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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Saturday, July 1, 2017

जीएसटी पर इस तरह का जश्न मनाना समझ में नहीं आया-हिन्दी संपादकीय (HindiEditorial On GST)


                                              जीएसटी लागू करने के बाद संसद में  15 अगस्त 1947 की तरह जश्न मनाना अपने आप में आश्चर्य की बात है।  हमें तो आश्चय इस बात पर हो रहा है कि राष्ट्रवादी विचारक देश में कर आतंक की बात करते रहे पर उससे देश को मुक्ति दिलाने की बजाय जीएसटी को ही एक बृहद रूप में इस तरह लागू किया जिससे व्यापारी वर्ग घबड़ा रहा है। एक मजेदार तक यह दिया जा रहा है कि जिन वस्तुओं पर 31 फीसदी के हिसाब से कई कर थे अब 28 प्रतिशत किया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि फायदा क्या हुआ? कर की दर का आतंक तो खत्म नहीं हुआ न।
                                  व्यापारियों को डर जीएसटी से नहीं वरन् आयकर से हैं। जीएसटी का नंबर तो लेना ही पड़ेगा जिससे उनके व्यापार पर सरकार नज़र रहेगी। इस तरह उनकी आय का अनुमान सरकार को होता रहेगा।  जीएसटी के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे व्यापारियों की भीड़ में जाकर प्रत्येक से उसके आयकर भरने की राशि पूछी जाये तो पता चल जायेगा कि वह कितना गरीब हैं।  सालाना तीन लाख से ऊपर कमाने वाला कर्मचारी आयकर देने को बाध्य होता है-दफ्तर में उसका हिस्सा काट लिया जाता है-जबकि बीस तीस और पचास लाख तक कमाने वाले व्यापारियों का सर्वे करें तो पता लगेगा कि कितना आयकर दे रहे हैं। आठ लाख वेतन पाने वाले कर्मचारी और दस लाख कमाने वाले व्यापारी के जीवन स्तर में भारी अंतर क्यों होता है?
                             समस्या यही है कि जीएसटी के आने से सबका धंधा सरकार की नज़र में आयेगा तब उनसे आयकर भी वसूल हो सकता है। यही डर इन व्यापारियों को सता रहा है वरना ग्राहक चुकाने वाले हैं तब व्यापारियों के लिये कौनसी परेशानी है। वैसे सरकार से भी यह पूछना चाहिये कि पेट्रोल, शराब व भवननिर्माण जैसे कमाऊ तथा भ्रष्टाचार वाले व्यवसायों को जीएसटी से अलग क्यों रखा गया है? जम्मूकश्मीर में तो भाजपा की सरकार है वहां इसे लागू होने से रोकना भी खतरनाक लगता है।  अलबत्ता पूंजीपतियों को इससे राहत मिलेगी क्योंकि वह अपने लिये सारी सुविधायें चाहते है-एक पूंजीपति का दावा तो हमने सुना भी होगा जो एक दल के अपनी जेब में होने का दावा करता है।

Sunday, October 9, 2016

राज्यप्रमुख को अपनी सफलता जनता के साथ बांटना चाहिये-हिन्दी संपादकीय (StateChief Should Share His Succes with Public-HindiEditorial)

                                        राज्यप्रमुख का यह दायित्व है कि वह अपनी जनता का मनोबल भी बनाये रखे-ऐसा हमारे अध्यात्मिक दर्शन के प्रमुख विद्वान कौटिल्य का कहना है। अभी बताया जा रहा है कि पाकिस्तान के आतंकवादी हमलों का बदला भारत की सरकार ने पहले भी लिया था।  कभी यह घटना प्रमुख समाचार होना चाहिये थी पर अब रहस्योद्घाटन की तरह सामने आ रही है।  दरअसल अब भारतीय सेना ने सीमा पारकर उरी हमले का बदला पाकिस्तानी सेना से लिया और इसको प्रचारित भी किया। उसके बार पाकिस्तान के साथ विश्व में सनसनी फैल गयी-पाकिस्तान तो बहुत डर गया है और वहां अब अनेक चिंतायें घर करने लगी हैं।  इससे भारतीय जनमानस में उरी बदले के बाद की कार्यवाही करने के लिये अपनी सेना के प्रति सम्मान बढ़ा है।  कुछ लोगों को इस बदले की कार्यवाही पर नहीं वरन् उसके  प्रचार पर एतराज हैं।  हमें नहीं हैं क्योंकि जब पिछले हमले हुए थे उसमें देश की हानि होने से हमारा मनोबल गिरा था। बदले की कार्यवाही  हुई पर बताया नहीं गया जिससे हमें तसल्ली होती। 
             हमें याद है कि हमारे सैनिकों के सिर काटकर पाकिस्तानी सेना ले गयी थी। तब मन में बहुत पीड़ा हुई थी।  अब कह रहे हैें कि उस समय भारतीय सेना ने भी तीन पाकिस्तानियों के सिर काटे थे।  अब बताने का फायदा नहीं है क्योंकि उस घटना की पीड़ा हमारे मन में बहुंत समय तक रही थी।  हम मानते हैं कि भारतीय सेना ने बदला लिया पर उसका प्रचार नहीं हुआ। इससे पाकिस्तान के कर्ताधर्ता अपनी छवि विश्व में बनाये हुए थे और अवसर मिलने पर घातक प्रहार करते रहे।  इतना ही नहीं भारत में पाक समर्थक बुद्धिमानों का समूह भी अपना काम करता रहा।  अब समस्या यह हो गयी है कि भारत ने जमकर अपनी कामयाबी का प्रचार किया है जिससे पाकिस्तान की छवि एक कमजोर राष्ट्र के रूप में हो रही है।  इससे पाकिस्तान तथा भारत में उसकी समर्थक बुद्धिजीवी समूह की छाती पर सांप लोट रहा है।  भारत की वैश्विक प्रचार जगत में पाकिस्तान पर बढ़त बनी हुई हैं और यही तो हम चाहते थे।  आजकल प्रचार का युग है इसलिये हर राज्यप्रमुख को अपनी सफलता सार्वजनिक रूप से जनता के साथ बांटना चाहिये। इसलिये हम अपने वीर जवानों को सलाम करते हैं।
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अन्य ट्विटर पाठ

                   आजकल प्रचार जगत में अक्षयकुमार और अजय देवगन के वक्तव्य राष्ट्रभक्ति के संदर्भ में प्रमुखता से आ रहे हैं। पहले क्यों इनकी अनदेखी होती थी कोई बतायेगा? हम सीधी बात बताते हैं कि राज्य प्रबंध का समाज पर बहुत प्रभाव होता है और उसकी गतिविधियों से अप्रत्यक्ष संकेत भी लोगों पर प्रभाव डालते हैं। अक्षय कुमार, अनिली कपूर, अजय देवगन और सुनील शेट्टी हिन्दी फिल्मों मेें ऊंचे स्तर के अभिनेता हैं। अक्षयकुमार के बारे में तो कहा जाता है कि वह फिल्म जगत को सबसे अधिक राजस्व अर्जन में योगदान देता है। बरसों तक उसका प्रचार ऐसे होता रहा जैसे कोई साधारण कलाकार हो।  सुनील शेट्टी और अजय देवगन भी बहुत बरसों से सफल फिल्में देते रहे हैं पर प्रचार में उनके बयान कभी प्रमुखता से नहीं आये।   अब अचानक उन्हें महत्व मिलने लगा है।

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                             बात तो सही है कि जब सीमा  पर शहीद जवानों का शव तिरंगे में लिपटकर आता है तब कोई सबूत नहीं मांगता पर अब जब सीमा पार जाकर दुश्मनों को निपटाकर कर जीवित आये हैं तो सबूत मांगे जा रहे हैं।  हमारी सलाह है ऐसे लोग अपने मित्र पाकिस्तान का रुदन देकर समझ क्यों नहीं जाते या उसे सांत्वना देने के लिये अपना कर्तव्य निभा रहे हैं।
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                   वैसे राष्ट्रवादियों ने कभी इस तरफ ध्यान नहीं दिया पर हमने अनेक पाठ इस पर लिखे थे।  अब भी राष्ट्रवादी शायद ही  इस बात को समझ पायें कि राज्य प्रबंध भी समाज पर बहुत प्रभाव डालता है। अतः जरूरी है कि इसमें कुशलता दिखाते हुए जनहित भी करना चाहिये । अंततः राज्य प्रबंध से जनमानस का अर्थ भी सिद्ध होना चाहिये वरना अलोकप्रिय होने पर पर हवा विपरीत दिशा में भी चली जाती है।
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Saturday, October 1, 2016

आलोचकों को देशद्रोही कहकर देशभक्ति का प्रमाणपत्र न बटोरें-हिन्दीसंपादकीय (Noy San AniNational to Critics-HindiEditoiral)

                                                       हमारा मानना है कि भारत में पाकिस्तान के कलाकारों को काम करने का अवसर अब नहीं देना चाहिये क्योंकि दुनियां में उसे अलग थलग करने के प्रयासों मे शेष विश्व को यह दिखाना पड़ेगा कि हम हर क्षेत्र में अपना काम कर रहे हैं।  यह तर्क राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत दिखता है पर इसमें साक्ष्य है जिसे समझा जाना चाहिये।  कुछ लोग हैं जो पाकिस्तानी कलाकारों पर बंदिश का विरोध कर रहे हैं।  हम उनके विरोध से सहमत नहीं है पर इसका मतलब यह नहीं है कि हम देशद्रोही कहकर अपमानित करें। राष्ट्रभक्त के प्रमाणपत्र के लिये ऐसे आलोचकों को राष्ट्रदोही कहना हमें सही नहीं लगता। राष्ट्रभक्ति के नाम पर अभिव्यक्ति की शर्तें तय नहीं होना चाहिये।
               हमारे देश के ही अनेक फेसबुकिये ऐसे वीडिया हमारे सामने रख रहे हैं जिसमें पाक के कुछ चैनल अपने यहां निष्पक्ष लोगों की बात दिखाते हैं जो अपने ही देश के लोगों से सहमत नहीं होते पर इसका मतलब यह कतई नहीं कि उन्हें वहां देशद्रोही कहकर अपमानित करते हों।  अतः हमारा अपने ही देश के बुद्धिमानों से आग्रह है कि वह फिल्मों में पाक कलाकारों का भारत में काम करने का समर्थन कर रहे हैं उनका तर्क से सामना करें पर उन्हें देशद्रोही कहकर तिरस्कृत न करें। वैसे तो इस वातावरण में भारतीय टीवी चैनलों को स्वयं ऐसे ही समाचारों से बचना चाहिये।
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                      अर्नब गोस्वामी ने पहली बार एक शब्द उपयोग किया ‘मुंबईया फिल्मों में पाक समर्थक लॉबी’ है। कोई हमारी यह राय भी वहां तक पहुंचा दे कि यह कमाई की वजह से पाक की नहीं बजाते बल्कि उनकी पूंछ दबी हुई हैं। किसने दबा रखी है सब जानते हैं।
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                अब यह यकीन होने लगा है कि पाकिस्तान की नादान सेना मानेगी नहीं और भारतीय सेना बिना क्षति उठाये उसका नामोनिशान मिटा देगी-यह हमें अपनी सेना की रणनीति देखकर यही लगता है-तब यहां उसकी समर्थक फिल्म लॉबी का क्या होगा?,
            पाकिस्तान के कलाकारों पर प्रतिबंध लगाना इसलिये भी जरूरी है कि उसे विश्व में अलगथलग करने के लिये लिये हमें उसका शत्रू दिखना है। मुंबईया फिल्म में पाक समर्थक लॉबी अगर इस तरह विलाप करेगी तो जनता उनके फिल्म और नाटकों का नकार देगी।

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