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Wednesday, May 25, 2016

जरूर बदल जाते हैं-हिन्दी कविता (jaroor badal jate hain-Hindi Poem)

मकान रहते वहीं रहते
घर के रूप 
जरूर बदल जाते है।

चमकते महल भी
इतिहास के खंडहर में
जरूर बदल जाते हैं।

कहें दीपकबापू धरती पर
इंसान बनता बहुरूपिया
यह अलग बात है
सभी एक दिन तस्वीर में
जरूर बदल जाते हैं।
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दीपक  राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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Thursday, April 14, 2016

रक्तकुंड अब नीर कहलाने लगे हैं-हिन्दी क्षणिकायें (Hindi ShortPoem)

रौशनी के रहवासी
अंधेरों के घेरे से
घबड़ाते हैं।
नहीं जानते
रौशनी के खंबे
अंधेरी बस्तियों के
मजदूर ही लगाते हैं।
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सौदागर कर रहे
लोगों से घर में
रौशनी के लिये चांद का सौदा।
विज्ञापन के बीच जारी बहस
बेईमानी कम करने पर
भूले ईमानदारी का मसौदा।
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अरसा हो गया
धरती से फरिश्तों को
लापता हुए
अब यादों में ही आते हैं।

अब तो शैतान ही
मुखौटा लगाकर
धोखा देने आते हैं।
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जहान की चिंता करते
शब्दों के व्यापारी
चीज कोई बेचते नहीं
छवि बना लेते भारी।
सपने साथ वादों का
व्यापार अनवरत जारी
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हमने तो हमदर्दी जताई
वह रस्म मानकर सो गये।

हमारे दिल से निकले
शब्द हवा में खो गये।

दर्द हल्का करने का भ्रम
यूं ही ढो गये।
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आत्मघात करने वाले
अब वीर कहलाने लगे हैं।

ज़माने के लिये रोने वाले
अब पीर कहलाने लगे हैं।

कहें दीपकबापू रक्तकुंड
अब नीर कहलाने लगे हैं।
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दीपक  राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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Sunday, March 13, 2016

राज्य जोंक की तरह व्यापार से कर वसूल करे-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(State Must libral on Tax for Trade Devlopment-A Hindu Hindi Thought based on ManuSmiriti(

हमारे देश की अर्थव्यवस्था समाजवाद के उस उस खिचड़ी सिद्धांत पर आधारित है जो पूंजीवाद और जनवाद के मिश्रित तत्वों बना है। इस सिद्धांत के अनुसार धनिक से अधिक कर लेकर गरीब का कल्याण किया जाना चाहिये।  जिस कृषि को भारतीय अर्थव्यवसथा का आधार माना जाता है वहां से कोई कर नहीं वसूला जाता-अनेक लोगों ने राय दी थी कि बड़े किसानों पर कर लगना चाहिये पर भारतीय आर्थिक रणनीतिकर इस सोच से भी घबड़ाते हैं कि कहीं उन पर गरीब विरोधी होने का आरोप न लग जाये। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि समाजवाद के नाम पर नये पूंजीपति पैदा होने से रोका गया जिससे कथित विकास के नाम पर चंद औद्योगिक घराने परंपरागत रूप से अपना वर्चस्व बनाये हुए हैं।  उदारीकरण की प्रक्रिया में भी उन्हें ही सुविधायें मिल रही हैं। इससे हुआ यह कि हमारे यहां परंपरागत व्यापार  पर ही करों का बोझ पड़ा है जो कि मध्यमवर्ग ही संचालित करता है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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यथा फलेन युज्येत राजा कर्ता च कर्मणाम्।
तथ वेष्य नृपो राष्ट्रे कल्पयेत् सततं करान्।।
हिन्दी में भावार्थ-राज्य प्रबंधक को कर इस तरह लगाना जिससे व्यापार की बढ़ोतरी होने के साथ कोषालय में यथोचित लाभ पहुंचे। ठीक उसी तरह जैसे जोंक, बछड़ा तथा भ्रमर धीरे धीरे भोजन ग्रहण करते हैं।
अगर हम अपने देश के परंपरागत ढांचे को देखें तो यहां कृषि के बाद उच्च, मध्यम तथा निम्न तीनों वर्ग इस पर आश्रित रहे हैं।  नयी शिक्षा प्रणाली जहां पहले ही व्यापार करने की प्रवृति का हतोत्साहित कर रही थी वहीं अब आधुनिक विकास ढांचे में उसके लिये जगह ही नहीं बची है। औद्यागिक संस्थान अपने उत्पादों का व्यापार स्वयं कर रहे हैं। इतना ही नहीं आवश्यक खाद्य पेय वस्तुओं को भी वह बृहद व्यापार संस्थानो में विकास की वस्तुऐं बना रहे हैं जिससे परंपरागत व्यापार का स्वरूप ढहता जा रहा है जो कि हमारे समाज का कृषि के बाद दूसरा ठोस आधार है।
यह सही है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है पर समाज के केंद्र बिंदू में स्थित होने के कारण व्यापारिक वर्ग का बहुत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यही वर्ग संस्कार, संस्कृति तथा धर्म की धारा का नियमित प्रवाह भी करता रहा है। अगर हम चाहते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था सृदृढ़ हो तो हमें इस वर्ग में प्रोत्साहन की धारा प्रवाहित करनी होगी।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Saturday, February 20, 2016

मनृस्मृति में वर्णित हैं धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत-हिन्दी चिंत्तन लेख(Secularism Thought in ManuSmriti-Manuwad Is GraeatThought-HInduDharama Sandesh)

                        भारतीय तथा पाश्चातय धार्मिक विचाराधाराओं में मूल अंतर यह है कि हम मनुष्य के कर्म को ही धर्म की संज्ञा देते हैं जबकि विदेशी पूजा पद्धति के आधार पर उसका नाम तय करते हैं। भारत में विदेशी धार्मिक व सामाजिक विचाराधाराओं के साथ ही अध्यात्म में विषय में भ्रम पैदा हुआ है। हमारे यहां अभी तक राज्य प्रबंध के समर्थन के कारण प्रगतिशील तथा जनवादी चिंत्तन धारा अे पेशेवर विचारकों को समर्थन मिला जिससे वह समाज में बौद्धिक शिखर पर प्रभावी हो गये। यही कारण है कि हमारे यहां लोगों के इष्ट, पूजा पद्धति तथा पहनावे के आधार पर धर्म का रूप तय किया जाने लगा है। इसके बाद भारतीय समाज में जाति, क्षेत्र तथा भाषा के आधार पर बांटकर उसे आपस में लड़ाया जाता है। कर्म वह आचरण के आधार पर किसी के व्यक्तित्व व कृत्तिव पर दृष्टिपात करने की बजाय उसके भौतिक रूप को ही श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति बढ़ गयी है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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जातिज्ञानपदान्धर्मान्श्रेणीधर्माश्च धर्मवित्।
समीक्ष्य कुलधर्माश्च स्वधर्म प्रतिपादवेत्।।

                        हिन्दी में भावार्थ-धर्मज्ञ राजा को जाति धर्म, जनपद धर्म, श्रेणी धर्म तथा कुल धर्म को अच्छी तरह समझकर अपने धर्म का अनुसरण करना चाहिये।
                        हमारे यहां राज्य की धर्मनिरपेक्षता से आशय पाश्चात्य आधार पर बने संज्ञाधारी धर्मों को समान देखने की दृष्टि से माना जाता है जबकि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार कर्म के आधार पर बने धर्मो में बीच सामंजस्य स्थापित करना राजधर्म बताया गया है। जाति, जनपद या क्षेत्र, व्यवसाय या श्रेणी तथा कुल के आधार पर हर मनुष्य में स्वभाविक गुण होते हैं जिनकी जानकारी होने पर राज्य प्रमुख सहजता से प्रजा पर नियंत्रण कर सकता है। हमने देखा होगा कि हमारे देश में कुछ जातियों में दैहिक  क्षमता व आक्रामक प्रवृत्ति किसी क्षेत्र विशेष में उत्पन्न के कारण अधिक होती है जिससे उसके लोगों को रक्षा संस्थाओं में सेवा करने के लिये वरीयता दी जाती है।  यह ठीक भी है जहां बल से कार्य होता है वहां उसमें दक्ष व्यक्ति ही आवश्यक है लेकिन जहां बुद्धि तथा व्यवसाय कौशल वाली सेवाओं में वह दक्षता की बजाय किताबी ज्ञान देखा जाता है जबकि वहां प्रबंध कुशल के साथ ही व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता भी देखा जाना चाहिये।
                        रक्षाकर्मी का रक्षा, व्यवसायी का व्यवसाय, बुद्धिमान का मार्गदर्शन तथा सेवक का सेवा ही कर्म होता है जिसका निर्वाह ही उसका धर्म भी है।  राज्य प्रबंध में कुशल प्रमुख अपने देश की जातियों, वर्णों तथा वर्गों के कर्म तथा धर्म को समझकर उसमें अपने अनुकूल सेवका का चयन करता है। सर्वधर्मसमभाव की कला में पारंगत राज्य प्रमुख ही सहजता से राज्य कर सकता है-हमारी दृष्टि से मनुस्मृति की यही मान्यता लगती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Sunday, February 14, 2016

ज्ञान से प्रतिपक्षी को परास्त करें-हिन्दी चिंत्तन लेख (Gyan se praipakshi ko parast kar-Hindi Thought article)


                        सामाजिक जनंसपर्क ने जहां विश्व में धाक जमाई हैं वहीं अभद्र भाषा के शब्दों के प्रयोग ने चिंता का वातावरण भी बनाया है। अनेक बार ऐसा होता है कि हम जैसे लेखक किसी फेसबुक, ट्विटर वह ब्लॉग पर प्रदर्शित सामग्री पर असहमति जताने की चाहत इसलिये भी छोड़ देते हैं कि वहां बीभत्स शब्द पहले ही दर्ज होते हैं। यह डर लगता है कि कहीं हम आक्रामक विरोधियों के साथी न समझ लिये जायें। शुद्ध देशी भाषा की गालियां देखकर मन खराब हो जाता है। दुनियां में संसार में समाज भिन्न व्यक्तियों, विचारों व विषयों के समूह से ही बनता है।  भिन्नता से भरा है इसलिये तो समाज कहलाता है। एकरूपता होने पर तो एक ही इकाई ही कहलाता न! ऐसे में अपने से प्रथक विचार वाले व्यक्ति की उपस्थिति सहजता से स्वीकार करना चाहिये न कि उस पर आक्षेप लगाकर अपने अंदर कुंठा लाना चाहिये।
                        सामवेद में कहा गया है कि ‘ऋतस्य जिव्हा पवते मधु।’ सच्चे मनुष्य की वाणी से मधु टपकता है।
                        जब हम किसी विचार से असहमत हों तो उस पर प्रतिविचार अभिव्यक्त कर सकते हैं-यही ज्ञानी होने का प्रमाण भी होता है। तर्क में भार बढ़ाने के लिये अभद्र शब्द का पत्थर रखना आवश्यक नहीं-अगर रखते हैं तो यही माना जायेगा कि वक्ता या लेखक में अपने ही शब्दों के प्रति विश्वास नहीं है।
                        अथर्ववेद में कहा गया है कि ‘क्षिणामि ब्रह्णामित्रायुन्नयामि स्वानहम्।’ ज्ञान से विरोधियों का क्षरण कर अपने को आगे बढ़ाये।’
                        हमारे देश में विद्वानों के बीच विचाराधाराओं का द्वंद्व सदैव रहा है। भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा के वाहक होने के नाते हमारा अन्य  विचाराधारा के विद्वानों से मतभेद रहा है। उनसे बहसें भी होती रहीं है पर हमने हमेशा अपनी सहज प्रवृत्ति से उनके सामने अपने तर्क रखे हैं। इधर अंतर्जाल पर प्रगति व जनवादी विद्वान भी अपनी पूरी उसी पूरी शक्ति के साथ सक्रिय है।  उनका राष्ट्रवादी विचाराधारा के विद्वानों से पंरपरागत प्रचार माध्यमों में सदैव वाद विवाद रहा है पर इधर अंतर्जाल पर भयानक वाक्युद्ध में बदल गया है। चूंकि राष्ट्रवादी विचाराधारा के लेखक हमारा अध्यात्मिक लेखन के कारण हमारा सम्मान करते हैं इसलिये उनसे यह अपेक्षा रहती है कि वह सभी का सम्मान करें। खासतौर से जब राष्ट्रवादी भारत के प्राचीन दर्शन को जब अपना प्रिय विषय मानते हैं तब यह आशा तो की ही जाती है कि वह ज्ञान से प्रतिपक्षियों को परास्त करें। यही हमारे वेद  भी कहते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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