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Friday, June 26, 2015

नौकरी करने से कोई खुश नहीं रह सकता-भृर्तहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(service not ceticfise any time-A Hindu hindi thought article on bhartrihair neeti shatak)

                              हमारे यहां देशी पद्धति से चलने वाले गुरुकुलों की जगह अब अंग्रेजी शिक्षा से चलने वाले विद्यालय तथा महाविद्यालय  अस्तित्व में आ गये है। अंग्रेजी पद्धति की शिक्षा में केवल गुलाम ही पैदा होते हैं। आज हम देख रहे हैं कि जिस युवा को  देखो वही नौकरी की तरफ भाग रहा है। पहले तो सरकारी नौकरियों में शिक्षितों का रोजगार लग जाता था पर उदारीकरण के चलते निजी क्षेत्र का प्रभाव बढ़ने से वहां रोजी रोटी की तलाश हो रही है।  हमारी शिक्षा पद्धति स्वतंत्र रूप से कार्य करने की प्रेरणा नहीं देती और उसका प्रमाण यह है कि जिन लोगों ने इस माध्यम से शिक्षा प्राप्त नहीं की या कम की वह तो व्यवसाय, सेवा तथा कला के क्षेत्र में उच्च स्थान पर पहुंच कर उच्च शिक्षित लोगों को अपना मातहत बनाते हैं।  निजी क्षेत्र की सेवा में तनाव अधिक रहता है यह करने वाले जानते हैं।  फिर आज के दौर में अपनी सेवा से त्वरित परिणाम देकर अपने स्वामी का हृदय जीतना आवश्यक है इसलिये तनाव अधिक बढ़ता है।

मनुस्मृति में कहा गया है कि
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मौनान्मुकः प्रवचनपटुर्वातुलो जल्पको वा धृष्टःपार्श्वे वसति च सदा दूरतश्चाऽप्रगल्भः।।
क्षान्या भीरुर्यदि न सहते प्रायशो नाभिजातः सेवाधर्मः परमराहनो योगिनामध्प्यसभ्यः।

                              हिंदी में भावार्थ-सेवक यदि मौन रहे तो गूंगा, चतुर और वाकपटु हो तो बकवादी, समीप रहे तो ढीठ, दूर रहे तो मूर्ख, क्षमाशील हो तो भीरु और  असहनशील हो तो अकुलीन कहा जाता है। सेवा कर्म इतना कठिन है कि योग भी इसे समझ नहीं पाते।
       आजकल कोई भी स्वतंत्र लघु व्यवसाय या उद्यम करना ही नहीं चाहता। अंग्रेजी पद्धति से शिक्षित युवा  नौकरी या गुलामी के लिये भटकते हैं। मिल जाती है तब भी उन्हें चैन नहीं मिलता।  निरंतर उत्कृष्ट परिणाम के प्रयासरत रहने के कारण उन्हें अपने जीवन के अन्य विषयों पर विचार का अवसर नहीं मिल पाता जिससे शनैः शनैः उनकी बौद्धिक शक्ति संकीर्ण क्षेत्र में कार्यरत होने की आदी हो जाती है।  न करें तो करें क्या? बहरहाल सेवा या नौकरी का कार्य किसी भी तरह से आनंददायी नहीं होता।  यहां तक कि योगी भी इसे नहीं समझ पाते इसलिये ही वह सांसरिक विषयों में एक सीमा तक ही सक्रिय रहते हैं।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Wednesday, June 24, 2015

शायद इसलिये योग साधना को एकांत का विषय माना जाता है-हिन्दी चिंत्तन लेख(shayad isliye yog sadhna ko ekant ka vishay mana jata hai-hindi thought aritcle)


              योग साधना काो हमारे अध्यात्मिक शायद इसलिये ही एकांत का विषय मानते हैं क्योंकि न करने वालों का इसके बारे में ज्ञान होता नहीं है इसलिये ही साधक की भाव भंगिमाओं पर हास्यास्पद टिप्पणियां करने लगते हैं।  ताजा उदाहरण रेलमंत्री सुरेश प्रभु का विश्व 21 जून 2015 के अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर शवासन करने पर उठे विवाद से है। वह  शवासन के दौरान इतना  तल्लीन हो गये कि उन्हें जगाने के लिये एक व्यक्ति को आगे आना पड़ा।  नियमित योग साधकों के लिये इसमें विस्मय जैसा कुछ नहीं है। कभी कभी शवासन में योग निद्रा आ जाती है।  इसे समाधि का संक्षिप्त रूप भी कहा जा सकता है।  इस प्रचार माध्यम जिस तरह सुरेश प्रभु के शवासन के समाचार दे रहे हैं उससे उनके यहां काम कर रहे वेतनभोगियों के ज्ञान पर संदेह होता है।
                              हमारा अनुभव तो यह कहता है कि नियमित योग साधक प्रातःकाल जल्दी उठने के बाद अपने नित्य कर्म तथा साधना से निवृत्त होने के बाद अल्पाहार करते हैं तब चाहें तो शवासन कर सकते हैं। इस दौरान वह योगनिद्रा अथवा संक्षिप्त समाधि का आनंद भी ले सकते हैं। इस दौरान निद्रा आती है पर उस समय देह वायु में उड़ती अनुभव भी होती है।  इस लेखक ने अनेक बार शवासन में निद्रा और समाधि दोनों का आनंद लिया है। शवासन की निद्रा को सामान्य निद्रा मानना गलत है क्योंकि उसमें सिर पर तकिया नहीं होता। गैर योग साधकों के लिये तकिया लेकर भी इस तरह निद्रा लेना सहज नहीं है।  विशारदों की दृष्टि से  शवासन में निद्रा आना अच्छी बात समझी जाती है।
                              हमें यह तो नहीं मालुम कि सुरेश प्रभु शवासन के दौरान आंतरिक रूप से किस स्थिति में थे पर इतना तय है कि इसमें मजाक बनाने जैसा कुछ भी नहीं है।  वैसे भी योग साधकों को सामान्य मनुष्यों की ऐसी टिप्पणियों से दो चार होना पड़ता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, June 20, 2015

21 जून विश्व योग दिवस पर सभी को बधाई-हिन्दी चिंत्तन लेख(congretulation on international yoga day,world yoga day,vishwa yoga diwas-hindi thought article)

                              कल यानि 21 जून 2015 को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जा रहा है। एक योग साधक होने के साथ ही अंतर्जाल लेखक होने के कारण इस विषय पर अनेक पाठ लिखे।  दरअसल योग साधना पर यह लेखक आठ वर्षों से लिख रहा है।  विश्व योग दिवस पर लिखे गये हाल के पाठों से अधिक तो पूर्व में प्रकाशित पढ़े गये। पतंजलि योग साहित्य तथा श्रीमद्भागवत गीता से संबद्ध लेखों का निरंतर पढ़ा जाना इस बात का परिचायक तो था कि योग का का प्रचार बढ़ रहा है पर जिस तरह संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व योग दिवस मनाने का निर्णय लिया उसने एक योग साधक के रूप में हमें परम आनंद का अनुभव हुआ।
                              हम देख रहे हैं कि भारत के कथित रूप से समाज पर मनुष्य मन के आधार पर उसे भय दिखाकर नियंत्रण करने वाले अनेक धार्मिक ठेकेदारों की हवाईयां उड़ी हुई हैं।  यह भारत ही है जहां लोकतंत्र के चलते यही रहने वाले अनेक सामुदायिक ठेकेदारों ने योग विद्या पर न केवल विरोध दर्ज कराया वरन् जहां रुकावट डाल सकते हैं वहां डाली भी।  योग विरोधी की पहचान स्थापित कर भारतीय समाज से प्रथक दिखने के प्रयास से उन्हें भय तो तब होता जब हमारे टीवी चैनल अपने व्यवसायिक हितों के लिये निक्ष्पक्षता दिखाने के नाम पर उनके बयानों को बढ़ा चढ़ा कर पेश नहीं करते।  एक दो विरोधी को दस समर्थकों से अधिक बोलने का अवसर मिले तो वह किसलिये डरेंगेएक या दो योग विरोधी संपूर्ण भारतीय वैचारिक आधार पर से अलग चलने वाले समुदायों के प्रमाणिक प्रतिनिधि बनाकर इस तरह पेश किये गये जैसे कि वह मत से निर्वाचित हुए हों।  अपने समुदाय के इष्ट के दरबार में स्वामी बनना या किताबों को पढ़कर ज्ञान बेचने वाला जनमत से निर्वाचित प्रतिनिधि से बड़ा हो सकता है इस तरह की सोच भारत के कुछ टीवी चैनलों ने दिखाई।  पहली बार पता लगा कि समाज को एक रूप दिखाने क इच्छुक विद्वान ढोंगी हैं क्योंकि जब भी अवसर आता है उन्हें कभी इस तो कभी उस समुदाय की पहचान अलग बनाये रखने का प्रयास वही करते हैं ताकि फूट पर उनकी रोटी चलती रहे।
                              एक योग साधक होने पर हमें अंतर्जाल पर लिखने का अवसर मिला है इसलिये उसका जमकर उपयोग करते हैं। हमारा मानना है कि भारतीय योग शिक्षकों  प्रगतिशील और जनवादियों की सोच के जाल में फंसकर योग प्रचार प्रसार में समस्त समुदायों को एक माला में पिरोने के प्रयास की बजाय भारतीय धािर्मक विचाराधाराओं से जुड़े समुदायों को ही इसके लिये प्रेरित करना चाहिये था।  गैर भारतीय विचाराधारा वाले समुदायों में  अपनी छवि बनाने के प्रयास में मूल योग तत्वों का प्रचार ठीक ढंग से ही नहीं हो पाया-इसके विपरीत गैर भारतीय विचाराधारा  वाले समुदायों के ठेकेदार इसे एक शारीरिक व्यायाम बताकर समर्थन करते रहे-इस शर्त पर इसमें ओम या अन्य भारतीय धर्म ग्रंथों के मंत्र तथा सूर्य नमस्कार इसमें  शामिल नहीं हुआ।  हैरानी की बात है कि योग के शिखर पुरुष इसे मानते चले गये।  अब हमारी चिंता यह है कि  गैर भारतीय विचाराधारा वाले समुदाय के लोग शायद ही योग साधना करें पर भारतीय विचाराधारा वाले समुदाय जरूर भ्रमित न हो जायें कि यह तो केवल शारीरिक व्यायाम वाली विधा है।
                              योग का छद्म समर्थक बनते हुए कुछ समुदायों के लोगों ने कहा कि योग का धर्म से संबंध नहीं है।  यह हास्यास्पद तर्क वास्तविक समर्थकों ने भी दिया।  हम स्पष्ट कर दें कि योग अपने आप  में एक धर्म है। धर्म से संबंध न होता तो यह आज भी यह पतंजलि योग साहित्य तथा श्रीमद्भागवत गीता प्रासंगिक नहीं होती।  योगेश्वर श्रीकृष्ण ने धर्म पर चलने का मार्ग ही योग को बताया है।
                              इन विवादों से परे हटते हुए हम भारतीय विचारधारा के आधार पर चलने वाले अपने सहधर्मी लोगों को स्पष्ट कर दें कि ओम अक्षर परब्र्रह्म का रूप है।  हर आसन और प्राणायाम के समय इसकी जो ध्वनि हृदय में बजती है उसे सुने।  इससे देह के हर अंग में एक नयी स्फूर्ति का अनुभव होगा।  दिन में जब भी अवसर मिले ओम का जाप करते हुए ध्यान लगायें।  हमें स्वयं तेजस्वी बनने के साथ ही अपने परिवार तथा समाज को इस पथ पर चलने के लिये प्रेरित करें न कि दूसरे समुदायों से प्रशंसा पाने के प्रयास में इसके मूल तत्वों से बचने में अपना समय बर्बाद करें।
          अपने सभी पाठकों, ब्लॉग लेखक मित्रों, तथा फेसबुक पर सक्रिय प्रशंसकों को विश्व योग दिवस की हार्दिक बधाई।  एक दिन पहले इसलिये दे रहे हैं क्योंकि प्रातःकाल  हमारा समय योग साधना में गुजर जाता है। बाद में आकर देना बासी लगेगा।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
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Wednesday, June 17, 2015

योग साधक वातावरण विषाक्त नहीं करते-21 जून विश्व योग दिवस पर विशेष हिन्दी लेख(yog sadhak vatavaran vishakt nahin karte-A Hindu hindu thought article on world yoga day,hindi editorial on vishwa yoga diwas)

                               संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने योग के बारे में सकारात्मक टिप्पणी कर पूरे विश्व को भारतीय योग विद्या के बारे जो जाग्रति पैदा की है, वह प्रशंसनीय है। जहां पूरे विश्व में योग साधना के बारे में प्रचार हो रहा है वहीँ  भारत में ही इसके विरोध का भी ऐसा रूप सामने आ रहा है जो भावनात्मक कम पेशवर ज्यादा लगता है। विरोध के लिए ही इसका विरोध हो रहा है और प्रचा माध्यम अपने व्यावसायिक हितों के लिए निष्पक्षता के नाम पर  इसे प्रश्रय दे रहे हैं   जैसे जैसे येाग 21 जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का समय पास आ रहा है वैसे भारत में इस पर विवादास्पद बयान देकर सनसनी पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रचार माध्यम भी ऐसे बयानों को खूब चटखारे लेकर सुना रहे हैं।  योग का विरोध करने वालों पर हमें कुछ नहीं कहना है पर योग समर्थक भी विरोधियों के वक्तव्यों को चुनौती देने के लिये जिस तरह हल्के वक्तव्य दे रहे हैं उससे तो यह नहीं लगता कि वह कोई योग साधना करते हों।
                              एक योग साधक जानता है कि अभद्र एक शब्द का दूसरा अभद्र शब्द विकल्प नहीं हो सकता। योग के विरोध में हो या समर्थन में अभद्र शब्द वातावरण को प्रदूषित करता है। जिनके चेहरे भावहीन, चरित्र छिद्रमय और चाल में घबड़ाहट है वह योग का विरोध करते ही हैं-अपने विलासी जीवन से आये आलस्य के भाव के बंधन में पड़े ऐसे लोग सक्रिय योगियों से उनकी सक्रियता के कारण चिढ़ते भी हैं।  उनके अभद्र शब्दों की परवाह योग साधक नहीं करते पर उनके प्रत्युत्पर में योग साधना के वह समर्थक जो प्रचार में केवल नाम पाना चाहते हैं जब उत्तर में अभद्र शब्द प्रयोग करते हैं तब उन पर भी संदेह होता है कि वह शायद ही योग साधना करते हों।  योग साधकों के मुख से निकले शालीन शब्द भी जब विरोधी की तरफ तीर की तरह जाते हैं तो वह जवाब देने की स्थिति में नहीं रहता।  अन्य सुनने वालों को भी ऐसे शब्द कर्णप्रिय लगते हैं।  योग साधना में निरतंर अभ्यास से व्यक्ति की वाणी, व्यक्तित्व तथा विचार इतना तेजस्वी हो जाता है कि उसका हर शब्द आलोचक के के लिए शूल या तीर का काम करता है।
                              योग साधक का वाणी पर संयम स्वाभाविक रूप से रहता है।  संयम का अर्थ यह कदापि नहीं है कि प्रतिकूल व्यक्ति, विचार या वाणी का विरोध न किया जाये वरन् योग साधना से बिना वातावरण को विषाक्त किये उनको  अनुकूल बनाने की कला योग साधक में होती है।  इसलिये जो वास्तव में योग साधना के समर्थक हैं उन्हें इसका निंरतर अभ्यास भी करना चाहिये तभी वह वातावरण को विषाक्त बनाने के दोष से मुक्त हो पायेंगे।  योग साधना के प्रचार प्रसार में इस बात का ध्याना रखना चाहिये कि अन्य समुदायों के लोग इसे बाध्य होकर नहीं वरन् प्रेरित होकर अपनायें।
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