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Monday, March 27, 2017

हमने तो यादों का खजाना संभाला था=छोटीकविताये एवं क्षणिकायें (Hamne yandon ka khazana sanbhala thaa-Short HindiPeom)

दिमाग बंद कर
दिल का दरवाजा
खोला नहीं जाता।
हादसों में घाव का
बहता रक्त
तोला नहीं जाता।
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सुंदरता के सभी दीवाने
दिल की बात
समझे कोई नहीं।
झील से गहरी आंखों पर
मरने वाले न जाने
वह सोई नहीं।
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हमने तो यादों का
खजाना संभाला था
पर उनके दिल पर ताला था
भटके ज़माने में 
कौन उन्हें
समझाने वाला था।
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उनके कंधों पर उम्मीद रखी
यही हमारा कसूर है।
नतीजा अब यह कि
दिल से यकीन दूर है।
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अगर फूलों के रंग होते
हम भी होली मना लेते।
भावनाओं के तार मिलते
प्रेम की झोली बना लेते।
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दिल की पहचान नहीं
दिमाग से प्यार करें।
जज़्बातों को छू नहीं पायें
आंखों में नकली प्यार भरें।
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खिलाड़ी भी बिकते हैं,
महंगे हों वही टिकते हैं।
बाज़ारवाद के दौर में
बंधुआ आजाद दिखते हैं।
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फुर्सत नहीं मिलने का
बहाना हमेशा करते हैं।
मुफ्त की मुलाकातों से
वह शायद डरते है।
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कपड़े के रंग से बनाते छवि
वह कैसे फकीर हैं।
राजस्व की लूट से बने
वह कैसे अमीर हैं।
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इशारे क्या समझेंगे
शब्दों को ही नहीं समझ पाते।
वह खुश हैं ज़माने से
कहे जो नासमझ जाते।
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इश्क के किस्से भी
रोज सुनाये जाते हैं।
आज भी मरे आशिक
नकदी से भुनाये जाते हैं।
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अपनी प्रतिष्ठा गंवाकर
दूसरे की निंदा करते हैं,
इस तरह आत्मसम्मान
वही जिंदा करते हैं।

Wednesday, September 21, 2016

बेजुबानों में ही अब मौन बचा है-दीपकबापूवाणी (Bejubanon mein hi maun bacha hai-DeepakBapuWani)

अंग्रेजी में मु्फ्त के माल उड़ायें, हिन्दी में पराये शब्द जुड़ायें।
‘दीपकबापू’ तोतलों की संगत में, अच्छा है वाणी से मौन जुडायें।
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चारों तरफ शांति का शोर मचा है, बेजुबानों में ही अब मौन बचा है।
मन के मीत करें धन से प्रीत, साहुकार वही जिसे काला धन पचा है।।
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असल के नाम पर नकल मिलाया है, अमृत कहकर विष खिलाया है।
‘दीपकबापू’ गम करना बेकार माने, सभी ने खुशी से दर्द पिलाया है।।
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भीड़ में बहुत मिले लोग, मगर दोस्त अब भी दिल में छाये हैं।
तन्हाई नहीं अब सताती इतना, अच्छी यादें जो साथ लाये हैं।
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दिन में राम का नाम जापें, रात को रम में गला तापें।
‘दीपकबापू’ खड़े दरबार में, भक्त अपना ही भाव नापें।।
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नाम के त्यागी सिंहासन पर विराजे, बजवा रहे प्रशंसा में बाजे।
‘दीपकबापू’ पकड़े वैभव मार्ग, भक्तों को दिखाते स्वर्ग के दरवाजे।
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नारे लगाकर वह लूट जाते, वादे निभाने से भी छूट जाते।
‘दीपकबापू’ शिष्टाचारी ठग बने, भले लोग झूठ से टूट जाते।।
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मौसम बदलने के अहसास नहीं होते, जज़्बात सामानों का बोझ ढोते।
‘दीपकबापू’ दिल के अंदाज से अनजान, अपने लिये ही अकेलापन बोते।।
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शांति की बात कातिलों से करते, भलमानसों में अपने लिये शक भरते।
‘दीपकबापू’ चला रहे बहसों का दौर, लाशों की तरफ देखने से डरते।।
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पहले पांच बरस बीते, अगले भी बीत जायेंगे।
‘दीपकबापू’ बनाये नये नारे, नयी फसल लायेंगे।।
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