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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Monday, October 17, 2016

छोटे व मध्यम व्यापारियों की कमाई का भी ध्यान रखना होगा-चीनी सामान के बहिष्कार से देशभक्ति जोड़ने पर एक लेख (Attension takes of Poor and Middle Class Treders-Boycott of chines good and Natinaliti-Hindi Article)


                                                            चीन भारत के प्रति शत्रुभाव रखता है यह सर्वविदित है और हम तो उसके भारत के उपभोक्ता बाज़ार में खुले प्रवेश पर पहले भी सवाल उठाते रहे हैं। सबसे बड़ा हमारा सवाल यह रहा है कि भारत में लघुउद्योग व कुटीर उद्योग को प्रोत्साहन की नीति थी वह सफल क्यों नहीं रही? इन लघु व कुटीर उद्योगों में निर्मित छोटे छोटे सामान भारतीय परंपराओं का अभिन्न भाग होते थे। यह पता ही नहीं चला कि चीनी सामान ने भारतीय बाज़ार में प्रवेश किया पर इतना तय है कि यह देश के आर्थिक तथा राजनीति के शिखर पर विराजमान लोगों के आंखों के सामने ही हुआ था-या कहें उन्होंने अपनी आंखें फेर ली थीं।
                                           अब अचानक चीन के एक आतंकी के प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार दिखाने पर उसके सामान के बहिष्कार का आह्वान देशभक्ति के नाम पर किया जा रहा है।  सच कहें तो अब देशभक्ति को सस्ता बनाया जा रहा है।  इस समय दिवाली के अवसर पर पर्व से संबंधित पटाखे, सजावाट का सामान तथा खिलौने आदि न खरीदने के लिये जोरदार अभियान चल रहा है।  हम बता दें कि मोबाइल, लेपटॉप तथा कंप्यूटर में भी ढेर सारा चीनी सामान लगा है।  अनेक आधुनिक सामान तो चीन से पुर्जें लाकर यही संयोजित किया जाता है।  हमें एक दुकानदार ने बताया था कि इनवर्टर, स्कूटर , कार तथा चाहे कहीं भी लगने वाली जो भी बैट्री हो वह चीन में ही बनती है।  इस समय बड़े व्यापारियों से कोई अपील नहीं कर रहा-क्योंकि उन्हें शायद देशभक्ति दिखाने की जरूरत नहीं है।  इसके लिये आसान शिकार मध्यम तथा निम्न वर्ग का व्यवसायी बनाया जा रहा है।  हम यहां चीनी सामान बिकने का समर्थन नहीं कर रहे पर हमारे देश के मध्यम तथा निम्न वर्ग के व्यवसायियों के रोजगार की चिंता करने से हमें कोई रोक नहीं सकता।  वैसे ही हमारे देश में रोजगार के अवसर कम होते जा रहे हैं।  आजकल छोटे व्यापारी आधुनिक मॉल संस्कृति के विकास के कारण वैसे भी अस्तित्व का संघर्ष कर रहे हैं-स्थित यह है कि उनकी नयी पीढ़ी अपना पैतृक काम छोड़कर नौकरी की तलाश में घूम रही हैं।  ऐसे में दिपावली तथा होली जैसे पर्वों के समय जो अधिक कमाने की जिम्मेदारी योजना होती है उस पर पानी फिरा जा रहा है।  अनेक लोगों ने चीन का सामान भरा है और अगर उनकी बिक्री कम हुई तो पूंजी का नाश होगा-हालांकि जिस तरह महंगाई व आय के असमान वितरण ने जिस तरह समाज के एक बहुत बड़े वर्ग की क्रय क्षमता को कम किया उससे भी दीवाली पर चीनी सामान की बिक्री कम हो सकती है। यह अलग बात है कि इसे देशभक्ति के खाते में ही दिखाया जायेगा।
                                       अपनी रक्षा की इच्छा रखने वाला हर आदमी देश के प्रति वफादार होता है-देशभक्ति दिखाने में उत्साह रखना भी चाहिये पर इसका मतलब यह नहीं है कि हम हर छोटे विषय पर भी अपने दाव खेलने लगे।  देश में आर्थिक असमंजसता का वातावरण है इसलिये यह ध्यान रखना चाहिये कि अपने नागरिकों की हानि न हो। हमें सबसे ज्यादा आपत्ति उस योग शिक्षक पर कर रहे हैं जिसने योग व्यवसाय के दम पर बड़ी कंपनी बनाकर पूंजीपति का उपाधि प्राप्त कर ली और अब चीनी सामान के बहिष्कार का आह्वान कर रहा है।  इस तरह वह छोटे व्यापारियों को उसी तरह संकट में डाल रहा है जैसे कि उसकी हर मोहल्ले में खुली दुकानें डाल रही हैं।  अगर उसमें हिम्मत है तो चीन से आयात करने वाले बड़े दलालों, व्यापारियों तथा उद्योगपतियों से देशभक्ति दिखाने को कहें-जिनका अरबों का विनिवेश चीन में हैं।  प्रसंगवश हमने हमेशा ही मध्यम वर्ग के संकट की चर्चा की है और इस विषय में जिस तरह देशभक्ति दिखाने के लिये फिर उसे बाध्य किया जा रहा है उस पर हमारी नज़र है।
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Friday, October 14, 2016

मूढ़ नास्तिक भ्रमवश आस्तिक ही होते हैं-हिन्दी चिंत्तन लेख (Nastik and Aastik-Hind Thought article)


                           हमारा एक मित्र नास्तिकतावादी है।  हमारे साथ कहीं घूमने चला तो एक मंदिर देखकर अपने उसके अंदर चलने का आग्रह किया। वह बोला-‘तुम जाओ, मैं तो बाहर बैठकर ठेले पर चाय पीऊंगा। मैं तुम्हारी तरह अंधविश्वासी नहीं हूं।’
               हमने कहा’ठीक है! मैं अंदर जाकर ध्यान लगाता हूं। पंद्रह मिनट बाद लौट आऊंगा।’
                      वह बोला-‘तुम उस पत्थर की मूर्ति पर जाकर ध्यान क्यों लगाते हो? यहां इतने सारे पत्थर रखे हैं। किसी पर भी ध्यान लगा लो।’
                 हमने कहा-‘मैं लगा लेता, पर यहां न शांति है न सफाई! मंदिर में सेवक सफाई रखते हैं।’
                             थोड़ी देर बाद लौट तो वह इधर उधर घूमता दिखाई दिया। हमसे कहने लगा-‘यार, तुमने आधा घंटा लगा दिया। मैं यहां इंतजार कर रहा हूं।’
                               हमने कहा-‘अंदर आ जाते। हमारा ध्यान भंग कर देते।’
                          वह बोला-‘नहीं, मैं नास्तिक हूं। पत्थर के भगवान के मंदिर में नहीं आ सकता।’
                   मैंने हंसते हुए कहा-‘‘कमाल है! मैं तुम्हारे कहने से बाहर रखे पत्थर पर भी ध्यान लगाने को तैयार था।  श्रद्धा होने पर मेरे लिये वहां अपना इष्ट प्रकटतः होता। अब तुम मुझे जवाब दो बाहर रखा पत्थर अगर तुम्हारे लिये पत्थर है तो अंदर भगवान को भी  पत्थर मान लेते।  कहा भी जाता है कि ‘मानो तो भगवान नहीं मानो तो पत्थर’। अपने नास्तिक होने का भय तुम्हें इतना है कि पत्थर का भगवान भी तुम्हें चिंता में डाल देता है।’’
                                 वह नास्तिकतवादी मित्र हमारे लिये लिखने के अच्छी सामग्री प्रदान करता है।  उसी की वजह से हम आस्तिक नास्तिक की बहस बचते हैं।  उस पर पिछले 20 वर्ष की योग साधना की ध्यान क्रिया ने अध्यात्म विषय पर हमें इतना परिपक्व बना दिया है कि नास्तिक तो छोडि़ये आस्तिक भी ज्ञान चर्चा में हावी नहीं हो पाते।  हमने उस नास्तिकतावादी मित्र से पूछा था कि ‘जब कोई किसी पत्थर में भगवान देखता है तो तुम उससे चिढ़ते की बजाय उसकी पत्थर मानकर उपेक्षा क्यों नहीं करते? वहां जाने से तुम बिदकते क्यों हो?’
                            हमारा मानना है कि नास्तिकतावाद नैराश्य, कुंठा तथा निष्क्रियता को बढ़ावा देता है।  मजे की बात यह नास्तिकवादी व्यसनों में ज्यादा फंसे दिखते हैं-कम से कम हमारे चार ऐसे मित्र हैं जो बेहतर इंसान होना भक्त से बेहतर मानते हैं पर वह व्यसनों के दास हैं।
                           हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि ‘परमात्मा का रूप अनंत और अचिंत्तन्य हैं।’  सीधी बात यह कि इंसान की यह स्वयं की समस्या है कि वह आस्तिक बने या नास्तिक।  जैसा उसका संकल्प होगा वैसा ही यह संसार उसके लिये बन जायेगा-हमारा दर्शन ज्ञान और विज्ञान पर आधारित है, जिसमें मनुष्य को जीवन के प्रति सकारात्मक भाव अपनाने को कहा जाता है। आस्तिकता से सकारात्मक भाव बढ़ता है और नास्तिकता से नकारात्मकता बढ़ती है।  नास्तिकों को इसी से भी मूढ़ मान सकते हैं कि वह मृत व्यक्ति की कब्र पर बने ताजमहल में प्रगतिशीलता और संगमरमर की बनी भगवान की प्रतिमा में पिछड़ापन देखते हैं।  हमने अपनी राय बता दी थी कि प्रतिमायें पत्थर की होती है भगवान तो उसमें हमारी श्रद्धा से आते हैं और उससे हमारे अंदर आत्मविश्वास आता है कि कोई हमारे साथ है।
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Sunday, October 9, 2016

राज्यप्रमुख को अपनी सफलता जनता के साथ बांटना चाहिये-हिन्दी संपादकीय (StateChief Should Share His Succes with Public-HindiEditorial)

                                        राज्यप्रमुख का यह दायित्व है कि वह अपनी जनता का मनोबल भी बनाये रखे-ऐसा हमारे अध्यात्मिक दर्शन के प्रमुख विद्वान कौटिल्य का कहना है। अभी बताया जा रहा है कि पाकिस्तान के आतंकवादी हमलों का बदला भारत की सरकार ने पहले भी लिया था।  कभी यह घटना प्रमुख समाचार होना चाहिये थी पर अब रहस्योद्घाटन की तरह सामने आ रही है।  दरअसल अब भारतीय सेना ने सीमा पारकर उरी हमले का बदला पाकिस्तानी सेना से लिया और इसको प्रचारित भी किया। उसके बार पाकिस्तान के साथ विश्व में सनसनी फैल गयी-पाकिस्तान तो बहुत डर गया है और वहां अब अनेक चिंतायें घर करने लगी हैं।  इससे भारतीय जनमानस में उरी बदले के बाद की कार्यवाही करने के लिये अपनी सेना के प्रति सम्मान बढ़ा है।  कुछ लोगों को इस बदले की कार्यवाही पर नहीं वरन् उसके  प्रचार पर एतराज हैं।  हमें नहीं हैं क्योंकि जब पिछले हमले हुए थे उसमें देश की हानि होने से हमारा मनोबल गिरा था। बदले की कार्यवाही  हुई पर बताया नहीं गया जिससे हमें तसल्ली होती। 
             हमें याद है कि हमारे सैनिकों के सिर काटकर पाकिस्तानी सेना ले गयी थी। तब मन में बहुत पीड़ा हुई थी।  अब कह रहे हैें कि उस समय भारतीय सेना ने भी तीन पाकिस्तानियों के सिर काटे थे।  अब बताने का फायदा नहीं है क्योंकि उस घटना की पीड़ा हमारे मन में बहुंत समय तक रही थी।  हम मानते हैं कि भारतीय सेना ने बदला लिया पर उसका प्रचार नहीं हुआ। इससे पाकिस्तान के कर्ताधर्ता अपनी छवि विश्व में बनाये हुए थे और अवसर मिलने पर घातक प्रहार करते रहे।  इतना ही नहीं भारत में पाक समर्थक बुद्धिमानों का समूह भी अपना काम करता रहा।  अब समस्या यह हो गयी है कि भारत ने जमकर अपनी कामयाबी का प्रचार किया है जिससे पाकिस्तान की छवि एक कमजोर राष्ट्र के रूप में हो रही है।  इससे पाकिस्तान तथा भारत में उसकी समर्थक बुद्धिजीवी समूह की छाती पर सांप लोट रहा है।  भारत की वैश्विक प्रचार जगत में पाकिस्तान पर बढ़त बनी हुई हैं और यही तो हम चाहते थे।  आजकल प्रचार का युग है इसलिये हर राज्यप्रमुख को अपनी सफलता सार्वजनिक रूप से जनता के साथ बांटना चाहिये। इसलिये हम अपने वीर जवानों को सलाम करते हैं।
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अन्य ट्विटर पाठ

                   आजकल प्रचार जगत में अक्षयकुमार और अजय देवगन के वक्तव्य राष्ट्रभक्ति के संदर्भ में प्रमुखता से आ रहे हैं। पहले क्यों इनकी अनदेखी होती थी कोई बतायेगा? हम सीधी बात बताते हैं कि राज्य प्रबंध का समाज पर बहुत प्रभाव होता है और उसकी गतिविधियों से अप्रत्यक्ष संकेत भी लोगों पर प्रभाव डालते हैं। अक्षय कुमार, अनिली कपूर, अजय देवगन और सुनील शेट्टी हिन्दी फिल्मों मेें ऊंचे स्तर के अभिनेता हैं। अक्षयकुमार के बारे में तो कहा जाता है कि वह फिल्म जगत को सबसे अधिक राजस्व अर्जन में योगदान देता है। बरसों तक उसका प्रचार ऐसे होता रहा जैसे कोई साधारण कलाकार हो।  सुनील शेट्टी और अजय देवगन भी बहुत बरसों से सफल फिल्में देते रहे हैं पर प्रचार में उनके बयान कभी प्रमुखता से नहीं आये।   अब अचानक उन्हें महत्व मिलने लगा है।

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                             बात तो सही है कि जब सीमा  पर शहीद जवानों का शव तिरंगे में लिपटकर आता है तब कोई सबूत नहीं मांगता पर अब जब सीमा पार जाकर दुश्मनों को निपटाकर कर जीवित आये हैं तो सबूत मांगे जा रहे हैं।  हमारी सलाह है ऐसे लोग अपने मित्र पाकिस्तान का रुदन देकर समझ क्यों नहीं जाते या उसे सांत्वना देने के लिये अपना कर्तव्य निभा रहे हैं।
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                   वैसे राष्ट्रवादियों ने कभी इस तरफ ध्यान नहीं दिया पर हमने अनेक पाठ इस पर लिखे थे।  अब भी राष्ट्रवादी शायद ही  इस बात को समझ पायें कि राज्य प्रबंध भी समाज पर बहुत प्रभाव डालता है। अतः जरूरी है कि इसमें कुशलता दिखाते हुए जनहित भी करना चाहिये । अंततः राज्य प्रबंध से जनमानस का अर्थ भी सिद्ध होना चाहिये वरना अलोकप्रिय होने पर पर हवा विपरीत दिशा में भी चली जाती है।
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Saturday, October 1, 2016

आलोचकों को देशद्रोही कहकर देशभक्ति का प्रमाणपत्र न बटोरें-हिन्दीसंपादकीय (Noy San AniNational to Critics-HindiEditoiral)

                                                       हमारा मानना है कि भारत में पाकिस्तान के कलाकारों को काम करने का अवसर अब नहीं देना चाहिये क्योंकि दुनियां में उसे अलग थलग करने के प्रयासों मे शेष विश्व को यह दिखाना पड़ेगा कि हम हर क्षेत्र में अपना काम कर रहे हैं।  यह तर्क राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत दिखता है पर इसमें साक्ष्य है जिसे समझा जाना चाहिये।  कुछ लोग हैं जो पाकिस्तानी कलाकारों पर बंदिश का विरोध कर रहे हैं।  हम उनके विरोध से सहमत नहीं है पर इसका मतलब यह नहीं है कि हम देशद्रोही कहकर अपमानित करें। राष्ट्रभक्त के प्रमाणपत्र के लिये ऐसे आलोचकों को राष्ट्रदोही कहना हमें सही नहीं लगता। राष्ट्रभक्ति के नाम पर अभिव्यक्ति की शर्तें तय नहीं होना चाहिये।
               हमारे देश के ही अनेक फेसबुकिये ऐसे वीडिया हमारे सामने रख रहे हैं जिसमें पाक के कुछ चैनल अपने यहां निष्पक्ष लोगों की बात दिखाते हैं जो अपने ही देश के लोगों से सहमत नहीं होते पर इसका मतलब यह कतई नहीं कि उन्हें वहां देशद्रोही कहकर अपमानित करते हों।  अतः हमारा अपने ही देश के बुद्धिमानों से आग्रह है कि वह फिल्मों में पाक कलाकारों का भारत में काम करने का समर्थन कर रहे हैं उनका तर्क से सामना करें पर उन्हें देशद्रोही कहकर तिरस्कृत न करें। वैसे तो इस वातावरण में भारतीय टीवी चैनलों को स्वयं ऐसे ही समाचारों से बचना चाहिये।
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                      अर्नब गोस्वामी ने पहली बार एक शब्द उपयोग किया ‘मुंबईया फिल्मों में पाक समर्थक लॉबी’ है। कोई हमारी यह राय भी वहां तक पहुंचा दे कि यह कमाई की वजह से पाक की नहीं बजाते बल्कि उनकी पूंछ दबी हुई हैं। किसने दबा रखी है सब जानते हैं।
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                अब यह यकीन होने लगा है कि पाकिस्तान की नादान सेना मानेगी नहीं और भारतीय सेना बिना क्षति उठाये उसका नामोनिशान मिटा देगी-यह हमें अपनी सेना की रणनीति देखकर यही लगता है-तब यहां उसकी समर्थक फिल्म लॉबी का क्या होगा?,
            पाकिस्तान के कलाकारों पर प्रतिबंध लगाना इसलिये भी जरूरी है कि उसे विश्व में अलगथलग करने के लिये लिये हमें उसका शत्रू दिखना है। मुंबईया फिल्म में पाक समर्थक लॉबी अगर इस तरह विलाप करेगी तो जनता उनके फिल्म और नाटकों का नकार देगी।

Tuesday, September 27, 2016

योगी संयम से शत्रू का छिद्रान्वेषण कर उसे हराते हैं-संदर्भःभारत पाकिस्तान संबंध (Yogi Sanyam se shatru ka Chhidranveshan ka use harate hain-India Pakistan Relation)


                      पाकिस्तानी भले ही परमाणु बम लेकर बरसों से भारतीय हमले से बेफिक्र हैं यह सोचकर कि हम एक दो तो भारत पर पटक ही लेंगे तब वह डर जायेगा। अब उन्हें हमारी प्यार भरी सलाह  है कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी से उनको डरना ही चाहिये क्योंकि वह योगाभ्यासी हैं।  एक सामान्य व्यक्ति तथा  योग साधक में अंतर होता ही है।  अपनी बात पूरी करने से पहले उनको बता दें कि उन्हें योग के आसन और प्राणायाम के विषय ही सुने हैं-वह भी टीवी चैनल देखकर-जबकि धारणा, ध्यान और समाधि भी उसका ऐसा हिस्सा है जिसे पाकिस्तानी क्या समझेंगे अभी तक भारत कुछ ही योग अभ्यासी हिन्दू समझ पाये हैं।
                          उरी की घटना के बाद तत्काल पाकिस्तान पर हमला करने की मांग उठी थी पर कुछ लोगों ने माना कि ऐसा करना गलती होगी।  अभी तक एक भी कदम नहीं उठाया गया है। हम मान लेते कि सब कुछ पहले की तरह ही सामान्य हो जायेगा पर प्रधानमंत्री मोदी की गतिविधियों को टीवी पर देखकर पता लगता है कि वह हर छोटी बड़ी चीज पर स्वयं विचार कर रहे हैं।  पतंजलि योग में संयम की चर्चा हैं जिसे हम धारणा व  ध्यान का मिश्रित पर्याय भी कह सकते हैं।  योगसिद्धांतों  के अनुसार किसी विषय, व्यक्ति या वस्तु पर संयम करने से उसके बारे में संपूर्ण चित्र अंतर्मन में आने लगता है।  इतना ही नहीं न लिखी गयी, न सुनी गयी और न देखी गयी सामग्री सामने आती दिखती है।  मोदी जी हर विषय पर दृष्टिपात करने के साथ ही पाकिस्तान की हरकतों पर संयम कर रहे होंगे-यानि पहले उससे संबंधित विषय को चित्त की धारणा में लाते होंगे फिर उस पर ध्यान लगाते होंगे। ध्यान के बाद उनकी जब समाधि लगती होगी तो जरूर कुछ निष्कर्ष सामने होते होंगे।  आज नहीं तो कल नहीं तो परसों समाधि में मोदी जी पाकिस्तान का वह छेद देख ही लेंगे जो आज तक कोई नहीं देख पाया है।  एक बात तय रही कि हमारी दृष्टि से पाकिस्तान अब एतिहासिक दुष्परिणाम की तरफ बढ़ रहा है क्योंकि उसने अभी तक किसी ऐसे प्रधानमंत्री का सामना नहीं किया होगा जो विश्वभर के नेताओं को व्यक्तिगत रूप से प्रभावित कर रहा हे।
                     पाकिस्तान के कला, साहित्य, अर्थ तथा राजनीति के शिखर पुरुष भारत के विरोधी न भी हों तब भी वह हिन्दू संस्कृति का नाम नहीं सुनना चाहते। उन्हें अरेबिक संस्कृति पूरी तरह से प्रिय है। मगर हम  देश के दक्षिणपंथियों विचारकों को बता दें कि कुछ ऐसा जरूर होगा जो पाकिस्तान की धारा बदल देगा।  हम जैसे लोग इसके लिये एक दो महीने नहीं ढाई साल तक इंतजार कर सकते हैं। योगी अपने संयम से शत्रु के छेद ढूंढकर उसे परास्त करना जानते हैं।
                 नोट-यह लेख अरेबिक विचाराधारा के पोषक पाकिस्तानियों की समझ में नहीं आयेगा अतः उन्हें पढ़कर समझाने का कोई उच्चस्तरीय अंतर्जालीय प्रयास न करें।
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              सूचना-अगर भारत के टीवी चैनल इस लेखक को बहसों में बुलाना चाहें तो वह दिल्ली आ सकता है। मोबाईल फोन न-8989475367, 9993637656, 8989475264 

Saturday, September 24, 2016

मोदीजी का भाषण पाकिस्तान के लिये मीठा व धीमा परमाणु बम भी साबित हो सकता है-हिन्दी संपादकीय (Modi Speach in Kozhikode-HindiEditorial)


                    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी योग साधक हैं और मानना पड़ेगा कि उनकी बुद्धि तथा वाणी में सरस्वती विराजती है।  कोझिकोड में आज उनके भाषण का सही अर्थ बहुत कम लोग समझ पायेंगे।  खासतौर से राष्ट्रवादी विचारकों के लिये भाषण के पूरे मायने समझना कठिन होगा-वह अखंड भारत का सपना देखते हैं पर कोई सार्वजनिक रूप से हमारी तरह नहीं कह पायेगा कि यह भाषण ‘अखंड भारत’ के प्रधानमंत्री का भाषण था। मोदी जी देश के पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने सिंध, बलूचिस्तान और पख्तूनों की जनता को बता दिया कि पाकिस्तान का मतलब पंजाब तक ही सीमित है। नवाज शरीफ और राहिल शरीफ पंजाबी हैं-इसी कारण आज तक वहां  सेना लोकतंत्र का बोझ ढो रही है। भारत तथा पाकिस्तान के टीवी चैनलों अनेक पाक सेना के पूर्व अधिकारी पंजाबी वक्त आते हैं जिन्हें लाहौर व इस्लामाबाद से आगे कुछ दिखता नहीं जहां से अब उनके लिये आफत आने वाली है।
              नवाज शरीफ आज आराम से सो सकते हैं क्योंकि मोदी जी ने त्वरित रूप से सैन्य कार्यवाही का संकेत नहीं दिया पर अपनी वायुसेना को इधर से उधर उड़ाकर पाकिस्तान को युद्ध की तैयारी के लिये तत्परता दिखाने वाला राहिल शरीफ अगले अनेक कई दिनों तक सो नहीं पायेगा। कहते हैं कि जहां तलवार काम नहीं करती वहां कलम या शाब्दिक चातुर्य काम करता हैं।  पाकिस्तान के कथित पंजाबी राष्ट्रभक्त आज अपने देश का नक्शा देख रहे होंगे  जो पश्चिमी पंजाब तक सिमटा नज़र आयेगा। राष्ट्रवादी शायद ही इस बात को समझ पायेंगे कि आज प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त के बाद अपने दूसरे भाषण में प्रगतिशील और जनवादी विद्वानों का उद्वेलित कर दिया है।
          इस भाषण को सिंध और पंजाब से आये हिन्दुओं की वह पीढ़ी पूरी तरह समझेगी जिसने अपने बुजुर्गों की आंखों में बंटवारे का दर्द देखा है। हमने अपनी माता पिता की आंखों में सिंध का नाम लेते ही जो दर्द देखा है उसे आज तक नहीं भूले। सिंधी हिन्दूओं की पूरी कौम एक तरह लुप्त करने का षड्यंत्र रचा गया-यही कारण है कि जब देशभक्ति जागती है तो ऐसे महापुरुषों के प्रति भी मन वितृष्णा से भर जाता है जिन्हें कथित स्वतंत्रता के बाद महापुरुष कहा जाता है।
                 याद रखें यह भारत के प्रधानमंत्री का भाषण था जिसे सरकारी घोषणा या नीति भी माना जाता है।  आज तक किसी प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के सिंधी, बलूच तथा पख्तून जनमानस को इस तरह सीधे संबोधित नहीं किया। यह अनोखा दिन है-राहिल शरीफ की सारी अकड़ इतने में ही निकल जायेगी। वह सोचेगा कि आखिरी वह किस पाकिस्तान का सेनाध्यक्ष है।  सिंध, बलूच और पख्तून जनता पर इसका जो प्रभाव होगा उसका अनुमान वही कर सकता है जो पाकिस्तान की मीडिया पर नज़र रखे हुए है-पाक टीवी चैनल पर एक पंजाबी पूर्व सैन्य अधिकारी पख्तूनों को नमकहराम तक करार दिया था। जातीय संघर्ष में फंसा पाकिस्तान अब धार्मिक परचम के नीचे एक नहीं रह पायेगा। तत्काल तो नहीं पर कालांतर में यह भाषण धीमा और मीठा परमाणु बम भी साबित हो सकता है। 
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नोट-अगर कोई टीवी चैनल वाला हमें इस विषय पर हमें आमंत्रित करना चाहे तो हम कल दिल्ली आने वाले हैं। 
दीपकबापूवाणी

Wednesday, September 21, 2016

बेजुबानों में ही अब मौन बचा है-दीपकबापूवाणी (Bejubanon mein hi maun bacha hai-DeepakBapuWani)

अंग्रेजी में मु्फ्त के माल उड़ायें, हिन्दी में पराये शब्द जुड़ायें।
‘दीपकबापू’ तोतलों की संगत में, अच्छा है वाणी से मौन जुडायें।
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चारों तरफ शांति का शोर मचा है, बेजुबानों में ही अब मौन बचा है।
मन के मीत करें धन से प्रीत, साहुकार वही जिसे काला धन पचा है।।
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असल के नाम पर नकल मिलाया है, अमृत कहकर विष खिलाया है।
‘दीपकबापू’ गम करना बेकार माने, सभी ने खुशी से दर्द पिलाया है।।
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भीड़ में बहुत मिले लोग, मगर दोस्त अब भी दिल में छाये हैं।
तन्हाई नहीं अब सताती इतना, अच्छी यादें जो साथ लाये हैं।
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दिन में राम का नाम जापें, रात को रम में गला तापें।
‘दीपकबापू’ खड़े दरबार में, भक्त अपना ही भाव नापें।।
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नाम के त्यागी सिंहासन पर विराजे, बजवा रहे प्रशंसा में बाजे।
‘दीपकबापू’ पकड़े वैभव मार्ग, भक्तों को दिखाते स्वर्ग के दरवाजे।
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नारे लगाकर वह लूट जाते, वादे निभाने से भी छूट जाते।
‘दीपकबापू’ शिष्टाचारी ठग बने, भले लोग झूठ से टूट जाते।।
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मौसम बदलने के अहसास नहीं होते, जज़्बात सामानों का बोझ ढोते।
‘दीपकबापू’ दिल के अंदाज से अनजान, अपने लिये ही अकेलापन बोते।।
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शांति की बात कातिलों से करते, भलमानसों में अपने लिये शक भरते।
‘दीपकबापू’ चला रहे बहसों का दौर, लाशों की तरफ देखने से डरते।।
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पहले पांच बरस बीते, अगले भी बीत जायेंगे।
‘दीपकबापू’ बनाये नये नारे, नयी फसल लायेंगे।।
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