समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
-------------------------


Wednesday, May 28, 2014

यात्रायें तो सपने जैसी होती हैं-हिन्दी चिंत्तन लेख(treval only as a as dream-hindi thought article)



      यात्रा और यंत्रणा-हिन्दी के यह दो शब्द स्वर की वजह से थोड़ा आपस में मेल खाते हैं मगर भाव की दृष्टि से इनका आपस में कोई संबंध नहीं है। यात्रा का उर्दू पर्यायवाची शब्द सफर है जिसे अंग्रेजी के सफर यानि कष्ट से जोड़कर कहा जाता है कि सफर तो सफर होता है। वैसे देखा जाये तो यात्रा का यंत्रणा शब्द को भाव से जोड़ा जाये तो भी बुरा नहीं है। 
      जब हम अपने घर से बाहर की यात्रा करने निकलते हैं तो लगता है कि अब बाहर वैसा सुख तो मिलने से रहा जैसा कि घर में मिल रहा है। यह सोच नकारात्मक लगती जरूर है पर यही प्रेरणादायक भी होती है। यात्रा का उद्देश्य सामाजिक, धार्मिक या आर्थिक लक्ष्य की पूर्ति करना  हो तो स्वतः ही यंत्रणा की बात छोटी लगती है। उस दिन हमें रात्रि को घर से बाहर से निकलते समय इस बात का आभास था कि हम दैनिक सुखों का त्याग कर जा रहे हैं पर अपना उद्देश्य उस भाव का हृदय से विलोपित कर रहा था। यात्रा की यंत्रणा तो हमेशा की तरह प्रारंभ हो गयी जब घर से स्टेशन तक ऑटो ढूंढने निकले।  ऑटो वाला अस्सी रुपये मांग रहा था और हमारा मानना था कि यह राशि साठ रुपये से अधिक नहीं होना चाहिए।  उस समय दूसरा ऑटो दिख नहीं रहा था इसलिये हमें झुकना पड़ा।  अर्थशास्त्र का विद्यार्थी होने के नाते  हमें मांग तथा आपूर्ति का नियम मालुम है इसलिये बीस रुपये ज्यादा देने की पीड़ा हजम कर गये।
      पूरी रात रेल में नींद नहीं आयी और इसलिये कोटा शहर में पूरा दिन सिर दर्द के साथ गुजरा।  यह तो गनीमत थी कि योगभ्यास की वजह से बीच बीच में आसनों से ऊर्जा का संचय करते रहे। नींद नहंी आयी इस पर भी विरोधाभास हो सकता है।  हमें लगता था कि हमें नींद  आयी थी पर सोच यही थी कि नहीं आयी।  यह सोच भी देह का संतुलन बिगाड़ रही थी। हुआ यूं कि हमने लगातार नींद नहीं ली थी।  रात को अनेक बार ऐसा लगता था कि हम अभी जगे हैं पर सोचते थे कि हम सोये ही नहीं हैै।
      भरी दोपहरिया में जब रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ हो गया हो तब आसमान से आग बरसती है और सूर्य नारायण सिर पर इस तरह विराजते हैं कि बस अब भस्म कर देंगे।  देह में ंरोम रोम जल रहा हो तब दिमाग को शंात रखकर ही तनाव से बचा जा सकता है।  इधर गर्मियों में वातानुकूल और गर्म वातावरण के बीच हम झूलते रहे हैं इसलिये जुकाम तो बना ही हुआ है।  भरी दोपहरिया में हम नाक से जुकाम निकालकर बाहर फैंकते हैं।  कई बार गला खंखार का थूक से बाहर वह आ ही जाता है।  रात में अपने घर से लाया गया सात लीटर पानी चूक गया था।  स्टेशन पर ठंडा पानी पिया यह जानते हुए भी कि वह अंदर जुकाम की श्रीवृद्धि करेगा।
      आज सुबह घर लौटे।  रात भर बस में नींद के साथ वैसा ही खेल चला जैसा कि पहले रेल में चला था।  हमें यह यात्रा यंत्रणादायक तो नहीं लगी क्योंकि ऐसे समय में हमें अपनी योगाभ्यास की वजह से  दैहिक शक्ति का परीक्षण करने का अवसर मिल जाता है। देह नहीं थकती पर योगाभ्यास में बाधा की वजह से मन जरूर थक जाता है। इससे ज्यादा इंटरनेट से संपर्क कट जाने की बात मनोरंजन से दूर कर देती है।
      उस दिन पार्क में घूमते हुए एक सज्जन से मुलाकात हुई थी। वह पंद्रह दिन के पर्यटन से वापस आये थे।  कहने लगे कि ‘‘भई, जब हम बाहर से घूमकर थके हारे आते हैं और फिर पार्क मे घूमने का अवसर मिलता है  तो लगता है कि हमारा सारा प्रयास व्यर्थ हो गया।  आनंद तो यहां पार्क में घूमने पर ही मिलता है। हम दूसरी जगह जाते हैं तो जहां ठहरना हो तो  ऐसे पार्क में कहां मिलते हैं?’’
      हमें पता है कि घर के सुख से उकताये आदमी का मन ही उसे बाहर भगाता है। प्रातःकाल योगाभ्यास और सैर करने के बाद मन तृप्त हो जाता है इसलिये हमें बाहर भागने की प्रेरणा नहीं देता। जब आदमी बाहर सुख से उकताता है तो घर की याद सताती है। घर लौटकर वह यही सोचता है कि अपनी यात्रा तो उसने सपने की तरह बिताई।  आज हम यहां थे कल कहीें ओर थे। कल यहीं होंगे जहां हैं। इसका मतलब यह कि हम पांच दिन एक सपना देख रहे थे।
      हमारी यह यात्रा कोटा राजस्थान से जुड़ी थी। वहाँ  चंबल गार्डन और सात अजूबे देखे। हमने ऑटो वाले से कहा था कि सात अजूबे  चलोगो तो वह मुंह देखने लगा। हमने कहां सेवन वंडर जाना है। वह समझ गया।  इन दोनों जंगहों पर हमें पार्क अच्छे लगे पर इनमें जाने पर टिकिट लगता है। मतलब यह कि हम जैसे प्रतिदिन पार्क घूमने जाने वाले के लिये वहां के उद्यान सहायक नहीं है। दूसरी अच्छी चीजों की उपस्थिति हमें भाती नहीं है।  मन करता था कि इन उद्यानों में प्रतिदिन भ्रमण करें पर जब अपनी कॉलोनी के उद्यान में आये तो लगा कि यह कहीं बेहतर है।  कल जो देख रहे थे वह सपना था।  हां यात्रायें एक सपना ही होती है। उनकी स्मृतियां वैसे ही मस्तिष्क से विलोपित हो जाती हैं जैसे कि रात्रि की सपने भूला दिये जाते है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Tuesday, May 13, 2014

प्राणायाम से मन पर नियंत्रण रहता है-पतंजलि योग साहित्य का आधार पर चिन्तन लेख (pranayam se mana par ninantran rahata hai-A hindi thougt based on patanjali yoga litrature)



  जकल भारतीय योग की पूरे विश्व में चर्चा है। यह अलग बात है कि अनेक पेशेवर लोगों ने इस पद्धति का लाभ उठाने के लिये इसका रूप विकृत करने की कोशिश की है। सच बात तो यह है कि योग साधना अंतमुर््खी विषय है जबकि अनेक योग शिक्षक उसे रंगीन बनाने का प्रयास कर रहे हैं।  इस योग के इतने नाम हो गये हैं कि ऐसा लगता है कि इसके अनेक रूप हैं।  जबकि सच्चाई यह है कि योग अपनी देह, मन और विचार स्थिर कर मौन साधना करना ही है।  हालांकि अनेक निष्काम योग शिक्षकों ने इस पर अनुंसधान कर इसे नया रूप दिया है  जिससे  योग साधना के मूल तत्व परिवर्तित नहीं होते वरन् व्यायाम भी अच्छा हो जाता है।  जबकि पेशेवर लोगों ने इसको आकर्षक विषय बनाने के साथ ही बहिमुर््खी बना दिया है।      
            तंजलि योग सूत्र एक प्रमाणिक कला और विज्ञान है। आज जब हम अपने देश में अस्वस्थ और मनोरोगों के शिकार लोगों की संख्या को देखते हैं तो इस पद्धति को  अपनाने की आवश्यकता अधिक अनुभव होती है। पतंजलि योग एक बृहद साहित्य है और इसमें केवल आसनों से शरीर को स्वस्थ ही नहीं रखने के साथ  ही प्राणायाम तथा ध्यान  योग से मन को भी प्रसन्न रखा जा सकता है। यह अंतिम सत्य है कि दवाईयां मनुष्य की बीमारियां दूर सकती हैं पर योग तो कभी बीमार ही नहीं पड़ने देता। योग साधना के नियमित अभ्यास से लाभ कि अनुभूति उसे करने पर ही की जा सकती है|


पतंजलि योग सूत्र में  कहा गया है
प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य।

     हिन्दी में भावार्थ-प्राणवायु को बाहर निकालने और अंदर रोकने के निरंतर अभ्यास चित्त निर्मल होता है।

विषयवती वा प्रवृत्तिरुपन्न मनसः स्थितिनिबन्धनी।।

हिन्दी में भावार्थ-विषयवाली प्रवृत्ति उत्पन्न होने पर भी मन पर नियंत्रण रहता है।
विशोका वा ज्योतिवस्ती।
हिन्दी में भावार्थ-इसके अलावा शोकरहित प्रवृत्ति से मन नियंत्रण में रहता है।
वीतरागविषयं वा चित्तम्।
हिन्दी में भावार्थ-वीतराग विषय आने पर भी मन नियंत्रण में रहता है।

     भारतीय योग दर्शन में प्राणायाम का बहुत महत्व है। योगासनों से जहां देह के विकार निकलते हैं वहीं प्राणायाम से मन तथा विचारों में शुद्धता आती है। जैसा कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते आ रहे हैं कि इस विश्व में मनोरोगियों का इतना अधिक प्रतिशत है कि उसका सही आंकलन करना संभव नहीं है। अनेक लोगों को तो यह भी पता नहीं कि वह मनोविकारों का शिकार है। इसका कारण यह है कि आधुनिक विकास में भौतिक सुविधाओं की अधिकता उपलब्धि और उपयेाग के कारण सामान्य मनुष्य का शरीर विकारों का शिकार हो रहा है वहीं मनोरंजन के नाम पर उसके सामने जो दृश्य प्रस्तुत किये जा रहे है वह मनोविकार पैदा करने वाले हैं।     ऐसी अनेक घटनायें  समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर आती हैं जिसमें किसी फिल्म या टीवी चैनल को देखकर उनके पात्रों जैसा अभिनय कुछ लोग अपनी जिंदगी में करना चाहते हैं। कई लोग तो अपनी जान गंवा देते हैं। यह तो वह उदाहरण सामने आते हैं पर इसके अलावा जिनकी मनस्थिति खराब होती है और उसका दुष्प्रभाव मनुष्य के सामान्य व्यवहार पर पड़ता है उसकी अनुभूति सहजता से नहीं हो जाता।
      प्राणायाम से मन और विचारों में जो दृढ़ता आती है उसकी कल्पना ही की जा सकती है मगर जो लोग प्राणायाम करते और कराते हैं वह जानते हैं कि आज के समय में प्राणायाम ऐसा ब्रह्मास्त्र है जिससे समाजको बहुत लाभ हो सकता है।
----------


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday, May 7, 2014

दीनता के सौंदर्य से दीनबंधु प्रभावित होते हैं-रहीम दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(dinta ke saundarya se deenbandhu prabhavit hote hain-rahim darshan)



            पाश्चात्य संस्कृति तथा शिक्षा के प्रभाव में हमारे यहां समाज सेवा करना एक फैशन बन गया है। जहां पहले लोग दान आदि जैसे काम धार्मिक भावना से ओतप्रोत होकर स्वभाविक रूप से करते थे वहीं अब स्थिति यह है कि समाज सेवा करने वाले एक हाथ से चंदा लेते हैं तो दूसरे हाथ से गरीबों और असहायों की मदद का दावा करते हैं। एक तरह से पूर्णकालिक पेशेवर समाज सेवकों की जमात बन गयी है जिनका दावा यह होता है कि वह निष्काम भाव से परमार्थ कर रहे हैं।  इतना ही नहीं यह समाज सेवक अपनी छवि एक देवपूरुष की बनाकर सम्मान भी प्राप्त करते हैं।  अपनी छवि के लिये चंदे के रूप में प्राप्त धन का उपयोग वह प्रचार माध्यमों में बनाये रखने के लिये भी करते हैं।  इतना ही नहीं उनका कोई व्यवसाय नहीं होता इसलिये वह इसी चंदे से अपना घर भी चलाते हैं।

कविवर रहीम कहते हैं
---------------------------
दिव्य दीनता के रसहि, का जाने जग अंधु
भली बिचारी दीनता, दीनबंधु से बंधु
      हिंदी में भावार्थ-भगवान की भक्ति दीन भाव से करने पर जो रस और आनंद मिलता है उसे अहंकार में अंधे लोग नहीं समझ सकते। दीनता में जो सोंदर्य है उससे ही दीनबंधु आकर्षित होते हैं।
दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोय
जो रहीम दीनहि लखै, दीनबंधु सम होय
      हिंदी में भावार्थ-जो दीन है वह सबकी तरफ देखता है पर उसे कोई नहीं देखता। जो दीन की ओर देखकर उस पर दया करता है उसके लिये वह भगवान तुल्य हो जाता है।

     पहले समाज की एक स्वचालित व्यवस्था थी जिसमें धनी व्यक्ति के लिये दान का कर्तव्य निश्चित किया गया ताकि जिनके पास धन नहीं है उन्हें प्राप्त होता रहे और समाज में समरसता का भाव बना रहे मगर  अब लोग दान के नाम पर नाक भौं सिकोड़ते हैं या फिर ढिंढोरा पीटकर देते हें जिससे उनको आर्थिक लाभ और सामाजिक प्रतिष्ठा मिले। कुछ धनिक और उनकी संतानों के लिये तो माया शक्ति प्रदर्शन का एक हथियार बन गयी है। जिनके पास धन है उनको समाज में दीन और दरिद्र की तकलीफों का ख्याल नहीं होता और न ही इस बात का विचार होता है कि वह उनकी तरफ अपेक्षित भाव से देख रहे हैं। माया उनको अंधा बना देती हैं और फिर इन्हीं दीनों में से कोई अपराधी बनकर उनकी इसी माया का हरण तो कर ही लेता है और कहीं न कहीं तो शारीरिक हानि भी पहुंचा देता हैं।
      एक बात धनिकों को याद रखना चाहिये कि दीन उनको देखते हैं और उनके व्यवहार से ही उन पर अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में अगर वह स्वयं ही उन पर दया करें तो उनके लिये भगवान बन जायेंगे क्योंकि दीन तो बिचारे सभी तरफ देखते हैं पर उनकी तरफ अगर कोई देखे तो उनका मन प्रसन्न हो जाता है।
      दान करने से आशय यह नहीं है कि कहीं भिखारियों को खाना खिलाया जाये या किसी मंदिर में दान डाला जाये। यह अपने आसपास ही निर्धन और जरूरतमंद लोगों लोगों की सहायत कर भी किया जा सकता है। किसी मजदूर से काम कराकर उसके मांगे गये मेहनताने से थोड़ा अधिक देकर या अपने घर की अनावश्यक पड़ी वस्तु उनको देखकर भी उनका मन जीता जा सकता है। यह संदेश साफ है कि अगर आप धनी है तो आप अपने आसपास के निर्धन लोगों पर कृपा करते रहें तभी आप भी अमन से रह पायेंगे वरन आपको स्वयं ही अकेलापन और असुरक्षा का अनुभव होगा। मतलब यह कि आप दीनबंधु बने तभी आप दीनबंधु को पा सकते हैं। दान देते समय भी अपने अंदर दीन भाव रखना चाहिये और भक्ति करते समय भी। तभी परमानंद की प्राप्त हो सकती है।
------------------


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, April 27, 2014

अहिंसक मनुष्य कभी कष्ट नहीं उठाता-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(ahinsak manushya kabhi kasht nahin uthata-manus smriti)



            प्रकृत्ति का नियम है जैसा बोओगे वैसा काटोगे। अहिंसा तथा परमार्थ का मार्ग अपनाने वाले इस बात को जानते हैं कि अपने सत्कर्म कभी न कभी उनके लिये अच्छा परिणाम देने वाले होंगे पर दुष्कर्म करने वालों को अपने भावी दंड का अनुमान पहले से नहीं होता।  श्रीमद्भागवत गीता के गुण तथा कर्म विभाग का अगर ध्यान से अध्ययन किया जाये तो इस बात का ज्ञान हो जाता है कि इस त्रिगुणमयी मायावी संसार में बीज के अनुरूप ही फल प्रांप्त होता है। हर मनुष्य रहन सहन की स्थिति, खान पान के रूप तथा संगति के प्रभाव के अनुसार काम करता है।  हम अक्सर यह सोचते हैं कि अपनी बुद्धि से काम कर रहे हैं पर इस बात का आभास नहीं होता कि देह के तत्वों से वह प्रभावित भी होती है।
            कभी हम एकांत चिंत्तन के समय अपने अंतर्मन की गतिविधियों पर दृष्टिपात करें तो इस बात का आभास होगा कि हम अपने खान पान, रहन सहन तथा संगति के अनुरूप व्यवहार करते हैं। अगर हमें अच्छे काम करने हैं तो अपने रहन सहन, खान पान तथा संगति को भी शुद्ध रखना होगा।

मनु स्मृति में में कहा गया है कि
---------------------------------
यद्ध्यायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च।
तद्वाघ्नोत्ययत्नेन यो हिनस्तिन किंचन।।
     हिंदी में भावार्थ-जो मनुष्य किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता, वह जिस विषय पर एकाग्रता के साथ विचार और कर्म करता है  अपना लक्ष्य शीघ्र और बिना विशेष प्रयत्न के प्राप्त कर लेता है।

नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्यद्यते क्वचित्।
न च प्राणिवधः स्वग्र्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्।।
     हिंदी में भावार्थ-किसी भी जीव की हत्या कर ही मांस प्राप्त किया जाता है लेकिन उससे स्वर्ग नहीं मिल सकता इसलिये सुख तथा स्वर्ग को प्राप्त करने की इच्छा करने वालो को मांस के उपभोग का त्याग कर देना चाहिये।

     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में मनुष्य के चलने के दो ही मार्ग हैं-एक सत्य  परमार्थ और दूसरा असत्य हिंसा। यदि मनुष्य का मन लोभ, लालच और अहंकार से ग्रस्त हो गया तो वह नकारात्मक मार्ग पर चलेगा और उसमें सहृदयता का भाव है तो वह सकारात्मक मार्ग पर चलता है। श्रीगीता के संदेशों का सार यह है कि जैसा मनुष्य अन्न जल ग्रहण करता है तो वैसा ही उसका स्वभाव हो जाता है तब वह उसी के अनुसार ही कर्म करता हुआ फल भोगता है।
      वैसे पश्चिम के वैज्ञानिक भी अपने अनुसंधान से यह बात प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन और मांसाहारी भोजन करने वालों के स्वभाव में अंतर होता है। वह यह भी प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन करने वालों के विचार और चिंतन में सकारात्मक पक्ष अधिक रहता है जबकि मांसाहारी लोगों का स्वभाव इसके विपरीत होता है। जहा माँसाहारी उग्र होते हैं वहीँ शाकाहारी शांत स्वाभाव के पाए जाते हैं| अतः जितना संभव हो सके भोजन में मांसाहार से परहेज करना चाहिये।
.......................................................


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, April 24, 2014

धर्म की पहचान वाले दस लक्षण-मनु स्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(dharm kee pahachan wale das lakshan-manu smriti)



            हमारे देश में धर्म चर्चा अधिक ही होती है।  चाहे शिक्षित हो या अशिक्षित, चिकित्सक हो या मरीज, शिक्षक हो र्या छात्र कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो स्वयं को धर्मभीरु साबित करने का कोई अवसर छोड़ता है। इसके बावजूद धर्म को लेकर अनेक प्रकार के भ्रम हमारे देश में प्रचलित हैं। इतना ही नहीं अनेक कथित धार्मिक विद्वान अपनी सुविधानुसार धर्म की परिभाषा भी बदलते रहते हैं। पेशेवर धार्मिक बुद्धिमान जितना धर्म का उपयोग अपने लिये करते हैं उतना शाायद ही किसी अन्य पेशे के लोग कर पाते हैं। अनेक वणिक वृत्ति के लोगों ने धर्म के नाम पर अपने महलनुमा आश्रम बना लिये हैं। इतना ही नहीं उनके पास परिवहन के ऐसे आधुनिक वाहन भी उपलब्ध हो गये हैं जिनकी कल्पना केवल अधिक धनी ही कर पाते हैं।

मनु स्मृति में कहा गया है कि
_____________________
धृति क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रिवनिग्रहः।
धीविंद्या सत्यमक्रोधी दशकं धर्मलक्षणम्।।

      हिंदी में भावार्थ-धैर्य, क्षमा, मन पर नियंत्रण, चोरी न करना, मन वचन तथा कर्म में शुद्धता,इंद्रियों पर नियंत्रण, शास्त्र का ज्ञान रखना,ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना, सच बोलना, क्रोध और अहंकार से परे होकर आत्मप्रवंचना से दूर रहना-यह धर्म के दस लक्षण है।
दक्ष लक्षणानि धर्मस्य व विप्राः समधीयते।
अधीत्य चानुवर्तन्ते वान्ति परमां गतिम्।।

      हिंदी में भावार्थ-जो विद्वान दस लक्षणों से युक्त धर्म का पालन करते हैं वे परमगति को प्राप्त होते हैं।

      वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में किसी धर्म का नाम देखने को नहीं मिलता है। अनेक स्थानों पर कर्म को ही धर्म माना गया है अनेक जगह मनुष्य के आचरण तथा  लक्षणों से पहचान की जाती है। कहने को तो यह भी कहा जाता है कि हमारा धर्म पहले सनातन धर्म से जाना जाता था पर इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि इंसान को इंसान की तरह जीने की कला सिखाने वाला हमारा धर्म ही सनातन काल से चला आ रहा है। धर्म का कोई नाम नहीं होता बल्कि इंसानी कि स्वाभाविक वृत्तियां ही धर्म की पहचान है। इस संसार में विभिन्न प्रकार के इंसान हैं पर वह  मनु द्वारा बताये गये धार्मिक लक्षणों पर चलते हैं  तभी वह धर्म मार्ग पर स्थित माने  जा सकते हैं। हमें इन लक्षणों का अध्ययन करना चाहिये। इसका ज्ञान होने पर यह देखने का प्रयास नहीं करना चाहिए  कि कोई दूसरा व्यक्ति धर्म मार्ग पर स्थित है या नहीं  वरन् हमें स्वयं देखना है कि हमारा अपना  मार्ग कौनसा है?
      वैसे हमारे देश में जगह जगह ज्ञानी मिल जायेंगे। बड़ों की बात छोड़िये आम आदमियों में भी ऐसे बहुत लोग हैं जो खाली समय बैठकर धर्म की बात करते हैं। ज्ञान की बातें इस तरह करेंगे जैसे कि उनको महान सत्य बैठ बिठाये ही प्राप्त हो गया है। मगर जब आचरण की बात आती है तो सभी कोरे साबित हो जाते हैं। कहते हैं कि जैसे लोग और जमाना है वैसे ही चलना पड़ता है। अपने मन पर नियंत्रण करना बहुत सहज है पर उससे पहले यह संकल्प करना पड़ता है कि हम धर्म का मार्ग चलेंगे। धर्म की लंबी चैड़ी व्याख्यायें नहीं होती। परिस्थतियों के अनुसार खान पान में बदलाव करना पड़ता है और उससे धर्म की हानि या लाभ नहीं होता। वैसे खाने, पीने में स्वाद और पहनावे से आकर्षक  दिखने का विचार छोड़कर इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि हमारे स्वास्थ्य के लिये क्या हितकर है? दूसरा क्या कर रहा है इसे नहीं देखना चाहिये और जहां तक हो सके अन्य लोगो के कृत्य पर टिप्पणियां करने से भी बचें। जहां हम किसी की निंदा करते हैं वहां हमारा उद्देश्य बिना कोई परोपकार का काम किये बिना स्वयं को श्रेष्ठ साबित करना होता है। यह निंदा और आत्मप्रवंचना धर्म विरुद्ध है। सबसे बड़ी बात यह है कि एक इंसान के रूप में अपने मन, विचार, बुद्धि तथा देह पर निंयत्रण करने की कला का नाम ही धर्म है और मनु द्वारा बताये गये दस लक्षणों से अलग कोई भी दृष्टिकोण धर्म नहीं हो सकता।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Tuesday, April 22, 2014

चाटुकारिता में जीवन व्यर्थ न करें-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख (chatukarita mein jiwan vyarth na karen-bhartrihare neeti shatak)



            वर्तमान भौतिक युग में जिनके पास अधिक धन, उच्च पद और प्रतिष्ठा है उनका आभा मंडल समाज में इतना व्यापक होता है कि हर सामान्य आदमी उनके पास पहुंचकर अपना कल्याण पाना चाहता है।  यह अलग बात है कि ऐसे कथित महापुरुष सामान्य लोगों से कहीं अधिक डरपोक, लालची तथा अहंकारी होते हैं।  अपनी उपलब्धि का मद उन्हें हमेशा ही धेरे रहता है। यह समाज का शोषण कर सारी सफलता प्राप्त करते हैं पर सामान्य आदमी फिर उनसे दयालुता दिखाने की आशा करता है।  देखा यही जा रहा है कि वही शिखर पुरुष समाज में प्रतिष्ठ प्राप्त करता है जो अपने इर्दगिर्द चाटुकारों की सेना एकत्रित करता है।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
----------------------------------
दुरारध्याश्चामी तुरचलचित्ताः क्षितिभुजो वयं
तु स्थूलेच्छाः सुमहति बद्धमनसः
जरा देहं मृत्युरति दयितं जीवितमिदं
सखे नानयच्छ्रेयो जगति विदुषेऽन्यत्र तपसः।।
     हिंदी में भावार्थ- जिन राजाओं का मन घोड़े की तरह दौड़ता है उनको कोई कब तक प्रसन्न रख सकता है? हमारी अभिलाषाओं  और आकांक्षाओं  की तो कोई सीमा ही नहीं है। सभी के मन में अधिक धन, बड़ा पद तथा प्रतिष्ठत छवि  पाने की लालसा स्वाभाविक रूप से होती  है। इधर शरीर बुढ़ापे की तरह बढ़ रहा होता है। मृत्यु पीछे पड़ी हुई होती  है। इन सभी को देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि भक्ति और तप के अलावा को अन्य मार्ग ऐसा नहीं है जो हमारा कल्याण कर सके।

     लोगों के मन में धन पाने की लालसा बहुत होती है और इसलिये वह धनिकों, उच्च पदस्थ एवं बाहुबली लोगों की और आशा भरी दृष्टि स ताकते हुए  उनकी चमचागिरी करने के लिये तैयार रहते हैं। उनकी चाटुकारिता में कोई कमी नहीं करते। चाटुकार लोगों  को यह आशा रहती है कि कथित ऊंचा आदमी उन पर रहम कर उनका कल्याण करेगा। यह केवल भ्रम है। जिनके पास वैभव है उनका मन भी हमारी तरह चंचल होता है और वह अपना काम निकालकर भूल जाते हैं या अगर कुछ देते हैं तो केवल चाटुकारिता  के कारण नहीं बल्कि कोई सेवा करा कर। वह भी जो प्रतिफल देते हैं तो वह भी न के बराबर। इस संसार में बहुत कम ऐसे लोग हैं जो धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त कर उसके मद में डूबने से बच पाते हैं।  अधिकतर लोग तो अपनी शक्ति के अहंकार में अपने से छोटे आदमी को कीड़े मकौड़े जैसा समझने लगते हैं और उनकी चमचागिरी करने पर भी कोई लाभ नहीं होता।  अगर ऐसे लोगों की निंरतर सेवा की जाये तो भी सामान्य से कम प्रतिफल मिलता है।
      सच तो यह है कि आदमी का जीवन इसी तरह गुलामी करते हुए व्यर्थ चला जाता हैं। जो धनी है वह अहंकार में है और जो गरीब है वह केवल बड़े लोगों की ओर ताकता हुआ जीवन गुंजारता है। जिन लोगों का इस बात का ज्ञान है वह भक्ति और तप के पथ पर चलते हैं क्योंकि वही कल्याण का मार्ग है।इस संसार में प्रसन्नता से जीने का एक ही उपाय है कि अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए ही जीवन भर चलते रहें।  अपने से बड़े आदमी की चाटुकारिता से लाभ की आशा करना अपने लिये निराशा पैदा करना है।
--------------------------------

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’ 
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, April 19, 2014

राजनीति में रूप बदलना ही पड़ता है-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(rajneeti mein roop badalnaa hee padta hai-bhartrihari neeti shatak ka aadhar par chinttan lekh)



      यह एक ध्रुव सत्य है कि राजनीति करने वाले को अनेक तरह के रंग दिखाने ही पड़ते हैं। जो अपना जीवन शांति, भक्ति और अध्यात्म ज्ञान के साथ बिताना चाहते हैं उनके लिये राजनीति करना संभव नहीं है। ज्ञानी लोग इसलिये राजनीति से समाज में परिवर्तन की आशा नहीं करते बल्कि वह तो समाज और पारिवारिक संबंधों में राज्य के हस्तक्षेप का कड़ा विरोध भी करते हैं।  सामान्य भाषा में राजनीति का सीधा आशय राज्य प्राप्त करने और उसे चलाने के कार्य करने के लिये अपनायी जाने वाली नीति से है। बहुरंगी और आकर्षक होने के कारण अधिकतर लोगों को यही करना रास आता है। अन्य की बात तो छोडि़ये धार्मिक किताब पढ़कर फिर उसका ज्ञान लोगों को सुनाकर पहले उनके दिल में स्थान बनाने वाले कई कथित गुरु राजनीति को स्वच्छ बनाने के लिये उसमें घुस जाते हैं-यह लोकतंत्र व्यवस्था होने के कारण हुआ है क्योंकि लोग राजनीति विजय को प्रतिष्ठा का अंतिम चरम मानते हैं। लेखक, पत्रकार, अभिनेता-अभिनेत्रियां तथा अन्य व्यवसायों मं प्रतिष्ठत लोग राजनीति के अखाड़े को पसंद करते हैं। इतना ही नहीं अन्य क्षेत्रों में प्रसिद्ध लोग राजनीति में शीर्ष स्थान पर बैठे लोगों की दरबार में हाजिरी देते हैं तो वह भी उनका उपयोग करते हैं। लोकतंत्र में आम आदमी के दिलो दिमाग में स्थापित लोगों का उपयोग अनिवार्य आवश्यकता बन गया है। कोई व्यक्ति अपने लेखन, कला और कौशल की वजह से कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो वह उससे सतुष्ट नहीं होता वरन उसे   लगता है कि स्वयं को चुनावी राजनीति में आकार कोई प्रतिष्टित किये  स्थापित किये बिना वह अधूरा है।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

_________________

सत्याऽनृता च परुषा प्रियवादिनी च

हिंस्त्रा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या |

नित्यव्यया प्रचुरनित्य धनागमा च

वारांगनेव नृपनीतिनेक रूपा ||

     हिंदी में भावार्थ-राज्यकर्म में लिप्त राजाओं को राजनीति करते हुए बहुरुपिया बनना ही पडता है। कभी सत्य तो कभी झूठ, कभी दया तो कभी हिंसा, कभी कटु तो कभी मधुर कभी, धन व्यय करने में उदार तो कभी धनलोलुप, कभी अपव्यय तो कभी धनसंचय की नीति अपनानी पड़ती है क्योंकि राजनीति तो बहुरुपिया पुरुष और स्त्री की तरह होती है।

      यहाँ हम बता दें कि राजनीति से हमारा आशय आधुनिक चुनावी राजनीति  से है| व्यापक रूप से इस शब्द का अर्थ विस्तृत है|  राजसी कर्म हर व्यक्ति को करने होते हैं और उसे उसके लिए नीतिगत ढंग चलना ही होता है| यानी अपने अर्थकर्म के लिए रजा हो या रंक सभी को राजनीति करनी ही होती है|
      राजनीति तो बहुरुपिये की तरह रंग बदलने का नाम है। लोकप्रियता के साथ कभी अलोकप्रिय भी होना पड़ता है। हमेशा मृद भाषा से काम नहीं चलता बल्कि कभी कठोर वचन भी बोलने पड़ते हैं। हमेशा धन कमाने से काम नहीं चलता कभी व्यय भी करना पड़ता है-लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो भारी धन का व्यय करने का अवसर भी आता है तो फिर उसके लिये धन संग्रह भी करना पड़ता है। कभी किसी को प्यार करने के लिये किसी के साथ घृणा भी करना पड़ती है।
      यही कारण है कि अनेक लेखक,कलाकार और प्रसिद्ध संत चुनावी  राजनीति से परे रहते हैं। हालांकि उनके प्रशंसक और अनुयायी उन पर दबाव डालते हैं पर वह फिर भी नहीं आते क्योंकि राजनीति में हमेशा सत्य नहीं चल सकता। अगर हम अपने एतिहासिक और प्रसिद्ध संतों और लेखकों की रचनाओं को देखें तो उन्होंने राजनीति पर कोई अधिक विचार इसलिये नहीं रखा क्योंकि वह जानते थे कि राजनीति में पूर्ण शुद्धता तो कोई अपना ही नहीं सकता। आज भी अनेक लेखक, कलाकर और संत हैं जो राजनीति से दूर रहकर अपना कार्य करते हैं। यह अलग बात है कि उनको वैसी लोकप्रियता नहीं मिलती जैसे राजनीति से जुड़े लोगों को मिलती है पर कालांतर में उनका रचना कर्म और संदेश ही स्थाई बनता है। राजनीति विषयों पर लिखने वाले लेखक भी बहुत लोकप्रिय होते है पर अंततः सामाजिक और अध्यात्मिक विषयों पर लिखने वालों का ही समाज का पथप्रदर्शक बनता है।
      राजनीति के बहुरूपों के साथ बदलता हुआ आदमी अपना मौलिक स्वरूप खो बैठता है और इसलिये जो लेखक, कलाकर और संत राजनीति में आये वह फिर अपने मूल क्षेत्र के साथ वैसा न ही जुड़ सके जैसा पहले जुडे थे। इतना ही नहीं उनके प्रशंसक और अनुयायी भी उनको वैसा सम्मान नहीं दे पाते जैसा पहले देते थे। सब जानते हैं कि राजनीति तो काजल  की कोठरी है जहां से बिना दाग के कोई बाहर नहीं आ पाता। वैसे यह वह क्षेत्र से बाहर आना पसंद नहीं करता। हां, अपने पारिवारिक वारिस को अपना राजनीतिक स्थान देने का मसला आये तो कुछ लोग तैयार हो जाते हैं।

      आखिर किसी को तो राजनीति करनी है और उसे उसके हर रूप से सामना करना है जो वह सामने लेकर आती है। सच तो यह है कि राजनीति करना भी हरेक के बूते का नहीं है इसलिये जो कर रहे हैं उनकी आलोचना कभी ज्ञानी लोग नहीं करते। इसमें कई बार अपना मन मारना पड़ता है। कभी किसी पर दया करनी पड़ती है तो किसी के विरुद्ध हिंसक रूप भी दिखाना पड़ता है। आखिर अपने समाज और क्षेत्र के विरुद्ध हथियार उठाने वालों को कोई राज्य प्रमुख कैसे छोड़ सकता है? अहिंसा का संदेश आम आदमी के लिये ठीक है पर राजनीति करने वालों को कभी कभी अपने देश और लोगों पर आक्रमण करने वालों से कठोर व्यवहार करना ही पड़ता हैं। राज्य की रक्षा के लिये उन्हें कभी ईमानदार तो कभी शठ भी बनना पड़ता है। अतः जिन लोगों को अपने अंदर राजनीति के विभिन्न रूपों से सामना करने की शक्ति अनुभव हो वही उसे अपनाते हैं। जो लोग राजनेताओं की आलोचना करते हैं वह राजनीति के ऐसे रूपों से वाकिफ नहीं होते। यही कारण है कि अध्यात्मिक और सामाजिक ज्ञानी राजनीति से दूर ही रहते हैं न वह इसकी आलोचना करते हैं न प्रशंसा। अनेक लेखक और रचनाकार राजनीतिक विषयों पर इसलिये भी नहीं लिखते क्योंकि उनका विषय तो रंग बदल देता है पर उनका लिखा रंग नहीं बदल सकता।
........................................................
      


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

अध्यात्मिक पत्रिकाएं