने अपनी धार्मिक प्रवृत्ति के कारण ही अपना कर्तव्य निभाया। इसका आशय यह है कि धर्म का अस्तित्व आज भी उदार मनुष्यों में है। इसे यह भी कहना चाहिये कि यह उदारता ही धर्म के अस्तित्व का प्रमाण है। इसलिये झूठ बोलने से काम चलाने का तर्क अपने आप में बेमानी हो जाता है क्योंकि अंततः झूठ बोलना धर्म विरोधी है।
आदमी अनेक बार झूठ बोलता है पर उसका मन उस समय कोसता है। भले ही आदमी सोचता है कि झूठ बोलते हुए कोई उसे देख नहीं रहा पर सच तो यह है कि परमात्मा सभी के हृदय में स्थित है जो यह सब देखता है। एक मजेदार बात यह है कि आजकल झूठ बोलने वाली मशीन की चर्चा होती है। आखिर वह झूठ कैसे पकड़ती है। होता यह है कि जब आदमी झूठ बोलता है तब उसके दिमाग की अनेक नसें सामान्य व्यवहार नहीं करती और वह पकड़ा जाता है। यही मशीन इस बात का प्रमाण है कि कोई ईश्वर हमारे अंदर है जो हमें उस समय इस कृत्य से रोक रहा होता है।
................................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Sunday, September 27, 2009

भर्तृहरि नीति शतक-धन की गर्मी ख़त्म होते ही पुरुष क्या रह जाता है (purush aur dhan-adhyamik sandesh)

भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि 
-----------------------------------------


तानींद्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव।
अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः क्षपोन सोऽष्यन्य एव भवतीति विचित्रमेतत्।।


                   हिंदी में भावार्थ-मनुष्य की इंद्रिया नाम,बुद्धि तथा अन्य सभी गुण वही होते हैं पर धन की उष्मा से रहित हो जाने पर पुरुष क्षणमात्र में क्या रह जाता है? धन की महिमा विचित्र है।
                   वर्तमान सन्दर्भ  में संपादकीय व्याख्या- इस सृष्टि को परमात्मा ने बनाया है पर माया की भी अपनी लीला है जिस पर शायद किसी का भी बस नहीं है। माया या धन के पीछे सामान्य मनुष्य हमेशा पड़ा रहता है। चाहे कितना भी किसी के पास आध्यत्मिक ज्ञान या कोई दूसरा कौशल हो पर पंच तत्वों से बनी इस देह को पालने के लिये रोटी कपड़ा और मकान की आवश्यकता होती है। अब तो वैसे ही वस्तु विनिमय का समय नहीं रहा। सारा लेनदेन धन के रूप में ही होता है इसलिये साधु हो या गृहस्थ दोनों को ही धन तो चाहिये वरना किसी का काम नहीं चल सकता। हालांकि आदमी का गुणों की वजह से सम्मान होता है पर तब तक ही जब तक वह किसी से उसकी कीमत नहीं मांगता। वह सम्मान भी उसको तब तक ही मिलता है जब तक उसके पास अपनी रोजी रोटी होती है वरना अगर वह किसी से अपना पेट भरने के लिये धन भिक्षा या उधार के रूप में मांगे तो फिर वह समाप्त हो जाता है।
                वैसे भी सामान्य लोग धनी आदमी का ही सम्मान करते है। कुछ धनी लोगों को यह भ्रम हो जाता है कि वह अपने गुणों की वजह से पुज रहे हैं। इसी चक्कर में कुछ लोग दान और धर्म का दिखावा भी करते हैं। अगर धनी आदमी हो तो उसकी कला,लेखन तथा आध्यात्मिक ज्ञान-भले ही वह केवल सुनाने के लिये हो-की प्रशंसा सभी करते हैं। मगर जैसे ही उनके पास से धन चला जाये उनका सम्मान खत्म होते होते क्षीण हो जाता है।

                   इसके बावजूद यह नहीं समझना चाहिये कि धन ही सभी कुछ है। अगर अपने पास धन अल्प मात्रा में है तो अपने अंदर कुंठा नहीं पालना चाहिये। बस मन में शांति होना चाहिये। दूसरे लोगों का समाज में सम्मान देखकर अपने अंदर कोई कुंठा नहीं पालना चाहिये। यह स्वीकार करना चाहिये कि यह धन की महिमा है कि दूसरे को सम्मान मिल रहा है उसके गुणों के कारण नहीं। इसलिये अपने गुणों का संरक्षण करना चाहिये। वैसे यह सच है कि धन का कोई महत्व नहीं है पर वह इंसान में आत्मविश्वास बनाये रखने वाला एक बहुत बड़ा स्त्रोत है। सच
 तो यह है कि खेलती माया है हम सोचते हैं कि हम खेल रहे हैं।
----------------- --------------------

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, September 26, 2009

मनुस्मुति-देह में होता है 12 प्रकार का मल (manu sandesh in hindi)

एका लिंगे गुदे त्रिस्त्रस्तथैकत्र करे दश।
उभयोः सप्त दातव्याः मृदः शुद्धिमभीप्सता।।
हिंदी में भावार्थ-
जो लोग पूर्ण रूप से देह की शुद्धता चाहते हैं उनके लघुशंका पर लिंग पर एक बार मल त्याग करने पर गुदा पर तीन बार तथा बायें हाथ पर दस बार एवं दोनों हाथों की हथेलियों और उसके पृष्ठ भाग पर सात बार मिट्टी (वर्तमान में साबुन भी कह सकते हैं) लगाकर जल से धोना चाहिये।

वसाशुक्रमसृंमज्जामूत्रविंघ्राणकर्णविट्।
श्नेष्माश्रुदूषिकास्वेदा द्वादशैते नृणां मलाः।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य की देह में बारह प्रकार का मल होता है-1.चर्बी, 2.वीर्य, 3.रक्त, 4.मज्जा, 5.मूत्र, 6.विष्ठा, 7.आंखों का कीचड़, 8.नाक की गंदगी, 9.कान का मैल, 10. आंसू, 11.कफ तथा 12. त्वचा से निकलने वाला पसीना।
कृत्वा मूत्रं पूरीषं वा खन्याचान्त उपस्मृशेत्।
वेदमश्येघ्यमाणश्च अन्नमश्नंश्च सर्वदा।।
हिंदी में भावार्थ-
मल मूत्र त्याग करने के बाद हमेशा हाथ धोकर आचमन करना के साथ ही दो बार मूंह भी धोना चाहिये। सदैव वेद पढ़ने तथा भोजन करने से पहले भी आचमन करना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-दरअसल जब शरीर की पवित्रता और अपवित्रता की बात कही जाती है तो आधुनिक ढंग से सोचने वाले उसे एक तरह से अंध विश्वास मानते हैं जबकि पश्चिम के वैज्ञानिक भी अब मानने लगे हैं कि शरीर को साफ रखने से उसे अस्वस्थ करने वाले अनेक प्रकार के सूक्ष्म कीटाणु दूर हो जाते हैं। जल न केवल जीवन है बल्कि औषधि भी है। यही बात वायु के संबंध में कही जाती है। प्रातः प्राणायम करने से आक्सीजन अधिक मात्रा में शरीर को प्राप्त होता है जिससे कि अनेक रोग स्वतः ही परे रहते हैं। वैसे अगर हम विचार करें तो देह अस्वस्थ हो और इलाज के लिये चिकित्सकों के घर जाकर नंबर लगायें उससे अच्छा तो यह है कि जल और वायु से अपने शरीर को स्वस्थ रखें।
भारतीय अध्यात्म के आलोचक आधुनिक विज्ञान की चकाचौंध  में इस बात को भूल जाते हैं कि बीमारी के इलाज से अच्छा तो स्वस्थ रहने के लिये प्रयास करने की बात तो पश्चिमी वैज्ञानिक भी मानते हैं। बिमारी
 आने पर इलाज कराने से तो अच्छा है कि स्वस्थ रहने का प्रयास किया जाए ।
--------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग ‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.अनंत शब्द योग
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Thursday, September 24, 2009

संत कबीरदास वाणी-सांसरिक शिक्षा देने वाले गुरू नहीं होते (kabir vani-teacher not as a guru)

पंख होत परबस पयों, सूआ के बुधि नांहि।
अंकिल बिहूना आदमी, यौ बंधा जग मांहि।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं बुद्धिमान पक्षी जिस तरह पंख होते हुए भी पिंजरे में फंस जाता है वैसे ही मनुष्य भी मोह माया के चक्र में फंसा रहता है जबकि उसकी बुद्धि में यह बात विद्यमान होती है कि यह सब मिथ्या है।
शब्द गुरु का शब्द है, काया का गुरु काय।
भक्ति करै नित शब्द की, सत्गुरु यौं समुझाय।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो गुरु जीवन रहस्यों का शब्द ज्ञान दे वही गुरु है। जो गुरु केवल भौतिक शिक्षा देता है उसे गुरु नहीं माना जा सकता। गुरु तो उसे ही कहा जा सकता है जो भगवान की भक्ति करने का तरीका बताता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वर्तमान शिक्षा पद्धति में विद्यालयों और महाविद्यालयों में अनेक शिक्षक छात्रों को अपनी अपनी योग्यता के अनुसार पाठ्यक्रमों का अध्ययन कराते हैं पर उनको गुरु की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वर्तमान शिक्षा के समस्त पाठयक्रम केवल छात्र को नौकरी या व्यवसाय से संबंधित प्रदान करने के लिये जिससे कि वह अपनी देह का भरण भोषण कर सके। अक्सर देखा जाता है कि उनकी तुलना कुछ विद्वान लोग प्राचीन गुरुओं से करने लगते हैं। यह गलत है क्योंकि भौतिक शिक्षा का मनुष्य के अध्यात्मिक ज्ञान से कोई संबंध नहीं होता।

उसी तरह देखा गया गया है कि अनेक शिक्षक योगासन, व्यायाम तथा देह को स्वस्थ रखने वाले उपाय सिखाते हैं परंतु उनको भी गुरुओं की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। हां, ध्यान और भक्ति के साथ इस जीवन के रहस्यों का ज्ञान देने वाले ही लोग गुरु कहलाते हैं। तात्पर्य यह है कि जिनसे अध्यात्मिक ज्ञान मिलता है उनको ही गुरु कहा जा सकता है। वैसे आजकल तत्वज्ञान का रटा लगाकर प्रवचन करने वाले भी गुरु बन जाते हैं पर उनको व्यापारिक गुरु ही कहा जाना चाहिये। सच्चा गुंरु वह है जो निष्काम और निष्प्रयोजन भाव से अपने शिष्य को अध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है। हमारे  भारतीय दर्शन  में अध्यात्म का ज्ञान देना वाले को ही गुरू माना जाता है।
 .....................................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Tuesday, September 15, 2009

भर्तृहरि नीति शतक-किसी के मुख की चाँद से तुलना निंदनीय (face and moon-hindi adhyatmik sandesh)

अजानन्दाहात्भ्यं पततु शालभे दीपदहने स मीनोऽप्यज्ञानाद्वडियुतमश्नातु पिशितम्।
विजानंतोऽप्येतेवयमिह विषज्जालजटिलाः न मुंजचामः कामानहह गहनो मोह महिमा

हिंदी में भावार्थ-अपने अज्ञान के कारण पंतगा दीपक की लौ की तरफ आकर्षित होकर उसमें प्रवेश कर प्राण गंवा देता है और मछली कांटे में फंस जाती है पर मनुष्य तो इस संसार में भोग विलास के में यह जानते हुए भी लिप्त होता है कि उसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-देखा जाये तो स्त्री के प्रति कवियों के मन में आकर्षण सदियों से है। वह उसकी देह की व्याख्या कर उसे बहुत सुंदर प्रतिपादित करते हैं जबकि देखा जाये तो स्त्री और पुरुष दोनों की देह मांस पिंड से ही बनी है। इस देह के साथ अच्छाई और बुराई दोनों ही समान रूप से जुड़ी हैं।
स्तनौ मांसग्रन्थी कनककलशावित्यूपमिती मुखं श्लेष्मागारं तदपि च शशांकेन तुलितम्।
स्रवमूलक्लिन्नं करिवरकरस्र्धि जघनंमुहूर्निद्यं रूपं कविजन विशेषैर्गुरुकृतिम्

हिंदी में भावार्थ-मांस पिण्ड से बनी नारी देह का कवियों ने बहुत घृणित ढंग से वर्णन किया है। वह खंखारने  और थूकने के लिये जो मुख उपयोग में आता है उसकी तुलना चंद्रमा से करते हैं जो कि निंदनीय है।

प्रत्येक मनुष्य की देह में विकार होते हैं। इतना ही नहीं हम अपने मुख से मिठाई खायें या करेला उनको हमारी देह के अंग ही कचड़े के रूप में परिवर्तित कर देते हैं। वह कचड़ा जब निष्कासन अंगों से बाहर आता है तो हम ही उसे देखना नहीं चाहते। कहने का तात्पर्य यह है कि यह देह मांस के पिंड से बनी है पर स्त्री की देह पर अनेक रसिक कवि ऐसी टिप्पणियां लिखते हैं जो हास्यास्पद और निंदनीय है। यह परंपरा आज भी चली आ रही है। हमारे यहां सूफी भक्ति की भी परंपरा शुरु हुई है पर उसमें गीत इस तरह लिखे गये जैसे वह निरंकार ईश्वर के लिये गाये जा रहे हैं पर उसे दैहिक प्रेम करने वाले लोग अपने संदर्भ में लेते हैं। फिल्मों में कई ऐसे गीत हैं जिनका सृजन तो निरंकार के लिये किया जाता है पर परदे के  दृश्य में नायक  और नायिका अपने प्रणय सबंधों का निर्वाह करती  दिखाई देती है।
पतंगा अपने अज्ञान के कारण दीपक की लौ में जलकर भस्म होता है पर उसे भी प्रेम का प्रतीक बना दिया गया है। एक तरह से रसिक कवि न केवल स्वयं ही अज्ञानता के अंधेरे में होते हैं बल्कि अपनी कविताओं से दूसरे लोगों को भी भ्रमित करते हैं।  अगर हम  वर्त्तमान में देखें तो इन्हीं रसिक कविताओं में समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग डूबा हुआ है। इसका कारण लोगों का अपने अध्यात्मिक  ज्ञान से दूर रहना ही है जिसके फलस्वरूप  वह आज के कवियों की अतार्किक कविताओं और गीतों से सजे बाजार के चंगुल में फंसे रहते हैं।
-------------------

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Monday, September 14, 2009

मनु स्मृति-गुणवान आदमी से मित्रता कर लें (gunvan se mitrata karen-manu smriti)

मनु महाराज कहते है कि
-----------------------------------
प्राज्ञं कुलीनं शूरं च दक्षं दातारमेव च।
कृतज्ञः धुतिमंत च कष्टमाहुररि बुधाः।।
हिंदी में भावार्थ-
बुद्धिमान, कुलीन, शूरवीर, चतुर, धर्मात्मा, धैर्यवान, तथा कृतज्ञ व्यक्ति पर विजय पाना कठिन है। ऐसे व्यक्ति से संधि कर लेना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-अनेक अवसर पर क्रोध अथवा विवाद के कारण आदमी अपनी बुद्धि पर नियंत्रण खो बैठता है और यही उसके लिये आपत्ति का कारण बनता है। क्रोध या निराशा की स्थिति क्षणिक और जीवन बहुत लंबा होता है। इसलिये अवसाद के क्षणों में भी बुद्धिमान, वीर, चतुर, धर्मात्मा तथा धैर्य धारण करने वाले व्यक्ति से विवाद मोल नहीं लेना चाहिये। जीवन में पता नहीं कम किस के सहयोग की आवश्यकता पड़ जाये। क्रोध और निराशा के क्षणिक आवेग में सुयोग्य व्यक्ति से बैर लेना भविष्य में उससे मिलने वाले सहयोग की अपेक्षाओं को समाप्त करना है। जब कोई आपत्ति आती है तब उससे निपटने के लिये योजनाबद्ध तरीके से निपटने के लिये कार्यक्रम बनाना, साधन जुटाना तथा नियत समय पर कार्यवाही करने के लिये जिस बौद्धिक चातुर्य की आवश्यकता होती है उसकी पूर्ति के लिये सुयोग्य व्यक्तियों का साथ होना जरूरी है। ऐसे लोगों के साथ हमेशा अच्छा व्यवहार रखना चाहिये।
अनेक लोगों को यह भ्रम होता है कि धनी, प्रतिष्ठित तथा बाहूबली लोगों के साथ मित्रता होने से ही सारे संकट दूर हो जायेंगे तो यह उनका भ्रम है। कुछ लोग तो ऐसे लोगों की संगत में शांतिप्रिय, धैयैवान तथा बुद्धिमान लोगों से बैर भी लेते हैं पर जब विपत्ति आती है तो उन्हें ऐसे ही लोगों की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि जीवन में अपने मित्र और सहयोगियों के संग्रह करते समय इस बात को अवश्य देखना चाहिये कि वह न केवल सुयोग्य हों बल्कि समय आपने पर मददगार भी हों। इसके लिये उनके साथ हमेशा सौहार्दपूर्ण संबंध रखें। गुणवान आदमी से संपर्क रखने  से अपने अन्दर भी उस जैसे गुण विकसित होता  हैं।
..............................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Friday, September 11, 2009

संत कबीर के दोहे-स्वयं अपनी तारीफ मत करो (kabir ke dohe-apni tarif mat karo)

आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।
दोष पराया देखि करि, चले हसन्त हसन्त।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?
अपना याद आवई, जाका आदि न अन्त।।
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों के दोष देखकर सभी हंसते हैं पर उनको अपनी देह के स्थाई दोष न तो याद आते हैं न दिखाई देते हैं जिनका कभी अंत ही नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने मूंह से आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा करना मानवीय स्वभाव है। अपने में कोई गुण न हो पर उसे प्रचारित करना और दूसरे के गुण की जगह उसके दुर्गुण की चर्चा करने में सभी को आनंद आता है पर किसी को अपने दोष नहीं दिखते। जितनी संख्या में लोग परमार्थ करने वाले नहीं है उससे अधिक तो उसका दावा करने वाले मिल जायेंगे। हम अपनी देह में अपने उपरी अंग ही देखते हैं पर नीचे के अंग नहीं दिखाई देते जो गंदगी से भरे रहते हैं चाणक्य महाराज के अनुसार उनको कभी पूरी तरह साफ भी नहीं रखा जा सकता। तात्पर्य यह है कि हम अपने दैहिक और मानसिक दुर्गंण भूल जाते हैं। संत कबीरदास जी कहते हैं कि अपने बारे में अधिक दावे मत करो अगर किसी ने उनका प्रमाण ढूंढना चाहा तो पूरी पोल खुल जायेगी। हम आपसी वार्तालाप में अनेक बार ऐसे दावे करते हैं जिनको सिद्ध करना कठिन होता है, लोग उन पर यकीन नहीं करते पर सामने कोई नहीं टोकता यह अलग बात है।
उसी तरह दूसरे की निंदा करने की बजाय अपने गुणों की सहायता से भले काम करने का प्रयास करें यही अच्छा रहेगा। आत्मप्रवंचना कभी विकास नहीं करती और परनिंदा कभी पुरस्कार नहीं दिलाती। यह हमेशा याद रखना चाहिये। अपनी प्रवंचना और दूसरे की आलोचना में समय ही नष्ट करना है और इसे बचने में सुख मिल सकता है।
.................................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, September 9, 2009

कबीर के दोहे-मनुष्य में ही विराजमान है ईश्वर (kabir ke dohe-nar men hi narayan

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि
---------------------------
नर नारायन रूप है, तू मति जाने देह।
जो समझे तो समझ ले, खलक पलक में खेह।।

मनुष्यों तुम अपने को देह मत समझो बल्कि स्वयं को परमात्मा ही समझो। यह शरीर तो जड़ है और उसमें सांस प्रवाहित कर रहा आत्मा है वही स्वयं को समझो। यह समझ लो यह शरीर एक दिन माटी हो जायेगा पर आत्मा तो अमर है।
आंखि न देखि बावरा, शब्द सुनै नहिं कान।
सिर के केस उज्जल भये, अबहुं निपट अजान।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि संसार के लोग आंख से देखने और कान से ज्ञान समझने सुनने का काम नहीं कर पाते। उनके सिर के बाल सफेद हो जाते हैं पर फिर भी अज्ञानी बने रहते हैं।

वर्तमान सदंर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारा अध्यात्मिक दर्शन स्पष्ट करता है कि यह शरीर पंच तत्वों से बना है और उसमें मन, बुद्धि और अहंकार की प्रवृति स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहती हैं। आंख हैं तो देखती है, कान हैं तो सुनते हैं, नासिका है तो सुगंध ग्रहण करती है, मुख है तो भोजन ग्रहण करता है और मस्तिष्क है तो विचार करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि गुण ही गुणों को बरत रहे हैं पर हम सोचते हैं कि यह सभी हम कर रहे हैं हृदय में दृष्टा भाव होने की जगह कर्तापन का अहंकार आ जाता है। इसी अहंकार में मनुष्य के बाल सफेद हो जाते हैं पर वह अज्ञान के अंधेरे में ही अपना जीवन गुजार देता है।
हम आत्मा हैं और परमपिता का अंश है। यह आत्मा अनश्वर है पर हम अपने नष्ट होने के भय में रहते हैं। कर्तापन का अहंकार हमें माया का गुलाम बनाकर रख देता है। संत कबीर दास जी के मतानुसार सत्य का ज्ञान प्राप्त कर हमें अपने अंदर आत्मविश्वास पैदा करना चाहिये कि हम परमात्मा का अंश या स्वरूप हैं। जिस परमात्मा को हम दर दर ढूंढते हैं वह हम स्वयं ही हैं या कहें कि वह हमारे अंदर ही हैं। जरूरत है तो बस शब्द ज्ञान को समझने की है। इस संसार में आकर अपने दैहिक कर्तव्य पूरा तो करना चाहिये पर अपनी बुद्धि और मन को उसमें अपनी संलिप्पता की अनुभूति से परे रखें।
...........................................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, September 5, 2009

चाणक्य दर्शन-ज्ञानी के लिए परमात्मा का वास सभी जगह (For knowledge of God resides everywhere)

अग्निर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि दैवतम्।
प्रतिभा स्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनाम्
हिंदी में भावार्थ
-द्विजातियां अपना देव अग्नि, मुनियों का देव उनके हृदय और अल्प बुद्धिमानों के लिये देव मूर्ति में होता है किन्तु जो समदर्शी तत्वज्ञानी हैं उनका देव हर स्थान में व्याप्त है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सकाम भक्ति करने वाले हवन, यज्ञ तथा भोजन दान करते हैं। उनके लिये देवता अग्नि है। जो सात्विक भक्ति करता हैं उनके लिये सभी के दिल में भगवान है। जो लोग एकदम अज्ञानी है वह केवल मूर्तियों में ही भगवान मानकर उनकी पूजा करते है। उनको किसी अन्य प्रकार के काम से कोई मतलब नही होता-न वह किसी का परोपकार करते हैं न ही सत्संग के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा उनके मन में आती है। सच्चा ज्ञानी और योगी वही है जो हर जगह उस ईश्वर का वास देखता है।
इस विश्व में अज्ञानी और स्वार्थी लोगों की भरमार है। लोगों ने धर्म से ही भाषा, ज्ञान, विचार, और व्यापार को जोड़ दिया है। आपने देखा होगा कि कुछ लोग धर्म परिवर्तन करते हैं तो अपना नाम भी बदल देते हैं। वह लोग अपने इष्ट के स्वरूप में बदलाव कर उसे पूजने लगते हैं। कहने को भले ही उनका धर्म निरंकार का उपासक हो पर कर्म के आधार पर मूर्तिमान को भजते दिखते हैं-उनका देव भले ही निरंकार हो पर धर्म एक तरह से मूर्तिमान होता है। कहने को सभी धर्माचार्य यही कहते हैं कि इस विश्व में एक ही परमात्मा है पर इसके पीछे उनकी चालाकी यह होती है कि वह केवल अपने वाले ही स्वरूप को इकलौता सत्य बताते हुए प्रचार करते हैं-कभी किसी दूसरे धर्म के स्वरूप पर बोलते कोई धर्माचार्य दिखाई नहीं देता। अलबत्ता भारत धर्मों से जुड़े के कुछ तत्वज्ञानी संत कभी अपने अंदर ऐसे पूर्वाग्रह के साथ सत्संग नहीं करते। वैसे भी भारतीय धर्म की यह खूबी है कि वह इस संसार में व्यापक दृष्टिकोण रखते हैं और केवल मनुष्य की बजाय सभी जीवों-यथा पशु पक्षी, जलचर, नभचर और थलचर-के कल्याण जोर दिया जाता है।
...................................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, September 2, 2009

कबीर दर्शन-दूसरे का दोष देखकर तो सभी हँसते हैं (kabir darshan-dosron ke dosh)

आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?
दोष पराया देखि करि, चले हसन्त हसन्त।
अपना याद आवई, जाका आदि न अन्त।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों के दोष देखकर सभी हंसते हैं पर उनको अपनी देह के स्थाई दोष न तो याद आते हैं न दिखाई देते हैं जिनका कभी अंत ही नहीं है।
आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने मूंह से आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा करना मानवीय स्वभाव है। अपने में कोई गुण न हो पर उसे प्रचारित करना और दूसरे के गुण की जगह उसके दुर्गुण की चर्चा करने में सभी को आनंद आता है पर किसी को अपने दोष नहीं दिखते। जितनी संख्या में लोग परमार्थ करने वाले नहीं है उससे अधिक तो उसका दावा करने वाले मिल जायेंगे। हम अपनी देह में अपने उपरी अंग ही देखते हैं पर नीचे के अंग नहीं दिखाई देते जो गंदगी से भरे रहते हैं चाणक्य महाराज के अनुसार उनको कभी पूरी तरह साफ भी नहीं रखा जा सकता। तात्पर्य यह है कि हम अपने दैहिक और मानसिक दुर्गंण भूल जाते हैं। संत कबीरदास जी कहते हैं कि अपने बारे में अधिक दावे मत करो अगर किसी ने उनका प्रमाण ढूंढना चाहा तो पूरी पोल खुल जायेगी।
उसी तरह दूसरे की निंदा करने की बजाय अपने गुणों की सहायता से भले काम करने का प्रयास करें यही अच्छा रहेगा। आत्मप्रवंचना कभी विकास नहीं करती और परनिंदा कभी पुरस्कार नहीं दिलाती। यह हमेशा याद रखना चाहिये।
.................................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Tuesday, September 1, 2009

संत कबीर वाणी-विवेक नष्ट होने पर अच्छे बुरे की पहचान नहीं रहती (sant kabir vani-achche bure ki pahachan)

फूटी आँख विवेक की, लखें न संत असतं
जिसके संग दस बीच हैं, ताको नाम महंत

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जिन लोगों की ज्ञान और विवेक नष्ट हो गये है वह सज्जन और दुर्जन का अन्तर नहीं बता सकता है और सांसरिक मनुष्य जिसके साथ दस-बीस चेले देख लेता है वह उसको ही महंत समझा करता है.
बाहर राम क्या दिखराइये, अन्तर जपिए राम
कहा काज संसार से, तुझे घनी से काम

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दिखावटी रूप से राम का भजन करने से कोई लाभ नहीं होता. राम का स्मरण हृदय से करो. इस संसार में तुम्हारा क्या काम है तुम्हें तो भगवान का स्मरण मन में करना चाहिऐ.

वर्तमान सन्दर्भ में व्याख्या-लोगों की बुद्धि जब कुंद हो जाती है तब उनको सज्जन और दुर्जन व्यक्ति की पहचान नहीं रहती है। सच बात यही की इसी कारण अज्ञानी व्यक्ति संकटों में फंस जाते हैं। झूठी प्रशंसा करने वाले, चिकनी चुपड़ी बातें कर अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले, पहले दूसरों की निंदा करने के लिए प्रेरित कर फ़िर झगडा कराने वाले लोग इस दुनिया में बहुत हैं। ऐसे दुष्ट लोगों की संगत से बचना चाहिए। इसके अलावा ऊंची आवाज़ में भक्ति कर लोगों में अपनी छबि बनाने से भी कोई लाभ नहीं है। इससे इंसान अपने आपको धोखा देता है। जिनके मन में भगवान् के प्रति भक्ति का भाव है वह दिखावा नहीं करते। मौन रहते हुए ध्यान करना ही ईश्वर सबसे सच्ची भक्ति है।
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Monday, August 31, 2009

रहीम दर्शन-अहंकारी को जागृत करना व्यर्थ (ahankar aur jagran-rahim ke dohe)

कदल सीप भुजंग मुख, स्वाति एक गुन तीन
जैसी संगति बैठिए, तैसोई फल दीन

कविवर रहीम कहते हैं कि कि स्वाति नक्षत्र की वर्षा की बूंदें कदली में प्रवेश कर कपूर बना जाता है, समुद्र की सीपी में जाकर मोती का रूप धारण कर लेता है और वही जल सर्प के मुख में जाकर विष बन जाता है।
अनकीन्ही बातें करै, सोवत जागै जोय
ताहि सिखाय जगायबो, रहिमन उचित न होय

कविवर रहीम कहते हैं कि कई लोग ऐसे हैं जो कहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं। ऐसे लोग जागते हुए भी सोते हैं। ऐसे अहंकारी व्यक्ति को सिखाना या जागृत करना बिल्कुल व्यर्थ है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में ऐसे व्यक्तियों की अभाव नहीं है जो अपनी कथनी और करनी में भारी भेद प्रकट करते हुए थोड़ा भी संकोच अनुभव नहीं करते। एक तरफ वह आदर्श की बात करते हुए नहीं थकते पर दिन भर वह माया के फेरे में सारी नैतिकता को तिलांजलि देते हैंं। अगर ऐसा न होता तो इस देश में इतने सारे साधु और संत और उनके करोड़ों शिष्य हैं फिर भी पूरे देश मेंे अनैतिकता, भ्रष्टाचार, गरीबों और परिश्रमियों का दोहन तथा अन्य अपराधों की प्रवृतियों वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। आजकल ईमादारी से संग्रह करना कठिन हो गया है। इसका आशय यह है कि जो कमा रहे हैं वही दान कर रहे हैं और अपने गुरुओं के आश्रमों में भी उपस्थिति दिखाते हैं। हर जगह धन सम्राज्य है पर माया से दूर रहने की बात सभी करते हैं। अपराधी हो या सामान्य आदमी भक्ति जरूर करते दिखते हैं। अपराधी अपने दुष्कर्म से बाज नहीं आता और सामान्य आदमी को अपने काम से ही समय नहीं मिलता। बातें सभी आदर्श की करते हैं। यही भेद है जिसके कारण देश में अव्यवस्था फैली है।

इसके अलावा सभी लोग भले आदमी से संगति तो करना ही नहीं चाहते। जो समाज को अपनी शक्ति से आतंकित कर सकता है लोग उससे अपने संपर्क बनाने को लालायित रहते हैं। वह सोचते हैं कि ऐसे असामाजिक तत्व समय पर उनके काम में आयेंगे पर धीरे-धीरे उनके संपर्क में रहते हुए उनका स्वयं का नैतिक आचरण पतन की ओर अग्रसर हो जाता है। संगति का प्रभाव होता है-यह बात निश्चित है। अगर किसी शराबी के पास कोई व्यक्ति बैठ जाये तो उसकी बातें सुनकर उसका स्वयं का मन वितृष्णा से भर जाता है और वही व्यक्ति किसी सत्संगी के पास बैठे तो उसमें अच्छे और सुंदर भावों का प्रवाह अनभूति कर सकता है। अतः अपने लिये हमेशा अच्छी संगति ही ढूंढना चाहिए।
-------------------------------------


दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

अध्यात्मिक पत्रिकाएं