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Wednesday, November 18, 2015

भारत में सहशिक्षा पर विचार करना आवश्यक(Bharat mein Sahshiksha par vichar karna Awashyak)


                                   
                                   भारत में छात्र छात्राओं की सहशिक्षा पर सदैव विवाद चलता रहा है। जहां आधुनिकतावादी सहशिक्षा को पौंगपंथी मानते हैं वह सामाजिक, धार्मिक तथा स्वास्थ्य विशेषाज्ञों का एक समूह आज भी इसका समर्थक है।  केरल के शिक्षामंत्री ने कहीं कह दिया कि महाविद्यालय में लड़के लड़कियों को एक साथ नहीं बैठना चाहिये। इसे प्रचार माध्यम विवादित कहकर शोर मचा रहे हैं।
                                   इस तरह के बयान पहले भी आते रहे हैं जिन्हें दकियानूसी कहकर खारिज किया जाता है पर सवाल यह है कि क्या हम आधुनिक दिखने के प्रयास में प्राकृत्तिक सिद्धांतों की अनदेखी तो नहीं कर रहे।
                                   भारत को विश्व में समशीतोष्ण जलवायु वाला माना जाता हैं। यहां गर्मी और सर्दी अधिक पड़ती हैं।  अशिक्षा, गरीबी तथा बेकारी के कारण जनसंख्या बढ़ती है। कहा जाता है कि जहां विकास हो वहां जनंसख्या नियंत्रण स्वयं हो जाता है। भारत में उष्णता की प्रचुरता के कारण यौनिक उन्माद की प्रवृत्ति अधिक मानी जाती है। हम यह भी देख रहे हैं कि युवा रिश्तों में खुलेपन की वजह से अनेक प्रकार के संकट भी पैदा हो रहे हैं।  सबसे बुरी बात यह कि शैक्षणिक संस्थानों में जिन्हें मंदिर भी कहा जाता है वहां सहशिक्षा के चलते लड़के लड़कियों के बीच पाठयक्रम की कम अन्य विषयों पर चर्चा अधिक होती है। वहां परंपरागत खेलों की जगह प्रेम या मित्रता के नाम पर खेल होने लगता है। हम भारत की किसी भी भाषा में बनी फिल्म को देखें तो पायेंगे कि शैक्षणिक संस्थान केवल प्रेम करने के लिये ही होते हैं।  फिल्मों का प्रभाव समाज पर कितना है हम सभी जानते हैं और इनकी देखादेखी जहां सहशिक्षा है वहां अनेक ऐसी घटनायें सामने आती हैं जो बताती हैं कि वास्तव में अब विचार किया जाना चाहिये।
                                   पहले तो मनुष्य में दैहिक तथा मानसिक संयम अधिक होता था पर आज तो उसकी शक्ति का हृास हो गया है। ऐसे में ऐसी राय ठीक है पर कोई न माने यह अलग बात है पर कम से कम शोर तो न मचाये। हम अपने देश में जिस तरह अनेक  छात्र तथा छात्राओं के शिक्षा से इतर गतिविधियों से उनके पालको परेशान देखते हैं उससे तो यह लगता है कि अब भी छात्र छात्राओं के लिये प्रथक शैक्षणिक संस्थान बने रहना जरूरी है। कम से कम भारत में जो सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक स्थिति है उसे देखते हुए तो यही कहा जा सकता है। सुप्रभात
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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